Third Anglo Mysore War – तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध

Third-Anglo-Mysore-WarThird Anglo Mysore War

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध मैसूर राज्य के शासक टीपू सुल्तान और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच 1789 से 1792 के दौरान हुआ था। यह युद्ध आंग्ल-मैसूर युद्ध मालिका का तृतीय युद्ध था। अंग्रेजो के साथ हैदर के पहले दो युद्ध हो चुके थेI अंग्रेजो से संघर्ष टीपू को परंपरा में मिला I टीपू की महत्वाकांक्षा शान्त होने वाली नहीं थी। अंग्रेजों के विरुद्ध घृणा तो उसे विरासत में मिली थी। वह फ्रान्सीसियों के सहयोग से अंग्रेजों को नीचे दिखाना चाहता था।

Third Anglo Mysore War – तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध

उसकी महत्वाकांक्षा ने उसे अशान्त बना दिया। अपनी शक्ति के विचारों से प्रोत्साहित और अंग्रेज के विरुद्ध भावना से ग्रस्त उसने अपने को फ्रान्सीसियों से बुरी तरह जोड़ा, जिनकी सहायता की आशा से वह भयावह और घृणित शक्ति को नीचा दिखाना चाहता था। 1784ई. मंगलौर की सन्धि के अनुसार टीपू सुल्तान और अंग्रेजों में शान्ति स्थापित हो गई थी, लेकिन यह सन्धि कोई स्थायी समझौता नहीं था। शीघ्र ही कुछ ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हुई, जिन्होंने तृतीय मैसूर युद्ध को अनिवार्य कर दिया

युद्ध के कारण – तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे I

(1) टीपू सुल्तान अपने पिता की भांति अंग्रेजों से घृणा करता था और वह विदेशी शक्तियों के सहयोग से उनको दक्षिण भारत से बाहर निकाल देना चाहता था। दूसरी ओर अंग्रेज भी टीपू की शक्ति को नष्ट करना चाहते थे।

(2) इस समय टीपू ने अंग्रेजों के विरुद्ध विदेशी सहायता प्राप्त करने का प्रयत्न किया। 1786 ई. में टीपू ने गुलाम अली खां के नेतृत्व में प्रतिनिधि मण्डल कुस्तुनतुनिया में टर्की के सुल्तान के पास भेजा, ताकि अंग्रेजों के विरुद्ध सहायता प्राप्त की जा सके। इसी प्रतिनिधि मण्डल को कुस्तुनतुनिया से फ्रान्स जाना था, ताकि अंग्रेजों के विरुद्ध फ्रान्सीसियों की सहायता भी प्राप्त की जा सके।

जुलाई 1787 ई. में टीपू ने एक दूसरा राजदूत मण्डल फ्रान्स भेजा। यद्यपि दोनों ही स्थानों पर उसके राजदूत मण्डलों का अच्छा स्वागत हुआ, परन्तु आश्वासन के अतिरिक्त उसे कोई विशेष भौतिक सहायता प्राप्त नहीं हो सकी, क्योंकि उस समय टर्की का सुल्तान रूस और आस्ट्रिया के विरुद्ध संघर्ष में व्यस्त था और इस समय अंग्रेज उस की मदद कर रहे थे। फ्रान्स ने भी इंगलैण्ड को यह आश्वासन दे दिया था कि वह अंग्रेजों के विरुद्ध कोई उत्तेजनात्मक कार्यवाही नहीं करेगा।

Third Anglo Mysore War – तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध

टीपू के इन अंग्रेज विरोधी कार्यों से कार्नवालिस समझ गया था कि टीपू अंग्रेजों की शक्ति को नष्ट करने के लिए उत्सुक है। अत: उसके साथ निकट भविष्य में युद्ध अवश्यम्भावी है। अतः उसने 1788 ई. में पूना के रेजीडेण्ट मैलेट को लिखा था कि मैं समझता हूं कि फ्रान्स के साथ युद्ध का निश्चित एवं तात्कालिक फल होगा- टीपू के साथ युद्ध और इस अवस्था में, इन मराठों का शक्तिशाली सहयोग हमारे हितों के लिए बड़ा महत्वपूर्ण होगा। 

