Subramania Bharati – सुब्रह्मण्य भारती

Subramania-Bharati
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जन्म एवं प्रारंभिक जीवन – सुब्रह्मण्यम भारती राष्ट्रीय चेतना के अमर गायक थे। उन्होंने एक ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना की थी, जिसमें धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता हो। वह देश में सद्भाव और मैत्रीपूर्ण वातावरण देखना चाहते थे। सुब्रह्मण्यम भारती का जन्म एट्टयपुरम् (जिला तिरुनेल्वलि, तमिलनाडु) गाँव में 11 दिसंबर, 1882 को हुआ था।

Subramania Bharati – सुब्रह्मण्य भारती

उनके पिता चिन्नास्वामी अय्यर एट्टयपुरम् के राजा के यहाँ पंड़ित का कार्य करते थे। राजदरबार के वेतन से उनका गुजारा तो हो जाता था, किंतु अपने और अधिक आर्थिक विकास के लिए उन्होंने एक छोटी सी कपड़ा मिल भी स्थापित कर ली थी। चिन्नास्वामी की पत्नी लक्ष्मी धार्मिक विचारों की महिला थीं। सुब्रह्मण्यम इन दोनों की पहली संतान थे।

शिक्षा – बचपन में उनके माता-पिता इन्हें ‘सुब्बैया’ कहते थे। जब सुब्बैया पाँच वर्ष के थे, तभी उनकी माता का देहांत हो गया। इसके लगभग एक वर्ष बाद यानी सन् 1888 में सुब्बैया के पिता ने दूसरा विवाह कर लिया। सुब्बैया के पिता उन्हें डॉक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते थे, लेकिन सुब्बैया का मन पढ़ने-लिखने में नहीं लगता था। विद्यालय में वह अध्यापक के प्रश्नों के उत्तर प्रायः नहीं देते थे।

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उनका स्वभाव हठीला-सा था। वह पिता से छिपकर घंटों मंदिर में बैठे रहते थे। अपने चाचा सांबशिवम् के साथ वह शरारतों में व्यस्त रहते थे। अपने सामने किताब रखकर न जाने किस कल्पना-लोक में खो जाते थे। सुब्बैया का यह रुख देखकर पिता बहुत निराश हुए। बाद में सुब्रह्मण्यम के चाचा सांबशिवम् ने अपनी देख-रेख में उन्हें स्कूल में पढ़ाने का प्रस्ताव रखा।

पिता चिन्नास्वामी ने उनका यह प्रस्ताव सहज ही स्वीकार कर लिया, क्योंकि वह तो अपने पुत्र को किसी भी तरह अच्छी और उच्च शिक्षा दिलाना चाहते थे। सुब्बैया की आरंभिक शिक्षा उनके गाँव में ही हुई। वह पढ़ने में एक औसत दर्जे के विद्यार्थी थे। वह रटने की अपेक्षा समझने में अधिक विश्वास रखते थे। उनके अध्यापक समय-समय पर छात्रों से विभिन्न समस्यापूर्तियाँ करवाते रहते थे।

Subramania Bharati – सुब्रह्मण्य भारती

अध्यापक अकसर छात्रों को काव्य-पाठ के लिए भी प्रेरित करते रहते थे। अन्य छात्र जहाँ दूसरे कवियों की कविताएँ सुनाकर वाह-वाही लूटते, वहीं सुब्वैया अपनी टूटी-फूटी भाषा में दो चार पंक्तियाँ रचकर सुना देते थे। इसीलिए अध्यापक और छात्र अकसर उनका मजाक उड़ाया करते थे। अध्यापक ने तो मजाक में उनका नाम ही ‘भारती’ रख दिया था।

