Second Anglo Mysore War – द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध

Second-Anglo-Mysore-WarSecond Anglo Mysore War

मद्रास की संधि से प्रथम मैसूर युद्ध की समाप्ति हुई थी। यह सन्धि वास्तव में दो मित्रों की सन्धि नहीं थी। अंग्रेज न तो हैदर को मित्र मानने के लिए तैयार थे और न ही सन्धि की शर्तों का पालन करना चाहते थे I अतः 1780 ई. में द्वितीय-मैसूर युद्ध का सूत्रपात हुआ, जो हैदर की मृत्यु तक चलता रहा।

Second Anglo Mysore War – द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध

इस युद्ध के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

(1) मद्रास की सन्धि में किसी बाहय शक्ति के आक्रमण होने पर दोनों ने एक दूसरे की सहायता का वचन दिया था, किन्तु 1771 में जब मराठों ने मैसूर पर आक्रमण कर दिया, तो अंग्रेजों ने हैदर अली की कोई सहायता नहीं दी। अंग्रेजों के इस विश्वासघात के कारण उसे पराजित होकर मराठों के साथ एक अपमानजनक सन्धि करनी पड़ी। अंग्रेजों के इस प्रकार के व्यवहार से हैदर अली क्रुद्ध हो गया तथा उसने अंग्रेजों से प्रतिशोध लेने का निश्चय कर लिया।

(2) अमेरिका के स्वतन्त्रता संग्राम में फ्रान्सीसी अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में अमेरिकन लोगों की सहायता कर रहे थे। इससे भारत में भी अंग्रेजों और फ्रान्सीसियों के बीच युद्ध आरम्भ हो गया। अतः 19 मार्च, 1779 ई. को अंग्रेजों ने मालाबार तट पर स्थित माही पर अधिकार कर लिया, जो कि फ्रान्सीसियों के अधिकार में था।

मालाबार हैदर के अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत था और माही को वह अपने राज्य का एक भाग समझता था। इसके अतिरिक्त माही के बन्दरगाह से हैदर को निरन्तर युद्ध सामग्री प्राप्त होती थी, किन्तु उस पर अंग्रेजों का नियन्त्रण होने से इनमें बाधा उत्पन्न हो सकती थी। हैदर ने अंग्रेजों को मही खाली करने को कहा, किन्तु अंग्रेजों ने इन्कार कर दिया, तब उसके क्रोध की कोई सीमा न रही।

Second Anglo Mysore War – द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध

(3) निजाम के भाई बसालतजंग को गुंटुर की जागीर प्राप्त थी। अंग्रेजों ने बसालतजंग के फ्रान्सीसियों से घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण उसकी जागीर गुन्दर पर अधिकार कर लिया। गुन्दर का रास्ता हैदर व निजाम के राज्य से होकर जाता था। अंग्रेजों ने इस रास्ते से सेना को भेजने से पूर्व हैदर व निजाम की स्वीकृति प्राप्त नहीं की।

इसलिए जब उन्होंने इस रास्ते से अपनी सेनाएं भेजीं, तो निजाम व हैदर ने इसका तीव्र विरोध किया। इससे हैदर व अंग्रेजों के बीच कटुता बढ़ी और निजाम भी नाराज हो गया। हेस्टिंग्ज ने 1768 ई. में की गई सन्धि के अनुसार निजाम को उत्तरी सरकार के बदले में 7 लाख रुपया प्रतिवर्ष देने से इन्कार कर दिया। इस कारण हैदराबाद का निजाम अंग्रेजों से असन्तुष्ट हो गया।

(4) इस समय हैदराबाद का निजाम अंग्रेजों से असन्तुष्ट था। हैदर अली अंग्रेजों से बदला लेने की सोच रहा था। इस समय अंग्रेजों का मराठों के साथ भीषण युद्ध चल रहा था। मराठे अंग्रेजों के विरुद्ध हैदर की सहायता प्राप्त करना चाहते थे। अत: हैदर ने 1780 ई. में मराठों से समझौता कर लिया। इसके बाद निजाम को भी अपनी ओर मिला लिया। इस प्रकार इन तीनों शक्तियों ने मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध शक्तिशाली मोर्चा बना लिया।

