Sarvepalli Radhakrishnan – डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

Sarvepalli-Radhakrishnan
                                                       Sarvepalli Radhakrishnan

 

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन आधुनिक युग के महानतम दार्शनिक, शिक्षाविद्, वरिष्ठ लेखक, उत्कृष्ट वक्ता एवं कुशल प्रशासक थे। जीवनपर्यन्त उन्होंने देश की सेवा की। उनका व्यक्तित्व आकर्षक और सम्मोहक था। जब दक्षिण भारतीय पद्धति में मुरेठा बाँधकर राधाकृष्णन अँग्रेजी में भाषण करते तो सभी मंत्र मुग्ध होकर सुनते।

Sarvepalli Radhakrishnan – डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

जन्म एवं प्रारंभिक जीवन – डॉ. राधाकृष्णन का असली गांव ‘सर्वपल्ली’ था, परन्तु इनसे दो पीढ़ी पहले यह परिवार वहां से तिरुतणी गांव आ गया। सर्वपल्ली और तिरुपति भी इसके आसपास ही और मद्रास से 40-50 मील के फासले पर हैं। बाद में डा. राधाकृष्णन् मद्रास के ही निवासी बन गये। पिता श्री वीरस्वामी पुरोहिताई के साथ शिक्षक का कार्य भी करते थे। इसलिए यह कहना अयथार्थ नहीं कि उन्हें धर्म और शिक्षण कार्य विरासत में ही मिले। इनका जन्म 5 सितम्बर, 1888 को हुआ।

बारह वर्ष की आयु तक वह अपने गांव में ही रहे और पिता ने ही उन्हें आरम्भिक शिक्षा दी। उसके बाद एफ. ए. तक की शिक्षा वेल्लोर में कि और बाद में मद्रास के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़े। क्रिश्चियन कॉलेज काफी प्रसिद्ध था और वहाँ से कई अन्य प्रमुख व्यक्तियों ने भी शिक्षा प्राप्त की थी। मिशनरी संस्थाओं में शिक्षा प्राप्त करने के दो प्रभाव हुए एक तो अंग्रेज़ी भाषा पर अधिकार, दूसरे हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में सोचने का अवसर जिसने धीरे-धीरे आस्था का रूप धारण कर लिया।

ईसाई मिशनरी तो हिन्दू धर्म की बड़ी आलोचना करते थे, परन्तु राधाकृष्णन बचपन के स्वभाव के कारण एकान्त में इस विषय पर सोचते रहते थे और धीरे-धीरे उनके मन में हिन्दू धर्म के प्रति गर्व जागृत होता गया इन्हीं दिनों स्वामी विवेकानन्द के भाषणों ने उन्हें और भी प्रेरणा दी। उन्होंने एम. ए. दर्शन में किया। डॉ. राधाकृष्णन का परिवार इतना निर्धन न था, पर धनी भी न था खर्चा चलता था, परन्तु कॉलिजों की पढ़ाई चलाना कठिन था।

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इसके लिए युवा राधाकृष्णन को ट्यूशन पढ़ानी पढ़ती थीं। वह अपने से नीचे की कक्षाओं के विद्यार्थियों की ट्यूशन करते थे। पढ़ाई के बाद वह 1908 में मद्रास के प्रेसीडेन्सी कॉलिज में असिस्टेण्ट प्रोफेसर हो गये। परन्तु मद्रास राज्य की शिक्षा सेवा के लिए ट्रेण्ड होना आवश्यक था, इसलिए टीचर्स कॉलिज सैदापेट में प्रविष्ट हुए। राधाकृष्णन ने 1917 तक मद्रास के प्रेसीडेन्सी कॉलिज में अध्यापन का कार्य किया, परन्तु इस अवधि में उन्होंने अनेक भाषण और अनेक देशी-विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में विद्वत्तापूर्ण लेख लिखने आरंभ किये।

