Tatya Tope – तात्या टोपे

Tatya-TopeTatya Tope

तात्या टोपे सन् 1857 के विद्रोह के एक महान् सेनानी थे। वे पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब के यहाँ लिपिक थे। तात्या और नाना बालसखा भी थे। तात्या टोपे अपनी असाधारण वीरता और रण-कौशल के कारण एक सामान्य लिपिक के पद से उठकर नाना साहब की सेना के नायक पद तक पहुँचे।

Tatya Tope – तात्या टोपे

वे मराठा सेनानायकों की कुशल युद्धनीति (छापामार युद्ध-पद्धति) में अत्यंत सिद्ध होने के साथ-साथ शिवाजी महाराज की गुरिल्ला युद्ध नीति के भी अप्रतिम सेनानी माने जाते थे। उनके अत्यंत कुशल सैन्य नेतृत्व का पता इससे भी चलता है कि जिन अंग्रेजों को उन्होंने जीवन भर लोहे के चने चबवाए, वे भी उनके रण-कौशल की प्रशंसा करने से स्वयं को रोक नहीं पाते थे।

जन्म एवं प्रारंभिक जीवन – तात्या टोपे का जन्म सन् 1814 में नासिक के निकट पटौदा जिले के येवला नामक गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री पांडुरंग पंत था। वे शास्त्रोक्त कर्मकांड में कुशल विद्वान् पुरोहित थे। समाज में उनका बड़ा आदर सम्मान था। तात्या टोपे उनके ज्येष्ठ पुत्र थे। तात्या का वास्तविक नाम रामचंद्र पांडुरंग येवलकर था।

रामचंद्र के पिता श्री पांडुरंग पंत स्वयं तो सादा जीवन शैलीवाले एक धार्मिक व्यक्ति थे, परंतु रामचंद्र के जन्म के बाद उन्हें लगा कि वे अपनी आमदनी से अपने परिवार के लिए कुछ विशेष नहीं कर पाएँगे, जबकि रामचंद्र से उन्हें बड़ी अपेक्षाएँ थीं। अतः एक अच्छी नौकरी की तलाश में वे पेशवाओं की राजधानी पूना पहुँचे। वहाँ उनके एक परिचित श्री त्र्यंबकजी देंगले पेशवा के दरबार में नियुक्त थे।

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अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय सन् 1818 में बसाई के युद्ध में अंग्रेजों से हारने के बाद अब अपनी परिवर्तित राजधानी बिठूर (कानपुर से लगभग 12 मील दूर) में रह रहे थे। उन्हें अंग्रेजों द्वारा लाख रुपए वार्षिक पेंशन के रूप में मिलते थे बाजीराव द्वितीय स्वयं एक आस्थावान व्यक्ति थे और शास्त्र व वेदों के जानकार लोगों को भरपूर आदर-सम्मान देते थे।

श्री त्र्यंबकजी देंगले की मदद से जल्दी ही पांडुरंग को पेशवा से भेंट करने का अवसर मिल गया। पेशवा की अनुभवी आँखों में श्री पांडुरंग पंत के सौम्य- सरल व्यक्तित्व में छिपी विद्वत्ता को पहचान लिया और उन्हें अपने महल में बनी यज्ञशाला तथा धार्मिक विभाग का अध्यक्ष बना दिया। अपनी कार्य कुशलता के कारण जल्दी ही कई अन्य गृह विभागों की अध्यक्षता भी उन्हें मिल गई। पेशवा बाजीराव को बच्चों से बहुत लगाव था।

उनके बीच में पहुँचते ही वह स्वयं बच्चा बन जाते थे, परंतु इसे दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने तीन बालकों को गोद ले रखा था- नाना साहब, बाला साहब और बाबा भट्ट I श्री मोरोपंत तांबे भी अपनी पत्नी चिमाजी अप्पाराव की मृत्यु के बाद अपनी पुत्री मनु के साथ बिठूर आ गए थे। पेशवा बाजीराव मनु को बहुत अधिक स्नेह करते थे। उन्होंने प्यार से उसे ‘छबीली’ कहना आरंभ कर दिया। यही छबीली आगे चलकर झाँसी की वीर रानी लक्ष्मीबाई के नाम से जानी गई।

