Subhadra Kumari Chauhan – सुभद्रा कुमारी चौहान

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जन्म एवं प्रारंभिक जीवन – सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त, 1904 में इलाहाबाद के निहालपुर मुहल्ले में हुआ था। वह अपने माता-पिता की सातवीं संतान थीं। सुभद्रा बचपन में बहुत नटखट थीं, इसलिए माता-पिता उनका विशेष ध्यान रखते थे। अपने चंचल और तेज-तर्रार स्वभाव के कारण प्रायः उन्हें डाँट भी पड़ती थी, किंतु वह मन से बहुत कोमल थीं।

Subhadra Kumari Chauhan – सुभद्रा कुमारी चौहान

घर के नौकरों से भी उनका व्यवहार आत्मीयतापूर्ण रहता था। सुभद्रा के माता-पिता ने उन्हें घर में ही पढ़ना-लिखना सिखाया। इसके बाद उनकी प्रारंभिक शिक्षा प्रयाग स्थित एक विद्यालय में हुई। विद्यार्थी जीवन से ही उनका झुकाव लेखन की ओर होने लगा था। उन्होंने पहली कविता पंद्रह वर्ष की उम्र में रची थी। कविता रचने के प्रति उनका रुझान प्रायः माता-पिता व अध्यापकों के लिए परेशानी भी पैदा कर देता था।

सुभद्रा प्रायः गणित की कॉपी में ही कविताएँ लिख लेती थीं। सन् 1919 में सुभद्रा नौवीं कक्षा की छात्रा थीं। उन दिनों पंजाब के जलियाँवाला बाग में भीषण नरसंहार हुआ। सुभद्रा का कोमल मन इससे आहत हुआ और उन्होंने कलम को ही अपनी आवाज बनाने का निर्णय लिया। स्कूली जीवन में ही सुभद्रा का परिचय महादेवी वर्मा से हुआ। सुभद्रा और महादेवी- दोनों ही गणित आदि की कॉपियों में कविताएँ लिखती थीं।

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सुभद्रा ने ही गुमसुम रहनेवाली महादेवी की ऐसी ही एक कॉपी पूरे विद्यालय में प्रचारित की थी। इस कारण दोनों में जल्दी ही घनिष्ठता हो गई। वैसे दोनों के स्वभाव में काफी अंतर था-सुभद्रा चंचल थीं तो महादेवी गंभीर स्वभाववाली, किंतु यह अंतर भी उनकी मित्रता को कम नहीं कर सका। स्कूली शिक्षा के बाद सुभद्रा ने क्रास्टवेद गर्ल्स कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की।

Subhadra Kumari Chauhan – सुभद्रा कुमारी चौहान

प्रसिद्ध रचनाये

परिचय

क्या कहते हो कुछ लिख दूँ मैं
ललित-कलित कविताएं।
चाहो तो चित्रित कर दूँ
जीवन की करुण कथाएं॥

सूना कवि-हृदय पड़ा है,
इसमें साहित्य नहीं है।
इस लुटे हुए जीवन में,
अब तो लालित्य नहीं है॥

मेरे प्राणों का सौदा,
करती अंतर की ज्वाला।
बेसुध-सी करती जाती,
क्षण-क्षण वियोग की हाला॥

नीरस-सा होता जाता,
जाने क्यों मेरा जीवन।
भूली-भूली सी फिरती,
लेकर यह खोया-सा मन॥

कैसे जीवन की प्याली टूटी,
मधु रहा न बाकी?
कैसे छुट गया अचानक
मेरा मतवाला साकी??

सुध में मेरे आते ही
मेरा छिप गया सुनहला सपना।
खो गया कहाँ पर जाने?
जीवन का वैभव अपना॥

क्यों कहते हो लिखने को,
पढ़ लो आँखों में सहृदय।
मेरी सब मौन व्यथाएं,
मेरी पीड़ा का परिचय॥

Subhadra Kumari Chauhan – सुभद्रा कुमारी चौहान

वैवाहिक एवं क्रांतिकारी जीवन कि शुरुवात – सुभद्रा की शिक्षा पूरी होने के साथ ही ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान के साथ उनका विवाह कर दिया गया। ठाकुर लक्ष्मण सिंह ने बी.ए., एल-एल.बी. तक शिक्षा पाई थी और प्रसिद्ध वकील थे। सुभद्रा बचपन से ही रूढ़िवादी विचारों की विरोधी थीं। वह परदा प्रथा के पक्ष में भी नहीं थीं। इसीलिए विवाह के बाद वह बिना घूंघट निकाले ही ससुराल जाने लगीं, लेकिन यह खबर उनसे भी पहले उनकी ससुराल पहुंच गई।