लोकप्रिय प्रोफेसर – इससे धीरे-धीरे इनकी ख्याति देश-विदेश में फैलने लगी। उन दिनों मद्रास के पास ही मैसूर रियासत में एक ऐसा व्यक्ति दीवान था, जो भारत सरकार के उच्चाधिकारियों से घनिष्ठ परिचय के अतिरिक्त विदेशों तक में अपनी योग्यता के लिए प्रसिद्ध था वह ये डॉ. विश्वेश्वरैया। जब उन्होंने मैसूर की चहुंमुखी उन्नति आरंभ की तो सारे भारत से चुन-चुन कर विद्वान् व्यक्ति भी इकट्ठे किये।

उनमें राधाकृष्णन भी थे। उन्होंने इन्हें मैसूर के महाराजा कॉलिज में दर्शन का प्रोफेसर नियुक्त किया। उन दिनों डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी, प्रो. शाह और प्रो. वाडिया भी वहीं थे, सब विद्वत्ता में एक दूसरे से बढ़-चढ़कर थे, परन्तु अपनी भाषण शैली, योग्यतापूर्ण लैक्चर और बहुत ही परिमार्जित अंग्रेज़ी के कारण राधाकृष्णन ही सबसे अधिक लोकप्रिय प्रोफेसर थे। मद्रास विश्वविद्यालय के विद्यार्थी भी इनका भाषण सुनने आया करते थे।

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डॉ. राधाकृष्णन ने पी. एच. डी. नहीं किया था, संभवतः इसका कारण निर्धनता ही रहा हो, परन्तु आगे चलकर तो विश्व भर के सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों ने उन्हें ‘डॉक्टर’ की मानद उपाधियों से लाद दिया। मैसूर के छात्रों ने एक और बात अनुभव की। राधाकृष्णन धोती, लम्बा बन्द गले का कोट और पगड़ी पहनते थे-विशेष बात यह है कि उनकी यह पोशाक श्वेत शुभ्र होती थी।

इस शुभ्र सौम्य परिधान में जब वह दर्शन की गुत्थियां धाराप्रवाह अंग्रेज़ी में सुलझाते, किसी रुक्के, पुर्जे या नोट्स की मदद न लेते तो ऐसा प्रतीत होता मानो कोई धर्मावतार ही बोल रहा हो। छात्र उन पर मोहित थे। यों तो विश्वभर के छात्रों ने डॉ. राधाकृष्णन को सम्मान और प्रेम दिया है, परन्तु संभवतः मैसूर के छात्रों ने उन्हें सबसे अधिक प्रेम दिया।

मैसूर में उन्हें केवल तीन वर्ष रहने का अवसर मिला, पर ऐसा प्रतीत होता था कि उन्होंने छात्रों का दिल जीत लिया हो वह जब वहां से कलकत्ता जाने लगे तो मैसूर की सड़कों पर एक अभूतपूर्व दृश्य उपस्थित हो गया। छात्रों ने एक गाड़ी में अपने प्रिय अध्यापक को बिठाया और उस गाड़ी को अपने हाथों से खींच कर रेलवे स्टेशन तक ताये। मैसूर में डॉ. विश्वेश्वरैया की तरह कलकत्ता में सर आशुतोष मुखर्जी की आंख से भी कोई योग्य व्यक्ति न बच पाता था।

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कलकत्ता उन दिनों विद्या, कला और व्यवसाय का केन्द्र था और भारत की महान् विभूतियों को यहां से आगे बढ़ने और फलने-फूलने में बड़ा योग मिला सर मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्राण थे। उन्होंने डॉ. सी. वी. रमन, डॉ. साहा आदि अनेक योग्यतम व्यक्तियों को वहां जुटाया जो आगे चलकर विश्वविख्यात विभूतियां बनीं, तो वह भला युवा दार्शनिक को कैसे न पहचानते?

