Sardar Vallabhbhai Patel – सरदार वल्लभभाई पटेल

Sardar-Vallabhbhai-PatelSardar Vallabhbhai Patel

देश की स्वाधीनता, उसकी सुरक्षा तथा निर्माण के लिए कार्य करने वालों मे सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम अग्रणी है। वस्तुतः देश के स्वातंत्र्य-संग्राम के यह महान् सेनानी थे। वह स्वभाव से ही निर्भय, विर तथा दृढ निश्चयी थे। सकल्प में वह चट्टान, मन की गहराई में सागर और निर्भीकता एवं साहस में सिंह की भांति थे। वह बोलते कम तथा कार्य अधिक करते थे।

Sardar Vallabhbhai Patel – सरदार वल्लभभाई पटेल

देश की स्वतंत्रता के साथ सबसे विकट समस्या आई थी अनेक छोटी-छोटी देशी रियासती के विलय की। मंदियों से चले आ रहे एन सामंतों के शीश ने राजमुकुट उतार कर भारत माता को पढ़ाना कोई साधारण कार्य नहीं था। दम दुष्कर कार्य को जिम लौह पुरुष ने कर दिखाया, वे थे सरदार वल्लभभाई पटेल

जन्म – गुजरात के रोड़ा जिले के करमसद नामक गांव के एक कृषक परिवार में 31 अक्तूबर सन् 1875 ई० को इस महान नेता का जन्म हुआ था। उनके पिता झावेरभाई ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजी के विरुद्ध संघर्ष में भाग लिया था। उन्होंने अपने यौवन को मातृभूमि की सेवा में अर्पित कर दिया था।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना में भर्ती होकर उन्होने अग्रेजों के साथ युद्ध किया था। पटेल को माता लाहबाई 80 वर्ष की हो जाने पर भी प्रतिदिन चर्या कातती थी। माता-पिता की धार्मिक, साहसी और संयमी वृत्तियों का प्रभाव बालक पटेल के चरित्र पर भी पड़ा। डरना तो उन्होंने सीया ही नहीं था। भय तो जैसे उन्हें छू तक नहीं गया था। साथ ही सहनशीलता भी इतनी थी कि देखने वाला दांतो तले उगली दबा ले।

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शिक्षा – शिक्षा के लिए वल्लभभाई को करमसद, पटेलाद, नडियाद, बडौदा और न जाने यहां-कहां जाना पड़ा। पर जहां भी गये सरदार बनकर रहे । उम्र स्वभाव होने के कारण आपकी शिक्षकों से किसी न किसी बात पर अनबन हो जाती थी। उनके भावी जीवन के शुभ लक्षण उनके छात्र जीवन में ही दृष्टिगोचर होने लगे थे । उनको स्पष्टवादिता, निर्भीकता एवं दृढता का परिचय अनेक प्रसंगों से मिलने लगा था।

परंतु उस समय कौन कह सकता था कि यह भारत के बदलने वाले इतिहास का पूर्वाभास है। उनके हैडमास्टर सौभाग्य से उस समय तक जीवित रहे, जबकि गुजरात का गंगन-मंडल एक दिन उसी नटखट ‘महापुरुप’ के इस जय-जयकार के निनाद से गूंज उठा सरदार वल्लभभाई की जय ! हमारे सरदार बहुत बहुत जिये और कहते हैं कि वृद्ध हैडमास्टर को लोगो ने तब भी यही वाक्य दोहराते गुना कि ‘ऐसा नटखट लड़का मैंने आयु में दूसरा नही देखा !’

भला उन्हें क्या मालूम था कि उनके इस विद्यार्थी में इस ‘नटखटपन’ की मात्रा किसी भी अंश में कम होती तो इस देश को अपनी स्वतंत्रता का सौदा पटाने और उस अनमोल स्वाधीनता को पा लेने पर आज उसकी सम्यक सुरक्षा करने मे कितना गहरा मूल्य चुकाना पड़ता। मैट्रिक पास करते-करते वल्लभभाई का मन महत्वाकांक्षाओं से भर उठा था। उनके मन में उच्च शिक्षा प्राप्त करने की प्रबल महत्त्वाकांक्षा थी।

