Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

Sarojini-Naidu-InformationSarojini Naidu Information

जन्म – भारत कोकिला’ सरोजिनी नायडू का नाम लेते ही हमारे मस्तिष्क में जो व्यक्तित्व उभरता है, वह अपने में अनेक गुणों को समेटे है। उनका जन्म 13 फरवरी, 1879 को हैदराबाद में हुआ था। उनके पिता भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. अघोरनाथ चट्टोपाध्याय थे और माता का नाम वरदा सुंदरी था।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

प्रारंभिक जीवन – डॉ. अघोरनाथ स्वयं एक दृढ़ इच्छा शक्तिवाले व्यक्ति थे। उनका बचपन काफी अभाव और संघर्षों में बीता था। फिर भी विपरीत परिस्थितियों में न तो उन्होंने धैर्य का साथ ही छोड़ा और न ही परिस्थितियों से हार ही मानी।

जैसे-तैसे किताबें जुटाकर, सड़क के किनारे लगी लाइटों के नीचे रात-रात भर पढ़कर, कभी आधा पेट खाकर तो कभी केवल एक लोटा पानी पर संतोष करके उन्होंने पूर्वी बंगाल के एक छोटे से गाँव से विदेश में अध्ययन की यात्रा अपने बूते पर तय की।

उन्होंने एडिनबर्ग विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में ‘डॉक्टर ऑफ साइंस’ की उपाधि प्राप्त की। वे अंग्रेजी भाषा के विद्वान् होने के साथ-साथ कई अन्य विदेशी भाषाओं के भी अच्छे जानकार थे, जिनमें प्रमुख थीं- जर्मन, फ्रेंच, हिब्रू व रूसी विदेश से वापस आने पर डॉ. अघोरनाथ हैदराबाद के निजाम के निमंत्रण पर उनसे मिलने गए।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

हैदराबाद के निजाम ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उनके समक्ष प्रस्ताव रखा कि हैदराबाद में भी अंग्रेजी माध्यम के एक उच्चस्तरीय कॉलेज की स्थापना की जाए, जिससे देशवासी लाभान्वित हो सकें। डॉ. अघोरनाथ को यह प्रस्ताव इतना अधिक पसंद आया कि उन्होंने उसे तुरंत स्वीकार कर लिया।

शीघ्र ही इस कॉलेज की कल्पना को मूर्त रूप मिला। बाद में यही कॉलेज ‘निजाम कॉलेज’ के नाम से विख्यात हुआ। डॉ. अघोरनाथ स्वयं इस कॉलेज के प्रथम प्राचार्य नियुक्त हुए। सरोजिनी की माँ वरदा सुंदरी धार्मिक एवं सात्त्विक विचार की अत्यंत कोमल हृदया महिला थीं। उन्हें प्रकृति से बेहद प्रेम था।

डॉ. अघोरनाथ इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि किसी भी विचारधारा के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करने से ज्यादा प्रभावशाली स्वयं अपने व्यवहार द्वारा उसका उदाहरण प्रस्तुत करना होता है। इसलिए उन्होंने अपनी प्रगतिशील विचारधारा का उद्गम स्थल सबसे पहले अपने घर को बनाया। उन्होंने सरोजिनी को अधिक से-अधिक पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।

Click on below links to read more | अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

More Hindi Blogs

History in Hindi Articles

Kamala Devi Chattopadhyay – कमला देवी चट्टोपाध्याय

शिक्षा – उनकी इच्छा थी कि सरोजिनी गणितज्ञ अथवा वैज्ञानिक बने, परंतु जब एक बार उन्होंने सरोजिनी की बीजगणित की कॉपी में एक कविता लिखी देखी तो वह अपनी बेटी का रुझान भाँप गए। इसके बाद बजाय उसपर अपनी इच्छा लादने के, उन्होंने सरोजिनी को अपनी रुचि के अनुसार ही आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

एक बार उन्होंने अपनी डायरी में बड़ी गंभीरतापूर्वक लिखा, ‘ओह! एक वर्ष और बीत गया। मैंने इस संसार को बदलने के लिए क्या-क्या किया, पर यह तो वैसे-का-वैसा ही है। घर में जब इस बात का पता चला तो सभी लोग कई दिनों तक हँसते रहे। वह नन्ही सी बच्ची इस संसार में किस बदलाव की कामना रखती थी, यह रहस्य भविष्य के आँचल में ही छिपा हुआ था।