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First Anglo Mysore War – प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध

इसके बाद यह निश्चित किया गया कि मराठे बरार और मध्य भारत से होते व आस-पास की प्रदेशों पर आक्रमण करेगा। इस प्रकार द्वितीय मैसूर युद्ध की पृष्ठभूमि हुए अंग्रेजों पर आक्रमण करेंगे। निजाम उत्तरी सरकार पर और हैदरअली मद्रास आस-पास की प्रदेशों पर आक्रमण करेगा। इस प्रकार द्वितीय मैसूर युद्ध की पृष्ठभूमि तैयारी हो गयी |

युद्ध की घटनाएं – जुलाई, 1780 ई. में 83,000 सैनिकों और 100 तोपों को लेकर हैदरअली ने अंग्रेजों के मित्र कर्नाटक के नवाब पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों ने पहले से ही कर्नाटक की रक्षा के लिए कर्नल बैली की अध्यक्षता में एक सेना कर्नाटक में छोड़ रखी थी। हैदरअली ने अंग्रेजी सेना को बुरी तरह परास्त किया तथा बैली को घायल अवस्था में बन्दी बना लिया गया।

अक्टूबर, 1780 ई. में हैदरअली का कर्नाटक की राजधानी अर्काट पर अधिकार हो गया। कर्नाटक का नवाब अर्काट से भागकर मद्रास चला गया। हैदर की इन विजयों से अंग्रेजों की प्रतिष्ठा अपने न्यूनतम बिन्दु तक पहुंच गई थी। इसी सन्दर्भ में अल्फ्रेड लायल ने लिखा है कि -‘भारत में अंग्रेजों भाग्य सबसे नीचे गिर चुका था।

Second Anglo Mysore War – द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध

इन घटनाओं से वारेन हेस्टिंग्ज बहुत चिन्तित हुआ। उसने बक्सर के युद्ध के विजेता और अंग्रेजी सेनाओं के प्रधान सेनापति आयकूट को विशाल सेना के साथ हैदर अली से मुकाबला करने के लिए मद्रास भेजा। उसने कूटनीति से भोसले और सिन्धिया को हैदर अली की सहायता न करने के लिए राजी कर लिया और निजाम को गुन्टूर का प्रदेश देकर हैदर अली से पृथक कर दिया।

अब हैदर अली अंग्रेजों से युद्ध करने के लिए अकेला रह गया। जून, 1781 में आयरकूट ने पोर्टोनोवो के युद्ध में हैदर अली को पराजित किया। इस युद्ध में हैदर के दस हजार सैनिक मारे गये। ‘आयरकूट ने अपने बीस वर्ष पुराने कीर्ति दृश्यों को पुन: उपस्थित किया।’ 27 सितम्बर, 1781 को आयरकूट ने हैदर अली को सोलिंगपुर के युद्ध में बुरी तरह परास्त किया, और हैदर की सेना ने कर्नल ब्रेथवेट की सेना को परास्त कर पीछे धकेल दिया।

इसी समय फ्रान्सीसियों ने हैदर अली की सहायता के लिए 2,000 फ्रान्सीसी सैनिक मद्रास भेज दिये। 2 जून, 1782 ई. को आयरकूट का हैदर व फ्रान्सीसियों की संयुक्त सेना के साथ अरनी नामक स्थान पर युद्ध हुआ। यह युद्ध भी अनिर्णायक रहा।

Second Anglo Mysore War – द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध

