Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

Swami-ShraddhanandSwami Shraddhanand

स्वामी श्रद्धानंद के बचपन का नाम मुंशीराम था। वह पंजाब के जालंधर जिले में तलवन नाम के गांव में खत्री परिवार में २२ फरवरी १८५७ में पैदा हुए थे। साहस के अवतार, निर्भीक राजनीतिक नेता, देश-प्रसिद्ध आर्यसमाजी नेता, कांग्रेस सेवक, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के संस्थापक, संयम के उपासक स्वाभिमान की मूर्ति, स्वदेशाभिमान की प्रतिमा, राष्ट्रीयता की ज्योति, भारतीय संस्कृति के पुंज और भारत के अमर शहीद स्वामी श्रद्धानंद का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सदा अमर रहेगा।

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

ऋषि दयानंद की क्रांतिकारी विचारधारा से प्रभावित होकर उन्होंने इम तथ्य को हृदयंगम कर लिया था कि अंग्रेजी शासन से भी अधिक खतरनाक यह अंग्रेजियत है जो विदेशी भाषा, विदेशी आचार-विचार और विदेशी संस्कृति के माध्यम से इस देश की संतति को मानसिक दृष्टि से गुलाम बना रही है। मन गुलाम होने पर तन की गुलामी भी नही अखरती। देश मे केवल राजनैतिक पराधीनता को समाप्त करने का स्वप्न देखने वाले भी बहुधा मानसिक परा धोनता की उपेक्षा करते रहे।

परंतु मानसिक पराधीनता से मुक्ति पाए बिना केवल राजनीतिक स्वाधीनता कारगर नही हो सकती। स्वामी श्रद्धानंद ने अपना समस्त जीवन इसी ध्येय की पूर्ति के लिए लगा दिया। उन्होंने जहां वैदिक धर्म और वैदिक संस्कृति को रक्षा के लिए कार्य किया, वहां मानसिक पराधीनता से मुक्ति के लिए उनके कार्यों का योगदान भी कम नहीं है। गुरुकुल कागड़ी की स्थापना इसका जीता-जागता प्रमाण है।

उन्होंने वर्तमान भारत को प्राचीनतम से जोड़कर भारतीय राष्ट्रीयता का सच्चा मार्ग दिखाया था। अपने साहसपूर्ण कार्यो, देशभक्तिपूर्ण विचारों एवं समाज सुधारक कार्यों के कारण उनके व्यक्तित्व का प्रभाव उत्तर भारत मे जादू की तरह फैल गया। वे शीघ्र ही राजनीतिक तथा सामाजिक आंदोलन की जीती-जागती प्रतिमा बन गये।

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

वस्तुतः वीरता के साथ जब सात्विक विवेक का मिश्रण हो जाए तो लोकमानस पर उसका असाधारण प्रभाव पड़ता है। स्वामी दयानंद की ज्योति से स्वयं ज्वाला बनकर प्रज्वलित होने वाले अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानद में इन दोनों का अद्भुत सम्मिश्रण हुआ था ।

ऐसे महापुरुष का जन्म सन् 1856 ई० में पंजाब के जिला जालंधर मे तलवन नामक ग्राम में हुआ था। माता-पिता ने आपका नाम मुन्शीराम रखा और संन्यास न लेने तक आप इसी नाम से प्रसिद्ध रहे। मुन्शीराम अपने छः भाई-बहनों में सबसे छोटे थे और इसीलिए अपने माता-पिता के लाड़ले भी। उनके पिता थी नानकचंद ने 1857 के विद्रोह के दिनो में अंग्रेजी सरकार की सेवा कर पुलिस विभाग में उच्च-पद प्राप्त कर लिया था।

भगवद्-भक्ति उस कुल की परंपरागत विभूति थी। वीरता, सज्जनता, उदारता, निर्भीकता, स्पष्टवादिता आदि सब गुण बालक मुन्शीराम को विरासत में प्राप्त हुए थे। मुशीराम की बाल्यावस्था का अधिकांश भाग पिताजी की नौकरी के बराबर स्थानातरण के कारण खेल-कूद तथा स्वच्छंदता में ही व्यतीत हुआ।

Click on below links to read more | अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