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समय-समय पर रामचंद्र अपने पिता के साथ पेशवा के दरबार में जाया करते थे। वहाँ वे अपने पिता के साथ चुपचाप खड़े रहते पेशवा बाजीराव भी उस बालक को देखकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते थे। कुछ ही समय में रामचंद्र को वे अपने पुत्र के समान ही स्नेह देने लगे। रामचंद्र की शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था भी अन्य बच्चों के साथ ही कर दी गई।

अब नाना साहब, बाला साहब, बाला भट्ट, मनु और रामचंद्र साथ-साथ पढ़ते तथा साथ-साथ ही शस्त्र-विद्या, घुड़सवारी, निशानेबाजी आदि सीखते। वे बच्चे इन वीरतापूर्ण कार्यों में ही खेल का आनंद लिया करते थे।

तात्या टोपे उपाधी – एक बार की बात है। रामचंद्र के एक वीरतापूर्ण कार्य से खुश होकर पेशवा बाजीराव ने उन्हें एक अत्यंत मूल्यवान् ‘टोपी’ पुरस्कार के रूप में भेंट की। इस टोपी में नौ हीरे और कई अन्य मूल्यवान् रत्न गुंथे हुए थे। इस टोपी को रामचंद्र ने अंत तक अपने साथ ही रखा। उनके उपनाम ‘तात्या’ तथा ‘टोपी’ यहीं से प्रचलित नाम बन गया। अब सभी उन्हें इसी नाम से पुकारते थे।

Tatya Tope – तात्या टोपे

‘टोपे’ तो टोपी का ही बदला हुआ रूप था. जबकि ‘तात्या’ का मराठी अर्थ होता है-स्नेह अथवा अनुराग I समय बदला। बालक तात्या अब एक महत्त्वाकांक्षी एवं साहसी युवा थे। साँवले रंग, मझीले कद और गढ़ीले शरीरवाले तात्या कोई बहुत सुंदर युवक नहीं थे, परंतु उनके व्यवहार और बातचीत में निर्भयता स्पष्ट झलकती थी।

अंग्रेज शासन के खिलाफ असंतोष – यह वह समय था, जब देश तो अपना था, परंतु शासन विदेशी सरकार का था। क्या राजे-महाराजे और क्या पेशवा-नवाब, सभी की स्थिति समान थी। विदेशी सरकार को भारतीयों के सुख-दुःख या जरूरतों से कोई सरोकार नहीं था। वह इन्हें केवल एक संसाधन के रूप में देखती थी और इनके दमन का कोई भी मौका चूकती नहीं थी।

यहाँ तक भारतवासियों की धार्मिक आस्थाएँ, विश्वास और परंपराएँ भी उसके लिए कोई महत्व नहीं रखती थीं। वह जब-तब इन पर प्रहार करते रहती थी। उसका यह व्यवहार भारतीयों के मन में दबी हुई उस आग को हवा देता रहता था, जो अभी परिस्थितियों के सामने विवश थी। बड़े होने पर तात्या को लगा कि उनकी महत्त्वाकांक्षाएँ बिठूर में पूरी नहीं हो पाएँगी, अतः वे कानपुर चले गए।

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वहाँ उन्होंने कुछ समय तक ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी की, परंतु शीघ्र ही वह नौकरी छोड़ दी। इसके बाद उन्होंने महाजनी का काम भी शुरू किया; परंतु यह कार्य भी उनके स्वभाव से मेल नहीं खाता था। अभी वे अनिश्चय की स्थिति में थे, तभी उन्हें अपने पिता का संदेश मिला और वे वापस बिठूर लौट आए।

वहाँ उनके पिता ने उन्हें अपने पास ही लिपिक के पद पर लगवा दिया। इधर, बाजीराव पेशवा काफी वृद्ध हो चुके थे। अपने देश में विदेशियों के दिन-पर-दिन बढ़ते वर्चस्व को वे देख ही रहे थे। अतः उन्होंने काफी पहले से ही अपनी वसीयत तैयार कर दी थी, जिसमें उन्होंने नाना साहब को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए अपनी सारी संपत्ति नाना साहब को देने के साथ-साथ यह भी स्पष्ट कर दिया था कि उन्हें मिलनेवाली सभी सुविधाएँ भविष्य में उनके पुत्र को भी प्राप्त होती रहें।