डॉ. अघोरनाथ ने सरोजिनी में छिपी हुई प्रतिभा को पहचान लिया था। उन्होंने उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुविधा देने के साथ-साथ एक और चीज दी थी और वह थी- अनुशासन। परंतु उन्होंने उसका स्वरूप ऐसा रखा कि वह सख्त अथवा बोझिल लगने की बजाय सुविधापूर्ण और सरल लगता था। जब उन्होंने सरोजिनी को दिन-रात कविताओं में ही डूबे देखा तो उन्हें उसकी पढ़ाई को लेकर चिंता होने लगी।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

उन्होंने सरोजिनी को प्यार से समझाते हुए कहा कि उसे अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान देना चाहिए, और दोनों में संतुलन बनाकर चलना चाहिए। सरोजिनी ने अपने पिता की बात मान ली और अपनी पढ़ाई में गंभीरतापूर्वक जुट गईं। परिणाम सामने था- बारह वर्ष की आयु में उन्होंने मद्रास यूनिवर्सिटी से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान से पास की।

कविताओं के प्रति समर्पण – इसके बाद वे फिर अपने कविता प्रेम में जुट गई और लगातार लिखने लगीं। तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने तेरह सौ पंक्तियों की एक लंबी कविता लिखी-‘ए लेडी ऑफ द लेक’। इस कविता को लिखने में वे लगातार छह दिनों तक ऐसी उन्माद की अवस्था में जुटी रहीं कि उनकी तबीयत बुरी तरह से खराब हो गई।

डॉक्टर की सख्त हिदायत थी कि वह पूरी तरह से आराम करें और बिस्तर से नीचे पाँव तक न रखें। परंतु सरोजिनी तो अपनी ही धुन में रहनेवाली थीं। उन्होंने उसी अवस्था में अपनी उस लंबी कविता की काट-छाँट एवं साज-सँवार कर उसे पूरा किया। जब वे ठीक होकर बिस्तर से उठीं तो उनके चेहरे पर अपने कार्य की पूर्णता से उपजा संतोष दमक रहा था। ” उनके माता-पिता अपनी संतान की इस प्रतिभा पर फूले नहीं समा रहे थे।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

डॉ. अघोरनाथ ने सरोजिनी की तब तक की सभी काव्य रचनाओं को ‘द पोयम्स’ नाम से प्रकाशित करवा दिया। इसके बाद सरोजिनी ने उत्साहित होकर दो हजार पंक्तियों का एक फारसी नाटक ‘मेहर मुनीर’ लिखा। उनके पिता ने इस नाटक को भी प्रकाशित करवा दिया। उसकी कुछ प्रतियाँ उन्होंने अपने मित्रों व परिचितों में बाँट दीं और एक प्रति हैदराबाद के निजाम को भी भेंट की।

निजाम ने उस पुस्तक को बड़ी रुचि लेकर पढ़ा और उस समय तो उनके आश्चर्य का ठिकाना ही न रहा, जब उन्हें पता चला कि इस नाटक की लेखिका एक नन्ही सी बच्ची है। उन्होंने उसे एक अनोखा पुरस्कार देने की ठानी और सरोजिनी को आगे की पढ़ाई विदेश जाकर करने के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की।

पढ़ने के लिए विदेश गयी – उस समय सरोजिनी की आयु अठारह वर्ष से कम थी, इस कारण उन्हें कैंब्रिज में प्रवेश नहीं मिल पाया। तब उनके अध्ययन की व्यवस्था लंदन के किंग्स कॉलेज में की गई। यहाँ भी सरोजिनी ने अपने पिता की सीख को याद रखा और अपने साहित्य प्रेम व पढ़ाई में संतुलन बनाए रखा।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

जल्दी ही उनकी पहचान अपनी कक्षा के होशियार विद्यार्थियों में होने लगी। दूसरी ओर उनका साहित्य-सृजन भी जोरों पर था, बल्कि यदि यों कहा जाए तो अधिक उचित होगा कि यह समय उनकी साहित्यिक गतिविधियों के लिए निर्णायक सिद्ध हुआ। लंदन में सरोजिनी जिस जगह ठहरी थीं, सौभाग्य से वहाँ प्राय: बड़े साहित्यकारों व आलोचकों का आना-जाना लगा रहता था।