वहाँ की औरतों में कानाफूसी होने लगी। सुभद्राजी के जेठ ने भी यह खबर सुनी तो वह कुछ नाराज हुए। वह क्रोधावेश में दरवाजे पर ही बैठ गए। समय की नजाकत को समझकर सुभद्रा ने तुरंत घूँघट निकाल लिया, लेकिन घर के अंदर पहुँचते हि फिर उलट दिया। यहाँ सुभद्रा को अपने पति का पूरा सहयोग मिला। दरअसल, वह भी रूढ़ियों के खिलाफ थे। इस तरह सुभद्रा को पति के रूप में एक अच्छा मित्र मिल गया था।

ठाकुर लक्ष्मण सिंह सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे। वह राष्ट्रीय आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। सन् 1919 के जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने देश में क्रांतिकारी आंदोलन को तेज कर दिया था। सुभद्रा ने अपनी नौवीं की परीक्षा और लक्ष्मण सिंह ने एम.ए. की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। वे दोनों गांधीजी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलनव’ में कूद पड़े, क्योंकि उन दिनों यह आंदोलन जोरों पर था।

Subhadra Kumari Chauhan – सुभद्रा कुमारी चौहान

‘असहयोग आंदोलन’ में आते ही सुभद्रा प्रेरणात्मक कविताएँ लिखने लगीं। सुभद्रा और लक्ष्मण सिंह ने क्रांतिकारियों में अपनी पैठ जमा ली थी। सभी क्रांतिकारी उनकी कलम का प्रभाव जानते थे। सन् 1920-21 में सुभद्रा ने ‘राखी की लाज’ और ‘जलियाँवाला बाग में वसंत’ शीर्षक से ओजस्वी कविताओं की रचना की।

जलियाँवाला बाग में बसंत

यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।

कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।

ओ, प्रिय ऋतुराज किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।

वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।

Subhadra Kumari Chauhan – सुभद्रा कुमारी चौहान

कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।

किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।

कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।

आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।

कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।

तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।

यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।

Subhadra Kumari Chauhan – सुभद्रा कुमारी चौहान

खंडवा से जबलपुर – प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘प्रताप’ के संपादक गणेशशंकर विद्यार्थी ने एक दिन सुभद्राजी को पत्र लिखकर लक्ष्मण सिंह को पूरी तरह देश सेवा में समर्पित होने का प्रस्ताव भेजा। पति-पत्नी ने पत्र का आशय समझ लिया। विद्यार्थीजी के आह्वान पर लक्ष्मण सिंह खंडवा से जबलपुर चले गए। वहाँ उन्हें ‘कर्मवीर’ नामक पत्र का साहित्य संपादक बना दिया गया। उन दिनों ‘कर्मवीर’ के संपादक माखनलाल चतुर्वेदी थे।

वह सुभद्रा को अपनी मुँहबोली बहन मानते थे। सुभद्रा उनका काफी आदर करती थीं। पति के साथ सुभद्रा को भी जबलपुर जाना पड़ा। वहीं वह सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो गई। वहाँ उन्होंने छुआछूत तथा परदा प्रथा को दूर करने के साथ-साथ राष्ट्रीय चेतना लाने का कार्य प्रारंभ कर दिया। इसके लिए उन्होंने स्वयंसेवकों को संगठित किया, जो स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग ले रहे थे।

अंग्रेजों के विरुद्ध टिप्पणियाँ लिखने के कारण जब माखनलाल चतुर्वेदी और लक्ष्मण सिंह को जेल जाना पड़ा तब उन्होंने जन-जागरण का कार्यभार सँभाला। वह कांग्रेस से जुड़ी हुई थीं। वह घर-घर जाकर जन-चेतना का काम करने लगीं। बिलासपुर के गाँव उनके कार्यक्षेत्र थे। देश में जब झंडा सत्याग्रह का बिगुल बजा तो सुभद्रा भी आगे-आगे रहीं।

