Second World War In Hindi – द्वितीय विश्व युद्ध

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प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात भविष्य में इस तरह की लड़ाइयों को रोकने के लिए 1919 में राष्‍ट्रसंघ की स्‍थापना की गई थी, परन्तु यह संघ दूसरे विश्व युद्ध को रोकनें में नाकाम रहा | प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पेरिस शान्ति सम्मेलन से हुई। इस सम्मेलन में मार्शल फोच ने यह भविष्यवाणी की थी कि वर्साय की सन्धि 20 वर्ष के लिए युद्ध विराम सन्धि है। उसकी यह भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई और ठीक 20 वर्ष बाद ही द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ हो गया।

Second World War In Hindi – द्वितीय विश्व युद्ध

युद्ध के कारण – इस युद्ध के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे I

(1) वर्साय की संधि के प्रति असंतोष – मित्र राष्ट्रों ने वर्साय की संधि के द्वारा जर्मनी के प्रति बहुत अन्याय किया था। उस पर बहुत अधिक युद्ध का हर्जाना थोपा गया था। उसके उपनिवेश छीन लिए गये थे। यही नहीं, जर्मनी ने विवश होकर इस अपमानजमक संधि को स्वीकार किया था। प्रो. मुकर्जी के अनुसार, “विजेता शक्तियों की अदूरदर्शिता और स्वार्थपरता इस युद्ध के लिए उतनी ही अधिक उत्तरदायी थी. जितनी कि हिटलर की आवश्यक नीति’ लैंगसम ने लिखा है, ‘इससे यूरोप में जर्मन प्रदेश का आठवां भाग और 70 लाख व्यक्ति कम हो गये।”

(2) राष्ट्र संघ की असफलता – प्रथम विश्व युद्ध के बाद राष्ट्र संघ की स्थापना की गई थी। राष्ट्र संघ का उद्देश्य शांति बनाये रखना था, परन्तु उसे अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त नहीं हुई। इसका प्रमुख कारण यह था कि उसके पास ऐसे साधनों तथा शक्ति का अभाव था, जिसके द्वारा वह शक्तिशाली तथा बड़े राष्ट्रों पर नियंत्रण रख सके। जर्मनी, जापान तथा इटली ने खुले आम राष्ट्रसंघ के सिद्धान्तों का उल्लंघन किया और वह इनके विरूद्ध कुछ भी कार्यवाही नहीं कर सका।

(3) निः शस्त्रीकरण की असफलता – निःशस्त्रीकरण की असफलता भी द्वितीय विश्व युद्ध का एक प्रमुख कारण बनी। निःशस्वीकरण हेतु वाशिंगटन सम्मेलन एवं लंदन कांफ्रेंस आदि बुलाये गये, परन्तु किसी में भी उनको सफलता प्राप्त नहीं हुई। सुरक्षा की दृष्टि से लोकानों पेक्ट तथा पेरिस पेक्ट किये गये, परन्तु सुरक्षा के उद्देश्य में कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई।

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(4) इंगलैण्ड और फ्रांस की तुष्टिकरण की नीति – इंगलैण्ड और फ्रांस द्वारा जर्मनी तथा इटली के प्रति अपनाई गई तुष्टिकरण की नीति भी द्वितीय विश्व युद्ध का एक प्रमुख कारण बनी। म्यूनिक समझौते में यह नीति अपनी चरम सीमा पर पहुंच गई थी। इंगलैण्ड का प्रधानमंत्री चेम्बरलेन इस तुष्टिकरण की नीति का जन्मदाता था।

उसका यह मानना था कि यदि हिटलर और मुसोलिनी की छोटी-छोटी मांगों को स्वीकार कर लिया जाए, तो वे सन्तुष्ट हो जायेंगे। इस कारण हिटलर और मुसोलिनी की साम्राज्यवादी प्रवृत्ति को बल मिला, जिसके कारण द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ हो गया।

(5) तानाशाही शक्तियों का उदय एव उनकी साम्राज्यवादी नीतियां – प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जर्मनी में नाजीवाद, इटली में फासीवाद, रूस में साम्यवाद तथा जापान में सैनिकवाद का उदय हुआ हिटलर, मुसोलिनी तथा जनरल फ्रेंको जैसे अधिनायक युद्ध को अनिवार्य मानते थे, जिस के कारण विश्व शांति खतरे में पड़ गयी।