उन्होंने डॉ. राधाकृष्णन को पोस्ट ग्रेजुएट विभाग में दर्शन का प्रोफेसर नियुक्त किया। उन दिनों कलकत्ता विश्वविद्यालय बहुत श्रेष्ठ विश्वविद्यालय माना जाता था। यहीं से ब्रिटिश सरकार भी किसी व्यक्ति की योग्यता का अनुमान करती थी। यहीं से राधाकृष्णन अन्तरराष्ट्रीय दर्शन कांग्रेस के प्रतिनिधि बन हार्वर्ड विश्वविद्यालय, अमेरिका गये और वहां अपने भाषणों की छाप सर्व साधारण पर डाली। वे बोलते तो ऐसा प्रतीत होता था मानो दूसरा विवेकानन्द अवतीर्ण हो गया हो।

वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति – कलकत्ता रहते हुए वह आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भी पूर्वीय दर्शन के प्रोफेसर थे। वह छह महीने इंगलैंड रहते और छः महीने कलकत्ता जब महामना मालवीय जी अस्वस्थ रहने लगे तो उन्हें वाराणसी के हिन्दू विश्वविद्यालय, जिसे उन्होंने बड़े प्रेम से स्थापित किया था, की चिन्ता रहने लगी। वह अन्ततः डॉ. राधाकृष्णन को वहां का कुलपति बनाने में समर्थ हो गये I

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परन्तु इस दार्शनिक प्राध्यापक ने इस कार्य के लिए वेतन लेना स्वीकार न किया, क्योंकि उनका कहना था कि यह राष्ट्रीय संस्था है। वह कलकत्ता, काशी और आसफोर्ड तीनों जगह का काम देखने लगे। परन्तु हिन्दू-विश्वविद्यालय का काम दिनोंदिन बढ़ रहा था, अतः उन्हें बहुत भारी मन से कलकत्ता विश्वविद्यालय से त्यागपत्र देना पड़ा। 1940 में उन्होंने कलकत्ता छोड़ा।

सन् 1942 के आन्दोलन में हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र भाग लेना चाहते थे। सरकार यह जानती थी और यह प्रान्तीय सरकार के परामर्श पर उसमें ताला डालना चाहती थी, परन्तु डॉ. राधाकृष्णन ने अपनी बुद्धिमत्ता से ऐसी स्थिति पैदा नहीं होने दी। उनका यह कार्य महान देशभक्ति से किसी प्रकार कम न था।

बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्तित्व – डॉ. राधाकृष्णन को प्रायः सभी ने ‘शिक्षक’ कहा है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि उन्होंने जीवन के चालीस वर्ष शिक्षा के क्षेत्र में बिताये, परन्तु वस्तुतः वह इतने प्रतिभाशाली व्यक्ति रहे कि उन्होंने शिक्षा, लेखन, व्यवस्था, राजनीति और शासन सभी क्षेत्रों में महान पटुता का परिचय दिया। यह ठीक है कि मूलरूप उनका शिक्षक का ही रहा हो, परन्तु लेखनी और दर्शन शास्त्र के व्याख्याता के रूप को शिक्षक से पृथक् नहीं किया जा सकता।

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वह शिक्षक से लेकर शिक्षण संस्थाओं के मूर्धन्य व्यवस्थापक-कुलपति तक रहे और सभी प्रकार के कार्यों को अपनी प्रतिभा से चमत्कृत करते रहे। एक प्रोफेसर के रूप में जहां उनका अपने विषय पर पूरा अधिकार था, वहां उनमें उसे प्रभावशाली भाषा में उपस्थित करने की भी महान् दक्षता थी। इसके लिए उन्होंने कितना तप किया होगा, इसे कौन भुलाने को तैयार होगा।

वह 12-12, 18-18 घंटे अध्ययन करते रहते थे। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने जो कार्य किया वह भुलाया नहीं जा सकता, चाहे वह विशुद्ध शिक्षक के रूप में या अथवा किसी समिति के सदस्य अथवा अध्यक्ष के रूप में, या फिर कुलपति के रूप में। शिक्षक के रूप में तो उनका योगदान अभूतपूर्व ही था, वह कलकत्ता में प्रोफेसर होते हुए आक्सफोर्ड में भी प्रोफेसर थे। संभवतः शायद ही कोई व्यक्ति एक ही समय दो देशों में एक साथ प्राध्यापक रहा होगा।

