Sher Shah Suri in Hindi – शेर शाह सूरी हिंदी

Sher-Shah-Suri-in-HindiSher Shah Suri in Hindi

शेरशाह के प्रारम्भिक जीवन के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है। उसके बचपन का नाम फरीद था। वह सन् 1472 ई. में होशियारपुर पंजाब में उत्पन्न हुआ उसका पिता हसन पंजाब के सूबेदार जमाल खां के यहां नौकर था। जब जमाल खां जौनपुर का सुबेदार बन गया तो फरीद भी अपने पिता हसन के साथ जौनपुर चला गया।

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जागीरदार के रूप में – हसन को जमाल खां ने सहसराम और ख्वासपुर का जागीरदार बना दिया। वह अपनी सौतेली मां के व्यवहार से तंग आकर सहसराम छोड़ पुनः जौनपुर आ गया तथा वहीं पर उसकी शिक्षा-दीक्षा हुई। बाद में उसके पिता जमाल खां के कहने पर उसे सहसराम की जागीर का प्रबंधक बना दिया। यहीं से उसे एक प्रशासक का प्रशिक्षण प्राप्त हुआ।

एक जागीर के प्रबंधक के रूप में उसने जमीन की नाप (पैमाइश) करवायी तथा किसानों के हित के लिए अनेक सुधार किए। वह फिर एक बार सहसराम छोड़कर बिहार के शासक बहारखा लोहानी के पास चला गया। वहां पर उसने तलवार से शेर को मारा तथा शेरखां की उपाधि प्राप्त की।

बाबर की सेवा में – 1527 ई. में शेरखां ने बाबर की नौकरी कर ली थी तथा इस नौकरी के दौरान उसने मुगलों की युद्ध प्रणाली को सीखा और उनकी सैनिक कमियों को भली-भांति जानने की कोशिश की।

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बिहार का स्वामी बन गया – बहारखां की मुत्यु के बाद उसका नाबालिग पुत्र जलालखां बंगाल का शासक बना। उसकी मां ने शेरखां को उसका मंत्री व संरक्षक नियुक्त किया। शेरखां ने इसी पर कार्य करते हुए अपनी शक्ति को धीरे-धीरे बढ़ाना शुरू किया। भाग्य शेरशाह के पक्ष में था। 1530-31 ई. में चुनार के शासक की मृत्यु हो गई। शेरखा ने उसकी विधवा से विवाह कर चुनार के किले पर अधिकार कर लिया।

जब हुमायूँ ने चुनार के किले को आकर घेर लिया तो शेरखा ने उसे टालने के लिए बड़े नाटकीय ढंग से उसकी अधीनता स्वीकार कर चुनार के किले को अपने आधीन रखा। धीरे-धीरे उसने शक्ति संगठन की और बिहार के शासक जलालखां एवं उसके समर्थक बंगाल के शासक महमूदशाह की संयुक्त सेना को पराजित कर सारे बिहार का स्वामी बन गया।

बंगाल विजयी – बिहार विजय के बाद शेरखां ने बंगाल के शासक महमूदशाह पर हमला कर दिया। मुगल सम्राट हुमायूं बंगाल के शासक के अनुरोध पर उसकी मदद के लिए बंगाल की ओर चल दिया। उसे रास्ते में ही शेरखा के पुत्र जमालखां ने काफी परेशान किया।

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शेरशाह के शासन उद्देश्य

शेरशाह की गिनती उत्तर मध्यकालीन भारतीय इतिहास के महानतम शासकों में की जाती है। यद्यपि उसका शासन-काल केवल पांच वर्षों तक ही रहा लेकिन उसने इन वर्षों में ही यह प्रमाणित कर दिया कि वह एक कुशल प्रशासक एवं योग्य सैनिक था उसने राजत्व के सिद्धांत को एक उच्च आदर्श रूप प्रदान किया। उसकी यह धारणा थी कि शासक को अपनी प्रजा के साथ उसी प्रकार का व्यवहार करना चाहिए जैसे एक पिता अपनी सन्तान से व्यवहार करता है। उसके शासन एवं राजत्व के उद्देश्यों को निम्न शीर्षकों में व्यक्त किया जा सकता है।

बिना धार्मिक भेदभाव के सम्पूर्ण जनता को सुखमय जीवन व्यतीत करने का अवसर प्रदान करना – शेरशाह प्रथम सम्राट था जिसने हिन्दुओं पर लगाई गयी परम्परागत पाबन्दियों को समाप्त कर दिया। उसने हिन्दुओं के पुराने घावों को अपनी उदार धार्मिक नीति से भरने के लिए प्रशंसनीय प्रयत्न किये। उसने इस्लाम प्रचार के लिए राज्य द्वारा डाला जाने वाला दबाव समाप्त कर दिया। शेरशाह ने धर्म को व्यक्तिगत मामला माना। वह इमाम या उलेमा को भी राज्य विद्रोह या धोखा देने की स्थिति में कठोर दंड देने से नहीं हिचकता था।