साहित्यिक गुरु – शीघ्र ही उनका परिचय अंग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्यकार व समीक्षक एड्मंड गौसे व ऑर्थर साइमंस से हुआ। यह भेंटवार्ता उनके लिए बड़ी लाभप्रद सिद्ध हुई थी, जिसने उनके लेखन को एक नई दिशा दी। अपने एक सहपाठी के कहने पर सरोजिनी ने अपनी कुछ कविताएँ एड्मंड गौसे को दिखाई।

गौसे ने उन्हें स्पष्ट रूप से कह दिया कि उनके लेखन में रचना कौशल, व्याकरण की दृष्टि से शुद्धता व भावनात्मक सुरुचि तो है, किंतु उनमें उनकी भारतीयता की कोई झलक नहीं मिलती। उनकी अनुभूति और बिंब पश्चिमी लेखकों से प्रभावित है। यह सुनकर सरोजिनी को दुःख तो बहुत हुआ, परंतु बात थी तो शत-प्रतिशत सत्य अपनी चौदह वर्ष की अवस्था तक उन्होंने अंग्रेजी के सभी बड़े लेखकों को पढ़ डाला था।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

यहाँ तक कि उनके लेखन पर शेली का प्रभाव साफ-साफ दिखता था। उन्होंने गौसे के इन शब्दों को पूर्णतः आत्मसात् कर लिया कि तुम जैसी प्रतिभावान् हिंदुस्तानी लड़की से मैं यह अपेक्षा करूँगा कि पश्चिमी भाषा और काव्य में दक्षता प्राप्त करके भी अपने भारतीय वातावरण और सभ्यता व संस्कृति को अपने काव्य में प्रतिबिंबित करो।

तुम्हारे काव्य में हम भारत की आत्मा के दर्शन करना चाहते हैं, बाद में उन्हीं गौसे को उन्होंने अपने साहित्यिक गुरु का दर्जा दिया, क्योंकि उन्हीं की प्रेरणा से अभिभूत हो सरोजिनी ने आगे जो काव्य-रचना की, उसमें सचमुच भारत की आत्मा की झलक उठी।

विवाह – यहीं उनकी भेंट डॉ. गोविंद राजुलू नायडू से हुई। वे दक्षिण भारतीय थे। उनका स्वभाव बड़ा ही सरल था। कुछ ही समय के परिचय ने दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति कोमल भावनाओं को जन्म दिया। इसके कुछ ही समय बाद अचानक ही सरोजिनी का स्वास्थ्य खराब रहने लगा।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

पहले तो उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया, परंतु जब स्थिति अधिक बिगड़ने लगी तो मजबूरन उन्हें अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़कर स्वदेश लौटना पड़ा। सन् 1898 में तीन वर्ष के बाद यहाँ अपने परिवार जनों के बीच उचित देखभाल से धीरे-धीरे उनकी तबीयत में सुधार आने लगा। शीघ्र ही वे पूरी तरह से ठीक हो गईं; परंतु उनके स्वास्थ्य की डाँवाँडोल स्थिति आजीवन बनी रही।

स्वदेश वापसी के लगभग तीन महीने बाद ही उन्होंने डॉ. गोविंद राजुलू नायडू से अंतरजातीय प्रेम विवाह कर लिया। उस समय के रूढ़िवादी परिवेश को देखते हुए यह एक क्रांतिकारी कदम था। इसका बड़े पैमाने पर विरोध हुआ। डॉ. अघोरनाथ ने किसी की बात पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया और खुशी-खुशी सरोजिनी का विवाह डॉ. गोविंद नायडू के साथ करा दिया।

डॉ. गोविंद नायडू विधुर थे और आयु में भी सरोजिनी से काफी बड़े थे, परंतु उनका व्यक्तित्व इन सब बातों से बहुत ऊपर था। वे व्यवहार के जितने सरल थे, बुद्धि से उतने ही विद्वान्। सरोजिनी के पिता की ही भाँति डॉ. नायडू भी स्त्री समर्थक विचारों में आस्था रखते थे।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