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Pratham Vishwa Yudh Kab Hua Tha – प्रथम विश्व युद्ध

जर्मनी, जापान तथा इटली भी इंगलैण्ड तथा फ्रांस की भांति विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना करना चाहते थे अतः उन्होंने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विस्तारवादी नीति को अपनाया। इसलिए इनका उन राज्यों से संघर्ष होना स्वाभाविक था, जो पहले से विशाल साम्राज्य के स्वामी थे।

(6) धुरी राष्ट्रों का उग्र राष्ट्रवाद तथा प्रबल सैनिकवाद – जर्मनी, जापान तथा इटली इन तीनों देशों को धुरी राष्ट्र के नाम से पुकारा जाता था। इनका उग्र राष्ट्रवाद तथा प्रबल सैनिकवाद भी युद्ध का एक कारण बना। हिटलर ने वर्साय संधि का उल्लंघन किया तथा ‘करो या मरो’ का नारा दिया। उसने अनिवार्य सैनिक सेवा लागू कर दी।

मुसोलिनी भी युद्ध का पुजारी था। जापान के नेता उग्र सैनिकवादी नीति अपनाने के प्रबल समर्थक थे। इन तीनों धुरी राष्ट्रों के उग्र राष्ट्रवाद तथा प्रबल सैनिकवाद के कारण अन्तर्राष्ट्रीय शांति खतरे में पड़ गयी तथा द्वितीय विश्व युद्ध अनिवार्य हो गया।

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(7) धुरी राष्ट्रों द्वारा उपनिवेशों की स्थापना – धुरी राष्ट्रों (जर्मनी, जापान, एवं इटली) ने नवीन उपनिवेशों की स्थापना करने का निश्चय किया, ताकि ये वहां से कच्चा माल प्राप्त कर सकें एवं तैयार माल बेच सकें। इसके अतिरिक्त अपनी बढ़ती हुई जनसंख्या को वहां बसा सकें।

अतः जर्मनी ने आस्ट्रिया व चेकोस्लोवाकिया पर जापान ने मंचूरिया पर तथा इटली ने एबीसीनिया पर अधिकार कर लिया। जब हिटलर ने पौलेण्ड पर आक्रमण किया, तो द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ हो गया।

(8) अल्पसंख्यक जातियों में व्याप्त असंतोष – वर्साय की सन्धि के द्वारा एवं उसके बाद अन्य कई सन्धियों द्वारा अल्पसंख्यक जातियों का निर्माण किया गया। इसमें अनेक स्थानों पर ऐसी कई अल्पसंख्यक जातियों को एक स्थान पर एक ही शासक के अधीन रखा गया, जो एक दूसरे की विरोधी थीं। एक ही राष्ट्रीयता के व्यक्तियों को दूसरे देशों में अल्पसंख्यक जाति की तरह रखा गया।

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परिणामस्वरूप अल्पसंख्यक जातियों के असंतोष में वृद्धि हुई। हिटलर ने इसका लाभ उठाया और आस्ट्रिया तथा चेकोस्लोवाकिया पर अधिकार कर लिया। इसके पश्चात् उसने डानजिंग की समस्या को हल करने के लिए पीलेण्ड पर आक्रमण किया, तो द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ हो गया।

(9) आर्थिक संकट (1929-30 ई.)- 1930 में सम्पूर्ण विश्व पर आर्थिक संकट छा गया, जिसके कारण जर्मनी में हिटलर के नेतृत्व में नाजीवाद का उत्कर्ष सम्मय हो सका। आर्थिक संकट से मुक्ति प्राप्त करने के लिए सभी देशों ने विदेशी माल पर भारी आयात कर लगा दिये।

परिणामस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार ठप्प हो गया। ऐसी स्थिति में धुरी राष्ट्रों जर्मनी, जापान तथा इटली ने कच्चा माल प्राप्त करने एवं तैयार माल बेचने हेतु साम्राज्यवादी नीति पर चलने का निश्चय किया, जिसके कारण द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ हो गया I

