Surendranath Banerjee – सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

Surendranath-BanerjeeSurendranath Banerjee

जन्म – सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी भारत की एक अनुपम विभूति थे। उनका जन्म नवम्बर 1848 में एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके दादा कट्टर हिन्दू थे, फिर भी उन्होंने अपने पुत्र डॉ. दुर्गाचरण बनर्जी को डाक्टरी की शिक्षा दी। यही डॉ. दुर्गाचरण बनर्जी सुरेन्द्र के पिता थे। इनकी माँ अत्यधिक धर्मनिष्ठ महिला थी। अतः बालक सुरेन्द्र पर प्राचीन और नवीन दोनों विचारों का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था।

Surendranath Banerjee – सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

शिक्षा –  सुरेन्द्र अत्यधिक तीक्ष्ण बुद्धि के छात्र थे। स्मरण शक्ति बड़ी प्रखर थी। 15 वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली। बी.ए. की परीक्षा पास करने के बाद ये 1871 ई. में इंगलैण्ड गए और उसी साल उन्होंने इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा में सफलता प्राप्त कर ली। उन्हें भारत लौटने पर सिलहट के असिस्टेस्ट मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त किया गया। सुरेन्द्र का इंगलेण्ड जाना खतरे से खाली न था। बनाल केली ब्राह्मणो ने उन्हें अपनी जाति से अलग कर दिया, फिर भी सुरेन्द्र ने इसकी कोई परवाह न की।

सुरेन्द्र का हृदय राष्ट्रप्रेम से भरा था। अंग्रेज भारतीयों की बड़ी हंसी उड़ाया करते थे। स्वतंत्र विचार वाले प्रतिभाशाली सुरेन्द्र का गौरांग हाकिमों से बहुत दिनों तक मेल न रह सका। शीघ्र ही सुरेन्द्र का सिलहट के जिला मजिस्ट्रेट के साथ मतभेद बढ़ता गया। उन्हें जिला मजिस्ट्रेट के अधीनस्थ कार्य करना होता था जो उन पर अनुचित दबाव डालता।

युवक सुरेन्द्र उसके दबाव में न आये, अतः उसने इन पर मुकदमा चलाने की सिफारिश की। इस पर सरकार की तरफ से जाँच आयोग बैठाया गया जिसमें उन्हें बर्खास्त करने की अनुशंसा की। फलस्वरूप आयोग के प्रतिवेदन के अनुसार भारत-मंत्री ने इन्हें सन् 1873 ई. में नौकरी से बर्खास्त कर दिया। इस संबंध में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक अध्यक्ष अंग्रेज पदाधिकारी श्री ए.ओ. ह्यूम ने लिखा है कि अंग्रेज भारतीयों को हीन भावना से देखते थे।

Surendranath Banerjee – सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

वे सदा इस बात के लिए प्रयत्नशील रहते कि शाही नौकरी का भवन भारतीय के प्रवेश से दूषित न होने पाए। सुरेन्द्रनाथ को नौकरी से बर्खास्त होने के बाद पचास रुपये मासिक की पेशन सरकारी खजाने से मिलने लगी। सुरेन्द्रनाथ अपने मामले की पैरवी करने के लिए लंदन गए, पर वे सरकार को समझाने में असफल रहे। लाख प्रयत्न के बाद सरकार ने अपना निर्णय नहीं बदला।

तब उन्होंने इंगलेण्ड में ही बैरिस्ट्री की परीक्षा पास करनी चाही पर बर्खास्त आई.सी.एस. होने के कारण इस पेशे के लिए उन्हें इजाजत नहीं दी गई। परेशान होकर उन्होंने अंग्रेजी भाषा का गहराई के साथ अध्ययन किया। 1875 ई. में वे कलकत्ता लोट आये। अब सुरेन्द्र एक निराश युवक की भाँति इधर-उधर भटक रहे थे। पचास रुपये की पेंशन से परिवार का भरण – पोषण करना कठिन कार्य था।

भगवान की दया से उनकी मुलाकात प्रसिद्ध समाजसेवी और प्रख्यात विद्वान् पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर से हुई जिन्होंने मेट्रोपोलिटन इन्स्टीट्यूट में 200 रुपये मासिक वेतन पर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को अंग्रेजी का प्रोफेसर नियुक्त में किया। बाद में सिटी कॉलेज चले गये जहाँ उन्हें 300 रुपये प्रतिमाह मिलने लगा।