देश-विदेश में शिक्षा का इतना व्यापक अनुभव होने के कारण, देश स्वतंत्र होने पर शिक्षामंत्री मौलाना आजाद ने स्वाधीन भारत में उच्च शिक्षा की नवीन व्यवस्था के लिए एक आयोग नियुक्त किया, डॉ. राधाकृष्णन इस आयोग के अध्यक्ष थे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना इसी आयोग की सिफारिश पर हुई, आज इसके हाथ में देश में उच्च शिक्षा के प्रसार का पूरा प्रबन्ध है।

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यह ठीक है कि प्रतिदिन के परिवर्तित होते हुए भारतीय समाज में शिक्षा का नवीन स्वरूप अभी उभर कर पूर्णरूपेण प्रकट नहीं हुआ, तो भी डॉ. राधाकृष्णन द्वारा आयोग की रिपोर्ट उन्हें एक महान् शिक्षाशास्त्री सिद्ध करने के लिए काफी है। शिक्षा शास्त्री के रूप में उन्होंने कई राष्ट्रीय, एशियाई तथा अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों की अध्यक्षता भी की। काशी में पहला एशियाई शिक्षा सम्मेलन हुआ, उसके अध्यक्ष डॉ. राधाकृष्णन ही थे।

लखनऊ में दूसरा अधिवेशन 1937-38 में हुआ, उसके भी अध्यक्ष वही थे। उनके अध्यक्षीय भाषण से यह भली प्रकार प्रकट होता है कि वह शिक्षा मर्मज्ञ थे। इसी तरह पुराने राष्ट्रसंघ और वर्तमान संयुक्त राष्ट्रसंघ की यूनेस्को आदि कई समितियों से डॉ. राधाकृष्णन का बहुत निकट का सम्बन्ध रहा और इनके द्वारा उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय बौद्धिक सहयोग, विश्वशान्ति और विश्व बन्धुत्व के लिए भारी कार्य किया।

यूनेस्को का अधिवेशन उन्हीं के प्रयत्नों से नई दिल्ली में हुआ था, विज्ञान भवन-जहां आज भी अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन होते रहते हैं-तभी स्वरूप में आया। कहते हैं जब मास्को से राजदूत के रूप में डॉ. राधाकृष्णन विदा होने लगे तो रूसी लीहावरण के धनी लौह पुरुष मार्शल स्तालिन की आंखें भी सजल हो उठी थीं। इस बात का स्पष्ट-सा भाव यही है कि राजूदत के रूप में भी दार्शनिक शिक्षक अत्यन्त सफल रहा था I

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वस्तुतः उस समय मास्को में भारतीय राजदूत का कार्य इससे अधिक क्या हो सकता या कि रूस भारत को स्वतंत्र देश के रूप में उसके अस्तित्व को स्वीकार करे। यह ठीक है कि रूस तब तक सर्वाधिक शक्ति सम्पन्न देश न बना था और उसने अणुबम का विस्फोट भी न किया था। परन्तु मार्शल स्तालिन का दबदवा इतना था कि सारा विश्व उनसे कांपता था। ऐसा रूस स्वतंत्र हो जाने पर भी भारत को ब्रिटेन का दुमछल्ला ही मानता था I

ऐसी स्थिति में नेहरू जी द्वारा डॉ. राधाकृष्णन को मास्को में भारतीय राजदूत बनाना अत्यन्त दूरदर्शितापूर्ण कार्य था। क्योंकि दोनों देश यह अच्छी तरह जानते थे कि उनका एक दूसरे के लिए क्या महत्व है। रूसी नेता भली-भांति जानते थे कि डॉ. राधाकृष्णन स्वाधीनता आन्दोलन के मध्य न तो जेल गये हैं और न रूस के दृष्टिकोण से प्रगतिवादी ही हैं, परन्तु यह यह अच्छी तरह जानते थे कि यह व्यक्ति विशुद्ध भारतीय है और उसी के नाते विदेशों में भी ख्याति अर्जित कर चुका है।