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परंतु परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने कोई अवलंब न देख स्वावलंबी बनने का निश्चय किया। बाल्यकाल से ही जैसा उनका स्वभाव था, उसमें उनके जो विचार, मान्यताएं, स्वप्न एवं महत्त्वाकांक्षाओं का एक चित्र उनके हृदय में निर्मित हो रहा था, उसमें किसी छोटी-मोटी नौकरी से ही पटेल का मन संतुष्ट हो जाना संभव नही था।

उनकी इस अवस्था का परिचय सन् 1921 के असहयोग आदोलन मे उन्ही के एक हृदयस्पर्शी भाषण के अश से मिलता है I “भाई मोहनलाल ने मेरा परिचय देते हुए कहा कि मैं पहले अंग्रेजों को हूबहू नकल करता था, यह सच है। साथ ही यह बात भी ठीक है कि मैं फुरसत का समय खेल-कूद में व्यतीत करता था। उस समय मेरा विश्वास यह था कि इस अभागे देश में विदेशियों की नकल करना ही उत्तम कार्य है।

मुझे शिक्षा भी ऐसी ही दी गई थी कि इस देश के लोग हल्के और नालायक हैं, और हम पर राज्य करने वाले परदेशी ही अच्छे और हमारा उद्धार करने में समर्थ हैं; इस देश के लोग तो परतंत्रता के ही योग्य हैं; ऐसा विष इस देश के समस्त बच्चों को पिलाया जाता है। मैं बचपन से ही यह देखने और जानने को तड़पता रहता था कि जो लोग सात हजार मील दूर विदेश में राज्य करने आते थे उनका देश कैसा होगा।

Sardar Vallabhbhai Patel – सरदार वल्लभभाई पटेल

मैं साधारण घराने का था। मेरे पिताजी मन्दिर में जिंदगी व्यतीत करते थे और उसी में उन्होंने वह पूरी की। मेरी इच्छा पूरी करने का उनके पास साधन नही था। मुझे मालूम हुआ कि दस-पंद्रह हजार रुपया मिल जाय तो विलायत जा सकता हूं। मुझे कोई इतना रुपया देने वाला नहीं था। मेरे एक मित्र ने कहा कि ईडर स्टेट में दरबार से रुपया व्याज पर मिल सकता है।

उस मित्र के काका ईडर में ही रहते थे, इसलिए मेरा वह मित्र और में दोनों ईडर गए और शेष-पिल्ली जैसे विचार करके गांव की प्रदक्षिणा करके वापस चले आए। अंत में निश्चय हुआ कि विलायत जाना हो तो रुपया स्वयं अर्जित कर जाना चाहिए। बाद में वकालत की पढ़ाई की और वकालत का धंधा करके खर्च लायक कमाई करने विलायत जाने का निश्चय किया।”

इस समय उनकी विद्रोही भावना क्रियाशीलता के लिए झटपटा रही थी। अतः उन्होंने मुखतारी को परीक्षा उत्तीर्ण कर गोधरा जिले में वकालत आरंभ कर दी। अल्पकाल मे हो आपकी वकालत अच्छी चल निकली। स्वभाव से निर होने के कारण आपने अनेक घमंडी मजिस्ट्रेटों को सबक सिखाया। फलतः आपकी धाक सर्वत्र जम गयी। आप अधिकाशतः फौजदारी मुकदमे ही रोते थे।

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कारण यह था कि इनमे थोड़े समय में अधिक धन कमाया जा सकता था। उनकी वकालत की सफलता मे योग्यता, निर्भीकता, बुद्धि-पायुमं; परिश्रम राभी का योग दान था। उन्हें पर्याप्त यश और धन की प्राप्ति हुई। सुचित धन से आप इंग्लैंड गये। वहां जाकर आप राग-रंग में नहीं पड़े। जिस कार्य के लिए वहां गये थे उसी मे तल्लीन रहे। उन्हें परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ । पुरस्कार स्वरूप शुल गाफ हो गया और छात्रवृत्ति भी मिनी । वल्लभभाई ने अपनी अंतिम संपूर्ण परीक्षा जून, सन् 1912 में उत्तीर्ण की।