(3) टीपू के साथ संघर्ष को अवश्यम्भावी समझते हुए कार्नवालिस ने उसकी शक्ति को समाप्त करने का प्रयत्न आरम्भ कर दिये। इसीलिए उसने मराठों तथा भारत की अन्य शक्तियों का सहयोग प्राप्त करने का निश्चय किया।

(4) टीपू ने अपनी शक्ति में वृद्धि करने के लिए हैदराबाद पर आक्रमण कर गुन्दुर पर अधिकार कर लिया। हैदराबाद के निजाम ने गुन्दुर को पुनः प्राप्त करने के लिए अंग्रेजों से टीपू के विरुद्ध सैनिक सहायता देने की प्रार्थना की। इस समय कार्नवालिस इस निर्णय पर पहुंच चुका था कि टीपू की शक्ति को दबाने के लिए। अहस्तक्षेप के नीति का परित्याग करना आवश्यक है, परन्तु वह निजाम को सहायता देने के प्रश्न पर धर्म संकट में पड़ गया।

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Second Anglo Mysore War – द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध

यदि वह निजाम को सहायता देता है, तो पिट्स इण्डिया एक्ट की धारा का उल्लंघन होता है और यदि सहायता नहीं देता है, तो निजाम के भावी सहयोग से वंचित हो जाता है। फिर भी, उसने एक मार्ग ढूंढ निकाला। कार्नवालिस ने निजाम को 7 जुलाई, 1789 ई. को इस शर्त पर सैनिक सहायता देना स्वीकार कर लिया कि निजाम अंग्रेज सेना का उपयोग कम्पनी के किसी मित्र शासक के विरुद्ध नहीं करेगा।

कार्नवालिस ने निजाम को कम्पनी के मित्रों के नामों की एक सूची दी, जिसमें जान-बूझकर टीपू का नाम नहीं दिया गया था। अतः अप्रत्यक्ष रूप से कार्नवालिस टीपू के विरुद्ध निजाम को सैनिक सहायता देने के लिए तैयार हो गया। इससे टीपू को यह स्पष्ट हो गया कि अंग्रेज शीघ्र ही युद्ध के लिए तैयार हो रहे थे। कार्नवालिस के इस कार्य ने मैसूर युद्ध को अनिवार्य बना दिया।

(5) टीपू अंग्रेजों की कार्यवाहियों से सर्तक हो गया था। अतः उसने अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से 29 दिसम्बर, 1789 ई. में ट्रावनकोर पर आक्रमण कर दिया। ट्रावनकोर का राजा अंग्रेजों का मित्र था । अतः कार्नवालिस जो पहले से ही आक्रमण करने का अवसर ढूंढ रहा था, टीपू की इस कार्यवाही को सहन नहीं कर सका उसने टीपू के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया। यह तृतीय-आंग्ल मैसूर युद्ध का तत्कालीन कारण था।

Third Anglo Mysore War – तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध

कार्नवालिस ने युद्ध आरम्भ करने से पूर्व मराठा व निजाम से सन्धि करने का निर्णय किया, ताकि टीपू को निजाम और मराठों का सहयोग प्राप्त नहीं हो सके। अतः उसने 1 जून, 1790 ई. को मराठों के साथ और 4 जुलाई, 1790 ई. को निजाम के साथ मैसूर के विरुद्ध सन्धियां कीं। इन सन्धियों के अनुसार दोनों ने अंग्रेजों को सैनिक सहायता देने का वायदा किया और यह निश्चय किया कि युद्ध के पश्चात् जीते हुए प्रदेशों को वे तीनों आपस में बांट लेंगे।