Second World War In Hindi – द्वितीय विश्व युद्ध

(10) सन्धियों की अमान्यता – वर्साय और पेरिस की सन्धियों द्वारा मित्र राष्ट्रों ने अपने पास अधिक सैन्य सामग्री न रखना स्वीकार कर लिया था, किन्तु उन्होंने अपनी सैन्य शक्ति में वृद्धि निरन्तर जारी रखी। इस तरह संधि निर्माताओं ने सन्धि की शर्तों को अमान्य कर दिया।

हिटलर खुले आम एक के बाद एक वर्साय की की सन्धि की शर्त का उल्लंघन करता रहा, परन्तु मित्र राष्ट्र उसका कोई जवाब नहीं दे सके। हिटलर उनकी कमजोरी का लाभ उठाता रहा, अन्त में उसका साहस इतना बढ़ गया था कि उसने द्वितीय विश्व युद्ध को प्रारम्भ करने में भी कोई संकोच नहीं किया।

(11) अमेरिका की विश्व राजनीति में अहस्तक्षेप की नीति – प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् अमेरिका पृथकता की नीति का पालन कर रहा था। अतः उसने विश्व राजनीति में किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं किया। यदि अमेरिका राष्ट्र संघ का सदस्य बन जाता और समस्याओं को सुलझाने में अपना सहयोग देता, तो जर्मनी जापान तथा इटली अपने मनसूबे में सफल नहीं हो पाते। अमेरिका ही विश्व का एकमात्र ऐसा शकिशाली देश था, जो धुरी राष्ट्रों पर अंकुश लगा सकता था।

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(12) रोम बर्लिन- टोकियो धुरी का निर्माण – प्रथम विश्व युद्ध की मांति द्वितीय युद्ध के प्रारम्भ होने से सम्पूर्ण विश्व दो परस्पर विरोधी गुटों में हो चुका था। 1937 ई. में रोम बर्लिन टोकियो धुरी के निर्माण के बाद यूरोप दो गुटों में विमत हो गया- एक गुट घुरी राष्ट्रों का तथा दूसरा गुट मित्र राष्ट्रों का था।

एक ओर जर्मनी, इटली तथा जापान थे, ये तीनों राष्ट्र घुरी राष्ट्र कहलाए। ये ऐसे राष्ट्र थे, जो कमी भी सन्तुष्ट नहीं हो सकते थे। दूसरा गुट मित्र राष्ट्रों का था, जिसमें इंगलैण्ड, फ्रांस तथा अमेरिका थे। बाद में रूस भी मित्र राष्ट्रों के साथ मिल गया था।

(13) घटनाक्रमों से सम्बन्धित –

(i) जापान ने 1931 ई. में मंचूरिया पर आक्रमण कर दिया और राष्ट्रसंघ के आदेशों की अवहेलना करते हुए 1932 ई. तक सम्पूर्ण मंचूरिया पर अधिकार कर लिया था।

(ii) इटली ने 1935 ई. में एबीसीनिया पर आक्रमण कर दिया और राष्ट्रसंघ के आदेशों की अवहेलना करते हुए 1936 ई. तक सम्पूर्ण एबीसीनिया पर अधिकार कर लिया

(iii) हिटलर ने खुले आम राष्ट्रसंघ के आदेशों का उल्लंघन किया। उसने आस्ट्रिया को हड़प लिया। म्यूनिख समझौते के द्वारा उसे जर्मन बाहुल्य प्रदेश सुडेटनलैण्ड दे दिया गया, किन्तु उसने इस समझौते का उल्लघंन करते हुए सम्पूर्ण चेकोस्लोवाकिया को हड़प लिया।

(iv) 1936 ई. में स्पेन में गृह युद्ध आरम्भ गया। हिटलर तथा मुसोलिनी ने इंगलैण्ड तथा फ्रांस के विरुद्ध जनरल फ्रेंको की मदद की, जिसके कारण उसने स्पेन में गणतंत्र व्यवस्था को समाप्त कर निरंकुश शासन व्यवस्था को स्थापित कर दिया । अब हिटलर तथा मुसोलिनी इंगलैण्ड तथा फ्रांस की धमकियों को कोरी गीदड़ भभकी समझने लगे, जिससे युद्ध अनिवार्य हो गया।