जनता की भलाई एवं कल्याण के लिए सरकार की स्थापना करना – शेरशाह प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने अपनी सरकार का महत्वपूर्ण उद्देश्य लोक-कल्याण एवं जनता की भलाई करना ही माना। उसने इस उद्देश्य कीपूर्ति के लिए हर प्रकार के अत्याचारों से प्रजा की रक्षा की और अपराधों का दमन किया।

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देश में शांति और व्यवस्था का राज्य सर्वत्र स्थापित किया। जनता के हित के लिए सड़कें, सरायें, मदरसे आदि बनवाए। सड़कों को सुरक्षित रखा गया और व्यापारियों एवं सैनिकों को अनेक सुविधाएं प्रदान की गयीं। इससे जनता सुखी व समृद्ध हो सकी।

अफगानों को संगठित कर उनकी प्रभुता को स्थायी बनाना – शेरशाह के शासन का एक उद्देश्य यह भी था कि देश में अनेक स्थानों पर फैले अफगानों को संगठित किया जाये तथा उनकी प्रभुसत्ता को देश में स्थायी बनाया जाये। उसने अफगानों में से ही अधिकतर अपने अमीरों एवं सरदारों को चुना। इस रूप में उसके राज्य को अफगानों की एक संस्था कहा जा सकता है।

सीमाओं को सुदृढ़ कर हुमायूं या मुगलों की वापसी को असंभव बनाना – शेरशाह के शासन का एक अन्य उद्देश्य सीमान्त प्रान्तों को सुरक्षित एवं सुदृढ़ करना था जिससे हुमायूं या मुगल लोगों का भारत में पुनः वापस आना संभव न हो सके। उसने इसी उद्देश्य से खोक्खरों के राज्य के अनेक भागों को अपने अधीन कर लिया।

उसने सीमान्त प्रदेशों में अनेक सैनिक चौकिया बनवायीं। उसने हुमायूं के भाई कामरान से पंजाब छीनकर मुगलों की भारत वापसी के अवसर को कम से कम कर दिया। शेरशाह के प्रयत्नों के कारण ही हुमायूं या मुगल उसके जीते जी भारत पर अधिकार न कर सके।

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देश को आर्थिक स्थिरता प्रदान करना – शेरशाह के शासन का अन्तिम परंतु अत्यधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य देश को आर्थिक स्थिरता प्रदान करना था। इसलिए उसने आर्थिक क्षेत्र में नयी नीति अपनायी। उसने सबसे पहले देश की आर्थिक स्थिरता के लिए शांति, कानून एवं व्यवस्था कायम की। कृषि के क्षेत्र में रैयतवाड़ी प्रथा को प्रारम्भ कर किसानों से सरकार का सीधा सम्बंध स्थापित किया।

अनेक भूमि सुधारों के साथ उसने व्यापार एवं वाणिज्य को भी प्रोत्साहन दिया। उसने मिश्रित धातु की मुद्रा को समाप्त कर शुद्ध सोने, चांदी एवं तांबे के सिक्के जारी किये जिससे आर्थिक स्थिरता स्थापित करने में बड़ी सहायता मिली। उसने सारे देश में एक ही मानक (Standard) के नामतौल को चलाया। शेरशाह के राजत्व एवं शासन के उद्देश्यों को देखकर हम उसे प्रथम राष्ट्रीय शासक होने का श्रेय प्रदान कर सकते हैं।

व्यापार की प्रगति व प्रोत्साहन के लिए महत्वपूर्ण कार्य

शेरशाह ने अपने शासनकाल में सभी क्षेत्रों की प्रगति के लिए कुछ न कुछ कदम अवश्य उठाये। उसने व्यापार को प्रोत्साहन देने के लिए अनेक प्रयत्न किए। उनमें से कुछ प्रयत्नों का वर्णन नीचे दिया जाता है I

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सड़कों का निर्माण – शेरशाह ने अनेक पक्की सड़कों का निर्माण किया जिससे व्यापारियों को आने-जाने, माल लाने-ले जाने और समाचार भेजने में आसानी हो। शेरशाह ने चार महत्वपूर्ण सड़कों का निर्माण करवाया। उसके द्वारा निर्मित सबसे प्रसिद्ध सड़क या ग्रांड ट्रंक रोड के नाम से आज भी जानी जाती है। यह सड़क बंगाल के सुनार गांव से झेलम नदी के किनारे बसे रोहतास नगर तक जाती थी।