उसमे वे आनर्स के साथ पहले नंबर पर पास हुए। इस पर उन्हें पचास पौड का नाकद पुरस्कार मिला। परीक्षा मे लिये उनके उत्तर इतने सुंदर एवं सटीक थे परीक्षक ने बंबई के मुख्य न्यायाधीश को लिया, “वल्लभभाई पटेल कृणस न्यायाधीश हो सकते हैं, इसलिए उन्हें न्याय विभाग में किसी ऊंचे पद नियुक्त कर देना चाहिए।” पटेल को न्यायाधीश नही बनना था, अतएव उन्होंने उस सिफारिश से लाभ नही उठाया।

स्वदेश लौटने पर यह अहमदाबाद आकर वकालत करने लगे। शीघ्र ही उनको धाक जम गयी। उनकी आय और प्रतिष्ठा दोनों में चार चांद लग गये। उनके अग्रज इन दिनों सार्वजनिक जीवन में कार्य करने लग गये थे। वे स्वराज्य संस्थाओं की ओर से बंबई की धारा सभा के एक सदस्य थे।

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वकालत और देश सेवा दोनों ही कार्य एक साथ न चलने की अवस्था में दोनों भाइयों ने निश्चय किया कि विट्ठलभाई धारा सभा के कार्य में अपना समय दें और वल्लभभाई वकालत कर बड़े भाई का भी खर्च वहन करें। इस तथ्य का प्रमाण उनका एक भाषण अंश है “स्वतंत्रता चाहिए तो इस देश में संन्यासी होना चाहिए, स्वार्थ त्याग करके सेवा करनी चाहिए। इसलिए हम दोनों ने निश्चय किया कि दोनों में से एक देश-सेवा करे और दूसरा कुटुम्ब सेवा करे।

उस वक्त से मेरे भाई ने इतनी अच्छी तरह चलता हुआ धंधा छोड़कर देश सेवा का काम शुरू कर दिया और घर का काम चलाने का भार मेरे सिर पर आया। इस प्रकार पुण्य कार्य उनके हिस्से में आया और मेरे सिर पर पाप का काम आ पड़ा। परंतु यह समझकर मन को बहलाता था कि उनके पुण्य में मेरा भी हिस्सा है।”

उस समय फौन जानता था कि वल्लभभाई भी शीघ्र ही ‘पाप कमाना’ छोड़कर ‘पुण्य कमाने’ के क्षेत्र मे आ जायेंगे। 1916 ई० के प्रसिद्ध लखनऊ अधिवेशन में एक प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित होकर आपने अपने भावी कर्मक्षेत्र कांग्रेस के प्रांगण में सर्वप्रथम पदा पंण किया। इन्हीं दिनों आप गुजरात सभा के सचिव चुने गए।

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गुजरात सभा तथा गोधरा में आयोजित एक राजनीतिक सम्मेलन के संबंध में युगपुरुष गांधी जी से भेंट हुई। उनके जादू भरे संपर्क से शीघ्र ही आपके जीवन में एक युगांतर उपस्थित हुआ। इन दिनों गांधी जी बिहार के चंपारन क्षेत्र में नीलवरों से पीड़ित जनता की सेवा कर रहे थे। उनके इस कार्य का राष्ट्रव्यापी प्रभाव पड़ रहा था।

अचानक मजिस्ट्रेट ने गांधी जी के इस काम पर प्रतिबंध लगाकर उन्हें चंपारन से चले जाने का आदेश दिया। गांधी जी ने मजिस्ट्रेट का आदेश मानने से मना कर दिया और अपने कार्य में लगे रहे। उन पर मुकदमा चला। मुकदमे में गांधी जी ने अपना जो बयान दिया उसने देशभर में हलचल मचा दी। पटेल इस विवरण को समाचारपत्र में पढकर उनके साहस के प्रशंसक हो गए।

उनके मन में गाधी जी के प्रति आदर भाव बढा, जो उनके भावी राजनीतिक जीवन का सूत्रधार सिद्ध हुआ। महात्मा गांधी से भेंट कर आप उनके अनुयायी बन गए। सन् 1917 में वल्लभभाई एक सदस्य के रूप में अहमदाबाद म्युनिसिपैलिटी में निर्वाचित हुए। बाद में उन्हें स्वास्थ्य कमेटी का अध्यक्ष चुना गया। इस वर्ष प्लेग का भीषण प्रकोप हुआ।