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(14) हिटलर द्वारा पोलेण्ड पर आक्रमण – द्वितीय विश्व युद्ध का तत्कालीन कारण हिटलर द्वारा पॉलैण्ड पर आक्रमण करना था। हिटलर ने पॉलेण्ड से डानजिंग बन्दरगाह की मांग की, परन्तु पौलेण्ड ने उसकी मांग को ठुकरा दिया। इस पर 1 सितम्बर, 1939 ई. को डानजिंग समस्या को हल करने के लिए हिटलर ने पौलेण्ड पर आक्रमण कर दिया।

इस पर इंगलैण्ड तथा फ्रांस ने हिटलर को चेतावनी दी कि यदि उसने 48 घण्टों के भीतर पॉलेण्ड से अपनी सेनाएँ नहीं हटाई, तो वे उसके विरुद्ध युद्ध घोषित कर देंगे। हिटलर ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। इस पर 3 सितम्बर, 1939 ई. को इंगलैण्ड तथा फ्रांस ने पॉलेण्ड के समर्थन में जर्मनी के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया। इस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध का सूत्रपात हो गया।

निष्कर्ष- इस प्रकार अन्त में निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उपर्युक्त घटनाओं के कारण द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ हो गया। सम्पूर्ण विश्व एक बार फिर विनाश के कगार पर खड़ा हो गया। वस्तुतः हिटलर तथा मुसोलिनी के उग्रराष्ट्रवाद तथा सैनिकवाद ने विश्व युद्ध को अनिवार्य कर दिया था तथा इंगलैण्ड व फ्रांस ने इनके प्रति तुष्टिकरण की नीति अपना सांप को दूध पिलाने का काम किया था, लेकिन इसके बाद भी विश्व युद्ध को न टाला जा सका।

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द्वितीय विश्व युद्ध की घटनाएँ – द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भ में धुरी राष्ट्रों को शानदार सफलताएँ मिलों और मित्र राष्ट्रा को निरन्तर पराजय का मुंह देखना पड़ा। जर्मनी ने पॉलेण्ड पर अधिकार करने के पश्चात फ्रांस (पारस) पर आक्रमण कर दिया। 1940 ई. तक हिटलर ने डेनमार्क और ना पर अधिकार कर लिया था।

इसके पश्चात उसको हालैण्ड बेल्जियम तथा फ्रांस पर अधिकार करने में सफलता मिली। इस समय मुसोलिनी ने अफ्रीका व यूनान पर आक्रमण कर दिया, परन्तु उसे असफलता का मुंह देखना पड़ा। ऐसी स्थिति में हिटलर मुसोलिनी की सहायता के लिए पहुंच गया। इस प्रकार यूगोस्लाविया और यूनान पर भी हिटलर मे अधिकार कर लिया।

22 जून, 1941 ई. को हिटलर ने रूस पर अकस्मात् हमला कर दिया। यद्यपि शुरू में जर्मनी को शानदार सफलताऐं मिलीं, परन्तु जर्मनी के सैनिक रूस की भीषण शीत को सहन नहीं कर सके। इसलिये रूसी सेना ने जर्मनी को खदेड़ दिया। अभी तक संयुक्त राज्य अमेरिका युद्ध में शामिल नहीं हुआ था।

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वह केवल मित्र राष्ट्रों को आर्थिक एवं सैनिक सहायता पहुंचा रहा था, परन्तु जापान ने अमेरिका के पर्लाहार्बर के नौसैनिक अड्डे पर बम वर्षा की। इस कारण अमेरिका ने मित्र राष्ट्रों की और से युद्ध में भाग लेने की घोषणा कर दी। जापान को युद्ध के दौरान, शानदार सफलताएँ प्राप्त हुई।

उसने हांगकांग, फिलीपाइन द्वीप समूह, मलाया, ब्रह्मा, थाइलैण्ड, बर्मा, इण्डोचीन और स्याम आदि पर अधिकार कर लिया। इसके पश्चात् जापान ने भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया। 1942 ई. में युद्ध ने करवट बदली। अब मित्र राष्ट्रों को शानदार सफलताएँ मिलने लगी और धुरी राष्ट्रों को पराजय का मुंह देखना पड़ा।

1944 ई. में इटली ने हथियार डाल दिये। वहां के देश-भक्तों ने मुसोलिनी और उसकी पत्नी को गोली से उड़ा दिया। 7 मई, 1945 को जर्मनी ने भी हथियार डाल दिये। इस समय हिटलर ने आत्महत्या कर ली और उसका शव जला दिया गया था। इस प्रकार यूरोप में युद्ध बन्द हो गया. परन्तु जापान के आत्म समर्पण नहीं करने से एशिया में युद्ध चलता रहा।