Subhadra Kumari Chauhan – सुभद्रा कुमारी चौहान

उन्होंने जबलपुर के लोगों में जन-चेतना का विकास किया और लगभग पाँच हजार लोगों को स्वयंसेवक बनाया। साथ ही, लगभग पाँच हजार रुपए का चंदा भी एकत्र किया। सत्याग्रह आंदोलन में वह सबसे आगे रहीं। इस कारण वह भी अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर ली गईं। जबलपुर में सत्याग्रह के दौरान गिरफ्तार होनेवाली वह पहली महिला थीं। जेल में सुभद्रा बीमार पड़ गईं, इसलिए उन्हें जल्दी ही रिहा कर दिया गया; लेकिन लक्ष्मण सिंहजी अभी जेल में ही थे।

उन दिनों सरोजिनी नायडू एक देशभक्त नेत्री के रूप में प्रखर हो चुकी थीं। ठीक वैसी ही बुलंद आवाज सुभद्रा की कविताओं में उभरती थी। देश के कई प्रतिष्ठित नेता और समाचार-पत्र भी उनकी कविताओं का लोहा मानने लगे थे। सुभद्रा ने जहाँ साहित्य के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई थी, वहीं लोग उन्हें एक क्रांतिकारी समाज सेविका के रूप में भी पहचानने लगे थे।

आर्थिक संकट – 14 अगस्त, 1923 को जबलपुर में कई राष्ट्रीय नेताओं के आगमन के कारण ब्रिटिश सरकार ने उस दिन वहाँ निषेधाज्ञा जारी कर दी और जुलूस आदि पर पाबंदी लगा दी थी। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने निषेधाज्ञा का उल्लंघन किया। सुभद्रा भी उनके साथ थीं। वह उस समय गर्भवती थीं। कुछ समय बाद उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया। इसी दौरान किन्हीं कारणों से ‘कर्मवीर’ को खंडवा में स्थानांतरित कर दिया गया।

Subhadra Kumari Chauhan – सुभद्रा कुमारी चौहान

इस कारण लक्ष्मण सिंह बेरोजगार हो गए। अब सुभद्रा के परिवार के सामने रोजी-रोटी की समस्या आ गई। परिवार की रोजी-रोटी चलाने के लिए लक्ष्मण सिंह ने दोबारा वकालत शुरू कर दी, लेकिन उनकी वकालत चलती नहीं थी। घर का खर्च चलाने के लिए उन्हें अपने गाँव की कुछ जमीन भी बेचनी पड़ी। माँ बनने के बाद सभद्रा में एक नई काव्य-चेतना ने जन्म लिया।

उन्होंने वात्सल्य रस से भरपूर कुछ कविताओं की रचना की। इसी दौरान उन्होंने ‘झाँसी की रानी’ शीर्षक भी लिखी। वीर रस से भरपूर इस कविता से उनका नाम देश भर में प्रसिद्ध हो गया। उनकी इस कविता ने सोए जनमानस की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी विशिष्ट पहचान बन गई। लोग जोश के साथ ऊँचे स्वरों में उनकी कविता गाने लगे। गाँव के लोग उन दिनों वीर रस से परिपूर्ण आल्हा-ऊदल की गाथा गाया करते थे।

उनमें सुभद्रा की कविता ‘झाँसी की रानी’ भी अपनी जगह बना चुकी थी। बुंदेलखंड की लोक-शैली में गाए जानेवाले छंद में रचित ‘झाँसी की रानी’ कविता की सस्ती व पतली पुस्तिकाएँ हर कांग्रेसी अधिवेशन, मेले, बाजार-हाट आदि का हिस्सा बन गई थीं। लोग उन्हें हाथोहाथ खरीद लेते थे।

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मुकुल कविता संग्रह – सन् 1930 में जब गांधीजी के नेतृत्व में सत्याग्रह ने जोर पकड़ा तब इस कविता ने देश में राष्ट्रीयता का विस्तार किया और युवकों को प्रेरणा दी। यही कारण था कि इस कविता को अंग्रेज सरकार ने जब्त कर लिया; किंतु तब तक यह बच्चे-बूढ़े, सभी के मन में बस चुकी थी। उन दिनों सुभद्राजी अति सक्रिय व व्यस्त रहती थीं। इसी दौरान उन्होंने कई कहानियों की भी रचना की, जिनसे उन्हें सराहना व प्रशंसा भी मिली।