यह भी एक सुखद संयोग ही था कि वे भारत में हैदराबाद के निजाम की शाही सेना की चिकित्सा सेवा के अध्यक्ष पद पर थे। बाद में वे पदोन्नत होकर मेजर बना दिए गए। समय बीतने के साथ-साथ यह बात सिद्ध होती गई कि डॉ. नायडू को अपने जीवन साथी के रूप में चुनने का सरोजिनी का निर्णय बिलकुल उचित था।

इसे सरोजिनी नायडू के गुणों की श्रेष्ठता कहें या भाग्य की उदारता कि एक ओर जहाँ उन्हें पिता के रूप में एक आदर्श पुरुष मिले, वहीं पति के रूप में भी उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति को पाया था, जो आगे के जीवन में पग-पग पर उनका प्रेरक बना। विवाह के बाद भी उनकी काव्य साधना निरंतर जारी रही। सन् 1903 तक वे तीन प्यारे-प्यारे बच्चों की माँ बन चुकी थीं।

बाढ़ पीड़ितों मदद – उनके स्वभाव की एक विशेषता यह थी कि वे सभी प्रकार के व्यक्तियों या परिवेश में बड़ी आसानी से घुल-मिल जाती थीं उनकी यही विशेषता उनका एक बड़ा गुण उस समय साबित हुई, जब सन् 1908 में मूसा नदी की भयंकर बाढ़ के कारण हैदराबाद का जनजीवन बुरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया। स्थानीय लोग भीषण संकटों से जूझ रहे थे।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

ऐसे समय में लेडी हैदरी के साथ सरोजिनी नायडू ने बड़े पैमाने पर कार्य किया। बाढ़ पीड़ितों के राहत कार्यों के लिए स्वयंसेवकों को संगठित करने का काम करते हुए उन्होंने संगठन की दिशा में पहला बड़ा प्रयास किया। अपना यह स्वरूप स्वयं सरोजिनी के लिए भी नया था।

अभी तक का उनका जीवन परिवार, बच्चों और कविता को ही पूर्णतः समर्पित रहा था, परंतु बाढ़ को विनाश-लीला को साक्षात् देखने के बाद उनके देखने-विचारने का ढंग ही बदल गया। उन्होंने इस शाश्वत् सत्य को स्वीकार किया कि प्रकृति केवल दृष्टि-सौंदर्य को सहलाती ही नहीं है, वरन् सिहराती भी है।

यहाँ से उनका जीवन पारिवारिक न रहकर सार्वजनिक हो गया। अब से जन-जन का दुःख-दर्द उनका अपना दुःख-दर्द था। जहाँ भी उनके सहयोग की आवश्यकता होती, वे तुरंत उपस्थित हो जातीं।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

इसी कर्तव्यपरायणता और सेवाभाव को उस समय फिर एक नया मोड़ मिला, जब उन्होंने इस बात को अनुभव किया कि भारत जैसे विशाल देश में, जहाँ सभी धर्म और संप्रदाय के लोग जिस प्रकार रहते आए हैं, जिस सद्भाव की हमेशा मिसाल दी जाती थी, आज उसी सांप्रदायिक सद्भाव को विदेशी शासकों की नजर लग गई है और उनकी कूटनीति इसे डसने का काम करने लगी है।

सरोजिनी के लिए ऐसा होते देखना तो दूर की बात थी, वह ऐसी कल्पना तक नहीं कर सकती थीं। हैदराबाद, जहाँ उन्होंने जन्म लिया था और पली-बढ़ी थीं, वहाँ रहकर उन्हें कभी इस बात का एहसास भी नहीं हुआ था कि धार्मिक विविधता मनुष्यता से बड़ी हो सकती है। बस, फिर क्या था? वे जगह-जगह अपने भाषणों द्वारा लोगों के बीच आपसी मेल-जोल का माहौल बनाने में जुट गईं।

राजनीतिक जीवन का आरंभ – यहीं से उनके राजनीतिक जीवन का आरंभ माना जाता है। इसी तथ्य पर मुहर लगाने का काम किया उनके उस भाषण ने, जो उन्होंने सन् 1912 में लखनऊ में आयोजित मुसलिम लीग के एक सम्मेलन में दिया था। उस ओजस्वी भाषण ने उनके स्वरूप को हिंदू-मुसलिम एकता के दूत के रूप में प्रस्तुत किया। इस सम्मेलन के बाद वे श्री परांजपे के साथ पूना गई।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