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Dadabhai Naoroji- दादा भाई नौरोजी

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को अध्यापन से बड़ा लाभ हुआ। ये छात्रों के सम्पर्क में आये। उन्हें अपनी व्याख्यान शक्ति को बढ़ाने का सुनहरा अवसर मिला। विद्यार्थियों को वे अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने के सिलसिले में प्रसिद्ध विचारक वर्क, उद्भट विद्वान् मैकाले और प्रसिद्ध कान्तिकारी मैजिनी के विचारों से भी अवगत कराते रहते। सुरेन्द्र ने प्राच्य साहित्य के अलावा पाश्चात्य साहित्य का भी गहराई के साथ अध्ययन किया था।

सुरेन्द्रनाथ भारत को एक सूत्र में बाँधना चाहते थे। अतः यह आवश्यक था कि पहले विद्यार्थियों को संगठित किया जाये। उनके प्रयत्न से कलकत्ता में विद्यार्थी संघ की स्थापना हुई। वे विद्यार्थियों को सदा राजनीति में भाग लेने के लिए प्रेरित किया करते। यह सही है कि कुछ वर्षों के बाद उन्होंने अपना यह विचार बदल दिया। फिर भी उस समय कलकत्ता के विद्यार्थी संघ ने काफी जन-चेतना लोगों में भरी थी।

इंडियन असोसिअशन की स्थापना – 1876 ई. में उन्होंने कलकत्ता के एक प्रख्यात अधिवक्ता श्री आनन्द मोहन बोस के सहयोग से ‘इण्डियन एसोसिएशन’ की स्थापना की। यह संस्था सुरेन्द्रनाथ के शब्दों में मध्यम वर्ग के अंग्रेजी में शिक्षित लोगों की संस्था थी क्योंकि ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन में तो बंगाल के जमींदारों का बोलबाला पहले ही से था। इण्डियन एसोसियेशन की स्थापना की जरूरत इसलिए महसूस हुई ताकि शिक्षित मध्यम वर्ग के लोगों का प्रतिनिधित्व वह कर सकें। इण्डियन एसोसिएशन के प्रमुख लक्ष्य इस प्रकार थे :

  1. भारत में प्रभावशाली लोकमत तैयार करना,
  2. सार्वजनिक राजनीतिक हितों के आधार पर सब जातियों तथा धर्मावलम्बियों में एकता स्थापित करना,
  3. हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रयत्न करना,
  4. सार्वजनिक आन्दोलन में जन समूह का सहयोग प्राप्त करना ।

Surendranath Banerjee – सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

इन महान उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने अथक प्रयास किया। उन्होंने उन उद्देश्यों के प्रचार के लिए केवल बंगाल का ही भ्रमण नहीं किया, बल्कि भारत के अन्य भागों की भी यात्रा की।

सन् 1878 में सरकार ने वर्नाकुलर प्रेस एक्ट पारित किया था। उस विधेयक के द्वारा समाचारपत्रों की स्वतंत्रता पर काफी आघात पड़ता था। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने इस विधेयक का डटकर विरोध किया। फलतः लार्ड रीपन ने इस कानून को रद्द कर दिया। 1857 की क्रान्ति के बाद 1858 ई. में महारानी विक्टोरिया ने एक घोषणा द्वारा भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन समाप्त कर दिया और हिन्दुस्तान शासन स्वयं अपने हाथों में लिया।

सरकार अब यह अनुभव करने लगी कि भारतीयों का सहयोग किसी-न-किसी रूप में लेना आवश्यक है। बिना उनके सक्रिय सहयोग के भारत में शासन करना कठिन होगा। डॉ. सर सैयद मोहमूद एवं अन्य भारतीयों के प्रयत्नों के फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने 1861 ई. में भारतीय परिषद अधिनियम पारित किया। इसके अनुसार गवर्नर जनरल की कोसिल में कम-से-कम छह तथा अधिक से अधिक बारह सदस्यों को रखने व्यवस्था की गई। 1884 ई. ही इसमें सुधार लाने के लिए कुछ लोगों ने शोर मचाना शुरू किया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी – में 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई जिसका प्रथम अधिवेशन बम्बई में हुआ जिसकी अध्यक्षता रमेशचन्द्र बनर्जी ने की। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी इस अधिवेशन में कुछ कारणवश भाग न ले सके, पर वे कांग्रेस की गतिविधियों से परिचित थे। 1886 ई. में कलकत्ता में अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता दादा भाई नौरोजी ने की। कांग्रेस ने एक प्रस्ताव द्वारा यह माँग की कि गवर्नर जनरल की इम्पीरियल कोंसिल के सदस्यों की संख्या में वृद्धि की जाये।