‘भारती’ का अर्थ होता है-विद्या की देवी, मजाक में दिया गया यह नाम आगे चलकर उनकी प्रतिष्ठा का सूचक बन गया। छोटी-मोटी तुकबंदियों के अलावा सुब्बैया ने अपने बचपन में अन्य किसी तरह की प्रतिभा का परिचय नहीं दिया। वह एक आम विद्यार्थी की तरह स्थानीय विद्यालय के छात्र रहे। कभी-कभी वह अपने साथियों को कविता में ही जवाब दे दिया करते थे। इससे धीरे-धीरे उनमें आशु कवित्व विकसित होने लगा।

एक बार कक्षा में अध्यापक ने उनसे कहा, “हमने सुना है, तुम कालमेघम हो। कोई कविता सुनाओ।” सुब्रह्मण्यम ने तुरंत उत्तर दिया, “श्रीमान्, कालमेघम आदेश पर नहीं, अपनी इच्छा से वर्षा करता है।” उल्लेखनीय है कि कालमेघम तमिल के प्राचीन कवि हैं। तमिल में इस शब्द का अर्थ है-वर्षा करनेवाला बादल’।

Subramania Bharati – सुब्रह्मण्य भारती

राजा की सेवा में – मैट्रिक की प्रवेश परीक्षा में सुब्रह्मण्यम सफल नहीं हुए, जिससे उन्हें मैट्रिक में प्रवेश नहीं मिल पाया। वह निराश होकर एट्टयपुरम् लौट आए। पिता चिन्नास्वामी के सारे सुख-स्वप्न धरे रह गए। अंत में निराश होकर उन्होंने सुब्बैया को रियासत के राजा की सेवा में नियुक्त करवा दिया। उन्हें तमिल और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं के काव्य का अच्छा ज्ञान था।

राजा की सेवा में एक किशोर को देखकर कुछ लोगों में ईर्ष्या जाग उठी। उन्होंने सुब्बया के विरुद्ध राजा के कान भरने शुरू कर दिए। एक दिन एक विरोधी ने सुब्बैया को अपमानित करने के लिए भरी सभा में उनके परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने की बात कह दी I इसपर सुब्बैया को क्रोध आ गया।

उन्होंने क्रोधावेश में सभी सभासदों को किसी भी विषय पर चर्चा करने की चुनौती दे दी और चर्चा का विषय चुनने का अधिकार भी सभा पर छोड़ दिया। अगले दिन एक विशेष दरबार का आयोजन किया गया। एट्टयपुरम के राजा स्वयं उपस्थित हुए। उन्होंने विचारपूर्ण चर्चा का विषय रखा- ‘शिक्षा’।

सभा की ओर से विषय प्रतिपादन एक विद्वान् पंडित ने किया। फिर सुब्रह्मण्यम की ओर संकेत हुआ। वह खड़े हुए और उन्होंने तर्कसंगत, विवेकपूर्ण एवं व्यंग्यमय शैली में भाषण दिया। उनके तर्क सुनकर सभी श्रोता दंग रह गए।

Subramania Bharati – सुब्रह्मण्य भारती

सन् 1897 में सुब्रह्मण्यम का विवाह कडयम गाँव के निवासी चेल्लम अय्यर की सात वर्षीया पुत्री चेलम्माल के साथ हुआ। सन् 1898 में सुब्रह्मण्यम के पिता चिन्नास्वामी को एट्टयपुरम की कपड़े की मिल में बड़ा घाटा हुआ, जिसे वह सहन नहीं कर सके और चल बसे। सुब्रह्मण्यम की माँ अपने छोटे बच्चों को लेकर मायके चली गई। अब भारती और चेलम्माल अकेले रह गए।

इसी दौरान भारतीजी की फूफी कुप्पममाल और फूफा कृष्णमाल ने उन्हें काशी में आमंत्रित किया। इस निमंत्रण से भारतीजी को मानो एक नई राह मिल गई। उन्होंने अपनी पत्नी को मायके भेज दिया और स्वयं काशी के लिए चल पड़े। वह लगभग चार वर्ष काशी में रहे। फूफा के कोई संतान नहीं थी, इसलिए सुब्बैया को उनका बहुत प्यार मिला।