इसी बीच मराठों ने अंग्रेजों के साथ 17 मई, 1782 को सालबाई की सन्धि कर ली। अतः अब अंग्रेज अपनी सम्पूर्ण शक्ति हैदर अली के विरुद्ध लगा सकते थे। वर्षा ऋतु आरम्भ होने से युद्ध में शिथिलता आ गई और सर आयरकूट मद्रास लौट आया। 7 दिसम्बर, 1782 को अर्काट के किले में कैंसर से हैदर अली की मृत्यु हो गई, परन्तु उसके उत्साही पुत्र एवं उत्तराधिकारी टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध जारी रखा।

इधर 26 सितम्बर, 1783 को आयरकूट की भी मृत्यु हो गई। अतः अंग्रेजी सेना की कमान ब्रिगेडियर मैथ्यूज ने सम्भाली। 1783 ई. में टीपू सुल्तान ने मैथ्यूज को परास्त कर उसको समस्त सेना सहित बन्दी बना लिया।इसी समय यूरोप में अंग्रेजों और फ्रान्सीसियों के बीच सन्धि हो गई। फलस्वरूप अब फ्रान्सीसियों ने टीपू को सहायता देना बंद कर दिया। यह टीपू के लिये बड़ा हानिकारक था। 1783 में अंग्रेजों को पुन: सफलता मिली।

अंग्रेजों ने पालघाट और नवम्बर, 1783 ई. में कोयम्बटूर पर अधिकार कर लिया था। अब अंग्रेज कर्नल फुलर्टन टीपू की राजधानी श्री रंगपट्टम पर आक्रमण करना चाहता था, लेकिन इसी समय मद्रास के गर्वनर ने फुलर्टन को फिर बुलवा लिया। मद्रास का गर्वनर मैकार्टने ने सन्धि के लिए उत्सुक था। उधर टीपू भी शान्ति का इच्छुक था। अतः हेस्टिंग्ज के समक्ष टीपू से सन्धि करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था।

Second Anglo Mysore War – द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध

मंगलौर की सन्धि एवं द्वितीय मैसूर युद्ध की समाप्ति – टीपू और अंग्रेजों के बीच 7 मार्च, 1784 ई. को मंगलौर नामक स्थान पर सन्धि हो गई। यह सन्धि मंगलौर की सन्धि कहलाती है। इस सन्धि की प्रमुख शर्ते निम्नलिखित थीं I

(1) दोनों ही पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए प्रदेशों और युद्ध, बन्दियों को लौटाने का वायदा किया ।

(2) मद्रास के गवर्नर लार्ड मैकार्टने ने यह आश्वासन दिया कि मैसूर राज्य में वह कभी हस्तक्षेप नहीं करेगा, वरन् उसके साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रखेगा।

वास्तव में मंगलौर की सन्धि अंग्रेजों के लिए बहुत अपमानजनक थी। स्वयं वारेन हेस्टिंग्ज इस सन्धि से असन्तुष्ट था, परन्तु मद्रास सरकार के कारण उसे यह सन्धि स्वीकार करनी पड़ी थी। अत: वारेन हेस्टिंग्ज ने मद्रास के गवर्नर लार्ड मेकाटने की इस सन्धि के मामले में निंदा की थी और कहा था कि इस सन्धि के फलस्वरूप अंग्रेजों को कर्नाटक से हाथ धोना पड़ेगा।

दूसरी ओर मंगलौर की सन्धि टीपू की कूटनीतिक सफलता थी। इस सन्धि ने उसकी शक्ति को घटाने के स्थान पर उसकी प्रतिष्ठा को बढ़ा दिया, जबकि जिस परिस्थिति में यह सन्धि हुई थी, उससे अंग्रेजों को अपना मुंह छिपाना पड़ा।’ मद्रास सरकार और टीपू ने ही युद्ध से तंग आकर यह सन्धि की थी, ताकि शान्ति के लिए थोड़ा समय मिल सके। अतः स्पष्ट थी कि कम्पनी और मैसूर राज्य में एक बार फिर संघर्ष होगा।