इसलिए रूस में उनका सम्मान हुआ और वह उस समय दोनों देशों को निकट लाने की भूमिका बखूबी निभा पाये। यह भी मानना पड़ेगा कि यह दार्शनिक अपने ही किस्म का राजदूत था। एक तो वह उस समय भी आक्सफोर्ड में प्रोफेसर थे, दूसरे वहां उन्होंने कभी भी राजदूतों की मान्य परंपराओं का पालन नहीं किया। परन्तु राजदूत होने के नाते जिस विशिष्टता की आवश्यकता थी वह उनमें कूट-कूट कर भरी थी।

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मार्शल स्तालिन से मुलाकात – वह पर्दे की आड़ में खेल खेलने वाले राजनीतिज्ञ खिलाड़ी न थे, जब कि ऐसे नाटकीय कृत्य राजदूतों को सामने की पंक्ति में ला देते हैं, तो भी मास्को में विदेशी राजदूतों में और सरकारी क्षेत्र में उनके व्यक्तित्व का मानो जादू-सा छाया रहता था। यह सब उनकी विनम्रता और काम करने के सीधे-सादे ढंग के कारण था। विद्वत्ता में तो शायद ही कोई राजदूत उनके स्तर का रहा हो।

मास्को में भी उन्होंने अपना सादा शुभ्र वेश न छोड़ा। धोती पहनते रहे पर सादे कोट के स्थान पर फर का कोट वहां की कठोर सर्दी के कारण पहनने लगे थे। राजदूतों की पार्टियां, भोज और मेल-मुलाकातें प्रायः आधी रात तक चलती रहती हैं, परन्तु डॉ. राधाकृष्णन रात को दस बजे के बाद कभी भी बाहर न ठहरते। सोवियत सरकार सदा इस बात का ध्यान रखती। मार्शल स्तालिन ने उन्हें एक बार भेंट मुलाकात के लिए बुलाया तो उन्होंने भी इस बात का पूरा ध्यान रखा।

भेंट में राधाकृष्णन ने मार्शल के व्यक्तित्व पर सम्राट् अशोक की जीवन घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे देश में एक बड़ा प्रतापी राजा हुआ था, परन्तु एक बड़े भयंकर रक्तरंजित युद्ध के बाद उसके मन पर युद्ध, मारकाट और हिंसा के प्रति इतनी घृणा भर गई कि वह भिक्षु हो गया। आप भी ऐसे ही हिंसामय मार्ग से गुज़र कर सत्ता तक पहुंचे हैं, अब आपको यह मार्ग छोड़कर उसी सम्राट् वाला मार्ग अपनाना चाहिए।

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यह बात कितनी करारी चोट थी, परन्तु वीर पुरुष सहृदय और निर्भीक व्यक्ति का सम्मान करते हैं, स्तालिन मुस्कराये और बोले, “ऐसे चमत्कार बहुत कम होते हैं, पर मैं भी लगभग पांच साल धर्मशास्त्र के स्कूल में शिक्षा पाता रहा हूँ।”

इस भेंट के दौरान विशिस्की और पावलोव जैसे उच्च सोवियत अधिकारी भी थे। श्री राजेश्वर दयात डॉ. राधाकृष्णन के साथ थे। मार्शल स्तालिन जानते थे कि संकीर्ण कायदे में बंधा सामान्य व्यक्ति ऐसी बेलाग बात नहीं कर सकता। पूछने पर पावलोव ने बताया कि मार्शल स्तालिन डॉ. राधाकृष्णन को उदारमना देशभक्त मानते हैं। मार्शल को इनसे मिलकर कुछ सांत्वना-सी प्राप्त होती थी, एक शान्ति-सी मिलती थी।

1952 में जब डॉ. राधाकृष्णन रूस से विदा ले रहे थे, तो श्री विशिस्की ने उनके सम्मान में एक पार्टी दी थी। विशिस्की विदेशमंत्री थे और उनकी ओर से किसी राजदूत के सम्मान में दी जाने वाली यह पहली पार्टी थी। भोज का समय मध्यान रखा गया था, क्योंकि वह जानते थे कि डॉ. राधाकृष्णन रात्रि भोज में पूरा आनन्द न ले सकेंगे। क्रेमलिन के भव्य स्वागत हाल में आयोजित यह पार्टी निराली ही थी। पार्टी में श्री विशिस्की ने डॉ. राधाकृष्णन से कहा, “बॉस आपसे मिलना चाहते हैं।”

