Shaheed Udham Singh – शहीद ऊधम सिंह

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बीसवीं शताब्दी के आरंभ के सर्वाधिक प्रसिद्ध क्रांतिकारियों में से एक ऊधम सिंह कंबोज डायर की हत्या के लिए जाने जाते हैं। डायर ने जलियाँवाला बाग में निहत्थे लोगों पर गोलीबारी करके जो कत्ले आम करवाया था, उसके बाद ऊधम सिंह ने उससे बदला लेने का संकल्प किया था। उन्हें ‘शहीदे आजम सरदार ऊधम सिंह कंबोज’ के नाम से भी जाना जाता है।

Shaheed Udham Singh – शहीद ऊधम सिंह

जन्म प्रारंभिक जीवन – ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर, 1899 को पटियाला में सुनाम में हुआ था। उनका असली नाम शेर सिंह था। उनके पिता सरदार टहल सिंह सुनाम के पास उपल में रेलवे में गेट कीपर थे। शेर सिंह जब तीन साल के ही थे, तभी उनकी माता का निधन हो गया था। कुछ ही साल बाद उनके पिता का भी निधन हो गया। सात साल की उम्र में ऊधम सिंह के सिर से माता-पिता, दोनों का साया उठ चुका था।

भाई किशन सिंह रागी ने उन्हें तथा उनके भाई मुक्ता सिंह को 24 अक्तूबर, 1907 को केंद्रीय खालसा अनाथालय में भरती करा दिया। जब उन्हें अमृत छकाकर सिख धर्म स्वीकार कराया गया तो दोनों भाइयों को नए नाम दिए गए। शेर सिंह को ऊधम सिंह और मुक्ता सिंह को साधु सिंह नाम दिया गया।

अनाथालय में ही उनके भाई साधु सिंह का भी देहांत हो गया। अब पूरी दुनिया में शेर सिंह का कोई नहीं था। यह सदमा विचलित कर देनेवाला था। अनाथालय में उन्होंने कई कलाओं और शिल्प में महारत हासिल की। मैट्रिक पास करने तक वे अनाथालय में ही रहे। सन् 1918 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया।

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क्रन्तिकारी जीवन की शुरुवात – इस हत्याकांड के समय वे वहीं पर मौजूद थे। अनाथालय के अपने कई साथियों के साथ वे सभा में आए लोगों को पानी पिलाने का काम कर रहे थे। जलियाँवाला बाग हत्याकांड के कारण उनके मन में बेहद गुस्सा भर गया। उनके जीवन में इससे नया मोड़ आ गया। उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और राजनीति में कूदकर वे समर्पित क्रांतिकारी बन गए। ऊधम सिंह ने एक मारे गए व्यक्ति की लाश उठाने के लिए कर्फ्यू का उल्लंघन किया और इसमें वे खुद भी घायल हो गए।

इस घटना के बाद वे अफ्रीका चले गए और वहाँ से एक के बाद एक कई देशों में घूमते रहे। उनका अंतिम लक्ष्य डायर तक पहुँचना था। हत्याकांड के बाद डायर को इंग्लैंड भेज दिया गया था, इसलिए ऊधम सिंह भी इंग्लैंड पहुँचना चाहते थे। सन् 1920 में वे अफ्रीका होते हुए नैरोबी पहुँचे। अमेरिका जाने की उनकी कोशिश नाकाम रही। सन् 1924 में वे भारत आ गए और उन्होंने फिर से अमेरिका जाने की कोशिश की, जिसमें उन्हें सफलता भी मिल गई।

5 साल के लिए जेल – अमेरिका में वे गदर पार्टी के क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। भगत सिंह के आग्रह पर वे अपने कुछ साथियों के साथ रिवॉल्वर और गोला-बारूद्र लेकर जुलाई, 1927 में भारत लौटे। यह खबर पुलिस को लग गई और 30 अगस्त, 1927 को उन्हें अमृतसर से गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें आर्म्स एक्ट के तहत पाँच साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई, लेकिन चार वर्ष बाद ही उन्हें छोड़ दिया गया।

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जेल में होने के कारण वे उस दौर की कई महत्त्वपूर्ण क्रांतिकारी गतिविधियों से दूर रहे। वे जेल में पड़े थे और बाहर भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद पूरी सक्रियता से लगे थे। उसी दौरान भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को जे.पी. सांडर्स के हत्या के आरोप में फाँसी पर लटका दिया गया। ऊधम सिंह ने इन महान क्रांतिकारियों के पदचिह्नों पर चलने का निर्णय किया।