अब तक उनकी कई कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी थीं। उनकी राष्ट्रीय कविताओं में देश-प्रेम, भारतीय संस्कृति व इतिहास की गहरी छाप दिखाई देती है। उन्होंने अपनी रचनाओं में सांस्कृतिक, ऐतिहासिक व राष्ट्रीय भावनाओं को समसामयिक राजनीतिक जीवन के साथ जोड़ा था। यह उनकी प्रतिभा की गहराइयों तथा अनुभूतियों की परिचायक थी।

संभवतः इन्हीं कारणों से एक प्रकाशक ने अनुमति लेकर उनकी समस्त काव्य रचनाओं को संग्रह के रूप में प्रकाशित किया। यह कविता संग्रह ‘मुकुल’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। पाठकों ने इसे हाथोहाथ लिया। उसी वर्ष उन्हें महिला साहित्यकारों की सर्वश्रेष्ठ कृति पर मिलनेवाला ‘सेकसरिया पुरस्कार’ भी प्रदान किया गया। पुरस्कार के रूप में उन्हें पाँच सौ रुपए प्राप्त हुए। उन दिनों यह राशि काफी बड़ी मानी जाती थी।

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उन बिगड़े हालात में यह राशि उनके बहुत काम आई। ‘मुकुल’ की सफलता ने उनका हौसला बढ़ाया और आय की नई दिशा भी दिखाई। ‘मुकुल’ के बाद ही उनके पहले कहानी-संग्रह ‘बिखरे मोती’ ने भी साहित्य जगत् में अपना प्रभाव छोड़ा। उनकी कहानियों में सामाजिक जीवन की झाँकी दिखाई देती है। कालांतर में उनका एक तीसरा कहानी-संग्रह ‘उन्मादिनी’ भी प्रकाशित हुआ। इस बीच उन्होंने एक बेटे को भी जन्म दिया।

स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रीय – सन् 1931-32 के ‘सत्याग्रह आंदोलन’ में पति-पत्नी दोनों पुनः सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी हुई; लक्ष्मणजी भी गिरफ्तार कर लिये गए। अपने बच्चों की देख-रेख के लिए सुभद्राजी ने स्वयं को गिरफ्तारी से दूर रखा। फिर भी, वह सार्वजनिक मंचों से लोगों में जागरूकता लाने का काम करती रहीं। उनके घर की आर्थिक स्थिति किसी से छिपी नहीं थी।

ऐसे में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने उनके बच्चों के लिए फल-मिठाई के साथ कुछ सहायता धनराशि भी भेजी। उसी वर्ष महादेवीजी सुभद्रा से मिलीं और फिर दोनों ने एक साथ गांधीजी से भेंट की। गांधीजी ने दोनों के काम को सराहा। विशेषकर सुभद्रा की ‘झाँसी की रानी’ कविता को भी प्रशंसा मिली। उन्हीं दिनों महादेवी को पुरस्कार स्वरूप चाँदी का एक कटोरा मिला था। उन्होंने गांधीजी को वह कटोरा दिखाया तो गांधीजी ने वह कटोरा स्वराज फंड के लिए माँग लिया।

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ऐसे में महादेवी इनकार न कर सकी, किंतु सुभद्रा को अफसोस हुआ कि वह स्वराज फंड में कुछ दान न कर सकीं। सुभद्रा की कविताओं और उनके व्यक्तित्व का प्रभाव सरदार पटेल पर भी पड़ा। वह उनके विचारों से बहुत प्रभावित थे। उनका इरादा सुभद्रा को सक्रिय रूप से कांग्रेस की राजनीति में लाने का था। उनके कहने पर ही सुभद्रा ने सन् 1936 में प्रांतीय चुनावों में जबलपुर की सुरक्षित महिला सीट के लिए नामांकन भरा।

यद्यपि विरोधी लोगों ने भी एक महिला को खड़ा किया था; किंतु संयोगवश उसका नामांकन-पत्र गलत पाया गया और सुभद्राजी निर्विरोध चुन ली गई। त्रिपुरा कांग्रेस अधिवेशन के समय वह पुनः गर्भवती थीं, लेकिन दुर्भाग्यवश उनके गर्भ के साथ ट्यूमर भी था। इसी कारण वह बीमार पड़ गई, किंतु फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, वह अधिवेशन में शामिल हुई। सन् 1941 में उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया।