इस प्रकार कार्नवालिस ने टीपू के विरुद्ध त्रिगुट का निर्माण कर लिया। इसके बाद टीपू नितान्त अकेला रह गया। उसे फ्रान्स से भी कोई सहायता प्राप्त नहीं हो सकी, क्योंकि एक वर्ष पहले फ्रान्स में जनक्रान्ति आरम्भ हो चुकी थी। अंग्रेजों के त्रिगुट के बारे में इतिहासकार फॉक्स ने लिखा है कि ‘एक न्यायप्रिय शासक के विरुद्ध डाकुओं की यह एक साजिश थी।’ इस प्रकार सुरक्षा करने के बाद अप्रैल, 1790 ई. में कार्नवालिस ने ट्रावनकोर पर आक्रमण का बहाना लेकर टीपू के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया।

युद्ध का प्रारम्भ – कार्नवालिस ने जून, 1790 ई. में मद्रास से एक सेना जनरल मीडोज के नेतृत्व में मैसूर पर आक्रमण करने में लिए भेजी। टीपू ने जनरल मीडोज़ को युद्ध में बुरी तरह परास्त किया, जिसके कारण मीड़ोज मद्रास की ओर भाग गया। इस घटना के सम्बन्ध में स्वंय कार्नवालिस ने 12 नवम्बर, 1790 ई. को डूण्डास को लिखा था कि ‘युद्ध की शीघ्र और सफल समाप्ति की मधुर आशा अब कुछ धुंधली हो गई है। हम युद्ध खो चुके हैं और हमारे शत्रुओं ने प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली है।’

Third Anglo Mysore War – तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध

वस्तुतः टीपू कार्नवालिस की आशा से अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ। अतः कार्नवालिस ने 1790 ई में टीपू के विरुद्ध सेना की बागडोर अपने हाथ में ली। कार्नवालिस वैलोर होता हुआ बंगलोर पहुंचा और 21 मार्च, 1791 ई. को उसने बैंगलोर पर अधिकार कर लिया । इसके बाद वह मैसूर की राजधानी श्रीरंगपट्टम की ओर बढ़ा। इसी समय रास्ते में निजाम और मराठे की सेनायें अंग्रेजों की सेना से मिल गईं। 13 मई, 1791 ई. को वह श्रीरंगपट्टम के पास पहुंच गया।

इतिहासकार बी. डी. बसु के अनुसार इस समय तक टीपू कम्पनी से मित्रता करना चाहता था। अतः उसने सन्धि के लिए दूत भेजा। कार्नवालिस ने टीपू के दूत से बात करने तक से इन्कार कर दिया। कार्नवालिस के श्रीरंगपट्टम के निकट पहुंचने पर टीपू ने साहस और सेनापति की योग्यता का परिचय दिया। फलस्वरूप कार्नवालिस को कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई।

इधर वर्षा आरम्भ होने से अंग्रेजों में बीमारी फैल गई तथा युद्ध सामग्री की कमी हो जाने के कारण कार्नवालिस को युद्ध बन्द कर 26 मई, 1791 ई. को लौटकर बैंगलोर आना पड़ा। नवम्बर, 1791 ई. में टीपू ने कोयम्बटूर को जीतने में सफलता प्राप्त की, परन्तु उसकी शक्ति क्षीण होती जा रही थी। बैंगलोर लौट आने के बाद कार्नवालिस ने पुनः आक्रमण किया। उसने नंदी दुर्ग पर अधिकार कर लिया और श्रीरंगपट्टम की ओर बढ़ा।

कार्नवालिस ने श्रीरंगट्टम के मार्ग में सभी पहाड़ी किलों पर एक एक करके अधिकार कर लिया और श्रीरंगपट्टम की ओर बढ़ा। कार्नवालिस ने श्रीरंगट्टम के मार्ग में सभी पहाड़ी किलों पर एक एक करके अधिकार कर लिया और फरवरी, 1792 ई. में वह श्रीरंगपट्टम किले की दीवार तक पहुंच गया। इससे टीपू की स्थिति अत्यन्त संकटापन्न हो गई, अतः उसने आत्मसमर्पण कर दिया और विवश होकर अपने दूत को सन्धि के लिए कार्नवालिस के पास भेजा। फलस्वरुप दोनों पक्षों के मध्य श्रीरंगपट्टम की सन्धि हो गई।

Third Anglo Mysore War – तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध

श्रीरंगपट्टम की सन्धि (23 मार्च, 1792 ई.)