भगत सिंह और उनके बलिदानी साथियों से प्रेरणा लेकर उन्होंने जलियाँवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने का निश्चय किया। वे क्रांतिकारी और कवि रामप्रसाद बिस्मिल के बहुत बड़े प्रशंसक थे। बिस्मिल ने कई क्रांतिकारी रचनाएँ की थीं। ऊधम सिंह उनकी रचनाएँ गाया करते थे। उनकी पसंदीदा गजल थी सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।

डायर का वध – 23 अक्तूबर, 1931 को अपनी रिहाई होने पर वे अपने गाँव लौट आए। हालाँकि स्थानीय पुलिस उन्हें लगातार परेशान करती रही। उन्होंने साइनबोर्ड की दुकान खोल ली और अपना नाम राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया। इसकी आड़ में उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियाँ जारी रखीं। इसी दौरान उन्होंने लंदन जाने और जलियाँवाला बाग हत्याकांड के दोषी डायर को मारकर बदला लेने की योजना तैयार की।

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उनकी गतिविधियों से पंजाब पुलिस सतर्क हो गई। वे अपने पैतृक गाँव सुनाम गए और पुलिस को चकमा देकर कश्मीर निकल गए। यहाँ से वे जर्मनी पहुँचे। अंत में इटली, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रिया होते हुए 1934 में अपनी मंजिल इंग्लैंड पहुँच गए। लंदन में वे 9 ऑल्डर स्ट्रीट, व्हाइट चैपल में ठहरे। वहीं उन्होंने एक कार और छह कारतूसोंवाली रिवॉल्वर और कारतूसों की खरीद की।

इंग्लैंड में उन्होंने डायर के गृहनगर डेवन में दस्तकारी का काम किया। इससे उन्हें अपना मकसद पूरा करने के कई अवसर मिले, लेकिन उनका लाभ वे नहीं उठा पाए। उनका मकसद सिर्फ डायर को मारकर भाग निकलना नहीं था, बल्कि वे इस घटना की ओर दुनिया भर का ध्यान भी खींचना चाहते थे। यही कारण था कि उन्होंने इस काम के लिए सर्वाधिक उचित समय का इंतजार किया।

सात साल के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार वह मौका आ ही गया। लंदन में कैक्सटन हॉल में 13 मार्च, 1940 को दस बजे भारत में काम कर रहे और कर चुके ब्रिटिश अधिकारियों की बैठक निश्चित हुई। माइकल ओ डायर इसमें मुख्य अतिथि था और कई बड़े ब्रिटिश अधिकारी भी इसमें शामिल होनेवाले थे। ऊधम सिंह को ऐसे ही मौके का इंतजार था।

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उन्होंने एक किताब में अंदर के पृष्ठ काटकर रिवॉल्वर उसमें छिपाई और हॉल में पहुँच गए। हॉल में वे एक दीवार के पास खड़े होकर सही मौके का इंतजार करने लगे। बैठक समाप्त होने के बाद लोग खड़े हो गए। ओ ‘डायर बैठक की अध्यक्षता कर रहे भारत सचिव जेटलैंड के पास गया। ऊधम सिंह ने सही मौका भाँपते हुए ओ’डायर पर पाँच-छह गोलियाँ दाग दीं, दो गोलियाँ लगी और उसने वहाँ दम तोड़ दिया।

इसके बाद उन्होंने जेटलैंड पर गोलियाँ दागीं, लेकिन उसे गंभीर चोट नहीं आई। ऊधम सिंह ने पाँच और लोगों पर गोलियाँ दागीं। उनमें लुइस डेन और लॉर्ड लैमिंग्टन शामिल थे। दोनों मरे तो नहीं, लेकिन गंभीर रूप से घायल जरूर हुए। ऊधम सिंह ने भागने की कोई कोशिश नहीं की। उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी रिवॉल्वर, चाकू, डायरी, दागी गई गोली अब भी स्कॉटलैंड यार्ड के कब्जे में है और उन्हें उसके ब्लैक म्यूजियम में रखा गया है, जिसमें अपराधियों का सामान रखा जाता है।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड के इक्कीस सालों बाद ऊधम सिंह ने अपना वह संकल्प पूरा कर दिखाया, जो उन्होंने स्वर्णमंदिर में पवित्र सरोवर में स्नान के बाद किया था। ऊधम सिंह का भागने का इरादा कभी था ही नहीं। इसलिए उन्होंने आत्मसमर्पण करते हुए सबके सामने अपना उद्देश्य बताया। हत्या के तुरंत बाद कई तरह को प्रतिक्रियाएँ सामने आईं।

