Tej Bahadur Sapru – सर तेज बहादुर सप्रू

Tej-Bahadur-SapruTej Bahadur Sapru

गत शताब्दी में हमारे देश में अनेक विभूत्तियों उत्पन्न हुई जिन्होंने राष्ट्रीय एकता और भारत माँ को बेड़ियों से मुक्त करने के लिए उल्लेखनीय कार्य किया है। उनमें से कुछ ने क्रांति का रास्ता अपनाया तो कुछ ने संवैधानिक सुधारों के माध्यम से देश की सेवा की। भारत में जहाँ एक ओर विनय, बादल, दिनेश, खुदीराम, आजाद, भगत, सुखदेव अंग्रेजी सत्ता को येन केन प्रकारेण समाप्त करना चाहते थे और उसी के लिए अपनी जानें भी दीं।

Tej Bahadur Sapru – सर तेज बहादुर सप्रू

इसके विपरीत कुछ भारत के लाल अंग्रेजी सरकार और जनता के मध्य सेतु का काम करते। उनकी मान्यता थी कि सरकार पर दबाव डालकर वांछित परिवर्तन समाज में लाया जा सकता है। कुछ हमारे नेता उग्रवादी थे, तो कुछ उदारवादी। सर तेज बहादुर सप्रू भारत के अन्यतम रत्न थे जिन्होंने सारा जीवन राष्ट्र के उत्थान में लगाया। वे पंडित मोतीलाल नेहरू, देशबंधु चितरंजन दास आदि की तरह अपने समय के विख्यात विधिवेत्ता थे।

जन्म – तेज बहादुर का आविर्भाव 6 दिसम्बर, 1875 को अलीगढ़ में हुआ था। उनके पूर्वज कश्मीरी ब्राह्मण थे। जवाहरलाल के पूर्वजों के समान उनके पूर्वज भी कश्मीर से अलीगढ़ आये और बाद में इलाहाबाद में रहने लगे। तेज बहादुर के पिता श्री अम्बिकाप्रसाद घर के कार्य देखते और उनके पितामह सरकारी नौकरी करते थे। उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी थी, इसलिए सप्रू को बचपन में धनाभाव के कारण दर-दर की ठोकरें नहीं खानी पड़ीं।

शिक्षा – सर तेज बहादुर सप्रू बहुत ही होनहार बालक थे। जो पढ़ते शीघ्र याद कर लेते। उन्होंने 15 वर्ष की अवस्था में मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली। उन्होंने आगरा कालेज से प्रथम श्रेणी में बी.ए. और एम.ए. परीक्षा पास की। उन्होंने कानून के क्षेत्र में भी दक्षता प्राप्त कर ली। वे इने-गिने व्यक्तियों में थे जिन्होंने एम.ए. के साथ-साथ कानून में भी एल.एल. डी. की उच्च डिग्री प्राप्त की थी।

Tej Bahadur Sapru – सर तेज बहादुर सप्रू

वकील की तौर पर कार्य – वकालत की परीक्षा पास कर उन्होंने 1896 में मुरादाबाद में अपना व्यवसाय प्रारम्भ कर दिया, पर यहाँ वकालत ठीक से नहीं चली। पंडित मदनमोहन मालवीय से सप्रू की भेंट हुई। मालवीयजी में व्यक्ति को पहचानने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने स्रपू को इलाहाबाद आने का आमंत्रण दिया। सर तेज बहादुर सप्रू इलाहाबाद में आकर वकालत करने लगे। कुछ ही दिनों में उनकी वकालत चमक गयी।

उनमें अपने दृष्टिकोण को रखने की अद्भुत क्षमता थी। न्यायाधीश उनके अकाट्य तर्क से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। जब सप्रू न्यायालय में बहस करते तो सभी मंत्रमुग्ध हो जाते। उनमें एक अच्छे वकील के सभी गुण मौजूद थे। जैसे-संयमित भाषण शैली, अकाट्य तर्क, जोरदार दलील और प्रसन्नमुद्रा आदि।

भारतीय स्वतंत्रता में योगदान – सर तेज बहादुर सप्रू का व्यक्तित्व व्यापक था। वे केवल वकालत से सन्तुष्ट नहीं थे। सार्वजनिक कार्यों में भी भाग लेते थे। वे समय समय पर समाचार पत्रों में लेख लिखते। वे 1904 से 1917 तक इलाहाबाद में लॉ जर्नल के संपादक रहे। 1913 में वे उत्तर प्रदेश के एसेम्बली के सदस्य बने। 1916 में केन्द्रीय एसेम्बली के सदस्य बनाये गये।