पेशवा कि पेन्शन बंद – 28 जनवरी, 1851 को पेशवा बाजीराव द्वितीय ने इस संसार से विदा ले ली। पेशवा की मृत्यु के बाद नाना साहब को बिठूर का राजा घोषित कर दिया गया। वे अत्यंत विनम्र स्वभाव के व्यक्ति थे तथा अपने मनोभावों पर नियंत्रण रखना जानते थे। अपने पिता के सौंपे गए दायित्व को उन्होंने जल्दी हो बड़ी कुशलता से संभाल लिया। तात्या टोपे उस समय तक उनके लिपिक ही थे। बचपन का साथ तो पहले से ही था।

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अब विचार और व्यवहार की समानता ने दोनों की मित्रता को और अधिक घनिष्ठता का रंग दे दिया। नाना साहब प्रत्येक कार्य में तात्या की सलाह लेने लगे और नाना साहब का हर तरह से हित सोचना तात्या ने अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। इसके साथ ही अब तात्या की छुपी हुई योग्यताएँ समय-समय पर सामने आने लगीं।

अभी बाजीराव पेशवा की मृत्यु को कुछ ही समय गुजरा था कि अंग्रेज सरकार की ओर से उनकी 8 लाख रुपए वार्षिक की पेंशन बंद कर दी गई। इसके साथ ही नाना साहब को उनकी पदवी ‘पेशवा’ का भी उपयोग न करने की हिदायत दी गई। नाना साहब ने इसका कड़ा विरोध किया तो उन्हें यह कहकर शांत कर दिया गया कि पेशवा ने बाजीराव को पेंशन व्यक्तिगत अनुदान के रूप में दी जाती थी, न कि आनुवंशिक।

इस कारण से पेशवा के पुत्रों का अपने पिता के अनुदान अथवा पदवी पर कोई अधिकार नहीं बनता। इस निर्णय के विरोध-स्वरूप नाना साहब ने अपने वकील अजीमुल्ला खी को इंग्लैंड में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर के सामने अपना पक्ष रखने के लिए भेजा; किंतु वहाँ भी उन्हें सफलता नहीं मिली।

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इसी बीच सन् 1832 से लागू हो चुके रेगुलेशन ऐक्ट के तहत नाना साहब व उनके परिवार को सामान्य ब्रिटिश लॉ कोर्ट्स की अधिकारिता से बाहर घोषित किया गया था; परंतु बाजीराव पेशवा की मृत्यु के एक साल पूरा होते-होते यह ऐक्ट निरस्त कर दिया गया। परिणामस्वरूप, नाना साहब व उनके परिवार की सारी जागीरें उनके हाथ से निकल गईं और उनकी स्थिति एक साधारण व्यक्ति जितनी ही रह गई।

इन्हीं परिस्थितियों में द्वितीय पेशवा बाजीराव का श्राद्ध जैसे-तैसे साधारण ढंग से पूरा किया गया, जबकि उस समय की प्रचलित रीति के अनुसार किसी पेशवा के श्राद्ध आदि के समय ‘पंच महादान’, जिनमें हाथी, घोड़ा, सोना, रत्न तथा भूमि सम्मिलित होते थे, दान स्वरूप दिए जाते थे। नाना साहब और तात्या विवश हो खून का घूँट पीकर चुप थे, परंतु उनके मन में उसी समय एक निश्चय जन्म ले चुका था।

चूँकि नाना साहब नरम स्वभाव के व्यक्ति थे, अत: अंग्रेज उनका दोहरा लाभ उठाते थे। एक ओर तो वे नाना साहब से उनके स्वाभाविक अधिकार तक छीन रहे थे I दूसरी ओर जब-तब उनके सामने कोई-न-कोई सहायता का प्रस्ताव रख देते थे। तात्या यह सब देखते और मन-ही-मन अंग्रेजों पर क्रोधित होते।

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१८५७ का उठाव और तात्या टोपे – सन् 1857 का प्रारंभिक काल था। गंगा के तट पर बसा कानपुर प्रथम श्रेणी की सैनिक छावनी तो पहले से ही था, अवध के ब्रिटिश शासन में मिल जाने के बाद इसका महत्त्व और अधिक बढ़ गया था। इस नगर की रक्षा में तैनात थी, पहली 53वीं नेटिव बंगाल इन्फैंट्री, द्वितीय कैवेलरी (घुड़सवार सेना) और तीसरी आर्टिलरी (बंदूकधारी सेना) की एक-एक कंपनी देशी सेना में कुल मिलाकर लगभग 3 हजार सैनिक थे, जबकि यूरोपीय आर्टिलरी में केवल 64 व्यक्ति व 6 तोपें थीं।