अधिक प्यार और दुलार के कारण सुब्बैया की आदतें बिगड़ने लगीं। दैनिक प्रार्थना का क्रम बंद हो गया। वह अंग्रेजी ढंग से बाल कटवाने लगे। उन्होंने मूँछे भी रख लीं और सिर पर पगड़ी बाँधनी शुरू कर दी। सुब्बैया की यह फैशनबाजी उनके फूफा को पसंद नहीं आई। उन्होंने सुब्बैया को समझाने की बहुत कोशिश की, किंतु उन पर कोई असर नहीं हुआ। हाँ, एक बात अवश्य हुई, सुब्रह्मण्यम में पढ़ने की इच्छा जाग गई।

उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध सेंट्रल हिंदू कॉलेज के माध्यम से मैट्रिक की परीक्षा पास की। नियमानुसार यह परीक्षा संस्कृत एवं हिंदी अथवा दो अन्य भाषाओं में देनी होती थी, साथ ही अन्य विषय तो रहते ही थे। भारती ने संस्कृत एवं हिंदी, दोनों में अच्छे अंक प्राप्त कर मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।

Subramania Bharati – सुब्रह्मण्य भारती

कविमित्र के रूप में कार्य – इसी दौरान एट्टयपुरम के राजा ने उन्हें अपने यहाँ आमंत्रित किया एट्टयपुरम पहुँचने पर राजा ने सुब्रह्मण्यम का एक कवि-मित्र के रूप में सम्मान किया। सुब्रह्मण्यम भारती राजा को शेली और बायरन की कविताएँ सुनाते। उन्हें देश-विदेश की गतिविधियों से अवगत कराते, किंतु राजा साहब परंपरागत मान्यताओं में डूबे हुए थे। उनका दृष्टिकोण सामंतवादी था। वह अकसर चापलूसों से घिरे रहते थे।

भारतीजी को यह सब अच्छा नहीं लगता था। एक बार अपने किसी वक्तव्य में उन्होंने राजाओं और जमींदारों के विषय में एक-दो कटु बातें कह दीं। इसपर उनके विरोधियों ने काफी बढ़ा-चढ़ाकर राजा से शिकायत कर दी। राजा ने भारतीजी से स्पष्टीकरण माँगा तो उन्होंने स्पष्टीकरण देने या क्षमा याचना करने की बजाय त्यागपत्र दे दिया। एट्टयपुरम छोड़कर भारतीजी मदुरै पहुँचे।

अध्यापक के रूप में कार्य – वहाँ उन्होंने साढ़े सत्रह रुपए मासिक वेतन पर सेतुपति हाई स्कूल में अस्थायी तमिल शिक्षक के रूप में नौकरी कर ली। अगस्त 1904 से नवंबर 1904 तक वह उस स्कूल में अध्यापक रहे। जुलाई 1904 में मदुरै की एक साहित्यिक पत्रिका ‘विवेकभानु’ में भारतीजी की पहली कविता ‘तनिमय इरक्कम’ प्रकाशित हुई।

14 पंक्तियों की उस कविता में कुछ क्लिष्ट शब्दावली का प्रयोग किया गया था। बाद में भारतीजी को अपनी इस शैली में काफी परिवर्तन करना पड़ा और सन् 1908 तक आते-आते वह नवीन शैली के अग्रणी कवि गिने जाने लगे। भारतीजी की व्यंग्य कविताओं के विषय प्राय: अंग्रेज सरकार के ‘जी-हुजूर’ बने।

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सन् 1904 के अंत में सुब्रह्मण्यम भारती ने तमिल पत्र ‘स्वदेशमित्रन्’ के उपसंपादक के रूप में काम करना शुरू कर दिया।  ‘स्वदेशमित्रन्’ में भारतीजी के कई लेख प्रकाशित हुए। इन लेखों में प्रमुखतः कर्म का महत्त्व, राष्ट्र और समाज के प्रति निष्ठा अभिव्यक्त हुई है।