Second Anglo Mysore War – द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध

हैदर अली का मूल्यांकन – आधुनिक भारत के इतिहास में हैदर का स्थान भारत के प्रमुख शासकों में है। वह एक साधारण सैनिक से अपनी योग्यता तथा वीरता के बल पर उन्नति करता हुआ मैसूर का सेनापति एवं अन्त में वहां का शासक बन गया। वह शिक्षित न था, परन्तु उसकी बुद्धि कुशाग्र और स्मरण शकि तीक्ष्ण थी। वह उच्चकोटि का कूटनीतिज्ञ था और अनेक अवसरों पर उसने अपने शत्रुओं में फूट डालने में सफलता प्राप्त की थी।

वह ऐसी किसी भी शक्ति से मैत्री करने को तैयार था, जो उसे सैनिक सहायता उपलब्ध करा सके। अतः 1778 ई. तक उसने अंग्रेजों से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया। जब अंग्रेजों ने उसे सहायता नहीं दी, तो उसने फ्रांसीसियों से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया। अंग्रेजों के बिना सहयोग के भी उसने एक ऐसी सेना का गठन कर लिया, जो अंग्रेजों की सेना से समानता के स्तर पर टक्कर ले सकी।

हैदर अली ने अपनी शक्ति और योग्यता से एक शक्तिशाली मैसूर राज्य का निर्माण करने में सफलता प्राप्त की थी। यदि इसकी वजह से अंग्रेज उसके शत्रु बने। सैनिक दृष्टि से हैदर अंग्रेज सेना नायकों से अधिक योग्य था। उसमें घुड़सवार सेना का नेतृत्व करने की अद्वितीय योग्यता थी। उसने अपने राज्य का विस्तार किया तथा उसे दृढ़ बनाया।

Second Anglo Mysore War – द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध

सरकार एवं दत्त ने लिखा है कि अपनी योग्यता से स्वयं को बनाने वाले हैदर अली ने मैसूर राज्य को दुर्बल और विभाजित पाया, परन्तु उसने उसे 18 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारत की एक सर्वश्रेष्ठ शक्ति बना दिया। हैदर न तो लूटेरों का सरदार था और न एक स्वार्थी अवसरवादी सैनिक। साहसपूर्ण सैनिक प्रतिभा के साथ-साथ उसमें एक कुशल राजनीतिज्ञ की भी योग्यता थी हैदर की सैनिक प्रतिभा के बारे में बावरिंग ने लिखा है कि हैदर पैदाइशी सैनिक, एक अच्छा घुड़सवार तथा तलवार चलाने और बंदूक चलाने दोनों में निपुण था।

प्रारम्भ से ही कठिन परिश्रम की आदत वाला हैदर थकाने वाले कार्य बिना किसी कठिनाई के कर सकता था। सेना का नेतृत्व करते समय वह आत्म सुरक्षा के खतरे भी झेलता था, जिससे उसके साथियों को प्रोत्साहन मिलता था। बावरिंग ने हैदर के बारे में इसके आगे लिखा है कि ‘सम्भवतः उसकी सबसे उचकोटि की विशेषता उसकी वह तेजी थी, जिस तरह वह प्राय: अनेक अवसरों पर अपनी सेना लेकर आगे बढ़ा था और सफलता प्राप्त की थी।

यह कार्य वही कर सकता था, जो शक्तिशाली और साहसी दोनों हो। वह मराठों के विरुद्ध इसलिए सफलता प्राप्त नहीं कर सका, क्योंकि मराठों के आक्रमण आंधी-तूफान की तरह होते थे और हैदर को केवल रक्षात्मक युद्ध लड़ने के लिए विवश होना पड़ता था। हैदर अली एक कुशल प्रशासक भी था।

Second Anglo Mysore War – द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध

अंग्रेज सेनानायक मुनरो ने उसके प्रशासन की नियमितता तथा कुशलता की बड़ी प्रशंसा की है। इस प्रकार हैदरअली एक शासक, सैनिक और सेनापति की दृष्टि से पूर्ण योग्य था। हैदर के जीवन पर दृष्टिपात करने से यह स्पष है कि वह एक सफल व्यक्ति सिद्ध हुआ I हैदर अली सैनिक प्रतिभा के साथ-साथ विलक्षण कूटनीतिज्ञता से भी पूर्ण था।

उसने अपनी कूटनीति से अपने विरुद्ध संगठित शत्रुओं में फूट डाली और अंग्रेजों को अकेला पटक दिया। वह मनुष्यों का पारखी था, इसलिए वह योग्य व्यक्तियों की सेवाएं प्राप्त कर सका। संक्षेप में, हैदर अली में वे सब गुण विद्यमान थे, जो एक योग्य शासक और कुशल सेनापति में होने चाहिए।

टीपू सुल्तान एवं आंग्ल मैसूर युद्ध – टीपू का जन्म 1749 ई. में हुआ था। उसके पिता का नाम हैदर अली था। ऐसा माना जाता है कि एक मुस्लिम फकीर टीपू सुल्तान औलिया के आशीर्वाद से उसका जन्म हुआ था, अतः उसका नाम फतेहअली टीपू रखा गया। यह फतेह अली टीपू इतिहास में अपनी वीरता के कारण टीपू सुल्तान के नाम से प्रसिद्ध है। जब टीपू शासक बना, उस समय दक्षिण की राजनीतिक स्थिति अत्यन्त पेचीदा थी।

Second Anglo Mysore War – द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध

मैसूर विरोधी राज्य उसके लिए कभी भी कठिनाई खड़ी कर सकते थे। मराठे और निजाम दोनों मैसूर के कुछ क्षेत्रों पर अपना दावा कर रहे थे। अंग्रेज उनके दावे के प्रश्न को लेकर मैसूर के मामले में हस्तक्षेप कर सकते थे। ऐसी स्थिति में टीपू ने विस्तारवादी नीति अपनाकर अपने विरोधियों को ललकारने का निश्चय किया।

टीपू और मराठे (1785-87) – मंगलौर की सन्धि से द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध समाप्त हो चुका था। टीपू ने फ्रान्सीसियों की सहायता से निजाम को दबाने और मराठों की शक्ति को नष्ट करने का निश्चय किया। अतः 1785 के आरम्भ में उसने नारगुण्ड व कित्तुर पर अधिकार कर लिया। इन प्रदेशों पर मराठों का अधिकार था। नाना फड़नवीस ने अंग्रेजों से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया, परन्तु वह असफल रहा।

इसके बाद नाना ने निजाम को अपनी ओर मिलाकर टीपू के विरुद्ध युद्ध आरम्भ कर दिया। मराठों ने बादामी व गजेन्द्रगढ़ के किलों पर अधिकार कर लिया। फिर भी टीपू की प्रशिक्षित पैदल सेना मराठों की घुड़सवार सेना की अपेक्षा अधिक सफल सिद्ध हुई। इसी बीच अंग्रेजों ने अपनी कुछ सेना पूना की ओर भेजी तथा पूना में अंग्रेज रेजीडेण्ट की नियुक्ति भी की।

Second Anglo Mysore War – द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध

टीपू ने समझा कि मराठों ने उसके विरुद्ध अंग्रेजों का सहयोग प्राप्त कर लया है। इसलिए अंग्रेज सेना पूना की ओर रवाना हो रही है। अतः टीपू ने 1787 ई. में मराठों से सन्धि कर ली। इस सन्धि के अनुसार दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए प्रदेशों को लौटाने का वायदा किया तथा मराठों ने टीपू के लिये जाने वाले खिराज में कमी कर दी। टीपू ने मराठा युद्ध बन्दियों को मुक्त कर दिया। 

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