Surendranath Banerjee – सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

थोड़े में काउंसिल के सुधार के लिए कांग्रेस मंच की ओर से आवाज बुलन्द की गई। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने काउंसिल में सुधार लाने के लिए प्रयत्न किया, फलस्वरूप 1892 में भारतीय परिषद अधिनियम पारित किया गया। गवर्नर जनरल की काउंसिल के साथ-साथ प्रान्तों के लेजिरलेटिव काउंसिल की सदस्यता भी बढ़ायी गयी। इस काउंसिल में बनर्जी आठ वर्षों तक सदस्य रहे। वे सदा भारतीयों के हित के लिए लड़ते रहे।

सन् 1899 ई. में काउंसिल ने कलकत्ता कॉरपोरेशन के अधिकारों में कमी कर दो। अब यह एक स्वायत्तशासी निकाय न रहकर अर्द्धसरकारी संस्था बन गई। सुरेन्द्रनाथ ने इसके खिलाफ घोर संघर्ष किया, पर वे करते ही क्या? काउंसिल में बोलबाला सरकारी सदस्यों और समर्थकों का था।

संयोगवश सुरेन्द्रनाथ बनर्जी 22 वर्ष के बाद जब बंगाल में स्वायत्त शासन विभाग के मंत्री हुए, तब उन्होंने इस नियम को रद्द कराकर कलकत्ता कॉरपोरेशन को अनेक अधिकार दे दिये। यह व्यवस्था की गई कि नामजद सदस्यों की अपेक्षा जनता द्वारा निर्वाचित सदस्य अधिक रखे जायें। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को कलकत्ता के नगर निगम में सुधार लाने का बहुत बड़ा श्रेय है।

इसी बीच 1898 ई. में कर्जन भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया। वह एक प्रतिभाशाली प्रशासक था। उसने भारतीयों के बीच फूट डालने की योजना बनाई। उसने विश्वविद्यालय विधेयक पारित कराया जिसके अनुसार गैर सरकारी महाविद्यालयों के अधिकार में अत्यधिक कमी कर दी गयी। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने इसके खिलाफ आवाज उठाई।

Surendranath Banerjee – सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

लार्ड कर्जन ने अपने दीक्षांत समारोह में भारतीयों के लिए कुछ अपशब्दों का प्रयोग किया था। उसने उन्हें अशिष्ट और असभ्य तक कह डाला। सुरेन्द्र ने इसका विरोध किया। लाई कर्जन ने राष्ट्रीयता को दबाने के लिए बंगाल को दो टुकड़ों में करने का निर्णय लिया। उसके इस कदम से सारे भारत में क्रान्ति की लहर दौड़ पड़ी।

लार्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल को दो टुकड़ों में बांटकर उसकी राजनीतिक शक्ति को ही समाप्त करना चाहा। सुरेन्द्र ने इस अजनतांत्रिक निर्णय के खिलाफ संघर्ष करना शुरू किया। केवल बंगाल में ही नहीं, बंग-भंग के खिलाफ समस्त भारत में आन्दोलन छेड़ा गया। सुरेन्द्र बंग-भंग के आन्दोलन के समय काफी लोकप्रिय बन गये थे।

बरिसाल में बंगाल प्रांतीय राजनीतिक सम्मेलन का आयोजन किया गया, पर सरकार ने इसे होने नहीं दिया। फिर भी सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने अन्य कार्यकर्ताओं के साथ सड़को पर वन्दे मातरम् का नारा लगाया। बंग भग का आन्दोलन 1911 तक चलता रहा। दिसम्बर, 1911 ई. में सम्राट् पंचम जार्ज ने अपने प्रसिद्ध दिल्ली दरबार में बंगाल विभाजन विधेयक को रद्द कर दिया तथा भारत की राजधानी कलकत्ता से हटाकर दिल्ली लायी गयी।