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पटेल ने बडी कुशलता और साहस के साथ सारे नगर के लोगों को निकालकर जंगलो में बसाया और उनकी प्राणरक्षा की । सन् 1918 में जब देश में इन्फ्लुएंजा फैला तो अहमदाबाद में आपने घर-घर निःशुल्क औषधि वितरण तथा स्वास्थ्य रक्षा संबंधी शिक्षाप्रसार का प्रबंध किया। इस प्रकार अपनी निःस्वार्थ सेवापरायणता से आप जनता के श्रद्धापात्र बन गए।

उन्हीं दिनों आपने गुजरात विद्यापीठ के लिए दस लाख रु० एकत्र किये । जनता और धनिकों पर आपका इतना प्रभाव देखकर गांधी जी अत्यधिक प्रभावित हुए । शीघ्र ही आप गांधी जी के प्रधान शिष्य के रूप में प्रतिष्ठित हो गये। आपने इतिहास प्रसिद्ध ‘खेड़ा-सत्याग्रह’ और उसी समय उठ खडे होने वाले अहमदाबाद के मजदूर मिलमालिकों के संघर्ष एव तत्संबंधी हडताल के चिरस्मरणीय अनुष्ठान में महत्त्वपूर्ण भाग लिया।

उसके बाद युद्ध के लिए रंगरूट भर्ती विक गांधी जी द्वारा उठाए गए आदोलन मे भी पूर्ण सहयोग देकर, एक सच्चे अहिंसा वादी सैनिक के रूप में आपने अपने प्रांत में उनके प्रधान राजनीतिक लेफ्टिनेण्ट की मी गौरवपूर्ण स्थिति की प्राप्ति की । 1919 ई० में रौलट-एक्ट को लेकर गांधी जी ने राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह आंदोलन आरंभ किया तो उन्होंने पूरा सक्रिय सहयोग दिया।

उन्होंने देश के भावी संग्राम के लिए जीवन अर्पित करने की गंभीर शपथ ग्रहण की। वे तन-मन से गांधी जी द्वारा निर्दिष्ट कार्यक्रम को पूरा करने में जुट गए। उन्होंने गांव गाव घूमकर कृपको को करवंदी सत्याग्रह का महत्व और उसका संदेश पहुंचाना आरंभ किया। उन्होंने सरकार से बार-बार लोहा लिया और जनता में प्राण शक्ति फूंकी। एक सभा में अध्यक्ष पद से उन्होंने जो भाषण दिया उससे एक अंश उद्धृत है I “इस लडाई से सारे देश में आग लग जाएगी।

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दु.ख सहन किए बिना सुख नहीं मिलता और मिल जाए तो वह लम्बे समय तक टिकता नहीं। मजबूत और दृढ विचारों की जनता हो, इसी में राज्य की शोभा है। नालायक और डरपोक प्रजा की वफादारी में सार नही। डर और स्वाभिमान की रक्षा करने वाली वफादार प्रजा ही सरकार को शोभा देती है।” इस वक्तव्य से पता चलता है कि इन दिनों उनके वाक्य-प्रहार कितने तीखे थे।

साथ ही सरकार को पाठ पढ़ाने में वे कितने सिद्धहस्त थे। परिणामतः किसान प्रत्यक्ष रूप से सरकार से संघर्ष कर अपनी माग पूरी कराने पर तुल गए । तदनंतर असहयोग आंदोलन की रणभेरी बजते ही सहस्रों की आयवाती अपनी फलती-फूलतो वकालत को आपने तिलांजलि दे दी। असहयोग के कारण जनता ने जेलों को ठसाठस भर दिया। आदोलन को दमित करने के लिए सरकार ने समस्त शक्ति लगा दी।

सरकार जितना दबाती थी, असहयोग उतना ही बढता जाता था। सरदार की प्रेरणा से अहमदाबाद म्युनिसिपलिटी ने एक प्रस्ताव द्वारा अपने सभी स्कूलों का सरकार से संबध तोड़ लिया। इस पर म्युनिसिपैलिटी के द्वारा सरदार का सरकार के साथ भयंकर संघर्ष हुआ। अंत में सरकार ने अहमदाबाद म्युनिसिपल बोर्ड को अवधि समाप्त होने से पूर्व ही भंग कर दिया।

