Who Was Nadir Shah – नादिर शाह कौन था

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नादिरशाह का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था और शुरू में वह एक में लुटेरों के दल का सरदार था। प्रारम्भिक कठिनाइओं और अभावों ने उसे बहुत मजबूत और साहसी बना दिया। अफगानों के द्वारा 1722 ई. में फारस के शाह हुसैन सफावी से फारस का सिंहासन छीन लिये जाने के बाद नादिरशाह ने सिंहासन पर पुनः अधिकार करने में मदद की।

Who Was Nadir Shah – नादिर शाह कौन था

इसके पश्चात् वह 1727 ई. में शाह हुसैन के पुत्र शाह ताहमास्प की नौकरी में भर्ती हो गया। शाह की अकर्मण्यता का लाभ उठाकर नादिरशाह फारस का वास्तविक शासक बन बैठा और 1732 ई. में उसने शाह ताहमास्प को गद्दी से हटा दिया। शाह के अवयस्क पुत्र एवं उत्तराधिकारी की मृत्यु के पश्चात् नादिरशाह फारस के शासन का सर्वेसर्वा बन गया।

मुगल साम्राज्य, जिसकी स्थापना बाबर ने की, जिसको स्थायित्व प्रदान किया अकबर ने और जिसकी सीमाओं का सर्वाधिक विस्तार हुआ औरंगजेब के समय में, के परवर्ती कुछ शासक अत्यधिक अयोग्य एवं निकम्मे हुये। उनकी योग्यता तथा अमीर वर्ग की स्वार्थपूर्ण गतिविधियों के परिणामस्वरूप मुगल सरकार भ्रष्ट और अकर्मठ हो गई।

इसकी शक्ति की धाक न केवल भारतवर्ष में ही समाप्त हो गई वरन् विदेशों में भी इसकी शक्ति का भय जाता रहा। इसकी स्थिति लगभग वही हो गई जो तुर्की सल्तनत की तुगलक शासकों के शासन काल के दौरान थी। भारत का उत्तरी-पश्चिमी सीमान्त प्रान्त धीरे-धीरे मुगल बादशाहों की पकड़ से निकलता जा रहा था और फारस के शाह ने अवसर पाकर कन्धार भी मुगलों से छीन लिया था।

Who Was Nadir Shah – नादिर शाह कौन था

औरंगजेब के समय में ही उत्तरी-पश्चिमी सीमान्त पर नियंत्रण रख पाना मुगलों के लिये कठिन हो रहा था। इस स्थिति ने फारसियों को मुगल साम्राज्य पर आक्रमण करने का एक अच्छा अवसर प्रदान किया। 1736 ई. तक अपनी आन्तरिक समस्याओं से निबटकर उन्होंने भारत पर आक्रमण करने की योजना बनाई, जिसका नेतृत्व किया नादिरशाह नाम के एक साहसी यौद्धा ने।

नासिर खां एवं जकारिया खां, जो क्रमशः काबुल एवं पंजाब के गवर्नर थे, ने अपने-अपने प्रान्तों की सुरक्षा के पर्याप्त प्रयत्न किये, परन्तु असफल रहे। इसका प्रमुख कारण था कि इस समय केन्द्र में विभिन्न दलों में सत्ता के लिये संघर्ष चल रहा था और इन योग्य गवर्नरों के द्वारा केन्द्र से सहायता की मांग पर इनके विरोधियों की कुचालों के कारण ध्यान नहीं दिया जा सका।

परिणामस्वरूप इनकी सहायता की अपील दरबार तक पहुंच ही नहीं पाई, जिसके कारण आक्रमणकारी नादिरशाह निर्वाध आगे बढ़ता गया। नादिरशाह 1738 ई. में भारत की ओर चला। उसने पहले तो अपने देश को अफगान आक्रमणकारियों से स्वतंत्र किया। इसके बाद उसने मुहम्मदशाह के पास दो दूत भेजे जिनके माध्यम से उसने उनसे अफगान शरणार्थियों को देश में शरण न देने की प्रार्थना की, परन्तु मुहम्मदशाह ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया।