यह सड़क सबसे लम्बी सड़क थी दूसरी सड़क आगरा से बुरहानपुर तक जाती थी। तीसरी सड़क आगरा से जोधपुर तक जाती थी और चौथी सड़क लाहौर से मुलतान तक जाती थी। इन सभी सड़कों ने न केवल साम्राज्य की सुरक्षा और शांति बनाये रखने में मदद की अपितु व्यापार एवं वाणिज्य की वृद्धि में भी बहुत योगदान दिया।

सराय निर्माण – शेरशाह ने प्रत्येक महत्वपूर्ण सड़क पर हर दो कोस पर (लगभग तीन किलोमीटर) एक सराय का निर्माण किया। इन सरायों में हिन्दू और मुसलमान यात्रियों एवं व्यापारियों के भोजन व ठहरने की पृथक-पृथक व्यवस्था की। कहा जाता है कि शेरशाह ने कुल 1,700 सरायों का निर्माण करवाया। इन सरायों के आस-पास गांव बस गए और धीरे-धीरे इन गांवों का विस्तार कस्बों के रूप में हो गया। यही कस्बे बाद में व्यापार का प्रमुख केंद्र बन गए।

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मुद्रा सुधार – शेरशाह ने व्यापार के प्रोत्साहन के लिए मुद्रा में भी सुधार किए। उसने मिश्रित धातुओं के स्थान पर शुद्ध सोने, चांदी तथा तांबे के सिक्के जारी किए जिससे लोगों के मन में सरकारी मुद्रा के प्रति अधिक विश्वास उत्पन्न हो और वे सिक्के लेते देते वक्त हिचकिचाहट न करें उसने अनेक छोटे-छोटे तांबे के सिक्के चलाए जिससे लेन-देन में लोगों को सिक्कों की कमी के कारण कठिनाई महसूस न हो। इस तरह शेरशाह द्वारा मुद्रा सुधार कार्यों ने व्यापार को प्रोत्साहन दिया।

चुंगी एवं करों में सुधार – शेरशाह ने कष्टकारी करों को हटा दिया। उसने व्यापार की वस्तुओं पर केवल दो स्थानों पर चुंगी लगाई। प्रथम तो सीमात या सरहदों पर चुंगी तथा दूसरे उस समय चुंगी जब वह वस्तु बिकती थी। इससे व्यापार वाणिज्य में बड़ी सहायता मिली क्योंकि व्यापार के माल का परिवहन सुगम और सस्ता हो गया।

अधिकारियों को व्यापारियों से सद्व्यवहार का आदेश – शेरशाह ने सूबेदारों, अमीनों आदि सरकारी अधिकारियों को यह आदेश दिया कि व्यापारियों के साथ अच्छा व्यवहार करें तथा उनकी और उनके माल की रक्षा में पूरा योगदान दें। इससे व्यापारी वर्ग का सम्मान बढ़ा और व्यापार में वृद्धि हुई।

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व्यापारियों की हानि के लिए स्थानीय अधिकारी जिम्मेदार – शेरशाह ने व्यापारियों के जान व माल रक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय अधिकारियों पर डाल दी जैसे गांव में मुकदमें या जमींदार ही व्यापारियों को पहुंचाई गई हानि के प्रति जिम्मेदार थे। इससे व्यापारी सुरक्षित भावना के साथ देश के हर कोने में व्यापार करने जा सकते थे।

मानक भारों एवं मापों का प्रचलन – शेरशाह ने अपने सारे साम्राज्य में एक ही प्रकार के भार (बाट) एवं माप जारी किये जिससे लेन-देन में एक मानक या स्तर कायम हो सके। इस कदम से व्यापारियों को हिसाब लगाने एवं भाव तय करने में पर्याप्त आसानी हो गयी तथा लेन-देन में बेईमानी करने के अवसर भी कम हो गये।

शेरशाह का शासन प्रबंध

शेरशाह केवल साहसी योद्धा एवं सफल विजेता ही नहीं था, अपितु वह एक ऐसी महान पद्धति का निर्माता था जिसकी प्रशंसा उसके शत्रु मुगलों ने भी की है। वास्तव में वह इतिहास में अपने कुशल शासन प्रबंध के कारण अधिक लोकप्रिय है, न कि अनेक क्षेत्रों पर विजय प्राप्त करने के लिए। शेरशाह ने 5 वर्षों के छोटे-से राज्यकाल में प्रशासन के प्रत्येक विभाग में प्रगतिशील और लोक कल्याणकारी परिवर्तन किये।