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ब्रिटिश अधिकारियों की बैठक में जाकर किसी को मार देनेवाला हिम्मती काम था। लोग जानना चाहते थे कि वह कौन है, जिसने ऐसा करने के बाद भागने की कोशिश नहीं की? बहादुर क्रांतिकारी ऊधम सिंह के अतिरिक्त और कौन ऐसा कर सकता था?

भारत में प्रतिक्रियाएँ – भारत में भी मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ हुईं। कांग्रेस और समाचार पत्रों ने घटना की निंदा की, जबकि कई अन्य लोगों ने इसे सही ठहराते हुए भारत से ब्रिटिश राज के खात्मे और स्वतंत्रता हासिल करने की दिशा में इसे अहम कदम बताया। जनता और क्रांतिकारियों में उत्साह पैदा हो गया। सभी ने इस देशभक्तिपूर्ण साहसिक कारवाई की सराहना की। कानपुर में एक सभा में एक वक्ता ने कहा कि देश के अपमान का बदला ले लिया गया।

भारतीयों ने महसूस किया कि डायर की हत्या का असर हुआ है और दुनिया का ध्यान भारत और जलियाँवाला बाग हत्याकांड की ओर गया है। लोगों में आशा की नई किरण दौड़ पड़ी। दुनिया भर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बारे में लिखा गया और ओ’डायर को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। टाइम्स, लंदन ने 16 मार्च, 1940 के अंक में ऊधम सिंह को ‘फाइटर फॉर फ्रीडम’ बताया और उनके साहसिक कार्य को ‘भारत की दमित-वंचित जनता के क्रोध की अभिव्यक्ति के रूप में निरूपित किया।

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‘अमृत बाजार पत्रिका’ और ‘न्यू स्टेट्समैन’ ने भी ऊधम सिंह की सराहना की। ‘अमृत बाजार पत्रिका’ ने 18 मार्च, 1940 के अंक में लिखा, ‘ओ’डायर का नाम पंजाब की घटनाओं से इस तरह जुड़ा है कि उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।’ इसी तरह की बात ‘न्यू स्टेट्समैन ने भी लिखी।

हालाँकि, गांधी के विचार एकदम भिन्न थे। उन्होंने डायर की हत्या की निंदा की और 15 मार्च, 1940 के ‘हरिजन’ के अंक में लिखा, ‘इस घटना से मुझे बहुत दुःख हुआ है। मैं इसे पागलपन मानता हूँ। मैं उम्मीद करता हूँ कि इससे राजनीतिक प्रक्रिया को आघात नहीं पहुँचेगा’ 23 मार्च, 1940 को अपने समाचार पत्र ‘हरिजन’ में उन्होंने फिर से इस विषय पर विस्तार से लिखा, ‘माइकल ओ ‘डायर से हमारे मतभेद थे, लेकिन इससे उनकी हत्या से हमारा दुःख कम नहीं हो जाता। लॉर्ड जैटलैंड के लिए भी हमें दुःख है। हमें इस तरह की प्रतिक्रियावादी नीतियों से लड़ना होगा, लेकिन हमारे प्रतिरोध में किसी तरह की दुर्भावना नहीं होनी चाहिए। आरोपी इसे बहादुरी का काम समझ रहा है।’

नेहरू ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए। 15 मार्च, 1940 को उन्होंने नेशनल हेरल्ड’ में लिखा, ‘हत्या दुःख है, लेकिन यह उम्मीद भी है कि इससे भारत के दूरगामी राजनीतिक भविष्य पर असर नहीं पड़ेगा। हम खासकर भारत के युवा वर्ग की भावनाओं के रुझान से अवगत नहीं रहे। भारत की स्थिति को तुरंत सँभालने की जरूरत है, ताकि इसे और बिगड़ने से रोका जा सके। हम सरकार को चेतावनी देते हैं कि गांधीजी के ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ शुरू करने से इनकार के बावजूद देश के युवा कुछ अन्य तरीके अपना सकते हैं।