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इस पर नादिरशाह ने तीसरा दूत भेजा, परन्तु मुहम्मदशाह ने इस बार भी उसकी प्रार्थना की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। फलतः नादिरशाह आक्रमण के लिये बढ़ा। मुगलों के द्वारा अपनी उत्तरी-पश्चिमी सीमान्त की सुरक्षा की उपेक्षा के कारण नादिरशाह को 1739 ई. में गजनी, काबुल और लाहौर पर अधिकार करने में किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं हुई।

उसके आक्रमण से सम्पूर्ण पंजाब में अव्यवस्था फैल गई, परन्तु रंगीले मुहम्मदशाह और उसके दरबारियों ने उसके आक्रमण को हंसी में उड़ा दिया तथा उसने अपने देश की सुरक्षा करने का कोई प्रयास नहीं किया। उन्हें अक्ल तब आई जब आक्रमणकारी दिल्ली से कुछ ही दूर रह गया। अब यह निश्चय हुआ कि बादशाह स्वयं जाकर इस आक्रमणकारी को खदेड़ दे।

इसलिये वह एक बड़ी सेना लेकर करनाल पहुंचा तथा उसकी सहायता के लिये अवध का सूबेदार सआदतखां भी पहुंच गया। परिणामस्वरूप फरवरी 1739 ई. में करनाल की लड़ाई हुई जिसमें नादिरशाह की विजय हुई। पराजित बादशाह मुहम्मदशाह अब पूर्णतः नादिरशाह की कृपा पर आश्रित था और संधि वार्ता के अतिरिक्त उसके पास और कोई विकल्प नहीं था।

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विजेता नादिरशाह मुहम्मदशाह को बन्दी बनाकर उसके साथ दिल्ली आया जहां वह शाहजहां के मयूर सिहांसन पर बैठा। 20 मार्च को नगर में उसका जुलूस निकाला गया और ईद तथा ईरानी नये साल के उपलक्ष में उसके नाम का खुतबा पढ़ा गया। नादिरशाह ने शाही खजाने के असंख्य बहुमूल्य मोती, हीरे-जवाहरात और प्रसिद्ध तख्त-ए-ताऊस अथवा मयूर सिंहासन पर भी अधिकार कर लिया।

अभी तक शहर में पूर्ण शांति थी, परन्तु तभी कुछ शरारती तत्वों ने नादिरशाह की मृत्यु की अफवाह फैला दी, इससे कुछ अव्यवस्था फैल गई तथा दिल्ली के नागरिकों ने कुछ ईरानी सिपाहियों की हत्या कर दी। नादिरशाह ने पहले तो इस अव्यवस्था को समाप्त कर उपद्रव को दबाने का प्रयास किया, परन्तु अपने मृत सैनिकों का खून देखकर नादिरशाह आग-बबूला हो गया।

उसने आग-बबूला होकर दिल्ली के नागरिकों के कत्लेआम की आज्ञा दे दी। एक समकालीन वृत्तान्त से पता चलता है कि वह कत्लेआम सुबह आठ बजे से लेकर दोपहर तीन बजे तक चलता रहा जिसमें लगभग 30 हजार स्त्री, पुरुष, बच्चे मारे गये तथा असंख्य घरों को आग लगा दी गई।

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जो लोग बचे भी वे भी अकथनीय कष्टों के शिकार हुये क्योंकि नादिरशाह के सैनिकों ने न केवल लूटपाट ही की वरन् धान्यागारों पर भी ताले लगा दिये और वहां पर अपने रक्षक तैनात कर दिये जिससे जनता को अत्यधिक कष्ट हुआ। ईरानी सैनिकों ने दिल्ली में गणमान्य नागरिकों को पैसा वसूल करने के दृष्टिकोण से खूब सताया।