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जनता के सदस्यों ने जो स्कूल सरकार की सहायता के बिना म्युनिसिपैलिटी के कोप से खोले थे, सरकार ने उनका खर्च वसूल करने का दावा उन सदस्यों पर किया। सरदार वल्लभभाई ने अदालत में इस मुकदमे की पैरवी स्वयं वी. जिससे सरकार का दावा हाईकोर्ट तक से खारिज हो गया और उसे प्रतिवादियो को मुकदमे का खर्च भी देना पड़ा।

सन् 1921 में अहमदाबाद में हुए कांग्रेसाधिवेशन के आप स्वागताध्यक्ष चुने गये। स्वागताध्यक्ष के रूप में आपने रातों-रात खद्दर का एक विशाल नगर खड़ा कर देने का अद्भुत चमत्कार प्रदर्शन किया। इस अधिवेशन में सविनय अवज्ञा आंदोलन छेडने का प्रस्ताव पास हुआ और तदनुसार गांधी जी के आपके बल पर बारडोली में करवंदी आंदोलन शुरू किया।

परंतु अधिकारियों के भयं कर अत्याचार के कारण उसे स्थगित करना पड़ा। लोग यह समझने लगे थे कि अब भारत में सत्याग्रह आंदोलन सफल नहीं हो सकता। विधान सभाओं में जाकर ही वैधानिक आंदोलन किये जाने चाहिए। वल्लभभाई इस समय गुजरात के सच्चे नेता के रूप में जनता के समक्ष आए। वे ठोस कार्य करना भली-भांति जानते थे। गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद देश मे सन्नाटा छा गया।

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असहयोग भी शिथिल होने लगा किन्तु पटेल अनवरत मैदान में डटे रहे और कांग्रेस का रचनात्मक कार्य करते रहे। काग्रेस के प्रत्येक कार्य- चर्पा, खादी, पुनरुत्थान, अछूतोद्धार, किसान संगठन तथा व्यावहारिक शिक्षा आदि में उन्हें सफलता दिखाई देती थी। वे बराबर कार्यक्षेत्र में संलग्न रहे। उन्होंने स्वयं खादी पहनना आरंभ किया और अन्यो को प्रेरणा दी।

उन्होंने अनेक कार्यकर्ताओं तथा स्वयंसेवकों को लेकर विदेशी वस्त्रों की दुकानो पर धरना देने का कार्यक्रम आरंभ किया। असहयोग के कार्यक्रम को और तीव्रता से पूर्ण करने के लिए आपने सैकडों सहयोगियों के हस्ताक्षरों से एक घोषणा पत्र प्रकाशित किया जिसमे उन्होंने कहा “हिन्दुस्तान को सार्वजनिक आकांक्षाओं को कुचल डालने वाले इस शासन विश्व की कोई बलशाली से बलशाली सरकार भी उसको मार्ग से विचलित नही कर सकती ।

असहयोग आंदोलन के प्रारंभिक दौर में गांधी जी ने बारडोली को ही केन्द्र बनाने का निश्चय किया था। सरकार की कोपदृष्टि उस पर पड़ चुकी थी। इसलिए उसका लगान 22 प्रतिशत बढा दिया गया। प्रजा ने इसका प्रतिरोध किया। उन्होंने आंदोलन चलाने का निश्चय किया और उसका नेतृत्व सरदार पटेल को सौंपा। आपके नेतृत्व में आंदोलन छिड़ा। कृषकों ने लगान देना बंद कर दिया।

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सरकार ने बंबई धारा सभा मे सारे उपायों का सहारा लेकर आंदो लन को कुचल डालने की धमकी दी। कृषकों के पशुओं और भूमि की जस्ती होने लगी। आपने कृषकों को आश्वासन देना शुरू किया कि “मत घबराओं, जमीन तो चलकर तुम्हारे पास आयेगी।” छ. महोने व्यतीत होने पर भी आंदो लन बंद न हुआ। पटेल जैसे वीर एवं साहमी नायक के कारण उनका साहस न टूटा।