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उसकी प्रशासनिक योग्यता को स्वीकार करते हुए इतिहासकार मिस्टर कीन ने लिखा है, “किसी सरकार ने अंग्रेजी सरकार तक ने भी, इतनी बुद्धिमता नहीं दिखायी जितनी कि इस पठान (शेरशाह) ने।” शेरशाह ने अपने शासनकाल में हिन्दुओं और मुसलमानों से समान व्यवहार किया। उसने जन-कल्याण को अपना सर्वोच्च आदर्श रखा। उसके शासन प्रबंध का अध्ययन निम्न शीर्षकों में सरलता से किया जा सकता है:

केन्द्रीय प्रशासन – शेरशाह ने मोटे रूप से दिल्ली सल्तनत काल से चली आ रही केन्द्रीय प्रशासन व्यवस्था को ही जारी रखा। परंतु वह अपने मंत्रियों को अधिक अधिकार देने एवं प्रशासकीय शक्ति विभाजन का पक्षपाती नहीं था। इसलिए सारी शक्तियों का केन्द्र शेरशाह स्वयं ही बना रहा। उसकी इच्छा ही कानून थी। यद्यपि उसे सहयोग देने एवं कार्यों में हाथ बंटाने के लिए कई मंत्री से परंतु उन मंत्रियों की स्थिति केवल सचिवों मात्र ही थी।

शेरशाह के अयोग्य उत्तराधिकारियों के काल में इसके दुष्परिणाम प्रत्यक्ष रूप से सामने नजर आने लगे। यद्यपि शेरशाह निरंकुश शासक था तो भी उसने जन-कल्याण को उपेक्षा कभी नहीं की। वह स्वयं कहा करता था, “बड़े आदमियों का सदैव सक्रिय रहना ही शोभा देता है।” उसने केवल यह वाक्य कहे ही नहीं, वह जीवन-चर इन शब्दों पर चलता रहा।

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केन्द्रीय सरकार के शेरशाह के काल में पांच महत्वपूर्ण विभाग एवं पांच मंत्री थे। प्रथम दिवान-ए-विजारत विभाग राजस्व एवं वित्त सम्बंधी विभाग था। वजीर इस विभाग का मुख्य अधिकारी होता था। दूसरा विभाग दिवान-ए-अर्ज था, जो अर्ज-ए-मुमालिक के आधीन होता था। यह विभाग सेना सम्बंधी कामकाज चलाता था।

तीसरा विभाग दिवान-ए-रसातल था, जो विदेश मंत्री के आधीन होता था। चौथा विभाग दिवान-ए-इंशा था इस विभाग का मंत्री शाही घोषणा एवं पत्र-व्यवहार सम्बंधी कार्य करता था। पांचवा विभाग दिवान-ए-कजा नामक विभाग मुख्य काजी के अधीन होता था। यह विभाग न्याय प्रशासन को देखता था।

प्रान्तीय शासन – डा. कानूनगों के अनुसार, शेरशाह के समय प्रांत नहीं थे। जहां प्रांत थे, वहां सूबेदार सम्राट की तरह निरंकुश प्रांतीय शासन करता था। कुछ इतिहासकार शेरखां के प्रांतों को ‘इक्ता’ की संज्ञा देते हैं। यह भू-भाग एक ऐसे अधिकारी के हाथ में होता था जो नागरिक एवं सैनिक दोनों प्रकार के अधिकारियों के कार्यों को करता था लेकिन आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार सम्भवतः उसने या तो प्रांत बनाये ही नहीं या उनकी संख्या बहुत ही कम थी।

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सरकार का प्रशासन – शेरशाह ने अपने साम्राज्य को प्रशासन की सुविधा के लिए 47 सरकारों में बांट रखा था। प्रत्येक सरकार का प्रशासन दो अधिकारी चलाते थे। प्रथम अधिकारी को शिकदार-ए-शिकदारान (मुख्य शिकदार) कहते थे तथा दूसरे अधिकारी को मुन्सफ-ए-मुनिसफान (मुख्य मुन्सिफ) कहते थे। यह अधिकारी ‘सरकार’ में क्रमशः शांति व कानून की व्यवस्था, परगने के अधिकारियों की देख-रेख और चलते-फिरते न्याय के कार्य करते थे।