लगभग आठ सप्ताह तक दिल्ली लूट और आगजनी का शिकार बनी रही। अन्ततः मुहम्मदशाह की प्रार्थना पर नादिरशाह ने यह हत्याकाण्ड रोका, परन्तु दिल्ली में शान्ति और व्यवस्था तब तक कायम न हो सकी जब तक कि नादिरशाह वहां से चला नहीं गया।

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नादिरशाह के आक्रमण के परिणाम

आर्थिक और राजनैतिक दोनों ही दृष्टिकोणों से नादिरशाह के आक्रमण के परिणाम मुगल साम्राज्य के लिये अत्यधिक नुकसानदेह हुये। मुहम्मदशाह यद्यपि बादशाह तो बना रहा परन्तु उसको बहुत अधिक नुकसान उठाने पड़े। नादिरशाह अपने साथ उसके ताज के समस्त हीरे जिसमें प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी था, तख्त-ए-ताऊस तथा हिन्दू संगीत पर मुहम्मदशाह के समय में लिखी गई एक महत्वपूर्ण कृति की फारसी प्रतिलिपि भी ले गया।

नादिरशाह के एक सचिव के अनुसार उसने दिल्ली से लगभग 15 करोड़ रुपया नकद तथा बहुत सारे हीरे-जवाहरात, वस्त्र और शाही स्टोर से अन्य बहुमूल्य वस्तुयें वसूल की। वह अपने साथ 300 हाथी, 10,000 घोड़े तथा लगभग इतने ही ऊंट भी ले गया। इस प्रकार नादिरशाह के आक्रमण से पतनोन्मुख दिल्ली साम्राज्य, जिसकी आर्थिक स्थिति पहले से ही खराब थी, की अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुंचाया। इसके साथ ही सिन्धु पार के प्रदेश (सिंध, काबुल और पंजाब के पश्चिमी इलाके) ईरानियों को सौंप देने पड़े।

इस प्रकार नादिरशाह के आक्रमण के निम्नलिखित परिणाम दृष्टिगोचर होते हैं I

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जन और धन की अपार हानि – अनेक लोग मारे गये। बहुत अर्से तक गलियों में मुर्दे पड़े रहे। सारा नगर भस्मीभूत हो गया। किले में जो भी शाही जवाहरात, सम्पत्ति और कोष मिला, सब ईरानी विजेता ने हथिया लिया। करीब 60 लाख रुपये और कई अशर्फियां उसके हाथ आयीं। एक करोड़ रुपये का सोना और 50 हजार के जवाहरात थे I

जिसकी तुलना संसार में किसी से नहीं हो सकती थी। लगभग 348 वर्ष का संग्रह एक ही क्षण में एक हाथ से दूसरे हाथ में चला गया। इस प्रकार नादिर के आक्रमण का मुगल साम्राज्य की आर्थिक स्थिति पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। नादिर की लूट-खसोट के कारण उद्योग तथा व्यापार को प्रबल आघात हुआ।

कश्मीर से सिन्ध तक का प्रदेश हाथ से निकल जाना – दिल्ली से ईरान की ओर प्रस्थान करने के पूर्व नादिर ने मुहम्मदशाह को बादशाहत लौटाते हुये उसके सिर पर राजमुकुट रखा और एक जड़ाऊ तलवार उसकी कमर में बांधी। बादशाह ने घोषणा की कि ‘शहंशाह की उदारता से मुझे मुकुट और सिंहासन दुबारा मिला है और संसार के सम्राटों में मेरा स्थान ऊंचा हो गया है I

इसलिये सिन्ध नदी के पश्चिम का प्रदेश–कश्मीर से सिन्ध तक और इसे अतिरिक्त ठट्टा और उसके अधीन बन्दरगाह को खिराज (कर) के रूप में देता हूं। इस प्रकार मुगल साम्राज्य का बहुत महत्वपूर्ण भाग अर्थात् सिन्ध के उस पार के प्रान्त जिसमें अफगानिस्तान भी शामिल है, अब सदा के लिये बाबर के वंशजों के हाथ से निकल गये।