इनके कमांडर ऑफिसर थे- मेजर जनरल सर ह्यू ह्वीलर। उनके नाम के साथ जुड़ा हुआ था, पचास वर्षों का सेना की सेवा का अनुभव और गौरव I देशी सेना भी अपने विदेशी शासकों की अत्यधिक स्वामिभक्त थी और उनके इशारों पर चलती थी; परंतु जब धीरे-धीरे उसके बीच यह संदेह गहरा होने लगा कि उसके विदेशी स्वामियों को उनकी आस्था, हित-अहित से कोई सरोकार नहीं था, केवल अपना स्वार्थ साधना चाहते थे तो उनका विश्वास डगमगाने लगा।

विदेशी वे शासकों को इसकी थोड़ी-बहुत भनक तो पड़ गई थी, परंतु इतने से वे स्थिति की संवेदनशीलता का अंदाजा लगाने में चूक गए। कोई-न-कोई ऐसी घटना लगातार होती रही, जिससे देशी सैनिकों का अविश्वास जड़ पकड़ता गया। फलस्वरूप स्थानीय जनता में भी भारी असंतोष की स्थिति बनी हुई थी। वीर सपूत मंगल पांडे के विद्रोह ने इस आग को और हवा देने का काम किया। भले ही उस विरोध को दबा दिया गया था, परंतु वह अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था।

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अंग्रेज अधिकारी देशी सैनिकों को संदेह की नजर से देख रहे थे और यही हाल दूसरी ओर भी था। भारतीय सैनिकों में यह खबर फैलती जा रही थी कि उनके अंग्रेज स्वामियों को उन पर विश्वास नहीं रहा था, इसलिए देशी सैनिकों से उनके हथियार छीनकर उन्हें सेना से निकाला जा रहा था और उनके स्थान पर अंग्रेज सैनिकों को नियुक्त किया जा रहा था।

इधर ह्वीलर ने किसी भी आपात स्थिति से निपटने की तैयारियाँ शुरू कर दी और अंग्रेज अधिकारियों के घरों के आस-पास सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी। इन सब बातों से देशी सैनिकों के मन में खटास पड़ चुकी थी। ऐसे ही संवेदनशील समय में एक और विवाद अचानक उठ खड़ा हुआ। कच्चे आटे की एक खेप बाजार में बड़ी ही कम कीमत पर बेची गई थी, जिसके तुरंत बाद यह खबर उड़ गई कि उसमें गाय तथा सूअर की हड्डियाँ पीसकर मिलाई गई थी।

इस खबर से सभी सकते में आ गए और बाजार में भीड़ जुटने लगी। बहुत समझाने-बुझाने पर लोग वापस तो लौटने लगे, परंतु उनके मन का विश्वास वापस नहीं लौट रहा था। इसका कारण भी बड़ा ही स्पष्ट था। अभी कुछ ही समय पहले देशी सैनिकों ने जिस असंतोष के कारण विरोध का स्वर उठाया था, उनमें से एक प्रमुख कारण यह भी बताया जाता है कि सैनिकों को मिलनेवाले कारतूसों पर उन पशुओं की चरबी लगी होती थी, जिनसे देशी सैनिकों की धार्मिक आस्थाएँ आहत होती थीं।

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इधर जब लोगों का अविश्वास बहुत बढ़ गया तो अंग्रेजों ने नाना साहब से सहायता की प्रार्थना की। नाना साहब तात्या टोपे को साथ लेकर 300 सैनिकों की टुकड़ी एवं 2 तोपों के साथ तुरंत कानपुर पहुँचे। नवाबगंज स्थित खजाने की रक्षा करने में उन्होंने अंग्रेजों की मदद की। साथ ही, भड़के हुए देशी सिपाहियों को भी शांत करने का पूरा-पूरा प्रयास किया, जबकि वास्तविकता यह थी कि नाना साहब और तात्या भीतर से इस विद्रोह के समर्थक ही थे।

उन्हें प्रतीक्षा थी तो केवल उपयुक्त अवसर की। यह पूरी घटना 22 मई, 1857 की है। इसके ठीक अगले ही दिन डरे हुए अंग्रेजों ने अपनी औरतों, बच्चों और अन्य सहयोगियों के साथ जल्दीबाजी में बनाए गए एक कच्चे दुर्ग में शरण ली। दुर्ग के नाम पर वह एक खस्ताहाल बैरक ही था, जिसको छत तक छप्पर की थी। देशी सैनिकों ने उस स्थान की मोरचाबंदी कर दी थी। नाना साहब सैनिकों के साथ उनके अभियान में शामिल हो चुके थे।