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सप्रू ने वायसराय के साथ महात्मा गांधी की एक बैठक की व्यवस्था की लेकिन अली भाइयों को रिहा किए जाने तक कोई चर्चा नहीं होगी I यह गांधी की भूमिका थी इसलिए बातचीत के दरवाजे बंद हो गए। कानून मंत्री के रूप में, उन्होंने 1910 में लगाए गए समाचार पत्रों पर प्रतिबंध को कम करने की मांग की।

ई स वि 1908 की आपराधिक संहिता में कुछ मौलिक संशोधनों का भी सुझाव दिया। 1922 में माँटेग्यू इंग्लैंड गए। इससे पहले गांधी को छह साल की सजा सुनाई गई थी। सप्रू ने तब कार्यकारी बोर्ड के मंत्री के रूप में इस्तीफा दे दिया। इंग्लैंड की महारानी ने उन्हें नाइटहुड (KCSI) पुस्तक देकर उन्हें ‘सर’ की उपाधि प्रदान की। उन्हें राष्ट्रीय सम्मेलन में अध्यक्ष चुना गया था। अपने पहले ही भाषण में, उन्होंने द्विदलीय राज्य कानून  की तीखी आलोचना की और प्रांतीय स्वायत्तता की मांग की I

1920 में वे कानून सदस्य नियुक्त हुए। हिन्दुस्तान के बहुत से लोगों ने इसका विरोध किया, पर सपू अपने निर्णय पर अटल रहे। वे 1907 से लेकर 1918 तक बराबर कांग्रेस की सेवा करते रहे। महात्मा गाँधी द्वारा संचालित असहयोग आन्दोलन से वे अलग रहे। कांग्रेस की सदस्यता छोड़ दी। तदुपरांत कभी भी कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण नहीं की पर कांग्रेस की नीतियों का सदा समर्थन करते। वे भारतीय हित के प्रश्नों पर कभी भी चुप नहीं रहते थे। बड़ी निर्भीकता के साथ अपना विचार एसेम्बली में प्रकट करते।

Tej Bahadur Sapru – सर तेज बहादुर सप्रू

वह कांग्रेस के असहयोग और भारत छोड़ो आंदोलन से नाराज थे। उनका विचार था कि इस तरह की नीति से कड़वाहट पैदा होगी। वह सौहार्दपूर्ण बातचीत के जरिए इस मुद्दे को सुलझाने के इच्छुक थे। १९३५ में सविधान विधेयक के बारे में सब तरफ निराशा फैली हुई थी I निर्दलीय की स्थायी समिति ने जातीय मुद्दे (1944) को हल करने के लिए एक समिति नियुक्त की। उनकी अध्यक्षता सप्रू के पास आई। बाद में उन्हें सप्रू समिति के नाम से जाना जाने लगा।

गांधी-जिन्ना वार्ता विफल होने के बाद, सप्रू ने कठघरे में जाति के मुद्दों को सुलझाने के लिए 29 विभिन्न जातियों के प्रतिनिधियों की एक स्वतंत्र समिति का गठन किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए कुछ मौलिक अधिकारों को संविधान में शामिल किया जा सकता है, लेकिन जिन्ना की कट्टरता ने पाकिस्तान का गठन किया। उसके माता-पिता बहुत दुखी थे। हाल के दिनों में उनकी तबीयत बिगड़ी, लेकिन सरकार ने उन्हें रक्षा समिति में नियुक्त कर दिया

मदनमोहन मालवीयजी काशी में हिन्दू विश्वविद्यालय बनाने के लिए अथक प्रयास कर रहे थे। वे लोगों से संपर्क कर कोष संग्रह करते। सर तेज बहादुर सप्रू ने उनकी मदद की। सर तेज बहादुर सप्रू उर्दू को किसी सम्प्रदाय की भाषा नहीं मानते। ये हिन्दी के साथ-साथ उर्दू के विकास के लिए भी प्रयत्नशील थे।

Tej Bahadur Sapru – सर तेज बहादुर सप्रू

उन्होंने उर्दू और फारसी का गहराई के साथ अध्ययन किया। उन्होंने उर्दू की प्रगति के लिए ‘सह-इ-अदवे’ नामक संस्था का गठन किया। वे दिल्ली में आयोजित उर्दू साहित्य परिषद के अध्यक्ष बने। आज हमारे देश में कुछ स्वार्थी लोग भाषा और सम्प्रदाय के नाम पर संघर्ष करते हैं।

वे अपने निहित स्वार्थों के लिए राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को ही समाप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। मेरी तो मान्यता है कि हमें अधिक से अधिक भाषायें लिखनी चाहिए। भाषा का मुख्य लक्ष्य अपनी भावनाओं को दूसरों तक पहुँचाना है। कोई भी समझदार व्यक्ति भाषा के नाम पर दंगा करते नहीं देखा गया है। सर तेज बहादुर सप्रू ने भाषाई और साम्प्रदायिक एकता के लिए उल्लेखनीय कार्य किया है।