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इसके अतिरिक्त नादिर ने सिन्ध नदी के इस पार चार परगनों पर भी अपने अधिकार का दावा किया। यद्यपि ये परगने लाहौर के सूबेदार के संरक्षण में रहे, नादिर ने उससे यह समझौता किया कि इन परगनों की आय अर्थात् 20 लाख रुपये प्रतिवर्ष नादिरशाह को भेजे जायेंगे।

उत्तर-पश्चिमी सीमा का आरक्षित हो जाना – सतीशचन्द्र के अनुसार, “काबुल के मुगल साम्राज्य से अलग हो जाने तथा सिन्धु नदी के 4 प्रदेश निकल जाने के भारत के लिये उत्तर-पश्चिम सीमा की रक्षा का प्रश्न पुनः महत्वपूर्ण हो गया। अगले 50 वर्षों से अधिक तक उत्तर-पश्चिम की ओर से बराबर भारत पर आक्रमण हुये।

इस आक्रमणों के फलस्वरूप किसी नये राजवंश की नींव भारत में नहीं पड़ी किन्तु राजनीति पर उसका विशिष्ट प्रभाव पड़ा। इस प्रकार नादिर ने भारत पर आक्रमण का द्वार खोल दिया तथा भारत की लूट मार कितनी आसान है-यह दिखा दिया।”

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मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को धक्का – नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला दिया। उसने मुगलों की सैनिक शक्ति की दुर्बलता को प्रकट कर दिया। मजूमदार, रे चौधरी तथा दन्त का कथन है कि मुगल साम्राज्य की अब की बची-खुची प्रतिष्ठा भी नष्ट हो गयी तथा अब इसका पतन संसार के समक्ष स्पष्ट हो गया…..।’

अवध बिहारी पाण्डेय का कथन है कि नादिरशाह के आक्रमण से सम्राट की प्रतिष्ठा धूल में मिल गई। वह अपनी ही राजधानी में बन्दी की तरह रहा और उसकी आंखों के सामने उसकी प्रजा के ऊपर सभी प्रकार के अत्याचार किये गये…”

मराठों एवं सिक्खों के प्रभुत्व में वृद्धि – नादिर के दिल्ली से लौट जाने के बाद मराठों ने मुगल साम्राज्य की कमजोरी का लाभ उठाते हुये दक्षिण मालवा एवं गुजरात में अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उन्होंने बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर भी अपनी चौथ लाद दी।

इस प्रकार मुगल साम्राज्य का दक्षिणी, पश्चिमी और पूर्वी भाग पूर्णरूप से मराठों के अधिकार में आ गया। इसके अतिरिक्त उत्तर भारत में सिक्खों ने पुनः उपद्रव करना शुरू कर दिया। उन्होंने पंजाब तथा दिल्ली के आसपास के प्रदेशों पर छापे मारकर मुगलों को परेशान कर दिया। इस प्रकार मुगल साम्राज्य अपने विनाश की ओर बढ़ता चला गया।

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युद्ध में हल्की तोपों और जल्दी चलने वाली बन्दूकों का प्रयोग – सतीशचन्द्र के अनुसार, ‘सामाजिक दृष्टि से भी नादिर के आक्रमण का विशिष्ट प्रभाव उत्तर भारत पर पड़ा।’ ‘नादिरशाह की हल्की तोपें, जजायल, रहकला इत्यादि शस्त्रों ने युद्ध में विशेष प्रभाव दिखाया था। जल्दी चलने वाली बन्दूकों का प्रयोग भी नादिरशाह ने किया था।’