उन दिनों व्यक्तिगत सत्याग्रह जोर पकड़ चुका था। वह सुबह प्रभात फेरी निकालतीं और देशभक्ति के जोशीले गीत गाती। सत्याग्रह में वह आगे थीं और उन्होंने गिरफ्तारी देने का मन भी बना लिया था, किंतु गांधीजी के मना करने पर वह जेल नहीं गईं। स्वस्थ होने पर उन्होंने दोबारा सत्याग्रह में भाग लिया। तब उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, किंतु एक दिन बाद छोड़ भी दिया गया।

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तीसरी बार उन्हें आंदोलन के दौरान पुनः गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में उन्होंने महिला कारागार की दयनीय स्थिति के खिलाफ आवाज उठाई और कैदियों को सुविधाएँ देने की माँग की। कुछ दिनों बाद वह छोड़ दी गई। सन् 1942 में गांधीजी ने ‘असहयोग आंदोलन’ शुरू कर दिया था। सुभद्रा के घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। लक्ष्मण सिंह की वकालत भी नियमित रूप से नहीं चल रही थी।

उन्होंने सुभद्रा के कुछ गहने बेचकर जमीन खरीदी और खेती करने लगे। सुभद्रा ने भी अपने पारिवारिक कर्तव्य पूरे किए। लेकिन फिर भी उन्होंने पलवल में एक सभा का आयोजन किया। उनके भाषण के दौरान पुलिस ने सभा-स्थल को चारों ओर से घेर लिया। पुलिस की चेतावनी का उन पर कोई असर नहीं हुआ। पुलिस ने आँसू गैस के गोले फेंके। एक गोला उनके मंच के पास गिरा।

अस्वस्थ और कमजोर होने के कारण वह गिरने ही वाली थी कि लोगों ने उन्हें सहारा देकर मंच से उतारा। उधर पुलिस उनके घर की तलाशी ले रही थी। उन्हें जेल जाने का पूरा अंदेशा था, साथ ही घर की चिंता भी थी। वह घर न जाकर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के प्रतिनिधि श्री रामानुजलाल श्रीवास्तव के घर गईं। सुभद्रा ने श्रीवास्तव के हाथों अपनी किताब के स्वत्वाधिकार बेच दिए। बदले में उन्हें ढाई सौ रुपए मिले।

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उन्होंने सवा सौ रुपए रामानुजलाल को सौंपकर उन्हें बच्चों का संरक्षक बना दिया। शेष रुपए उन्होंने घर के खर्च के लिए अपनी बड़ी बेटी सुधा को सौंप दिए। उसी समय पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। अब पति-पत्नी, दोनों ही जेल में थे। एक दिन सुभद्रा को जेल में पति का पत्र मिला, जिसमें लिखा था-‘बच्चे घर में अकेले हैं। तुम क्षमा माँगकर घर चली जाओ।” सुभद्रा को अपने पति के इस संदेश पर यकीन नहीं हो रहा था। उन्होंने तुरंत उत्तर दिया—इतनी चिंता है तो आप माफी माँगकर घर चले जाएँ।’

वास्तव में यह झूठा संदेश एक जेल अधिकारी ने मजाक में भेजा था, किंतु सुभद्राजी का साहस देखकर वह उनका सम्मान करने लगा। उधर, जेल में लक्ष्मण सिंह को जब इस घटना का पता चला तो उन्हें अपनी पत्नी पर बहुत गर्व हुआ। सुभद्राजी के ट्यूमर की बात उस जेल अधिकारी से छिपी नहीं थी। उसकी सिफारिश पर ही सन् 1943 में सुभद्राजी को जेल से रिहा कर दिया गया।

बेटी का विवाह – इस दौरान उन्हें घर चलाने के साथ-साथ अपनी बड़ी बेटी सुधा के विवाह की चिंता भी होने लगी। उनकी बेटी विवाह योग्य हो चुकी थी और उनके पास धन भी नहीं था। ऐसे में सामाजिक क्रांति के अग्रदूत व साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद मसीहा बनकर सामने आए। उन्होंने बिना किसी बरात व बैंड-बाजे के अपने बेटे अमृतराय के साथ सुधा का विवाह करवाया।

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इस मौके पर लक्ष्मण सिंह भी पैरोल पर जेल से आए थे। उन्होंने उपहार स्वरूप अपने हाथ से बनाई कच्चे सूत की दो मालाएँ वर-वधू को पहनाई, आशीर्वाद दिया और वापस जेल चले गए। सन् 1947 तक सुभद्राजी का स्वास्थ्य निरंतर गिरने लगा था। वह कुछ दिनों के लिए गांधीजी के साथ वर्धा में जाकर रहने की योजना बना रही थीं, किंतु सन् 1948 में हुई गांधीजी की हत्या ने उन्हें अंदर तक झकझोर कर रख दिया।