भगिनी निवेदिता से भेट – दिसंबर 1906 में कांग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता में हुआ, जिसमें भारतीजी ने एक प्रतिनिधि पत्रकार की हैसियत से भाग लिया। यहाँ उन्हें राजनीतिक भाषणबाजी का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। इससे पूर्व उन्होंने कार्यालय में बैठकर नेताओं के लंबे-चौड़े भाषणों का अनुवाद, संक्षेपण अथवा पुनर्लेखन किया था।

इस कलकत्ता प्रवास के दौरान ही उनकी भेंट भगिनी निवेदिता से हुई। भगिनी निवेदिता से भारतीजी की आध्यात्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लंबी बातचीत हुई, जिससे वह बहुत प्रभावित हुए। भगिनी निवेदिता के प्रति उनके मन में अगाध श्रद्धा उत्पन्न हुई। वह उन्हें गुरुवत् मानने लगे।

भगिनी निवेदिता ने उन्हें एक सूखा पत्ता प्रसाद-स्वरूप दिया, जो वह अपनी हिमालय यात्रा के दौरान किसी पेड़ से तोड़कर लाई थीं। भारतीजी के लिए वह पत्ता ‘प्रेरणा का प्रतीक’ बन गया। उस पत्ते को उन्होंने आजीवन अपने पास रखा।सन् 1908 में भारतीजी के राष्ट्रीय गीतों का प्रथम संकलन प्रकाशित हुआ।

Subramania Bharati – सुब्रह्मण्य भारती

सन् 1909 में उनकी दूसरी काव्यकृति ‘जन्मभूमि’ प्रकाशित हुई। भारतीजी ने ये दोनों कृतियाँ भगिनी निवेदिता को श्रद्धापूर्वक समर्पित की। कलकत्ता में संपन्न हुए कांग्रेस के अधिवेशन और भगिनी निवेदिता से भेंट के बाद भारती की विचारधारा में काफी बदलाव आया। वह कांग्रेस के गरम दल की और झुक गए।

अखबारो में क्रांतिकारी लिखाण – यहाँ गौरतलब है कि भारतीजी हिंसा के पोषक नहीं थे। वह देश की स्वतंत्रता अधिकार के रूप में चाहते थे। चूँकि ‘स्वदेशमित्रन्’ की रीति-नीति के अंतर्गत भारतीजी अपने राष्ट्रवादी और चुनौती भरे लेख नहीं छाप सकते थे, इसलिए वह अपनी ऐसी रचनाओं को तमिल साप्ताहिक पत्र ‘इंडिया’ में प्रकाशित कराने लगे।

साथ ही, वह उसके लिए संपादकीय टिप्पणियाँ, अग्रलेख, कविताएँ आदि भी लिखने लगे; किंतु संपादक के रूप में नाम एम. श्रीनिवासन का छपता था। साथ ही, वह अंग्रेजी पत्रिका ‘बाल भारतम्’ के संपादक के रूप में कार्य करने लगे।विचारोत्तेजक टिप्पणियों और कविताओं के कारण भारतीजी दक्षिण से उत्तर भारत तक चर्चित होने लगे। उनकी देशप्रेम संबंधी कविताएँ युवाओं की जबान पर छाने लगी थीं।

देश की अन्य भाषाओं में भी भारतीजी की कविताओं का अनुवाद होने लगा। अंग्रेज सरकार इससे विचलित हो उठी। उसने ‘प्रेस ऐक्ट’ लागू कर दिया, जिसके तहत समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में राष्ट्रवादी रचनाओं के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। ‘इंडिया’ के संपादक एम. श्रीनिवासन को गिरफ्तार कर लिया गया। तब भारतीजी कुछ समय के लिए पांडिचेरी चले गए, क्योंकि यहाँ उनकी गिरफ्तारी भी हो सकती थी।