More Hindi Blogs

History in Hindi Articles

Ramkrishna Paramhans – रामकृष्ण परमहंस

प्रतिभा सम्पन्न एवं कुशाग्र बुद्धि होने से बालक मुंशीराम सुना हुआ बहुत सा कंठस्थ कर लिया करते थे परंतु कुसगति में पढ़ने के कारण उसे अनेक बार परीक्षाओं में असफलता मिली। उनकी प्रारंभिक आयु असफलताओं की लम्बी कहानी है। 27 वर्ष की अवस्था तक उन्होंने केवल दशम श्रेणी और मुखतारी की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। एफ० ए० की परीक्षा में कई बार असफल हुए परंतु ये कभी नही त्यागा। आपने गृहस्य होने के बाद एक लड़की के होने पर भी कानून की परीक्षा पास की थी।

बड़ी धूमधाम से विवाह होने पर भी मुंशीराम को तनिक भी संतोष नही हुआ। उसका हृदय और मस्तिष्क अंग्रेजी उपन्यासो के रंग में रंगा हुआ था। उपन्यासों की नायिकाओं के सर्वगुणों से सम्पन्न स्त्री के साथ आनंदमय भावी जीवन व्यतीत करने के स्वर्णमय विचार इन्द्रधनुष की भांति उसके नेत्रों के सामने देदीप्यमान हो रहे थे, पर विवाह के पश्चात् पता चला कि वह सर्व स्वप्नावस्थ की सृष्टि थी।

कारण यह था कि उनकी पत्नी शिवदेवी अभी बाल्यावस्था में ही थी और शिक्षा का तो उसमें सर्वधा अभाव ही था। परंतु उसने सहोदरा-बहन के प्रेम; आदर्श पत्नी की भक्ति, स्नेहमयी माता की ममता की पवित्र भावनाओं के प्रभाव से कल्पनालोक के वासी मुशीराम को वास्तविकता का ज्ञान करवाया । ऐसी साध्वी स्त्री का चार सन्तानें छोड़कर 31 अगस्त 1891 को अचानक देहांत हो गया। इस आघात ने और विशेषतया पत्नी के अंतिम संदेश ने उनका जीवन ही बदल दिया। पत्नी का अंतिम संदेश यह था I

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

“बाबूजी ! अब मैं चली। मेरे अपराध क्षमा करना। आपको तो मुझसे अधिक रूपवती और बुद्धिमती सेविका मिल जायेगी, किंतु इन बच्चों को मत भूलना। मेरा अतिम प्रणाम स्वीकार करें।” पति-अनुरक्ता पत्नी के इन अंतिम शब्दों ने मुंशीराम के हृदय में एक अद्भुत शक्ति का संचार कर दिया। अपने संबंधियों एवं मित्रो द्वारा लाख विवश करने पर भी पुनः विवाह नहीं किया और बच्चों के लिए माता का स्थान भी स्वयं पूरा करने का दृढ संकल्प किया।

बार-बार परीक्षा में असफल होते देखकर पिता ने पुत्र को ऊंची पढ़ाई के अयोग्य समझकर नायब तहसीलदार बनवा दिया। लेकिन स्पष्टवादी एवं स्वाभिमानी होने के कारण वह तीन मास से अधिक चाकरी नहीं निभा सके। उन्होंने विदेशी प्रभुओं की इच्छा पर न नाच सकने के कारण सरकारी पद को छोड़ दिया। तब पिता ने पुत्र के स्वभावानुसार स्वतंत्र आजीविका के लिए उसे काल का आदेश दिया।

मुंशीराम जी ने वकालत पास करके इस व्यवसाय में असाधारण सफलता पाई। जब स्वामी दयानंद बरेली पधारे तो उन्हें प्रभावशाली व्याख्यान सुनने का सुअवसर हाथ लगा। स्वामीजी का उन पर जादू-सा प्रभाव पडा और उनके जीवन आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ। अव तो ऋषि-दर्शन के लिए मुशीराम पागल हो ये घोर नास्तिक और महापतित मुशीराम को महात्मा मुशीराम और स्वामी श्रद्धानंद बनाने का श्रेय महर्षि दयानंद सरस्वती को ही है।

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

उनके दर्शनो और उपदेशों ने आपके जीवन में क्रांति मचा दी। वस्तुत ऋषि दयानंद के विचारो एवं सिद्धांतो का जिन कतिपय लोगों ने सफल प्रचार किया तथा उन्हें अपने जीवन मे घटाकर दिखाया, उनमें से मुशीराम जी का स्थान प्रमुख है। मुशीराम को वकालत की परीक्षा के लिए प्रायः लाहौर जाना पड़ता था। वहा उनका आर्यसमाज से संपर्क हुआ। आप आर्यसमाज बच्छोवाली, लाहौर के सन् 1888 मे सभासद् बन गये।