बीमारी के बावजूद वह जुलूस के साथ पैदल ग्वालियर तक गईं। गांधीजी की अस्थियों को 12 फरवरी, 1948 को प्रयाग में विसर्जित किया जाना था। देश की समस्त नदियों के साथ जबलपुर में नर्मदा नदी के तिलवारा घाट पर भी उनका विसर्जन होना था। सुभद्रा सुबह ही स्टेशन जा पहुँचीं। जिलाधीश के आदेश पर किसी को घाट पर जाने की इजाजत नहीं थी, सिवाय मंत्रियों के। यद्यपि सुभद्रा को अनुमति मिल गई, किंतु उनके सहयोगियों को रोक लिया गया।

लेकिन सुभद्रा के उग्र रूप धारण करने पर सभी को वहाँ जाने दिया गया। गांधीजी की मृत्यु ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था। डॉक्टरों ने उन्हें आराम करने की सलाह दी थी, फिर भी वह 14 फरवरी को एक बीमार परिचित को देखने नागपुर चली गईं। वहाँ वह एक सभा में भी गईं। दूसरे दिन वसंत पंचमी थी और उनके नाती का अन्नप्राशन भी था। उन्होंने सभी कार्य संपन्न किए।

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मृत्यु – 15 फ़रवरी, 1948 को लौटते समय उनकी कार मुरगी के बच्चों को बचाने की कोशिश में दुर्घटनाग्रस्त हो गई। उनके ड्राइवर को भी काफी चोटें आईं। अंततः अप्रैल 1948 में दिमाग की नस फटने से उनकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार उनकी विद्रोही कलम का अंत हो चुका था। उनके दाह संस्कार के समय भी उनकी ‘झाँसी की रानी’ शीर्षक कविता पढ़ी गई थी I

झाँसी की रानी कविता कुछ पंक्तिया

सिहासन हिल उठें राजवशों ने भृकुटी तानीं थी,
बूढे भारत मे भी आई फिर से नई जवानी थीं, 
गुमीं हुई आजादी की क़ीमत सबनें पहचानीं थी, 
दूर फिरन्गी को क़रने की सब़ने मन मे ठानीं थी। 
चमक़ उठी सन् सत्तावन मे, वह तलवार पुरानीं थी, 
बुन्देले हरबोलो के मुंह हमनें सुनी कहानी थीं, 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ 
कानपुर के नानां की, मुंहबोली ब़हन छबीली थीं, 
लक्ष्मीबाई नाम़, पिता की वह सन्तान अक़ेली थी, 
नाना के संग पढती थी वह, नाना के संग ख़ेली थी, 
बरछ़ी, ढाल, कृपाण़, क़टारी उसक़ी यहीं सहेली थी।
वीर शिवाजी क़ी गाथाएं उसको याद जुबानी थीं, 
बुन्देले हरबोलो के मुंह हमनें सुनी कहानी थीं, 
खूब़ लडी मर्दानी वह तो झाँसी वालीं रानी थीं॥

Subhadra Kumari Chauhan – सुभद्रा कुमारी चौहान

लक्ष्मी थी या दुर्गां थी वह स्वय वीरता क़ी अवतार, 
देख़ मराठे पुलक़ित होतें उसकी तलवारो के वार, 
नक़ली युद्धव्यूह क़ी रचना और ख़ेलना खूब़ शिकार, 
सैन्य घेरना, दुर्ग तोडना ये थे उसक़े प्रिय खिलवाड। 
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ज़ाओ रानी याद रखेगे ये कृतज्ञ भारतवासीं, 
यह तेरा ब़लिदान ज़गाएगा स्वतंत्रता अविनासीं, 
होए चुप इतिहास, लगें सच्चाई को चाहें फांसी, 
हों मदमाती विज़य, मिटा दें गोलो से चाहें झाँसी। 
तेरा स्मारक़ तू ही होग़ी, तू ख़ुद अमिट निशानीं थी, 
बुदेले हरबोलो के मुहं हमनें सुनी क़हानी थी, 

खूब़ लडी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी॥ 

Chhatrapati Shivaji Maharaj : छत्रपती शिवाजी महाराज चरित्र

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