वहाँ उनकी भेंट श्री गोपाल कृष्ण गोखले से हुई। वे आजादी के लिए संघर्षरत थे। उनके साथ समान विचारधारावाले कुछ बुद्धिजीवी जुटे हुए थे, जिनमें से कुछ प्रमुख नाम थे-महादेव गोविंद रानाडे, लोकमान्य तिलक और स्वयं श्री परांजपे। उन्होंने एक संस्था की स्थापना भी की, जिसका नाम था-‘सवेंट ऑफ इंडिया सोसाइटी’।

सन् 1917 में डॉ. एनी बेसेंट कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं। इस समय सरोजिनी भी देश में महिला जागरण का सूत्रपात कर रही थीं। डॉ. बेसेंट के कांग्रेस अध्यक्ष बनने से प्रेरित होकर यह प्रस्ताव पारित हुआ कि स्त्रियों को भी पुरुषों के समान मताधिकार समान शर्तों पर प्रदान किया जाए।

महिलाओ के अधिकार लिए लड़ी – 18 दिसंबर, 1917 को सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में उस समय की प्रमुख अठारह महिलाओं का एक प्रतिनिधि मंडल तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड चेम्सफोर्ड और भारत मंत्री श्री मटिग्यू से मिला और अपनी यह माँग उनके सामने रखी; परंतु सन् 1919 में मांटेग्यू सुधार के घोषणा पत्र में स्त्रियों को किसी भी प्रकार का अधिकार देना स्वीकार नहीं किया गया था।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

सरोजिनी नायडू ने अपनी इस विफलता पर हार नहीं मानी और दुगुने वेग से अपने लक्ष्य को पूरा करने में जुट गईं। बड़े पैमाने पर मुंबई में इस माँग के समर्थन में प्रदर्शन हुए। भारत से लेकर इंग्लैंड तक कोई ऐसा संबंधित उच्चाधिकारी नहीं था, जिससे इस बारे में संपर्क न किया गया हो। अंततः उनकी लगातार कोशिशों को सफलता मिल ही गई।

सन् 1921 में मद्रास विधानसभा में, 1923 में संयुक्त प्रांत, 1925 में बंगाल, 1926 में पंजाब, 1927 में मध्य प्रांत व 1929 में बिहार विधानसभा के नवनिर्वाचित सदस्यों ने स्त्रियों के मताधिकार को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार भारत के इतिहास में पहली बार स्त्रियों को राजनीति में सक्रिय हिस्सा लेने का मताधिकार प्राप्त हुआ।

सरोजिनी नायडू को अपनी इस सफलता पर संतोष तो था, परंतु इस बात का थोड़ा दुःख भी था कि उन्हें जीवन-पथ पर सफलता प्राप्त करते देख खुश होनेवाले उनके पिता डॉ. अघोरनाथ और सक्रिय राजनीतिक जीवन के लिए प्रेरित करने वाले उनके राजनीतिक गुरु श्री गोपाल कृष्ण गोखले ही उनसे विदा ले चुके थे।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

अब केवल उनके पति ही थे, जो दूर होने पर भी निरंतर सरोजिनी के प्रेरणा स्रोत बने हुए थे। अपनी राजनीतिक व्यस्तता के चलते सरोजिनी घर-परिवार से दूर हो गई थीं, परंतु उन्होंने कभी भी इसके लिए उन्हें आरोपित करने के बजाय सदैव अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने को ही प्रेरित किया।

स्वतंत्रता संग्राम से जुडी जुडी जुडी जुडी – सन् 1917 से लेकर 1947 तक के वर्षों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी शायद ही कोई ऐसी घटना हो, जिसमें सरोजिनी नायडू प्रमुख रूप से उपस्थित न रही हों। उनकी निर्भीक ओजस्वी वाणी और सिंह गर्जना को सुनकर यह विश्वास करना कठिन हो जाता था कि यह महिला कोमल कविताएँ भी लिखती है।