कार्नवालिस और टीपू के मध्य 3 मार्च, 1792 ई. में श्रीरंगपट्टम में सन्धि हो गई। यह सन्धि श्रीरंगपट्टम की सन्धि कहलाती है। इस सन्धि की प्रमुख शर्तें निम्नलिखित थे I

(1) इस सन्धि के अनुसार टीपू को लगभग आधा राज्य अंग्रेजों को देना पड़ा।

(2) टीपू से प्राप्त प्रदेशों को कार्नवालिस, पेशवा व निजाम ने आपस में बांट लिया। इस बंटवारे में सबसे अधिक लाभ अंग्रेजों को प्राप्त हुआ। उन्हें माला-बार, डिण्डीगल, बड़ा महल नामक प्रदेश प्राप्त हुये। इससे उनके राज्य का सिर्फ विस्तार ही नहीं हुआ, बल्कि उन्हें सैनिक और राजनीतिक महत्व के प्रदेश भी प्राप्त हो गये। निजाम को कृष्णा नदी के आसपास का प्रदेश प्राप्त हुआ तथा मराठों को तुंगभद्रा के बीच का क्षेत्र प्राप्त हुआ।

(3) अंग्रेजों का कुर्ग के राजा पर आधिपत्य हुआ।

(4) टीपू ने युद्ध के हर्जाने के रूप में तीस लाख पौण्ड अंग्रेजों को देना स्वीकार किया।

(5) टीपू ने अपने दो पुत्रों मोइजुद्दीन व अब्दुल खलीक को अंग्रेजों के पास बन्धक के रूप में रखना स्वीकार किया। युद्ध की समाप्ति के उपरान्त कार्नवालिस ने अत्यन्त गर्व के साथ घोषणा की कि ‘अपने मित्रों को अत्यधिक शक्तिशाली बनाये बिना ही हमने अपने शत्रु को बुरी तरह से पंगु बना दिया है।’

Third Anglo Mysore War – तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध

श्रीरंगपट्टम की सन्धि की इंगलैण्ड में कटु आलोचना की गई। आलोचकों का कहना था कि इस अवसर पर उसने टीपू की शक्ति को पूर्ण रूप से नष्ट न कर भयंकर भूल की, जिसके कारण वेलेजली को पुन: टीपू से संघर्ष करना पड़ा, परन्तु उस समय परिस्थितियों को देखते हुए तो यही कहा जाएगा कि इस समय कार्नवालिस ने टीपू की शक्ति को पूर्ण रूप से नष्ट न कर और उसके साथ श्रीरंगपट्टम की सन्धि कर बड़ी कूटनीतिज्ञता का परिचय दिया था।

श्री रंगपट्टम की सन्धि के फलस्वरूप तृतीय मैसूर युद्ध का अन्त हो गया था, परन्तु दोनों ओर से पारस्परिक वैमनस्य का अन्त नहीं होने के कारण स्थाई शान्ति के आसार नजर नहीं आ रहे थे, यद्यपि टीपू ने विवश होकर सन्धि कर ली थी, फिर भी उसने साहस नहीं छोड़ा और अंग्रेजों से बदला लेने के लिए पुनः तैयारी करने लगा। टीपू ने फ्रान्सीसियों से व अफगानिस्तान के अमीरों से अंग्रेजों के विरुद्ध सहायता प्राप्त करने के लिए गुप्त वार्तायें आरम्भ कर दीं।

Chhava

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