परगने का प्रशासन – शेरशाह ने प्रत्येक सरकार को कई परगनों में बांट रखा था। परगने में शिकदार (कानून व शांति बनाये रखने वाला) तथा मुन्सफ या अमीन (राजस्व एकत्र करने वाला) नामक दो अधिकारी होते थे। परगने में इन अधिकारियों के अलावा एक खजांची, दो कारकुन या लेखा-लेखक थे। खजांची खजाने का अध्यक्ष होता था तथा लेखा-लेखक भूमि तथा भूमिकर से सम्बंधित सभी रिकार्ड रखते थे।

स्थानीय या गांव का प्रशासन-शेरशाह ने स्थानीय और गांव के प्रशासन दिल्ली सल्तनत काल की तरह बिना परिवर्तन किये चलते रहने दिया। प्रत्येक गांव में एक पंचायत होती थी जो गांव के कल्याणकारी कार्यों एवं न्याय कार्यों को करती थी। शेरशाह ने पटवारी एवं चौकीदार के माध्यम से गांवों से सम्बंध बनाये रखे।

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भूमि सुधार एवं भू – राजस्व-शेरशाह ने सारी खेती योग्य भूमि को नपवाया। उसने उपज का 1/3 भाग किसानों से कर के रूप में वसूल किया। उसने सारी बोई जाने वाली भूमि को तीन श्रेणियों में बांट दिया-उत्तम, मध्यम एवं निकृष्ट। उसने भूमि का विभाजन औसत पैदावार के आधार पर किया। उसने किसानों एवं सरकार की बीच मध्यस्थों को समाप्त करने के लिए रैयतवाड़ी प्रथा जारी की। इस प्रथा से किसानों को काफी राहत प्राप्त हुई।

शेरशाह ने किसानों को यह छूट दी कि वे अपनी इच्छानुसार लगान नकद या अनाज में जमा करा सकते थे; यद्यपि सरकार लगान नकदी में ही लेना पसंद करती थी। शेरशाह ने अपने अधिकारियों को कह रखा था कि लगान निर्धारित करते वक्त उन्हें उदारता से काम लेना चाहिये परंतु वसूली करते वक्त बड़ी कठोरता से काम लेना चाहिए।

लगान साधारण परिस्थितियों में चाहे कठोरता से ही वसूल किया जाता था परंतु विपत्ति के समय किसानों के प्रति उदारता दिखायी जाती थी। उन्हें संकट के समय सरकार धन से सहायता भी देती थी। संक्षेप में, शेरशाह की भूमि एवं भू-राजस्वनीति के आधार पर कहा जा सकता है कि वह किसानों का हितैषी व हिमायती था।

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आय का अन्य साधन – लगान के अतिरिक्त खम्स (युद्ध काल की तूट), चुंगी उपहार एवं सरकारी टकसाल से पर्याप्त आय मिलती थी।

सैनिक, प्रशासन एवं सुधार – शेरशाह ने प्राचीन अफगान परम्परा को समाप्त कर दिया जिसमें कबीलों के आधार पर सेना भर्ती की जाती थी। शेरशाह स्थायी सेना के महत्व को भली-भांति जानता था। उसने स्वयं सैनिक भर्ती का कार्य किया तथा भर्ती के वक्त उनको सम्राट के प्रति वफादार रहने की कसम दिलवायी।

शेरशाह ने सैनिकों का हुलिया लिखने की प्रथा तथा घोड़ों को दागने की प्रथा को जारी किया। उसने यह कदम भ्रष्टाचार को रोकने के लिये उठाये। उसने सैनिकों को नकद वेतन दिया। इन सभी सुधारों के कारण उसके पास एक स्थायी और कुशल सेना बन सकी। कहा जाता है कि उसकी सेना में डेढ़ लाख घुड़सवार, 500 हाथी तथा 25,000 पैदल सैनिक थे।

न्यायव्यवस्था – शेरशाह ने न्याय के समक्ष सभी को बराबर समझा। उसने हिन्दुओं एवं मुसलमानों में कोई भेदभाव नहीं किया। उसने न्यायव्यवस्था का कार्य करते हुए अपने समक्ष उच्च और श्रेष्ठ आदर्श रखे। वह कहा करता था, “न्याय सबसे उत्तम धर्म रीति है और इसे काफिरों तथा मोमिनों (इस्लाम) के राजाओं द्वारा एक समान दर्जा दिया जाना चाहिए।”

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उसने सारे राज्यों में न्यायालयों की स्थापना की। अपराधियों को कठोर दण्ड दिये ताकि वे पुनः अपराध करने का दुस्साहस न कर सकें। सम्राट न्याय का सर्वोच्च अधिकारी था। उसके बाद न्याय का दूसरा बड़ा अधिकारी मुख्य काजी था, जो मूल मुकदमों के साथ-साथ अपीलें भी सुनता था।