उन्होंने कारागार से कैदियों को आजाद करा दिया और सारी नकदी सैनिकों के बीच बाँट दी। इसके दो सप्ताह बाद 5 जून को वे सैनिक दिल्ली की ओर बढ़ चले और कल्याणपुर में अपना पहला पड़ाव डाला। उनके इस कूच से मेजर जनरल डीलर अभी चैन की साँस भी नहीं ले पाया था कि अगले ही दिन सेना वापस लौट आई और इधर हैरान जनरलों को नाना साहब का यह संदेश मिला कि वे मोरचाबंदी वाले स्थान पर हमला करने जा रहे हैं।

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इसमें तात्या को पहली बार अपनी योग्यता बड़े रूप में दिखाने का मौका मिला। वे इस हमले में नाना साहब के सैनिक सलाहकार के रूप में साथ थे। जल्दी ही उन्हें इस काम में कई लोगों का सहयोग प्राप्त हो गया। बंगाल आर्मी के कुछ अनुभवी अधिकारी, जिनमें सूबेदार टिक्का सिंह (जो तब जनरल बना दिए गए थे), दुर्गजन सिंह, गंगादीन (तत्कालीन कर्नल), नाना साहब की निजी सेना के कमांडर ज्वाला प्रसाद आदि भी शामिल थे।

इन सबके अतिरिक्त अनेक स्थानीय जमींदारों के सशस्त्र रक्षक व अवध के सैनिकों की नादिरी और अख्तरी रेजीमेंट भी उनके साथ थी।मोरचेबंदी वाले स्थान पर दुर्ग के भीतर कैदियों की स्थिति बहुत बुरी हो चुकी थी। कई सैनिक तो भूख-प्यास से मर रहे थे। उस समय पूरे देश में जगह-जगह स्वदेशी विद्रोह उफान पर था और स्थिति नाजुक बनी हुई थी, इसलिए दुर्ग के कैदियों को किसी प्रकार की कोई सहायता नहीं मिल सकी।

अंततः एक संधि के साथ सर ह्वीलर ने आत्मसमर्पण करते हुए बंधकों को मुक्त करने की प्रार्थना की। चूँकि बंधकों में औरतें और बच्चे भी थे, अत: नाना साहब ने उसकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। तय हुआ कि ह्वीलर अपनी गैरिसन तोपें और खजाना वापस सौंप देगा तथा हर बंधक अपने साथ अपनी बंदूक व 60 राउंड गोलियाँ ले जा सकेगा। बदले में मुक्त करने के साथ-साथ स्त्रियों, बच्चों व घायलों के खाने पीने व उपचार की व्यवस्था भी नाना साहब करेंगे।

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27 जून को सभी शरणार्थियों की सती चौरा घाट पर तैयार खड़ी नाव पर सवार करा दिया गया। जैसे ही नावें कुछ आगे बढ़ीं, अचानक ही कुछ देशी नाविक नाव पर से पानी में कूद पड़े और किनारे की तरफ बढ़ने लगे। इस पर कुछ अंग्रेज सैनिक किनारे पर खड़े लोगों पर गोलियाँ चलाने लगे, जवाब में उधर से भी गोलियाँ चलने लगीं। इस कांड को इतिहास में ‘सती चौरा हत्याकांड’ के नाम से याद किया जाता है।

इस घटना के कारण देशी सैनिकों के मन में अंग्रेज शासकों के प्रति घृणा भर गई, क्योंकि अंग्रेज सरकार सैनिकों तथा अन्य विद्रोहियों को दबाने के लिए अपने एक से बढ़कर एक बर्बर अधिकारी की मदद ले रही थी। यहाँ तक कि कसाइयों की भी मदद ली गई। इन सबसे एक भयावह स्थिति बनी। इस विद्रोह को दबाने के लिए उस समय के सर्वाधिक बर्बर अधिकारी नील को विशेष रूप से मद्रास से बुलाया गया।  वह आते ही विद्रोह को कुचलने में जुट गया।