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मार्शत स्तालिन उस समय रोग शय्या पर थे और जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे। उनके मुख पर कुछ सूजन आ गई थी। डॉ. राधाकृष्णन ने उनका मुख अपने हाथों में लिया और अनुभव किया कि मुख सूजा हुआ है। डॉ. राधाकृष्णन ने उनकी पीठ थपथपा कर निरोग होने की कामना की और कुछ देर उनके गले में हाथ डाले रहे।

विदा होते समय स्तालिन बोले, “आप पहले व्यक्ति हैं जिसने मुझे मानव समझ कर मेरे प्रति व्यवहार किया है, दानव समझ कर नहीं। आप हमें छोड़कर जा रहे हैं, इसका मुझे दुःख है। में तो अब अधिक दिन जीवित न रहूंगा, पर मैं चाहता हूँ कि आप दीर्घजीवी हो,” यह कहते हुए उस शक्तिशाली अधिनायक की आंखें भी सजल हो गई।

वस्तुतः सोवियत रूस से भारत के मित्रतापूर्ण सम्बन्धों की शुरुआत जितनी अच्छी तरह डॉ. राधाकृष्णन के हाथों हुई, संभवतः दूसरा व्यक्ति इस दुष्कर कार्य में सफल न होता। परन्तु डॉ. राधाकृष्णन का मानवीय दृष्टिकोण, सरलता और विनम्रता ही इसमें सबसे अधिक सहायक हुए।

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भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति – संविधान निर्माण के बाद भारत का प्रथम निर्वाचन 1952 में हुआ। डॉ. राधाकृष्णन उस समय निर्विरोध भारत के उपराष्ट्रपति चुने गयेI उपराष्ट्रपति ही राज्यसभा का अध्यक्ष होता है। उपराष्ट्रपति होने के साथ ही वह दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति और साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष भी बने। पहले राज्यसभा को अनावश्यक माना गया था, परन्तु उसके प्रथम अध्यक्ष के नाते पहले दस वर्षों में ही उन्होंने इसकी उपयोगिता सिद्ध कर दी।

उन दिनों राज्यसभा में कांग्रेस का पूर्ण बहुमत था, इस पर भी उन्हें मनमानी करने का अवसर नहीं दिया गया। उन दिनों वहां डॉ. अम्बेदकर जैसे दिग्गज वक्ता और श्री भूपेश गुप्त जैसे तूफानी व्यक्ति भी थे, गरमागरम विवाद भी हुए, एक दूसरे पर सदस्य वाक-प्रहार भी करते परन्तु सब कुछ मर्यादा के भीतर विरोध में सदस्यों ने कभी भी वाक आउट नहीं किया ऐसा मालूम देता था कि मानो प्रो. राधाकृष्णन दर्शन के छात्रों की क्लास ले रहे हो।

एक सदस्य ने तो कहा भी था कि “सदस्य उनके विद्यार्थी से प्रतीत होते हैं।” यह राजनीतिक अखाड़ा था, जिसमें सदा उखाड़-छाड़ होती रहती थी। परन्तु यहां भी ऐसा प्रतीत होता था कि राजनीति नैतिकता से दबी हुई थी इसलिए राज्यसभा में भी उनके समय में कोई उच्छृंखलतापूर्ण कृत्य नहीं हुआ। राज्यसभा के अध्यक्ष के नाते राजनीति से उनका सीधा सम्बन्ध था, तो भी उन्होंने एक दार्शनिक के रूप में उसमें नया पुट दिया और राजनीतिक समस्याओं पर जो भी व्याख्या और मत व्यक्त किया वह उनके अनुरूप नवीनता लिये हुए होता था।

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इस काल में वह कई बार विदेशों की यात्रा पर भी गये। वह विदेश तो अनेक बार जा चुके थे, पर अब तो वह दार्शनिक-राजनीतिज्ञ के रूप में विश्व बन्धुत्व और भारत की तटस्थ नीति के व्याख्याता के रूप में जाते थे। राजनीतिज्ञ होते हुए भी वह सांस्कृतिक दूत का काम करते रहे और अपनी महानता से विश्व की त्रस्त मानवता को आश्वासन देते रहे। उन्होंने इस दौरान विदेशों में अनेक भाषणों द्वारा नेहरू जी की नीतियों पर विशद् प्रकाश डाला।