समाज के अधिकारियों ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए समाज में एक नवयुवक के प्रवेश की घोषणा की। नवयुवक ने अपने अंतरात्मा के सात्विक भावों को उडेलते हुए कहा – “हम सबके कर्त्तव्य और मतव्य एक होने चाहिये। जो वैदिक धर्म के एक-एक सिद्धांत के अनुकूल अपना जीवन नही ढाल लेगा, उसको उपदेशक बनने का साहस नही करना चाहिए। भाड़े के टट्टुओं से धर्म का प्रचार नही हो सकता। इस पवित्र कार्य के लिए स्वार्थ-त्यागी पुरुषो की आवश्यकता है।”

जालंधर के आर्य भाइयों को जब इनके आर्यसमाजी बनने का समाचार पहुचा तो उनमें नवजीवन का समावेश हो गया। सुप्रसिद्ध श्री देवराज जो ने मुशीराम जी को लिखा कि ये उनको जालंधर आर्यसमाज का प्रधान पद सौंपकर स्वप मंत्री हो गये हैं। नवीन उत्साह ने प्रधान पद की इस जिम्मेदारी ने तथा प्रचार की धुन ने मुशीराम को दृढ़ आयं बनाने में लगा दिया।

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

ऋषिकृत ग्रंथों का स्वाध्याय होने लगा तथा उसी के अनुसार आचरण का प्रयत्न भी। इस स्वाध्याय ने गहित संस्कारों की जड़ काटने मे तथा मास भदाण जैसे दुष्यंसन को समूल नष्ट करने में अपूर्व सहायता की। तब से लेकर मृत्युपर्यंत आपने आर्यसमाज का तन, मन एवं धन से प्रचार एव प्रसार किया।

वकालत के व्यवसाय की परवाह न करते हुए आप बड़े उत्साह के साथ आर्य समाज का कार्य करने लगे। प्रभातफेरी निकालते, मुहल्लों मे रात्रि को ‘सत्यार्थ प्रकाश की कथा करते और रविवार को देहात-प्रचार के लिए जाते। जालंघर पौराणिको का गढ़ था। मुंशीराम ने शास्त्रार्थों द्वारा इस गढ़ की दीवारों को तोड दिया। रहतियों की शुद्धि का कार्य किया, जिसका सिखों और पौराणिको ने विरोध किया। अपनी पुत्री का विवाह जात-पांत तोडकर किया।

उन्हें जाति बहिष्कृत किये जाने की धमकी दी गई पर वह अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहे। अंततः बिरादरी को पराजय माननी पड़ी। उन दिनों लड़कियों का पढ़ना अच्छा नहीं समझा जाता था। मुंशीराम जी ने इस दिशा में पहल की। उन्होने कन्याओं की पाठशाला खोल दी, जो इस समय ‘कन्या महाविद्यालय’ के नाम से समस्त देश मे प्रसिद्ध है। यह उनका ही प्रभाव था कि उर्दू के गढ़ पंजाब में हिन्दी का प्रेम उमड पड़ा ।

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

हिन्दी के प्रति जो उत्कट प्रेम आज पंजाब के हिन्दुओ मे जागृत हुआ दिखाई देता है, वह विशुद्ध राष्ट्रीय और सास्कृतिक आधार पर है। उसमे सांप्रदायिकता की छाया देखने वाले पंजाब के इतिहास से अपरिचित हैं। पंजाब में पंजाबी और उर्दू को छोड़कर हिन्दी के प्रति श्रद्धा जाग्रत करने का श्रेय स्वामी श्रद्धानंद को ही है।

महात्मा मुंशीराम की शक्ति अंग्रेजी शासन से भी अधिक शोषक, अंग्रेजियत को नष्ट करने में लग गयी। इसलिए उनका कार्यक्षेत्र केवल राजनीतिक न होकर सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक हो गया। उनका विश्वास था कि विदेशियों के शासन-तंत्र से मुक्ति पाकर ही भारत का कल्याण नही होगा। विदेशी शासन से भी अधिक अहितकर विष है विदेशी भाषा, विदेशी संस्कृति और सामाजिक कुरीतियां।