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परिणामस्वरूप अमेरिका ने 6 अगस्त, 1945 ई. को हिरोशिमा एवं 9 अगस्त को नागासाकी नगर पर अणु बम गिराये। इस भयंकर विध्वंस को देखते हुए 14 अगस्त 1945 ई. को जापान ने आत्म-समर्पण कर दिया। इस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति हुई।

द्वितीय विश्व युद्ध के परिणाम

(1) जन तथा धन की अपार हानि – द्वितीय विश्व युद्ध में जन तथा पन की अपार क्षति हुई। इस युद्ध में 2 करोड़ 20 लाख व्यक्ति मारे गये तथा 3 करोड़ 30 लाख व्यक्ति घायल हुए। सभी राष्ट्रों की भारी जनक्षति हुई। इस युद्ध से उनकी व्यवस्था नष्ट हो गयी। मैकनेल र्क्स ने अमेरिकन विश्वविद्यालय द्वारा तैयार आंकड़ों के आधार पर अपनी पुस्तक ‘वेस्टर्न सिविलिजेशन्स’ में लिखा है, ‘इस युद्ध में विश्य ने 13 खरब, 84 अरब, 90 करोड़ डॉलर व्यय किये।

(2) सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव – विश्वयुद्ध के दौरान स्त्रियां कारखानों एवं सरकारी कार्यालयों में काम कर रही थी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व की आर्थिक दशा अत्यन्त शोचनीय हो गई। खाद्यानों का अभाव हो गया तथा महंगाई बढ़जाने के कारण वस्तुओं की कीमतें आकाश को छूने लगीं।

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अमेरिका युद्ध भूमि से दूर होने के कारण बिना किसी बाधा के अपना आर्थिक विकास करता रहा। परिणामस्वरूप वह विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली एवं आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न तथा समृद्ध राष्ट्र बन गया।

(3) धुरी राष्ट्रों का विभाजन – युद्ध की समाप्ति के बाद मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी को युद्ध का दोषी ठहराया और उसके नेताओं पर अभियोग चलाये गये युद्ध अपराधी सिद्ध होने वाले नेताओं को यथोचित दण्ड भी दिया गया। जर्मनी की शक्ति को नष्ट करने के लिए मित्र राष्ट्रों ने उसे दो भागों पूर्वी जर्मनी तथा पश्चिमी जर्मनी में विभक्त कर दिया।

पश्चिमी जर्मनी पर मित्र राष्ट्रों का तथा पूर्वी जर्मनी पर रूस का अधिकार रखा गया। मित्र राष्ट्रों ने इटली के उपनिवेशों पर भी अधिकार कर लिया। रूस तथा अमेरिका ने कोरिया को आपस में बांट लिया। जापान के क्यूराइल द्वीपों पर रूस का तथा फारमोसा पर चीन का अधिकार रखा गया।

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(4) इटली में गणतंत्र की स्थापना – युद्ध की समाप्ति के बाद इटली के दो शक्तिशाली दलों- (साम्यवादी दल तथा गणतंत्रीय दल) में संघर्ष चल रहा था। गणतंत्रवादी दल ने मित्र राष्ट्रों के सहयोग से साम्यवादी दल को पराजित कर दिया। इस प्रकार मित्र राष्ट्रों के सहयोग के कारण इटली में गणतंत्र दल की सरकार स्थापित हुई।

(5) जापान में राजतंत्र का अन्त – द्वितीय विश्व युद्ध के समय तक जापान में राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था स्थापित थी, परन्तु जापान के आत्मसमर्पण करने के बाद अमेरिका ने उस पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने जापान में राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था को समाप्त कर दिया और उसके स्थान पर प्रजातंत्रात्मक शासन व्यवस्था की स्थापना कर दी। इस प्रकार जापान में पहली बार प्रजातंत्र की स्थापना हुई।

(6) तानाशाही शासन व्यवस्था की असफलता – इस युद्ध में लोकतांत्रिक शक्तियों (मित्र राष्ट्रों) ने जर्मनी, जापान तथा इटली के तानाशाही को बुरी तरह पराजित किया लोकतांत्रिक शक्तियों की विजय से जनता का लोकतंत्र में विश्वास जागत हुआ। इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दियाकि प्रजातंत्र को कुचलकर निरकुंश शासन व्यवस्था अधिक समय तक नहीं चल सकती।