भारत के दूसरे राष्ट्रपति – यूं तो 1961 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की बीमारी और उनकी मास्को यात्रा के समय डॉ. राधाकृष्णन राष्ट्रपति पद पर रह चुके थे परन्तु उन्होंने उस समय न राष्ट्रपति का वेतन लिया और न अपना पुराना आवास बदला। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के बाद वह राष्ट्रपति बने तो सारे संसार में इस नियुक्ति का स्वागत किया गया। विश्व भर के शान्तिप्रिय व्यक्तियों ने इस नियुक्ति की प्रशंसा की और प्रसन्नता व्यक्त की।

उन्होंने अपने आपको सर्वथा राष्ट्रपति पद के उपयुक्त सिद्ध किया। उनका त्याग और सादगी अपनी ही मिसाल बन गये। उनका एक-एक कार्य उन्हें ‘भारत रत्न’ सिद्ध कर रहा था। राष्ट्रपति बनने पर उन्होंने दस हज़ार रुपया मासिक वेतन के स्थान पर केवल ढाई हज़ार रुपया लेना स्वीकार किया।

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साहित्य – डॉ. राधाकृष्णन का लेखक का स्वरूप भी बड़े महत्त्व का है। 1908 से 1918 तक यह कार्य निर्वाध रूप से चलता रहा। उन्होंने धर्म, दर्शन तथा पश्चिम तथा पूर्व के धर्म से सम्बन्धित अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की। उनके द्वारा संपादित और लिखित ग्रन्थों की संख्या 150 से भी अधिक होती है। गीता, धम्मपद, ब्रह्मसूत्र आदि के साथ गांधी, भारत और चीन, आत्मकथा, शिक्षा, राजनीति तथा शान्ति और युद्ध के सम्बन्ध में भी उन्होंने लिखा।

उनकी सबसे पहली पुस्तक ‘दी फिलासफी ऑफ रवीन्द्र नाथ टैगोर’ थी, जिसकी महाकवि ने स्वयं प्रशंसा की थी और कहा था कि ऐसा दीखता है कि मेरा दर्शन संभवतः मुझ से भी अधिक आप अच्छी तरह समझते हैं। उनकी पुस्तक ‘इण्डियन फिलासफी’ दो भागों में है और इससे उन्हें विश्वख्याति मिली, परन्तु उनकी प्रत्येक पुस्तक उसी की तरह ही महत्त्वपूर्ण है।

डॉ. राधाकृष्णन की विशेषता यह थी कि विषय गंभीर होते हुए भी उनकी लेखनी द्वारा बोधगम्य बन जाता था। अंग्रेजी भाषा पर उनका कितना अधिकार है, इस सम्बन्ध में अंग्रेज़ों को भी अनेक बार शब्दकोश का सहारा लेना पड़ता था । उनकी बोलने और लिखने की शैली, ओजपूर्ण और जादू-सी मोहक थी। ग्रंथों की क्या बात, उनके छोटे से छोटे भाषण भी उनकी विद्वता के परिचायक हैं। भारत को ऐसे व्यक्ति पर निस्संदेह गर्व है जिसका समस्त विश्व आदर करता है।

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स्वर्गवास – राष्ट्रपति भवन छोड़ने के बाद राधाकृष्णन ने एक संन्यासी दार्शनिक का जीवन बिताया। अपना समय चिन्तन और भजन में लगाने लगे। वे एक निष्काम कर्मयोगी थे जो दुःख-सुख, मान-सम्मान से ऊपर उठ चुके थे। उनका स्वास्थ्य गिरने लगा। 87 वर्ष की अवस्था में 16. अप्रैल, 1975 ई. में उनका निधन हो गया। 17 अप्रैल, 1975 को हुआ तो सारा देश शोकाकुल हो उठा।

Shetkaryancha Asud

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