मुनिसफ तथा अमीन क्रमशः सरकार और परगना क्षेत्रों में दिवानी मुकदमों को सुनते थे जबकि मुख्य शिकदार तथा शिकदार क्रमशः सरकारों और परगनों में फौजदारी मुकदमें अपने-अपने क्षेत्रों में सुनते थे। कठोर दण्ड व्यवस्था के कारण लोग अपराध करने से डरते थे।

जासूस व्यवस्था – शेरशाह ने सारे साम्राज्य में विश्वस्त और दक्ष गुप्तचरों का जाल बिछा रखा था, जो उसे सारे साम्राज्य की गतिविधियों की जानकारी देते रहते थे। इन गुप्तचरों के भय से सरकार एवं परगनों के अधिकारी सम्राट के विरूद्ध किसी प्रकार का षड्यंत्र रचने का साहस नहीं कर सकते थे।

पुलिस व्यवस्था – शेरशाह ने नवीन प्रकार की पुलिस व्यवस्था का श्रीगणेश किया। उसने भी पुलिस अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्र की शांति व कानून व्यवस्था के लिये जिम्मेदार बना दिया सरकार में पुलिस का प्रमुख अधिकारी मुख्य शिकदार तथा परगना में पुलिस का मुख्य अधिकारी शिकदार ही होता था। यह अधिकारी अपने अपने इलाकों में समाज-विरोधी तत्वों पर कड़ी निगाह रखते थे।

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गांव में पुलिस कार्य की जिम्मेदारी मुखिया या मुकदमें पर थी। अगर कोई अधिकारी अपने क्षेत्र में हत्यारे का पता लगाने में असमर्थ रहता तो उस अधिकारी को ही फांसी दे दी जाती थी। इस व्यवस्था से अधिकारी भ्रष्ट नहीं हो सकते थे तथा वे अपराधी का पता लगाने में अपनी पूरी शक्ति लगा देते थे।

मुद्रा में सुधार तथा सार्वजनिक हित के कार्य – शेरशाह ने व्यापार की उन्नति के लिये खोट मिले धातुओं के सिक्कों के स्थान पर शुद्ध सोने, चांदी तथा तांबे की मुद्राएं चलायीं। उसने तांबे के छोटे-छोटे सिक्के चलाये ताकि लोगों को लेन-देन करते समय कठिनाई न हो। शेरशाह ने जनता की भलाई के लिए अनेक सड़कें भी बनवायीं। उनके दोनों किनारों पर वृक्ष लगवाये तथा स्थान-स्थान पर यात्रियों के ठहरने के लिए सरायें बनवायी।

इन सुधारों से व्यापार वाणिज्य एवं यात्राओं को प्रोत्साहन मिला। उसने शीघ्र डाक लाने ले जाने का भी प्रबंध किया। डाक-चौकियों का निर्माण थोड़ी-थोड़ी दूरी पर किया गया तथा डाक लाने ले जाने के लिये हरकारे नियुक्त किए। सारांश यह है कि शेरशाह एक कुशल प्रशासक था। उसने लोक-कल्याण के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दी।

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इतिहासकार एसकिन ने शेरशाह के में ठीक ही कहा है, “उसमें (शेरशाह में) अकबर से पूर्व के किसी भी शासक के कानून निर्माण और प्रजा की भलाई की भावना अधिक थी।” शेरशाह के शासन प्रबंध की महानता इस बात में है कि उसने जनता के सभी वर्गों को अनेक क्षेत्रों में समान समझा और देश की उन्नति व कल्याण के लिए कार्य किया।

यद्यपि उसने हिन्दुओं से जजिया लेना बंद नहीं किया और अधिकतर उच्च पदों पर केवल अफगान ही नियुक्त किये तो भी वह उत्तर मध्यकालीन भारत के महानतम प्रशासकों में स्थान प्राप्त करने का अधिकारी है।

शेरशाह की विजय

शेरखां बिहार के शासक का संरक्षक – शेरखा (शेरशाह) की शक्ति का उदय बिहार से हुआ। बिहार के शासक बहारखां लोहानी की मृत्यु के बाद जब उसका अवयस्क पुत्र जलालखां सन् 1528 ई. में शासक बना तो उसकी माता ने शेरखा को उसका शिक्षक एवं संरक्षक नियुक्त किया। शेरखां ने उस पद पर कार्य करते हुए अपनी शक्ति को खूब चढ़ाया।