सर तेज बहादुर सप्रू जीवनभर दो विरोधी तत्त्वों को मिलाने का प्रयास करते रहे। असहयोग आन्दोलन में भी उन्होंने सरकार और कांग्रेस के बीच समझौता कराने का असफल प्रयास किया। वे उदारवादी दल के प्रमुख नेता थे और 1923 में पूना में अखिल भारतीय लिवरल फाउन्डेशन के सभापति थे तथा इसी वर्ष वे इम्पीरियल कांग्रेस में भारतीय प्रतिनिधि होकर गये थे।

Tej Bahadur Sapru – सर तेज बहादुर सप्रू

इसी सम्मेलन में उन्होंने घोषणा की “हम सभी ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत हैं और बराबरी का दावा करते हैं। हमको सम्राट के भोजन गृह से निकालकर उनके अस्तबल में नहीं भेजा जा सकता।” 1926 से 1936 तक सर तेज बहादुर सप्रू ने बराबर भारत के लिए नवीन शासन विधान की रचना के लिए कार्य किया।

नेहरू रिपोर्ट समिति के वे प्रमुख सदस्य थे। ज्ञातव्य है कि नेहरू रिपोर्ट में भारत के लिए आदर्श शासन विधान का प्रारूप तैयार किया गया था। इसका प्रभाव आज भी हमारे संविधान पर दृष्टिगोचर होता है। सर तेज बहादुर सप्रू ने इंगलेण्ड में आयोजित गोलमेज सभाओं में भाग लिया। पर उनके सुझाव का कोई बहुत प्रभाव नहीं पड़ा कारण हिन्दुस्तान के प्रायः सभी वर्गों के लोगों ने अपने-अपने समुदाय की बातें कहनी शुरू की।

यही कारण था कि एक इतिहासकार ने लिखा है कि गोलमेज परिषद में हिन्दू, मुसलमान, हरिजन सब अपनी बातें करते, पर भारत का यहाँ कोई प्रतिनिधित्व करने वाला नहीं था। 1935 में भारत सरकार अधिनियम पारित किया गया जिसमें कई त्रुटियाँ थी। सर तेज बहादुर ने इन त्रुटियों के खिलाफ आवाज बुलन्द की।

Tej Bahadur Sapru – सर तेज बहादुर सप्रू

तेज बहादुर सप्रू ने साम्प्रदायिक आधार पर निर्वाचन (Communal Award) का विरोध किया जिसमें हरिजनी को हिन्दुओं से अलग करने का प्रयास किया गया था। महात्मा गाँधी ने कम्युनल एवार्ड के विरुद्ध अनशन कर दिया। डाक्टर अम्बेडकर ने इस व्रत को राजनैतिक धूर्तता बताया और कई आलोचकों ने कहा कि यह चलपूर्वक अपनी मांगे मनवाने का तरीका है परन्तु इसका काफी अच्छा प्रभाव हुआ।

इससे हिन्दू नेताओं को हरिजनों का मूल्य महसूस हुआ और पंडित मदनमोहन मालवीय, राजेन्द्रप्रसाद तथा एस. एस. राजा के प्रयत्नों से एक समझौता हो गया। उसको महात्मा गाँधी तथा डाक्टर अम्बेडकर ने भी स्वीकार कर लिया। इस समझौते पर 26 सितम्बर, 1932 को हस्ताक्षर हुए और उसी दिन महात्मा गाँधी ने अपना व्रत तोड़ दिया। सर तेज बहादुर सप्रू ने पूना समझौते का स्वागत किया।

उन्होंने अम्बेडकर के उन सहयोगियों का विरोध किया जो पूना समझौते के खिलाफ़ बोल रहे थे। सर स्टाफर्ड किप्स 1941 में भारत में संवैधानिक गतिरोध को दूर करने के लिए आये। उनके प्रस्ताव का सभी नेताओं ने विरोध किया सप्रू की इच्छा थी कि क्रिप्स के प्रस्तावों का अध्ययन किया जाये।

Tej Bahadur Sapru – सर तेज बहादुर सप्रू

मृत्यु – देश की आजादी में सर तेज बहादुर सप्रू का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे पहले गरम दल के साथ थे, पर बाद में उदारवादी बन गये। उनका लक्ष्य संवैधानिक यंत्र द्वारा भारत का कल्याण करना था। वे बड़े सौभाग्यशाली नेता हुए जिन्होंने कम-से-कम अपने जीवन में भारत की स्वतंत्रता देख ली। देश की आजादी के बाद लगभग वे 2 वर्षों तक जिन्दा रहे। 20 जनवरी, 1949 में सर तेज बहादुर सप्रू का देहावसान एक लम्बी बीमारी के बाद हो गया।

Shetkaryancha Asud

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