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(7) रूस का विश्व शक्ति के रूप में उदय – इस युद्ध के बाद रूस एक विश्व शक्ति के रूप में प्रकट हुआ स्टोनिया, बाल्कन प्रदेश, आधा पोलेण्ड, लिथुआनिया, लैटविया, फिनलैण्ड का भाग तथा पूर्वी प्रशा पर रूस का अधिकार हो गया, जिसके कारण उसका साम्राज्य बहुत विशाल हो गया। पश्चिमी राष्ट्र उसकी बढ़ती हुई शक्ति से भयभीत हो उठे I

(8) अमेरिका का विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उदय – द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व का नेतृत्व इंगलैण्ड के स्थान पर अमेरिका के हाथ में आ गया। अमेरिका युद्ध भूमि से दूर होने के कारण बिना किसी बाधा के अपना आर्थिक विकास करता रहा। वह यूरोपियन राष्ट्रों को माल भेज रहा था। अतः विश्व के कई महान देश उसके कर्जदार बन गये।

(9) शीत युद्ध का जन्म – द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस व अमेरिका ने रूस के सहयोग से धुरी राष्ट्रों को पराजित कर दिया था। इससे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ये मित्र राष्ट्र मिलकर शांति व्यवस्था बनाये रखेंगे। जब विश्व के रंगमंच पर सोवियत संघ एवं संयुक्त राज्य अमेरिका दो महाशक्तियों के रूप में प्रकट हुए, तब यह आशा निराधार सिद्ध हुई।

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दोनों की विचारधारा एक दूसरे की विरोधी होने के कारण सम्पूर्ण विश्व दो गुटों में विभक्त हो गया। दोनों ही परस्पर विरोधी खेमों का नेतृत्व करने लगे। इससे दोनों के मध्य तनाव उत्पन्न हुआ, जिससे शीत युद्ध का जन्म हुआ।

(10) विज्ञान के क्षेत्र में उन्नति- द्वितीय विश्व युद्ध के कारण विज्ञान के क्षेत्र में अत्यधिक विकास हुआ। इस युद्ध में अणु का प्रयोग किया था। अतः विश्व पहली बार इससे परिचित हुआ। युद्ध के समाप्त होने के बाद मानव ने विज्ञान के क्षेत्र में आश्चर्यजनक उन्नति की। 1961 ई. में मानव ने अन्तरिक्ष की यात्राएं प्रारम्भ की और 1969 ई. में दो अमेरिकन चांद की सतह पर पहुंच गये थे। इसके अतिरिक्त कृषि तथा चिकित्सा के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व उन्नति हुई।

(11) चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना – द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व ही चीन जापान से युद्ध करने में व्यस्त था। जब द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ हुआ, तो चीन ने मित्र राष्ट्रों के समर्थन में युद्ध में भाग लिया। जापान से युद्ध करने के कारण उसकी शक्ति काफी क्षीण हो चुकी थी।

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चीन के साम्यवादी दल को रूस का समर्थन प्राप्त था, जबकि चीन के राष्ट्रपति च्यांग काई शेक को अमेरिका सहायता दे रहा था। चीन में साम्यवादी दल की शक्ति में निरन्तर वृद्धि होती जा रही थी। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद चीन में पुन: गृह युद्ध प्रारम्भ हो गया, जिसमें साम्यवादी दल को सफलता प्राप्त हुई।

फलतः च्यांग काई शेक को चीन से भागकर फारमूसा नामक टापू में शरण लेने के लिए विवश होना पड़ा, जो आज भी अमेरिका के संरक्षण में है। साम्यवादी दल ने चीन में साम्यवादी शासन व्यवस्था स्थापित की, जिसके परिणामस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय जगत में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ।

(12) स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए आन्दोलन – प्रथम विश्व युद्ध की भांति द्वितीय विश्व युद्ध भी मित्र राष्ट्रों ने प्रजातंत्र की रक्षा के नाम पर लड़ा था, किन्तु जब युद्ध की समाति के बाद साम्राज्यवादी देशों ने अपने अधीन देशों को स्वतंत्रता प्रदान नहीं की, तो उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया।