विशेष रूप से रोहिल्ले सिपाहियों ने इन बन्दूकों का प्रयोग प्रारम्भ किया। केवल मराठों ने इनके प्रति ध्यान नहीं दिया। फलस्वरूप धीरे-धीरे रोहिल्ले मराठा घुड़सवारों का सामना करने के लिये नये प्रयोग कर सके। मराठों के ऊपर इसका प्रभाव घातक रूप से पानीपत की तीसरी लड़ाई में पड़ा।

आर्थिक दृष्टिकोण से ही नहीं राजनैतिक दृष्टिकोण से भी नादिरशाह का आक्रमण मुगल साम्राज्य के लिये अत्यधिक घातक हुआ। यद्यपि मुगल साम्राज्य पहले से ही पतनोन्मुख था, परन्तु अभी भी उसकी प्रतिष्ठा बनी हुई थी। नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल साम्राज्य की कमजोरी, केन्द्रीय सरकार की अशक्तता, दरबार में फैली अव्यवस्था तथा आर्थिक दिवालियेपन को सबके समक्ष उजागर कर दिया।

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नादिरशाह के आक्रमण के द्वारा मुगल साम्राज्य को पहुंचाये गये आघात के ही परिणामस्वरूप उसके विघटन की प्रक्रिया तेज हो गई तथा प्रान्तीय सूबेदारों ने अपने-अपने स्वतंत्र राज्यों का निर्माण करना प्रारम्भ कर दिया। अब केन्द्रीय सरकार का अस्तित्व वस्तुतः समाप्त हो गया और उसकी शक्ति प्रान्तों में विभाजित हो गई। ऐसी दशा में मुगल साम्राज्य का अधिक समय तक चलना संभव नहीं रहा।

नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल साम्राज्य को जो आघात पहुंचाया उससे उबर पाना उसके लिये संभव नहीं था, परन्तु रही सही कसर पूरी कर दी नादिरशाह के आक्रमण ने। अब मुगल बादशाह केवल नाममात्र का शासक रह गया, जिसका लाभ उठाकर अंग्रेजों ने भारतवर्ष पर अपनी राजनैतिक सत्ता की स्थापना के अपने प्रयास शुरू कर दिये।

धीरे-धीरे सत्ता अंग्रेजों के हाथ में केन्द्रित होती चली गई और अयोग्य और निकम्मे शासक उसके हाथों की कठपुतली बन गये। मुगल साम्राज्य यद्यपि चलता तो रहा 1857 ई. तक, परन्तु औरंगजेब की मृत्यु के बाद ऐसा कोई शासक नहीं हुआ जिसकी उपलब्धियों की चर्चा की जा सके।

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नादिरशाह के भारत पर आक्रमण के कारण

फारस पर प्रभुत्व स्थापित करके नादिरशाह ने कंधार पर आक्रमण करने का निश्चय कर लिया क्योंकि वह अफगान शक्ति का ऐसा सुदृढ़ केन्द्र था जहां अफगानों को जड़ से उखाड़ कर फारस के पूर्वी भाग की रक्षा की जा सकती थीं। इसके अतिरिक्त कंधार की विजय के उपरान्त अफगानों की शक्ति को अपनी ओर लाकर उसका प्रयोग दूसरे पड़ौसी देशों की विजय करने हेतु किया जा सकता था।

अतः नादिरशाह ने कन्धार पर आक्रमण कर दिया और 12 मार्च, 1738 को नादिशाह ने कन्धार के सुदृढ़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया। कन्धार पर अधिकार प्राप्त करते ही नादिरशाह की ललचायी हुई दृष्टि भारत पर पड़ी जो इस समय इतनी जर्जरित अवस्था में था कि किसी भांति भी नादिरशाह जैसे कुशल सेनानायक का सामना नहीं कर सकता था। इस प्रकार नादिरशाह के भारत पर आक्रमण के निम्नलिखित कारण थे