तात्या टोपे की दूरदर्शिता – इसी दौरान 30 जून को पुरानी शानो-शौकत के साथ नाना साहब को पुन: पेशवा घोषित कर गद्दी पर बिठा दिया गया। चारों ओर उत्सव का माहौल था। उस समय भी तात्या टोपे अत्यंत सतर्क थे और चारों ओर की सुरक्षा व्यवस्था की जाँच बार-बार कर रहे थे। वे जानते थे कि अंग्रेज इस बात को इतनी आसानी से नहीं भूलेंगे और कानपुर पर अपना वर्चस्व पुनः स्थापित करने के लिए प्रयास अवश्य करेंगे। इसी कारण तात्या आनंद-उत्सव में शामिल होने के बजाय अपनी फौज को सुसंगठित करने में जुट गए।

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तात्या टोपे की दूरदर्शिता काम आई, क्योंकि जिस समय कानपुर अपने पेशवा के उल्लास में डूबा हुआ था, उसी समय अंग्रेज अधिकारी हेवलाक कानपुर और लखनऊ को लक्ष्य करके आगे बढ़ने के लिए अपनी सेना तैयार कर रहा था। वह कानपुर स्टेशन को विद्रोही देशी सैनिकों के अधिकार से छुड़ाना चाहता था, परंतु तात्या टोपे ने वहाँ पहले से ही ऐसी व्यवस्था कर दी थी कि रेनॉर्ड के आगे बढ़ते ही उसे मुँह की खानी पड़ती। रेनॉर्ड समय रहते ही तात्या की इस चालाकी को भाँप गया और उसने अपना इरादा बदल दिया।

कानपुर पर फिर अंग्रेजों का अधिकार – 12 जुलाई को हेवलाक का दस्ता भी रेनॉर्ड से आकर मिल गया। देशी विद्रोहियों को इस बात की भनक पहले से नहीं लग पाई थी, जिसका नतीजा उन्हें अपने प्राण देकरें भुगतना पड़ा। अंग्रेज सैनिक चारों ओर से टूट पड़े। उनके साथ 11 तोपें भी थीं। देखते-ही-देखते पूरा कानपुर एक बार फिर अंग्रेजों के अधिकार में था। यह तात्या की एक बड़ी पराजय थी।

अगले दिन ज्वाला प्रसाद की सैनिक टुकड़ी ने औंग में शत्रु की सेना का मुकाबला किया। संख्या में कम होने पर भी सभी सैनिक अत्यंत वीरतापूर्वक लड़े; परंतु अंततः नाना साहब के सैनिकों को पीछे हटना पड़ा। उन्होंने भागकर पांडु नदी पार की और नदी के पुल पर अपना मोरचा जमा लिया। उनका इरादा उस समय तक पुल को बचाए रखने का था, जब तक वह रक्षणीय था, अंत में उसे उड़ा देना था।

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यही तात्या की सबसे बड़ी चूक साबित हुई। तात्या के सैनिकों के पास तोपें तो पहले से ही कम थीं। ठीक निर्णायक क्षणों में उनमें से दो तोपें बेकार हो गईं। इस कारण आवश्यकता के समय पुल को उड़ाया नहीं जा सका। इससे नाना के सैनिकों और शत्रु सेना के बीच का फासला बहुत कम रह गया था। अब तक हेवलाक तीन मोरचों पर विजय प्राप्त कर चुका था। चालाकी से युद्ध करते हुए वह अपने सैनिकों के साथ आगे बढ़ रहा था।

तभी अचानक उसने स्वयं को शत्रु-सैनिकों से घिरा हुआ पाया। यह नाना के सैनिकों की व्यूहबद्ध सेना थी, जिसमें उनके पीछे अनेक घुड़सवार सैनिक व तोपें थीं। दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ। यह कानपुर-युद्ध का अंतिम चरण था। इसके बाद तेज गोलीबारी के कारण नाना की सेना बिखर गई। दूसरी ओर बिना आराम व पर्याप्त आहार के लड़ते-लड़ते हेवलाक की सेना भी बुरी तरह से थक चुकी थी।

वह शत्रु सेना का पीछा नहीं कर सकी। इसका लाभ तात्या के सैनिकों को मिला और वे भाग निकलने में सफल रहे। आगे जाकर वे वापस नाना साहब के साथ मिल गए। नाना और तात्या बिठूर पहुँचे। नाना इस पराजय से हतोत्साहित हो चुके थे। जबकि तात्या केवल पराजित हुए थे, पस्त नहीं। उनका मस्तिष्क अब भी शत्रु का सामना करने की नीति तैयार करने में जुटा हुआ था। उन्होंने नाना साहब को धैर्य रखने के लिए कहा। नाना ने सेनाध्यक्ष के रूप में अपनी सेना की पूरी कमान तात्या के हाथों में सौंप दी।