Surendranath Banerjee – सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

उन दिनों बंगाल में क्रान्तिकारी दल का प्रभाव था। अरविन्द घोष और रासबिहारी बोस उनके प्रमुख नेता थे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी क्रान्तिकारी आन्दोलन के घोर विरोधी थे। यहाँ पर यह उल्लेख करना आवश्यक है कि क्रान्तिकारियों को वांछित सफलता नहीं मिली। रासबिहारी जापान चले गये तथा श्री अरविन्द पांडिचेरी में जा बसे सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी सदा 1886 से लेकर 1917 तक के कांग्रेस अधिवेशनों में प्रायः भाग लेते रहे।

दो बार वे कांग्रेस के सभापति भी निर्वाचित हुए। पहली बार वह सन् 1895 ई. में पूना की कांग्रेस के सभापति चुने गये। दूसरी बार वह सन् 1902 ई. में अहमदाबाद मे होने वाले कांग्रेस अधिवेशन में सभापति चुने गये। उनके अध्यक्षीय भाषण वड़े ही प्रभावोत्पादक और उत्प्रेरक थे। 1907 ई. में सूरत में कांग्रेस का अधिवेशन शुरू हुआ। ज्ञातव्य है कि कांग्रेस दो दिलों में बैट चुकी थी-नरम दल और गरम दल नरम दल के नेता फिरोजशाह मेहता, दादा भाई नौरोजी, गोपालकृष्ण गोखले और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी थे गरम दल का नेतृत्व लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपत राय करते थे।

नरम दल वाले संवैधानिक सुधार द्वारा देश का कल्याण करना चाहते थे, जबकि गरम दल वाले ‘सरकार’ को संघर्ष के द्वारा दबाना चाहते थे। तिलक ने घोषणा की थी कि त्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे हम प्राप्त करके रहेंगे। इस घोषणा से भारतीय युवक काफी प्रभावित हुए थे।

Surendranath Banerjee – सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

सूरत अधिवेशन में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व को पहली बार चुनौती दी गयी सूरत में उग्रवादी कांग्रेसियों ने उनका विरोध करते हुए उन पर जूता तक फेंका पर सुरेन्द्र इससे तनिक भी विचलित न हुए। गरम दल को कांग्रेस छोड़नी पड़ी। अब सुरेन्द्रनाथ का वर्चस्व कांग्रेस दल पर पूरा बढ़ चुका था। 1916 के लखनऊ अधिवेशन में गरम दल और नरम दल दोनों एक हो गये।

हिन्दू और मुस्लिम लीग के साथ भी कांग्रेस का समझौता हो गया। अतः 1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन का भारतीय इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान है। 1919 ई. में मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार योजना बन रही थी। इसी आधार पर भारतीय सरकार अधिनियम 1919 पारित किया गया और 1921 ई. में बंगाल सहित भारत के आठ प्रांतों में द्वैत शासन प्रणाली शुरू की गयी।

1921 में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को ‘सर’ की उपाधि दी गयी। इसी वर्ष सरकार ने उन्हें स्वायत्त शासन विभाग का मंत्री बनाया। कहना न होगा कि बड़ी कुशलतापूर्वक उन्होंने पद संभाला। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने महात्मा गाँधी द्वारा संचालित असहयोग आन्दोलन में भाग नहीं लिया। इस कार्य से उन्हें कोई राजनीतिक लाभ प्राप्त नहीं हुआ। श्री सुरेन्द्रनाथ बनर्जी एक अच्छे पत्रकार भी थे।

Surendranath Banerjee – सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

उन्होंने ‘बंगाली’ नामक समाचारपत्र भी प्रकाशित किया। इसके माध्यम से उन्होंने जनता को देश की सही स्थिति से परिचित कराया। यह पत्र पहले साप्ताहिक था पर बाद में दैनिक बन गया। जनता सुरेन्द्र के अग्रलेखों को बहुत पसन्द करती। उनके विचार सुलझे हुए और स्पष्ट होते। इस पत्र के खिलाफ 1880 में मुकदमा चला दिया गया कि उसमें प्रकाशित सम्पादकीय टिप्पणी में सुरेन्द्रनाथ ने अदालत का अपमान किया है।  सरकार को तो किसी बहाने की जरूरत थी।