इस दौरान उनका स्वास्थ्य लगातार खराब रहता था। कई बार स्थिति गंभीर भी हो जाती थी। वे हृदय रोग से तो पीड़ित थीं ही, साथ ही कई अन्य रोग भी लगे ही रहते। परंतु उनके बाहरी व्यक्तित्व को देखकर शायद ही कोई इस सत्य पर विश्वास करता। बड़ी से बड़ी कठिनाई और जटिल परिस्थिति में भी वे उन्मुक्त रूप से खिलखिला लेती थीं। अपने आदरपूर्ण व्यक्तित्वों को भी अपने हास्य बाणों से वे बख्शती नहीं थीं।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

गांधीजी उन्हें ‘मिकी माउस’ लगते तो सरदार पटेल ‘बारदोली के बैल’। आचार्य कृपलानी को वे ‘नर-कंकाल’ कहकर पुकारती। एक बार कांग्रेस के शीतकालीन अधिवेशन में कुछ बड़े नेता सर्दी से बचने के लिए मुँह-सिर ढके बैठे हुए थे। एक पत्रकार ने जब सरोजिनी से पूछा कि वहाँ बैठी महिलाएँ कौन हैं, तो उन्होंने गंभीरतापूर्वक जवाब दिया, “वे सभी गांधीजी की विधवाएँ हैं।”

सन् 1918 में स्त्री मताधिकार सम्मेलन, जो कि जिनेवा में आयोजित हुआ था, में श्रीमती नायडू की प्रमुख भागीदारी थी। सन् 1919 में निषिद्ध साहित्य का वितरण करके उन्होंने बापू के असहयोग आंदोलन में उनका साथ दिया। सन् 1919 में उन्हें ‘होमरूल लीग’ के सदस्य के रूप में लंदन भेजा गया।

इस समय हृदय रोग के कारण उनका स्वास्थ्य बहुत बुरी तरह से खराब था, परंतु वहाँ किंग्जवे हॉल में जलियाँवाला बाग हत्याकांड पर उन्होंने जो भाषण दिया, उसने हॉल में बैठे लंदनवासियों को न केवल बुरी तरह से सिहराया, बल्कि उनकी बात का समर्थन करने पर भी मजबूर कर दिया।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

प्रथम महिला राजयपाल – कोटि-कोटि भारतवासियों का त्याग और संघर्ष रंग लाया और देश ने लंबे पराधीनता काल के बाद 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता का प्रभात देखा। पं. जवाहर लाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। डॉ. सरोजिनी नायडू से उन्होंने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल पद को सँभालने का अनुरोध किया, जिसे गांधीजी के कहने पर उन्होंने स्वीकार कर लिया। उनका शपथ ग्रहण समारोह अपने आप में अनूठा था।

उस समारोह में सिख, मुसलिम, जैन, बौद्ध, हिंदू तथा ईसाई धर्मों की प्रार्थनाएँ की गई। उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा दिया। ऐसे में एक गहरी पीड़ा देनेवाले विभाजन के दुःख के साथ आजादी का सपना पूरा होना उन्हें अधूरा जान पड़ा था। इसलिए अपने राज्यपाल के रूप में उन्होंने अनेक ऐसे कार्य किए, जिनसे यह दुःख कम हो सके।

मृत्यु – अपना शेष जीवन उन्होंने गांधीजी के आदर्शों के अनुसार ही जीया उनका स्वास्थ्य दिन-पर-दिन बिगड़ता जा रहा था। 13 फरवरी, 1949 को दिल्ली में राष्ट्रपति भवन जाते समय कार में उनका सिर कार की निचली छत से टकरा गया। उस समय असहनीय पीड़ा को सहते हुए उन्होंने अपने सभी कार्य निर्विघ्न रूप से पूरे किए और 15 फरवरी को लखनऊ लौट गई।

Sarojini Naidu Information – सरोजिनी नायडू

उनके सिर का दर्द गंभीर रूप ले चुका था। अंततः उन्हें अस्पताल में भरती करा दिया गया।1 मार्च को उन्हें बिगड़ती हालत के बीच ही रक्त चढ़ाना पड़ा। उसके बाद वे सो गईं। देर रात जागने पर उन्होंने अपने पास बैठी नर्स से कुछ गाने के लिए कहा। जब वह नर्स उनकी अंतिम इच्छा पूरी करके चुप हुई तो उन्होंने कहा, “मैं चाहती हूँ कि अब कोई मुझसे बात न करे।” और इसके बाद भारत कोकिला हमेशा-हमेशा के लिए शांत हो गई।

Chhava

Leave a Comment