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पांडिचेरी प्रवास – उन दिनों पांडिचेरी फ्रांस के नियंत्रण में था, इसलिए अंग्रेजों का वहाँ कोई आदेश लागू नहीं होता था। भारतीजी ने ‘इंडिया’ के प्रकाशन की भी व्यवस्था पांडिचेरी में कर ली। फिर भी, अंग्रेजी सत्ता ‘इंडिया’ का प्रकाशन रोकने के लिए प्रयत्नशील रही।

उसने पत्रिका के लिए भेजे गए धनादेशों के वितरण पर रोक लगा दी, डाक में पत्रिकाओं को जब्त कर लिया, पत्रिका के पाठकों पर नजर रखी जाने लगी। अंततः 12 मार्च, 1910 को पत्रिका बंद करनी ही पड़ी। पांडिचेरी में भारतीजी की भेंट श्री अरविंद से हुई।

वह 4 अप्रैल, 1910 को अलीपुर की केंद्रीय जेल से छूटे थे और उन दिनों पांडिचेरी में ही रह रहे थे। भारतोजी ने उनके साथ वेद, उपनिषद्, गीता आदि पर विस्तृत चर्चा की। पांडिचेरी प्रवास में भारतीजी को भयंकर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। कभी-कभी तो फाके की नौबत भी आ जाती थी। इससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ने लगा। वह कमजोर होते गए।

पांडिचेरी में ही भारतीजी का संपर्क फकीरों, घुमक्कड़ों, साधु-संन्यासियों से हुआ। उनकी जीवन-शैली पर भी भारतीजी ने कुछ कविताएँ लिखीं। भारतीजी का जीवन फक्कड़ और मस्ती भरा था। वह अपने पास धन-संग्रह करके रखने के बजाय दीन-दुखियों की सहायता करना अधिक पसंद करते थे।

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पांडिचेरी में लंबे समय तक रहने के बाद भारतीजी 20 नवंबर, 1918 को भारत लौटे। उसी दिन पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें कुडलोर जेल में रखा गया। 14 दिसंबर, 1918 को जेल से रिहा होने पर वे कदयम् चले गए। 20 नवंबर, 1920 को भारतीजी पुनः ‘स्वदेशमित्रन्’ में उपसंपादक के पद पर नियुक्त हो गए।

उनका वेतन 75 रुपए प्रतिमाह निश्चित किया गया था। पत्र के संचालकों ने कवि-सेनानी भारतीजी के प्रति सहानुभूति-स्वरूप उनके पांडिचेरी प्रवास के दौरान प्रतिमाह 30 रुपए उनकी पत्नी को भेजे थे। मार्च 1919 में भारतीजी चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के घर पर गांधीजी से मिले।

गांधीजी उनके व्यवहार और सादगी से बहुत प्रभावित हुए। जून 1921 में एक दिन भारतीजी पार्थसारथी स्वामी के प्रसिद्ध मंदिर में गए। वहाँ वह एक हाथी को फल व नारियल भेंट करने के लिए आगे बढ़े। अचानक हाथी ने उन्हें सूँड़ से पकड़कर उछाल दिया। भारतीजी उसके पैरों के पास गिरे और मूर्च्छित हो गए। बाद में उन्हें निकटस्थ रायपेट्टा अस्पताल में भरती कराया गया। कुछ दिन के इलाज के बाद वह घर लौट आए।

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मृत्यु – जुलाई-अगस्त 1921 में भारतीजी पेचिश से पीड़ित हुए। शरीर पहले से ही दुर्बल था। काफी इलाज के बाद भी पेचिश ठीक नहीं हो सकी। अंततः 11 सितंबर की रात में लगभग डेढ़ बजे उनका देहांत हो गया। उनका अंतिम संस्कार बड़ी सादगी से संपन्न हुआ|

Chhava

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