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(यह बड़ी दुःख की बात हैं की गाँधी और नेहरू ने हमेशा शहीद उधम सिंह और उन जैसे कई अन्य क्रांतिकारि जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपनी जान दे दी उनके कार्य की कभी सराहना नहीं की और उनका हमेशा विरोध किया I)

सुभाषचंद्र बोस ही एकमात्र नेता थे, जिन्होंने ऊधम सिंह के कारनामे की सराहना की थी।

डायर की हत्या का मुक़दमा –  ब्रिटिश सरकार ने जल्द ही 1 अप्रैल, 1940 को काररवाई की और ऊधम सिंह पर माइकल ओ ‘डायर की हत्या का आरोप औपचारिक रूप से लगा दिया गया। ऊधम सिंह ने ब्रिक्स्टन जेल में 42 दिन की भूख हड़ताल की। उन्हें हर दिन जबरदस्ती खुराक दी जाती। 4 जून, 1940 को ऊधम सिंह को ओल्ड बैली में सेंट्रल क्रिमिनल कोर्ट में जस्टिस एकिंस्टन की पीठ के सामने पेश किया गया।

अदालत में उन्होंने अपना नाम राम मोहम्मद सिंह आजाद बताया। इस तरह से उन्होंने तीनों धर्मों को मिलाकर अपना नया नाम बनाया। बाद में भी उन्होंने यही नाम अपनाया। इस तरह से उन्होंने धर्म, जाति, नस्ल के भेदभाव को भी खारिज कर दिया ऐसा उन्होंने पहली बार नहीं किया था। कभी वे शेर सिंह कहलाए, तो कभी ऊधम सिंह कंबोज, ऊधम सिंह, उदय सिंह, फ्रैंक ब्राजील कहलाते रहे।

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पुलिस जानती थी कि उन्होंने अपना असली नाम नहीं बताया है, लेकिन उसके लाख कोशिश करने पर भी वे अपना यही नाम बताते रहे। उन्हें भारतीयों की एकता की चिंता सबसे अधिक थी। वे अधिकारियों को गुमराह नहीं करना चाहते थे, बल्कि साबित करना चाहते थे कि वे भारत के सभी धर्मों के प्रतिनिधि हैं।

जब उनसे ओ ‘डायर की हत्या के कारण के बारे में पूछा गया तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से जो कहा, वह रिकॉर्ड में दर्ज है, “मैंने उसे इसलिए मारा, क्योंकि मुझे उससे घृणा थी। वह इसी लायक था।” उन्होंने अपना बचाव करने से इनकार किया था और सबके सामने अपने कारनामे को स्वीकार किया था, इसलिए उन्हें दोषी मानते हुए एकिंस्टन ने उन्हें मौत की सजा सुना दी।

शहादत – 31 जुलाई, 1940 को उन्हें पेंटोनविल जेल में फाँसी पर लटका दिया गया और उसी दिन जेल में ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस प्रकार एक बहादुर क्रांतिकारी के जीवन का अंत हो गया।

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उनकी मौत के बाद उन्हें ‘शहीद’ के रूप में मान्यता मिली। उनकी आलोचना कर चुके नेहरू ने ‘दैनिक प्रताप’ में में लिखा, “मैं शहीदे आजम ऊधम सिंह को आदर सहित नमन करता हूँ, जिन्होंने हमारी स्वतंत्रता के लिए फाँसी के फंदे को गले लगाया।”

वीरपुत्र की अस्थिया स्वदेश लौटी – सुल्तानपुर लोधी के विधायक एस. साधु थिंड ने इंदिरा गांधी से अनुरोध किया के वे ब्रिटिश सरकार से माँग करें कि वह ऊधम सिंह की अस्थियाँ भारत को सौंपे। उनके प्रयास सफल रहे और जुलाई, 1974 को ऊधम सिंह की अस्थियाँ भारत लाई गईं। भारत सरकार के विशेष दूत के रूप में साधु सिंह स्वयं इंग्लैंड गए और शहीद ऊधम सिंह का अस्थि कलश लेकर आए।

यहाँ उन्हें शहीदों का सम्मान दिया गया। अस्थि कलश जब भारत आया तो हवाई अड्डे पर कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष शंकर दयाल शर्मा, पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह मौजूद थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी उन्हें पुष्पांजलि दी। ऊधम सिंह के अस्थि-कलश को उनके जन्म स्थान पंजाब में सुनाम में दफनाया गया और उनकी अस्थियाँ सतलज नदी में विसर्जित की गईं। 

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