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साम्राज्यवादी देशों ने इन आन्दोलनों को कुचलने का हर सम्भव प्रयास किया, परन्तु युद्ध में भाग लेने के कारण इन देशों की शक्ति क्षीण हो गई थी, अत: उनके लिए आन्दोलनों को कुचलना असम्भव हो गया। युद्ध की समाप्ति के पश्चात् इंगलैण्ड में आम चुनाव हुए, जिसमें चर्चिल की पराजय हुई और एटली इंगलैण्ड का प्रधानमंत्री बना।

उसने सदियों से गुलाम भारत को 16 अगस्त, 1947 ई. को स्वतंत्रता प्रदान की। इसके साथ ही एशिया में एक नवीन राष्ट्र पाकिस्तान का जन्म हुआ। ब्रिटेन ने बर्मा, मलाया तथा मिस आदि देशों को भी स्वतंत्रता प्रदान कर दी। बाद में अफ्रीका के कई देशों को भी स्वतंत्रता प्राप्त हुई।

इसके अतिरिक्त हिन्द चीन, श्रीलंका, हिन्देशिया (जावा, सुमात्रा एवं बोर्नियो) ने हिन्देशिया नामक संघ राज्य की स्थापना की। लीबिया, ट्युनिस, कांगो आदि अनेक देश भी स्वतंत्रता प्राप्त करने में सफल हुए। इस प्रकार एशिया तथा अफ्रीका के कई देशों में राष्ट्रीय आन्दोलन को सफलता प्राप्त हुई।

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(13) संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना – विश्व के राजनीतिज्ञों ने अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को हल करने एवं शान्ति बनाये रखने के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय संघ की स्थापना पर जोर दिया। इसलिए 24 अक्टूबर, 1945 ई. को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई। इस संघ ने विश्व की समस्याओं हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इसके कारण ही आज विश्व तीसरे महायुद्ध से बचा हुआ है। इसके अतिरिक्त इस संघ ने पिछड़े तथा अविकसित देशों की जनता की भलाई के लिए सराहनीय कार्य किये हैं।

(14) विभिन्न शांति संघियां – युद्ध के दौरान तथा उसके पश्चात् कई वर्षों तक युद्धकालीन समस्याओं को हल करने के लिए कई सम्मेलन बुलाये गये, जिसमें विभिन्न देशों ने कई शांति सन्धियां कीं। इसमें मास्को सम्मेलन, काहिरा सम्मेलन, तेहरान सम्मेलन बर्लिन सम्मेलन, सेन, फ्रांसिसको सम्मेलन, बर्लिन सम्मेलन, अटलाण्टिक चार्टर एवं कासा ब्लांका सम्मेलन आदि प्रमुख हैं।

(15) सैनिक संधियों का जन्म – पूंजीवादी तथा साम्यवादी संघर्ष के कारण अनेक सैनिक सन्धियों का जन्म हुआ। इसमें नाटो, सीटो, सैन्टो और वारसा आदि प्रमुख हैं। हमारा देश भारत इन सन्धियों से किसी भी प्रकार से बंधा हुआ नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व का नेतृत्व इंगलैण्ड के स्थान पर अमेरिका के हाथों में आ गया।

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(16) निःशस्त्रीकरण के प्रयत्न – द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् निः शस्त्रीकरण के लिए अनेक प्रयत्न किये गये, ताकि विश्व को तीसरे विश्व युद्ध से बचाया जा सके। अमेरिका तथा रूस के मत भेदों के कारण निःशस्त्रीकरण के सारे प्रयास असफल रहे।

निष्कर्ष – इस प्रकार उपयुक्त परिणामों पर दृष्टिपात करने से यह स्पष्ट हो जाता। है कि द्वितीय विश्व युद्ध से विश्व को गहरी क्षति पहुंची है, जिससे वह अभी तक उभर नहीं पाया है। आज भी विश्व में जो परिस्थितियां बनी हुई हैं, उनसे तीसरे विश्व युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, लेकिन यह निश्चित है कि यदि तीसरा विश्व युद्ध हुआ, तो चौथा विश्व युद्ध पत्थरों तथा लाठियों से लड़ा जायेगा, क्योंकि वर्तमान सभ्यता नष्ट हो जायेगी। 

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