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चुनार किले पर अधिकार – इसी समय चुनार के शासक ताजखां की मृत्यु हो गई। शेरखा ने उसकी विधवा से विवाह कर लिया। इसके परिणामस्वरूप शेरखां को बहुत सी सम्पत्ति एवं चुनार का किला भी प्राप्त हुआ। इसे हम शेरखा की प्रथम विजय कह सकते हैं। हुमायूँ ने 1531 में चुनार के किले को जब घेर लिया तो शेरखा ने हुमायूँ की अधीनता स्वीकार करने का नाटक करके अपनी स्थिति को धीरे-धीरे मजबूत कर लिया।

बिहार पर आधिपत्य – बिहार का नावालिग शासक जलाल नाममात्र का शासक था। वस्तुतः शेरखा ने धीरे-धीरे सभी अधिकार अपने हाथ में ले लिये। उसने सेना के अधिकांश लोगों को अपने पक्ष में कर लिया। शेख की बढ़ती शक्ति से चिढ़कर लोहानी सरदारों ने जलाल खां के कान भरने शुरू कर दिए।

जलाल खां ने शेरखां से छुटकारा पाने के लिए बंगाल के शासक महमूदा से सैनिक मदद ली। परंतु उन दोनों की संयुक्त सेना को शेरखा ने पराजित कर दिया। बंगाल का शासक अपने राज्य में वापस भागकर चला गया और सारा बिहार शेरखा के आधिपत्य में आ गया।

बंगाल विजय – शेरखां ने बंगाल के शासक महमूद से बदला लेने के लिए उसकी राजधानी गौड़ पर आक्रमण कर दिया। आगरे से हुमायूँ जब बंगाल के शासक की मदद के लिए एक विशाल सेना लेकर चला तो शेरखा के पुत्र जमालखां ने उसे रास्ते में ही चुनार के किले पर करीब 6 महीनों तक रोके रखा। इस बीच शेरखां बंगाल से पर्याप्त धन लूटकर बिहार वापस आ गया। उसने बिहार आकर लगातार सैनिक तैयारियां बड़े जोरों पर शुरू कर दी ताकि हुमायूँ से निपटा जा सके।

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चौसा का युद्ध – चौसा के युद्ध में शेरशाह ने हुमायूँ को पराजित किया। चुनार के दुर्ग पर अधिकार करने में असफल होने पर हुमायूँ विवश होकर बंगाल की ओर चल पड़ा। शेरखां वहां से हुमायूँ के पहुंचने से पूर्व ही अपना काम कर चुका था। वह बड़ा कूटनीतिज्ञ था। शेरशाह बंगाल में हुमायूँ से खुल्लमखुल्ला संघर्ष से बचना चाहता था।

शेरशाह के चले जाने की हुमायूँ ने बंगाल पर अपनी विजय समझ लिया और बहुत सा समय उत्सवों को मनाने में व्यतीत किया। उधर शेरखा सैनिक तैयारियों में लगा हुआ था। उसने हुमायूं और उसकी सेना को जो आगरे की ओर जा रही थी बक्सर के समीप चौसा नामक स्थान पर अचानक पैर लिया।

इस युद्ध में (जून 1539) हुमायूं की पराजय हुई और अधिकांश मुगल सैनिक युद्ध में काम आये। हुमायूं अपने प्राण बचाने के लिए घोड़े की पीठ पर सवार होकर गंगा में कूद पड़ा। एक भिश्ती ने उसको मरने से बचाया चौसा की इस लड़ाई ने हुमायूं की शक्ति को पूरी तरह समाप्त कर दिया और शेरशाह की प्रतिष्ठा को बढ़ा दिया।

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कन्नौज के युद्ध में हुमायूं अन्तिम बार पराजित तथा दिल्ली व आगरे पर शेरखा का अधिकार – चौसा के युद्ध की विजय से उत्साहित होकर शेरखां ने जौनपुर तथा कन्नौज पर अधिकार कर लिया। हुमायूं ने 1540 ई. में चौसा की पराजय का बदला लेने के लिए शेरखां पर आक्रमण कर दिया। कन्नौज के समीप दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। इस बार भी शेरखां को विजय प्राप्त हुई तथा भाग्यहीन मुगल बादशाह अपने प्राणों की रक्षा के लिए भाग उठा।

शेरशाह ने कुशल शत्रु की तरह हुमायूं का पीछा किया। हुमायूँ आगरा छोड़कर भाग गया और शेरखा ने आगरा और दिल्ली पर अधिकार कर लिया। शेरखां ने स्वयं को 1540 ई. में भारत का सम्राट घोषित कर दिया। उसने शेरशाह सूरी की उपाधि ग्रहण की सम्राट बनने के बाद भी उसने विजय करने के कार्य को जारी रखा।