मुगल साम्राज्य की दुर्बलता – नादिरशाह के आक्रमण के समय मुगल साम्राज्य जर्जरित अवस्था में था। औरंगजेब के जीवन के अन्तिम काल से ही मुगल साम्राज्य की अवनति प्रारम्भ हो गयी थी। औरंगजेब के उत्तराधिकारी अयोग्य थे। उत्तराधिकार के संघर्ष में कई योग्य सेनापति काम आ गये थे। दक्षिण में मराठों के विरुद्ध अनेक लड़ाइयों में बुरी तरह पराजित होने के कारण मुगल सेना की दुर्बलता प्रकट हो चुकी थी।

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केन्द्रीय सरकार की दुर्बलता के कारण पृथकतावादी तत्वों को प्रोत्साहन मिला, जिसके फलस्वरूप बंगाल, अवध तथा दक्षिण के प्रान्त लगभग स्वतंत्र हो चुके थे। इसके अतिरिक्त सिक्ख, जाट, बुन्देल आदि मुगल साम्राज्य की कमजोरी का लाभ उठा रहे थे और विभिन्न क्षेत्रों में अंशाति तथा अराजकता फैला रहे थे।

तत्कालीन मुगल सम्राट मोहम्मदशाह विलासप्रिय, आलसी, दुर्व्यसनी और राजनीतिक कर्तव्यों के प्रति उदासीन था। मुगल दरबार में दलबन्दी चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी और सभी अमीर अपनी स्वार्थ सिद्धि एवं एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हुये थे। अतः इन परिस्थितियों में नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण करने का निश्चय कर लिया।

नादिरशाह की महत्वाकांक्षा और धन प्राप्ति की लालसा – नादिरशाह महत्वांकाक्षी था और तुर्कों के विरुद्ध युद्ध जारी रखने के लिये धन भारत पर आक्रमण करके ही प्राप्त किया जा सकता था। सो इसलिये भी उसने भारत पर आक्रमण किया।

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विद्रोही अफगानों को शरण देना – कन्धार से भागे हुए अफगान मुगल साम्राज्य में शरण ले चुके थे। मुगल बादशाह उनका काबुल में प्रवेश रोकने में असमर्थ रहा।

आरक्षित सीमा – भारत में प्रवेश करने का रास्ता अफगानिस्तान व पंजाब होकर था और ये दोनों सीमावर्ती प्रान्त उस समय पूर्णरूपेण अस्त-व्यस्त थे। सीमावर्ती प्रान्त पंजाब भी आरक्षित अवस्था में था।

काफिरों को दण्डित करना – यद्यपि नादिरशाह के भारत पर आक्रमण करने के कारण राजनीतिक तथा आर्थिक थे, किन्तु मुस्लिम जनता को प्रभावित करने के लिये नादिरशाह ने यह घोषणा की कि उसका उद्देश्य मुगल साम्राज्य को दक्खिनी काफिरों (मराठों) से बचाना है।

एक सामाजिक लेखक के अनुसार वजीर व अमीरों ने समझा कि मराठा बहुत शक्तिशाली और बादशाह कमजोर हो गये हैं, बाजीराव ने दिल्ली तक देश को रौंद डाला है और भौंसले ने अयोध्या व बंगाल तक तहलका मचा दिया है। अतः ईरानी बादशाह को आमन्त्रित करके नवीन साम्राज्य की स्थापना करनी चाहिये।

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तारीखे हिन्द के लेखक रुस्तमअली ने अभियोग लगाया है कि निजामुल्मुल्क तथा सआदत खां ने नादिरशाह को आमन्त्रित किया। इसके साथ मुहम्मदशाह नादिरशाह के विरोधी अफगान सरदारों को शरण दे रहा था। नादिरशाह ने ऐसा न करने की प्रार्थना की। परन्तु मुहम्मदशाह ने इस ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। फलस्वरूप नादिरशाह आक्रमण करने के लिए मजबूर हो गया। यह उसके आक्रमण का तात्कालिक कारण था।

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