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कानपुर पर पुनः विजय पाने का प्रयास  – 18 जुलाई को नाना साहब, उनके भाई तथा तात्या टोपे ने अपने परिवार सहित बिठूर छोड़कर गंगा पार फतेहगढ़ चौरासी में चौधरी भोपाल सिंह के यहाँ शरण ली। कानपुर अंग्रेजों के हाथों में आ ही चुका था। हेवलाक लखनऊ की ओर बढ़ गया। कानपुर पर अब पूरी तरह नील का वर्चस्व था। उसने कानपुरवासियों और विद्रोही सैनिकों से जिस भयानक रूप में प्रतिशोध लिया, उससे स्वयं मानवता का सिर शर्म से झुक गया।

तात्या टोपे अब एक घायल सिंह की तरह थे। वे पूरी शक्ति से अपनी सेना के पुनर्गठन में लग गए। महीने भर में ही उन्होंने 41वीं पैदल सेना के साथ-साथ कुछ और सैनिकों को अपनी ओर मिलाने में सफलता प्राप्त कर ली। चूँकि तात्या छत्रपती शिवाजी महाराज की गुरिल्ला नीति के अंतिम सेनानी माने जाते थे, साथ ही छापामार तरीके से युद्ध करने में भी वे बड़ी सतर्कता बरतते थे, इसीलिए अंग्रेजों को युद्धभूमि में वे ‘छलावा’ प्रतीत होते थे।

अंग्रेजों के साथ होनेवाली मुठभेड़ों में वे उन्हें भारी क्षति पहुँचाते रहे। उनकी नीति देखकर ऐसा लगता था कि वे केवल विजय के लिए युद्ध कर रहे थे, परंतु तब भी कानपुर पर अधिकार करने में उन्हें सफलता नहीं मिल पाई थी। उस समय वे एक ऐसे किले की आवश्यकता महसूस कर रहे थे, जिसका उपयोग अभियान में गढ़ के रूप में किया जा सके। उनके इस मनोरथ को शीघ्र ही सफलता मिली कालपी के किले के रूप में यह स्थान कानपुर से केवल 47 मील दूर था।

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दोनों नगरों के बीच बहती यमुना ने इसे प्राकृतिक खाई के रूप में एक सुरक्षा कवच भी प्रदान कर रखा था। तात्या टोपे ने शीघ्र ही कालपी के दुर्ग पर अपना अधिकार करके पेशवा का मुख्यालय वहाँ स्थानांतरित कर लिया। अपने वाक् चातुर्य और विरोधियों को भी समर्थक बना लेने की कला के चलते तात्या ने एक बार फिर दुर्जेय ग्वालियर सैन्य दल और अन्य सैनिकों का सहयोग प्राप्त किया तथा भगिनीपुर, शिओली, अकबरपुर आदि नगरों को अपने अधिकार में लेते हुए तेजी से कानपुर की ओर बढ़ चले।

सर कॉलिन, जिसे भारतीय विद्रोह को शांत करने के लिए क्रीमिया के युद्ध से वापस बुलाया गया था की वापसी से पहले वे कानपुर पर कब्जा कर लेना चाहते थे। तात्या ने शीघ्र ही कॉलिन के सहयोगी विंदम को पराजित कर पूरे नगर पर अपना अधिकार कर लिया। तात्या की यह एक बड़ी, किंतु अल्पकालीन विजय थी।

इस युद्ध में उन्होंने शत्रु-पक्ष की सभी कमजोरियों का पूरा-पूरा लाभ उठाया, जिसकी प्रशंसा स्वयं उनके शत्रुओं ने मुक्त कंठ से की थी, परंतु लखनऊ रोड पर बनी खाई और पीपों पर बने पुल को अंग्रेजों के कब्जे से छुड़ाने में वे थोड़ी सी देरी के कारण चूक गए और यहाँ चूक बड़ी घातक सिद्ध हुई। तब तक कैंपबेल तुरंत सहायता की सूचना मिलते ही दोगुने वेग से आगे बढ़ चुका था।