इनकी दासता से मुक्ति पाये बिना राजनीतिक स्वतंत्रता उद्देश्यहीन हो जाएगी। अतएव उन्होंने असीम तप और त्याग से अर्जित शक्ति का उपयोग भारत को विदेशी भाषा, विदेशी धर्म, विदेशी संस्कृति की दासता से मुक्त कर भारतीयता को गौरवान्वित और तेजस्वी बनाने में किया। देश को अंग्रेजियत या किसी भी विदेशी दासता से मुक्त कराने का सबसे प्रभावशाली कार्य स्वामी जी ने गुरुकुल कांगडी की स्थापना से किया था।

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

गुरुकुल की स्थापना मुशीराम के जीवन का बहुत पुराना स्वप्न था। उस स्वप्न को पूरा करने के लिए आपको ग्राम-ग्राम भ्रमण कर गले मे भिक्षा की झोली डालकर चालीस हजार रुपया एकत्रित करना पड़ा। उसके मुख्य आचार्य और मुख्या धिष्ठाता होकर उसको पालने-पोसने और आदर्श शिक्षालय बनाने का सब कार्य भी आपको ही करना पडा।

अपनी फलती-फूलती वकालत को लात मारकर अपने स्वास्थ्य को मिट्टी में मिलाकर तथा अपनी सम्पत्ति भी गुरुकुल को प्रदान कर अपने को गुरुकुल के साथ इस प्रकार तन्मय कर दिया था कि आपके व्यक्तित्व और गुरुकुल के अस्तित्व को एक दूसरे से पृथक करने वाली किसी स्पष्ट रेखा का अंकित करना संभव नहीं था । वस्तुत. कांगडी का गुरुकुल आपके अदम्य साहस और अमोम शक्ति का फलस्वरूप है। वह उनका हृदय की संतान होने से ‘हृदयादाधि जायसे’ उनका एकमात्र वशधर स्मारक है।

प्रारंभ में जब उन्होंने हरिद्वार में गंगा के दूसरे किनारे पर भयंकर और बीहड जगल मे गुरुकुल की नीव डाली तो अधिकांश व्यक्ति स्वामी जी के प्रयास की सफलता में सदेह कर रहे थे। कुछ तो कहते थे-भला कौन अपने बालकों को इन जंगलों में लाकर साधु बनायेगा; रीठो, शेरों और हाथियों के उस वन में कौन अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजेगा !

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

परंतु जब महात्मा मुंशीराम जी ने सर्व प्रथम अपने कलेजे के दो टुकड़े इंद्र और हरिश्चंद्र उस वन मे भेजे तो आयंजगत् वाह-वाह कर उठा । तब गुरुकुल में शिक्षा पाने के लिए भारत ही नहीं, बाहर के देशो से भी ब्रह्मचारी आने लगे। आगे चलकर पं. इंद्रविद्या वाचस्पति दिल्ली के सुप्रसिद्ध पत्रकार और राजनीतिक नेता बने । हरिश्चंद्र जी स्नातक बनने के कुछ दिन बाद विदेशों में स्वाधीनता की अलख जगाने चले गये।

स्वाधीन भारत में अभी तक भी अंग्रेजी वायुमंडल में पालित-पोषित लोग यह कहते मिलेंगे – जब तक विज्ञान और तकनीकी ग्रंथ हिंदी में न हो, तब तक कैसे हिंदी मे उच्चशिक्षा दी जाय ? जबकि महात्मा मुंशीराम स्वाधीनता चालीस वर्ष पूर्व गुरुकुल कांगड़ी में हिंदी के माध्यम से विज्ञान जैसे विषयों की शिक्षा दे रहे थे। ग्रंथ हिंदी में थे और अध्ययन कराने वाले भी हिंदी के थे ।

जहां चाह होती है, वही राह निकलती है। एक दीर्घकाल तक अंग्रेज गुरुकुल कागड़ी को भी राष्ट्रीय आंदोलन का अभिन्न अंग मानते रहे। इसमें संदेह भी नहीं कि गुरुकुल के स्नातकों में स्वाधीनता की अद्भुत तड़प थी। स्वामी श्रद्धानन्द जैसा राष्ट्रीय नेता जिस गुरुकुल का संस्थापक हो और शिक्षा का माध्यम हिंदी हो, वहां राष्ट्रीयता नही पनपेगी तो कहां पनपेगी।