पंजाब पर विजय – आगरे एवं दिल्ली को जीतने के बाद शेरखा ने हुमायूं के भाई कामरान से पंजाब छीन लिया, जो उसके भय से पंजाब को छोड़कर काबुल चला गया था।

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बंगाल के गवर्नर का दमन – शेरशाह ने बंगाल पहुंचकर बंगाल के गवर्नर को बंदी बना लिया। उसने विद्रोहियों को नौकरी से अलग कर दिया। उस प्रांत को कई जिलों में बांटकर केवल उसी के प्रति उत्तरदायी अफसरों को पृथक-पृथक जिले का शासन सौंप दिया।

मालवा का साम्राज्य में विलय – शेरशाह की अगली विजय मालवा की विजय थी। उसके समक्ष मालवा के शासक कादिरशाह ने आत्म-समर्पण कर दिया। शेरशाह ने मालवा को अपने साम्राज्य का अंग बना लिया। शेरशाह ने कादिरशाह के साथ दयालुता का व्यवहार किया और उसे लखनौती का राज्यपाल नियुक्त कर दिया।

मुलतान व सिंघ की विजय शेरशाह के सेनापति ने शेरशाह के आदेशानुसार 1543 ई. में मुलतान व सिंध पर आक्रमण कर दिया। ये दोनों प्रांत जीतकर शेरशाह सूरी ने अपने साम्राज्य के अंग बना लिए।

Sher Shah Suri in Hindi – शेर शाह सूरी हिंदी

रायसीन को धोखे से जीतकर अपने साम्राज्य का अंग बना लिया – मालवा के बाद शेरशाह ने पश्चिम के राजपूतों के विरूद्ध अपना ध्यान दिया। 1543 ई. में उसने रायसीन के पूरणमल पर आक्रमण कर दिया राजपूतों ने डटकर मुकाबला किया। शेरशाह ने पूरणमल को आश्वासन दिया कि अगर वह उसे किला सौंप दे तो किसी व्यक्ति को भी नहीं मारा जायेगा।

परंतु किले से निकलते ही शेरशाह की सेना राजपूतों पर टूट पड़ी बहुत से लेखकों ने रायसीन की इस घटना का वर्णन शेरशाह के चरित्र पर एक धब्बे के रूप में किया है। शेरशाह ने रायसीन को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया।

मारवाड़ की विजय – मुलतान व सिंघ विजय के तुरंत बाद ही शेरशाह ने मारवाड़ पर एक विशाल सेना के साथ आक्रमण किया शेरशाह ने राजपूतों की वीरता देखकर छल से उस राज्य पर कब्जा करना चाहा। उसने कुछ झूठे पत्र मारवाड़ के राजा मालदेव के पास पहुंचवा दिये जिनको पढ़कर उसके मन में अपने साथियों पर अविश्वास उत्पन्न हो गया।

Sher Shah Suri in Hindi – शेर शाह सूरी हिंदी

मालदेव जान बचाकर भाग गया। मारवाड़ पर शेरशाह का अधिकार हो गया किंतु शेरशाह की मृत्यु के बाद पुनः मालदेव ने अफगान गवर्नर को पराजित कर मारवाड़ पर अधिकार कर लिया।

चित्तौड़ और अजमेर पर अधिकार – मेवाड़ का राजा उदयसिंह शेरशाह के समय नाबालिग था जब शेरशाह के आक्रमण का समाचार राजपूतों को मिला तो राजपूतों ने शेरशाह से लड़ने की अपेक्षा उसकी अधीनता को अच्छा समझा। परिणामस्वरूप शेरशाह ने चित्तौड़ एवं अजमेर पर अधिकार कर लिया। इस तरह जोधपुर, नागौर, मेहता, चित्तौड़ और अजमेर पर शेरशाह ने अपना अधिकार स्थापित कर, राजस्थान के एक बहुत बड़े भाग पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया।

कालिंजर के आक्रमण के समय शेरशाह की मृत्यु – शेरशाह की अंतिम विजय कालिंजर की थी। उसने इस किले को करीब एक वर्ष तक घेरे रखा। जब उसे विजय की कोई आशा न रही तो उसने बारूद से किले को उड़ाने का आदेश दिया। इस बारूद के विस्फोट में शेरशाह एकदम जल गया और तुरंत (1545 ई.) में उसकी मृत्यु हो गई।

संक्षेप में, शेरशाह सूरी एक महान विजेता था। उसने अपनी सैनिक प्रतिभा के बल पर ही हिमालय से लेकर विन्ध्याचल और झेलम से लेकर ब्रह्मपुत्र नदी तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। 

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