अदालत की मानहानि के सवाल पर सुरेन्द्रनाथ को दो महीने का कारावास का दंड दे दिया गया। इससे उनका नाम सारे देश में फैल गया। इस घटना से यह सिद्ध हो गया कि अंग्रेज सरकार भारतीयों को हर तरह से परेशान करना चाहती थी। दो महीने की जेल की अवधि समाप्त होने पर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी पुनः अपने सम्पादन कार्य में जुट गये।। सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी 1913 ई. में इम्पीरियल कीसिल के सदस्य चुने गये।

वे 7 वर्ष तक इसके सदस्य रहे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी एक कट्टर सिद्धान्तवादी व्यक्ति थे। वे वैधानिक आन्दोलन में विश्वास करते थे। वे मानते थे कि स्वराज हमें संवैधानिक आन्दोलन द्वारा भी प्राप्त हो सकता है। वे क्रान्ति में विश्वास नहीं रखते। राजनीति में उतार-चढ़ाव होता रहता है। जो एक दिन राजनीति के शिखर पर पहुँच जाता है उसे ही एक दिन धूल चाटना भी पड़ता है।

Surendranath Banerjee – सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

20वीं शताब्दी के प्रथम दशक में सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी भारतीय राजनीति के क्षितिज पर सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नक्षत्र थे। ये दोपहर के प्रखर मार्तण्ड की तरह चमक रहे थे। कुछ ही दिनों बाद 1923 में नियति ने सुरेन्द्रनाथ का साथ नहीं दिया। वे 1923 के लेजिस्लेटिव कॉसिल के सार्वजनिक चुनाव में पर गये। इसे हम कोई बहुत आश्चर्यजनक घटना नहीं मानते।

1977 के आम चुनाव में श्रीमती इन्दिरा गाँधी जैसे राजनेता को भी मुँह की खानी पड़ी थी। इसलिए जो यह मानकर चलता है कि राजनीति में सदा विजय होती है, मेरी समझ में उचित नहीं। यह बात दूसरी है कि कुछ सौभाग्यशाली सार्वजनिक जीवन में परास्त नहीं हुए। यथा- स्व. पंडित जवाहरलाल नेहरू, स्व. जगजीवनराम आदि सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कई बार इंगलैण्ड की यात्रा की थी।

पहले तो वे आई.सी. एस. की परीक्षा देने इंगलैण्ड में गये। 1897 ई. में वह वैल्वी कमीशन में बंगाल की ओर से गवाही देने के लिए गये। 1909 ई. में ब्रिटिश शासित देशों के पत्रकार सम्मेलन में वह भारतीय पत्रकारों के प्रतिनिधि की हैसियत से मनोनीत हुए। सन् 1919 ई. में गवर्नमेण्ट ऑफ इंडिया बिल की ज्वाइंट पार्लियामेन्ट्री कमेटी के समक्ष गवाही देने के लिए वे चार महीने इंगलैण्ड में रहे।

Surendranath Banerjee – सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

मृत्यु – सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी वीतराग संत के समान थे जो सदा सार्वजनिक हित को अपने पारिवारिक हित से ऊपर मानते थे। पुत्र और पत्नी की मृत्यु के बावजूद ये सार्वजनिक कार्य से कभी भी विचलित नहीं हुए। सवेरे उन्हें पुत्र शोक हुआ तो उसकी बिना चिंता किए वे शाम को सार्वजनिक कार्य में भाग लेने चले गये।

कुछ नरम दल का नेता कहकर उनकी हँसी उड़ाते हैं तो कुछ लोग उन्हें सरकार का समर्थक कहकर इनका महत्त्व कमाना चाहते हैं। सही बात यह है कि वे हिमालय के समान अपने विचारों पर अडिग थे, वही कार्य करते जिससे जनता का हित होता। इनका देहावसान 6 अगस्त, 1925 में हुआ। सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी की सेवाओं को सदा याद किया जायेगा।

Shetkaryancha Asud

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