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

सरकार का भयभीत होना स्वाभाविक था। परंतु गुरुकुल मे कुछ ऐसी विशेषताएं थी कि वह न केवल आर्यसमाजियों के लिए अपितु सनातनी, ईसाई, मुसलमान और यूरोपियन सबके लिए आकर्षण का केंद्र बन गया। डॉ० असारी और बॅरिस्टर आसफ अली जैसे निष्पक्ष मुसलमान, पादरी मि० मिलवनं, दीनबंधु एण्ड्रयूज और टैम्जे मैक्डॉनल्ड जैसे वहां पधारे और उसकी भूरी-भूरी प्रशंसा को महात्मा मुशीराम से मिलने देश के प्रमुख राष्ट्रीय नेता भी गुरुकुल आते रहते थे।

दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद जब मोहनदास करमचंद गांधी प्रथम बार गुरुकुल कागड़ी के उत्सव में पधारे, तब महात्मा मुशीराम ने ही उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि प्रदान की। तब से ही गांधीजी महात्मा कहलाने लगे। महात्मा गांधी ने गुरुकुल के संबंध में यह सम्पति दो थी “आर्यसमाज के कार्य का सर्वोत्तम परिणाम गुरुकुल की स्थापना है। यह सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय संस्था है, जिसका शासन और प्रबंध सब स्वायत्त है।”

अंग्रेज सरकार ने कई बार प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से गुरुकुल को सहायता देने का प्रस्ताव किया। परंतु देशभक्त और महर्षि के सजग अनुयायी मुंशीराम सदा इस प्रस्ताव को ठुकराते रहे। वह भली भांति जानते थे कि विदेशी सरकार से प्राप्त सहायता गुरुकुल की स्वतंत्र और स्वच्छंद आत्मा के लिए घातक होगी।

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

सन् 1902 से 1917 तक पंद्रह वर्ष स्वामी श्रद्धानंद जी ने महात्मा मुंशीराम के नाम से गुरुकुल कांगड़ी के यज्ञ में अपने जीवन की आहुति दे दी। श्री मत्यकाम विद्यालंकार के शब्दों में “गुरुकुल कांगड़ी ही उनका मंदिर था और जीवन का एकमात्र श्रद्धा केंद्र था। आपके ही प्रचंड साहस और महर्षि दयानंद के आदर्शों को भूर्त रूप देने के अटल निश्चय के कारण गुरुकुल कांगडी ने न केवल भारत मे एकमात्र राष्ट्रीय संस्था होने का गौरव प्राप्त किया I

बल्कि विदेशों के शिक्षाशास्त्रियों के हृदय मे भी गुरुकुल के प्रति अद्वितीय प्रतिष्ठा का भाव जागृत कर दिया।” इस प्रकार महात्मा मुशीराम ने हृदय की संपूर्ण ममता के साथ गुरुकुल को ने पालित घोषित किया। 12 अप्रैल सन् 1917 को कनखल की मायापुर वाटिका मे आपने संन्यास आश्रम में प्रवेश किया। उपस्थित नर-नारियो के सम्मुख उन्होंने अविचल भाव से खड़े होकर घोषित किया I

“मैं सदा सब निश्चय परमात्मा की प्रेरणा से श्रद्धापूर्वक ही करता रहा हूं। सन्यास भी श्रद्धाभावना से प्रेरित होकर ही लिया है। अतः मैं आज से अपने नये नाम ‘श्रद्धानंद’ को धारण कर रहा हूं। आप सब प्रभु से प्रार्थना करें कि सर्वसमर्थ प्रभु, मुझे अपने नये व्रत को पूर्णता से निभाने की शक्ति दें।”

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

इस भाति आर्य जनता के महात्मा मंशीराम, सन्यासाश्रम में प्रवेश करने के पश्चात् स्वामी श्रद्धानंद बनकर मनुष्य मात्र के हो गये। सब बंधनी एवं ए णाओं से मुक्त होकर आपने लोकोपकार में अपना जीवन अर्पित कर दिया आपने इस काल मे धर्म-यात्राएं कर अस्पृश्यता निवारण और दलितोद्वार का कार्य बड़े जोरों से किया। आर्यसमाज में परस्पर द्वेष को मिटाने तथा साम्प्र दायिकता की भावना को दूर करने का उन्होने भरपूर प्रयत्न किया।