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‘तात्या की सेना में इस बार करीब 10 हजार सैनिक थे। उनमें से अधिकतर रंगरूट ही थे। यह तात्या का ही सेनापतित्व था, जो उनसे काम निकलवा सके। तात्या की सेना एक बार फिर पराजित हुई। अंत तक उनकी तोपें भी छिन चुकी थीं और सेना तितर बितर हो चुकी थी। तब अंग्रेजों ने नाना साहब के महल एवं मंदिर को ध्वस्त कर दिया और नाना साहब के खजाने पर भी अधिकार कर लिया।

कानपुर पर विजय पाने के अपने इस प्रयास के विफल हो जाने पर तात्या ने मध्य भारत में यमुना और नर्मदा के बीच के क्षेत्र को अपना कार्य स्थल बना लिया। वहाँ अनेक राजे-रजवाड़ों और नवाबों का सहयोग उन्हें प्राप्त हुआ। झाँसी पहले से ही उनकी प्रमुख सहयोगी थी। वहाँ तात्या कई बार अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंकने में कामयाब रहे।

उधर ह्यूरोज ने झाँसी की घेराबंदी कर दी। मजबूत किले में 1,500 सैनिक और 25 तोपें मौजूद थीं। स्त्री-पुरुष, सभी रानी के नेतृत्व में कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे थे। अपने 20 हजार सैनिकों को एकजुट कर तात्या उसकी मदद के लिए आगे बढ़े, किंतु शीघ्र ही उन्हें पराजित होकर हटना पड़ा। परिणामस्वरूप, झाँसी का पतन हो गया।

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इसके बाद भी अंग्रेजों को पराजित करने और पराजित होने का लंबा सिलसिला चला तात्या टोपे ने अपने जीवन काल में अंग्रेज अधिकारियों को कभी चैन से न बैठने दिया। झाँसी की रानी की मृत्यु के बाद तो ब्रिटिश हुकूमत ने अपनी सारी शक्ति तात्या टोपे को पकड़ने में लगा दी। स्थानीय राजाओं का पूरा-पूरा सहयोग तात्या टोपे के साथ था। जब अंग्रेज किसी तरह तात्या पर विजय प्राप्त नहीं कर सके तो उन्होंने कूटनीति से काम लेते हुए तात्या टोपे के एक मित्र मानसिंह को नरवर राज्य दिलाने का प्रलोभन देकर अपने पक्ष में कर लिया।

शहादत –  अंततः 7 अप्रैल, 1859 को जिस समय तात्या टोपे अपने मित्र मानसिंह द्वारा बताए गए ‘सुरक्षित’ स्थान पर विश्राम कर रहे थे, तभी अंग्रेजी सेना ने आधी रात के समय उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जो तात्या टोपे अंग्रेजों की पहुँच से दूर थे, उन्हें अपने ही मित्र के विश्वासघात ने अंग्रेजों का बंदी बनवा दिया।

कड़े पहरे के बीच उन्हें शिवपुरी में जनरल की छावनी में ले जाया गया, जहाँ उन पर ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध युद्ध करने तथा कई अंग्रेज अधिकारियों को मौत के घाट उतारने का दोषी बताते हुए मुकदमा चलाया गया और आखिर में फाँसी का हुक्म सुना दिया गया। देशवासियों को उनके पकड़े जाने के समाचार पर विश्वास नहीं हुआ। भारत माता के इस जाँबाज सपूत की एक झलक पाने के लिए लोग उमड़ने लगे।

Tatya Tope – तात्या टोपे

उस अपार जनसमूह को सँभाल पाना अंग्रेज सेना के लिए कठिन हो रहा था। 18 अप्रैल, 1859 को सायं चार बजे भारत माता के इस वीर सपूत को फाँसी के तख्ते के पास लाया गया। जब उनका चेहरा ढकने के लिए उन्हें टोप पहनाया जाने लगा तो उन्होंने इनकार कर दिया और कहा, “मैं अपनी मौत को आमने-सामने देखने के लिए तैयार हूँ।” और फिर फाँसी का फंदा स्वयं अपने गले में डाल लिया।

इधर जल्लाद ने हत्था खींचा, उधर तात्या की निर्जीव देह रस्सी के सहारे हवा में झूल गई। उनका शरीर सूर्यास्त तक फंदे पर ही लटकाए रखा गया। अपने लगभग दो वर्ष के क्रांतिकाल में 150 मोरचों पर लोहा लेनेवाले इस अमर सेनानी की स्मृति प्रत्येक भारतीय के मन-मस्तिष्क में सदैव बनी रहेगी।

Chhava

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