वर्षों तक स्वामी श्रद्धानद दिल्ली के बेताज बादशाह माने जाते थे। उनके संकेत दिल्ली वालों के लिए आवेश का कार्य करते थे। दिल्ली मे चार अप्रैल सन् 1919 का वह दिन भी ऐतिहासिक दिन ही था, जब दिल्ली की जामा मस्जिद के तख्त पर खड़े होकर स्वामी जी ने भाषण दिया। ‘त्व हि ना पिता वसो त्वं माता शतऋो’ यह वेद-मंत्र पढ़कर जब स्वामी जी ने अपनी सिंह गर्जना की, तो घंटो तक टकटकी लगाये लोग स्वामी जी का भाषण सुनते रहे । स्वामी जी प्रथम गैर-मुस्लिम थे, जिन्हें मुसलमानों ने यह आदर दिया ।

अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन के स्वागत समिति के अध्यक्ष पद का जिस प्रकार आपने सफलतापूर्वक निर्वाह किया, उससे स्पष्ट हो गया था कि राजनीति के क्षेत्र में भी आप क्या कुछ कर सकते थे। कांग्रेस अधिवेशन से पूर्व अमृतसर के जलियांवाला बाग मे वह ऐतिहासिक नरमेध हो चुका था, जिसकी याद आज भी रोंगटे खड़े कर देती है। लोग इतने भयभीत थे कि कोई साहस करके तैयारियों में लगने को उद्यत नही हो रहा था।

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

उस समय वहा कोई कांग्रेस अधिवेशन की कल्पना भी नहीं कर सकता था। आखिर सबने एक स्वर से यह तय किया कि स्वामी श्रद्धानंद यदि इस अधिवेशन की बागडोर अपने हाथ में ले लें तब ही बात बन सकती है। नेताओं की प्रार्थना से आप स्वागताध्यक्ष बने सर्वत्र निराशा और आतंक के वातावरण में भी अमृतसर मे सूरत के इतिहास की पुनरावृत्ति न होने देने मे स्वामी जी का बहुत अधिक हाथ था।

आपने अध्यक्षीय भाषण में कहा – “यदि जाति को स्वतंत्र देखना चाहते हो तो स्वयं सदाचार की मूर्ति बनो।” उन्होंने सबको विदेशी खानपान, वेशभूषा व भोग-जीवन को तिलांजलि देने का संदेश दिया। उनके इस भाषण से पहली बार काग्रेस के मंच पर हिंदी सुनने को मिली थी। तब वहां बैठे किसी नेता ने कहा था “आज लगता है हम भारतीय कांग्रेस के अधिवेशन में बैठे हैं।”

एक ऐसा भी समय रहा जब लाला लाजपतराय, स्वामी श्रद्धानंद, भाई परमानंद आदि आर्यसमाज के नेता राष्ट्रीय आंदोलन के मंच पर भी वैसे हो सक्रिय थे, जैसे आर्यसमाज में उन दिनों स्वातंत्र्य-संघर्ष में आर्यसमाज का संगठन द्वितीय रक्षा पंक्ति का कार्य कर रहा था। समाज-सुधार के साथ-साथ राजनीतिक चेतना जगाने मे आर्यसमाज के इन नेताओं का योगदान सरलता से नही भुलाया जा सकेगा। हिंदी, हरिजन समस्या का समाधान और खादी तीनों के लिए आर्यसमाज अर्पित-सा हो गया था।

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

परंतु दलितोद्वार और असहयोग आंदोलन पर कांग्रेस से मतभेद होने के कारण आपने उससे त्यागपत्र दे दिया। आपकी राजनीति पर धर्म का आवरण चढा हुआ था, जिससे कांग्रेम की शुष्क राजनीति पर विश्वास रखने वाले नेताओं के साथ आपका घनिष्ठ संबंध-निर्वाह होना कठिन था। परंतु आपने राजनीतिक क्षेत्र में हिंदू धर्म की चेतना को पुनर्जीवित कर तथा स्वातत्र्य संग्राम मे निर्भीक योद्धा की भूमिका निभाकर देश को जो प्रेरणा दी, वह भारत के इतिहास में चिरस्मरणीय रहेगी।

समाज-सुधार आदोलन को भी इस निर्भीक संन्यासी ने नयी दिशा दी। हरिजन समस्या के समाधान में तो कई स्थानो पर संघर्ष का भी सामना करना पड़ा। गुरुकुल कांगड़ी में छात्रावासों और भोजनालयों में बिना किसी भेदभाव के हर जाति के विद्यार्थी रहते और खाते-पीते थे। स्वामी जी का कहना था मनो से छुआछूत की भावना मिटाने मे आवासीय शिक्षण संस्थाओं का अच्छा योगदान रह सकता है।

चौबीसो घंटे एक साथ मिलकर जब वह रहेगे, खेलेंगे कूदेंगे और पढ़ें-लिखेंगे तो कहां तक छूत अछूत की दीवार खड़ी रह जायेगी। आवासीय पद्धति पर आश्रित ऐसे गुरुकुल उन्होंने हरियाणा में इन्द्रप्रस्थ और कुरुक्षेत्र, गुजरात में सोनगढ़ और सूपा में भी खोले । हिंदू समाज मे अछूत जातियों को पृथक करके उसको दो भागों में विभाजित कर देने की सरकार की जिस गूढ चाल को महात्मा गांधी जी सन् 1931 में द्वितीय गोलमेज सभा में भांप पाये थे, स्वामीजी ने अमृतसर कांग्रेस के स्वागताध्यक्षीय भाषण में ही उसकी ओर संकेत कर दिया था।

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

आपने साहित्य द्वारा आंदोलन करने में भी कोई कसर न रखी थी। प्रत्येक समस्या पर आप अपने ही दृष्टिकोण से विचार करने थे, इसलिए आपके लेखों में ऐसी मौलिकता रहती थी, जो पाठकों के हृदय की गहनता मे सीधा पहुंचकर वहां अपना घर बना लेती थी। यद्यपि ‘अर्जुन’ और ‘तेज’ में भी स्वामी जी समय-समय पर लेख लिखते रहते थे तथापि उनके सार्वजनिक जीवन का पहला विश्वासपात्र साथी ‘सद्धर्म प्रचारक पत्र था।

उनको आर्यसमाज का अप्रतिद्वंद्वी नेता बनाने में इस पत्र का महत्त्वपूर्ण भाग था। उनके द्वारा होने वाली आर्य समाज की सेवा का यह प्रधान साधन रहा था। इन स्वतंत्र लेखों के अतिरिक्त आपने ‘आर्य पथिक लेखराम की जीवनी’, ‘ऋषि दयानंद का पत्र व्यवहार ‘आदिम सत्यार्थ प्रकाश आदि बहुत से ग्रंथ और ट्रेक्ट भी प्रकाशित किये थे। उर्दू का ओजस्वी लेखक होते हुए भी आपके हृदय में हिंदी प्रेम अद्वितीय रूप में विद्यमान था।

इस प्रकार एक नेता, महात्मा तथा संन्यासी मे जो सद्गुण होने चाहिए प्रायः वे सब आपमे विद्यमान थे। अपनी पक्षपातरहित तथा तटस्य नीति के कारण ही उन्हें मुसलमानों की जामा मस्जिद की वेदी तथा कांग्रेस के मंच से समान रूप से भाषण देने का अवसर मिला था। दृढ़-सिद्धांतवादी होना आपके व्यक्तित्व की विशेषता थी । धर्म के सिद्धातों में आप समझौते के सवधा विरोधी थे।

Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

उन्होंने लोगों को वाह-वाही पर अपने सिद्धांतों का बलिदान कभी नही किया। वे एक सुधारक थे, कर्मवीर थे। उनमे निर्भीकता को आश्चर्यजनक मात्रा थी। उन्होंने जीवन-पर्यंत देश, धर्म और जाति के लिए सर्वस्व बलिदान किया और अंतिम क्षणों में अपना भौतिक शरीर भी राष्ट्र को अर्पण कर दिया । वस्तुतः वे उन महापुरुषों में से थे जो जाति अथवा देश का नेतृत्व कर उसको घोर निराशा, गहन अंधकार और भयानक संकट से बचाकर सदा प्रकाश का मार्ग दिखाने के लिए उत्पन्न होते है। वे वास्तविक अर्थों के प्रेरणा के स्रोत थे। 

Chhatrapati Shivaji Maharaj : छत्रपती शिवाजी महाराज चरित्र

 

Leave a Comment