उनकी व्यवस्था और ठोस कार्य को देखकर बड़े-बड़े नर-रत्न इस युद्ध मे उतावले होकर कूद पड़े । कवि-गण गांव-गांव जाकर सुनाने लगे कि “विराट रूप हो किसान। स्वराज आज लो किसान।” आंदोलन ने इतना बल पकड़ा कि राज्यतंत्र तक बंद होने लगा। एक ओर शक्तिशाली सरकार थी दूसरी ओर अहिंसक कृषक थे। उनके अनुशासन, नम्रता, दृढता और श्रद्धा को देखकर सरदार भी गद्गद हो उठे थे ।

‘टाइम्स आफ इंडिया’ ने तो सब कुछ देखकर यहां तक लिख दिया था कि बारडोली में ‘बोल्शे विज्म’ चल रहा है और वल्लभभाई उनके ‘लेनिन’ है। “आर्य देश के बंबई प्रांत में बारडोलो नाम का एक मण्डल है। वहां महात्मा गांधी ने ‘बोल्शेविज्म’ का प्रयोग करना आरंभ कर दिया है। प्रयोग सफल भी होता जा रहा है। यहां के सारे कल-पुर्जे मंद पड़ गए हैं। गांधी के शिष्य पटेल का बोलबाला है।

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वही वहां का लेनिन है। स्त्रियों, बालकों और पुरुषों में एक नई ज्वाला घघक रही है। इस ज्वाला में राजभक्ति की अन्त्येष्टि किया हो रही हैं । स्त्रियों में नवोन चैतन्यता भर गई है। वल्लभभाई तो उनके गीतों का विषय हो रहा है। अपने नायक वल्लभभाई मे वे असीम भक्ति रखती हैं। पर इन गीतो में राज-विद्रोह की भयंकर आग मुलग रही है। उनको सुनते ही कान जलने लगते हैं।

यदि ऐसा हो रहा तो निस्सदेह वहां रक्त की नदियां बहने लगेगी।” अंततः सरकार को झुकना पड़ा। उसे कृषकों की मांगें स्वीकार करनी पड़ी। बारडोली की इस विजय पर समस्त भारत में प्रसन्नता प्रकट की गई। बार डोली के वीर कृपकों की जय-जयकार होने लगी। पटेल को अनेक मानपत्र दिये गये । बारडोली का नाम विश्व के इतिहास में अमर हो गया।

वल्लभभाई को गांधी जी ने ‘सरदार’ की आधि से विभूषित किया। उस दिन से वे सचमुच ‘सरदार’ बन गये। सारे भारत के नेता बन गये। उनका सम्मान समस्त देशों मे बढ़ गया। सरदार वल्लभभाई पटेल ने बारडोली संग्राम के लिए वहां की जनता को इतना अधिक प्रशिक्षित कर दिया था कि 1930 के नमक सत्याग्रह तथा उसके बाद के अन्य सत्याग्रहों में जनता अंग्रेजों के विरुद्ध बराबर डटी रही।

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वह गांधी, पटेल तथा अन्य नेताओं के जेल में होने पर भी विचलित न हुई। गांधी जी ने 12 मार्च 1930 को नमक कानून भंग करने दांडी नामक स्थान को कूच करना था। पटेल पहले ही प्रेरणा देने के लिए गांवो मे पहुंच चुके थे। वह नमक कानून भंग का प्रचार तथा महात्मा गाधी के मार्ग को प्रशस्त करने वाले थे। इस कूच की सारी योजना सरदार पटेल की देख-रेख में बनी थी।

एक भाषण में उन्होंने कहा था “अब एक ऐसा धर्मयुद्ध शुरू होता है जैसा संसार ने पहले कभी नही देखा होगा। यह ऐसा युद्ध है जिसमे एक ओर समग्र सात्विक शक्तियों का धार्मिक शास्त्रों का उपयोग होगा, दूसरी ओर आसुरी शक्तियो का, आसुरी शस्त्रों का उपयोग होगा। इस संग्राम मे आपका क्या योगदान रहेगा और आप किसका पक्ष लेंगे इसका निर्णय आपको करना है।

गुजरात की जनता इतिहास की स्वतंत्रता का प्रथम पृष्ठ लिख रही है। ईश्वर उसे शक्ति प्रदान करे ईश्वर आप सबका कल्याण करे।” उनके इस भाषण का जनता पर बहुत प्रभाव पड़ा। सरकार भयभीत हो गयी। उसने इस अवसर पर प्रथम प्रहार करने में विलय किया। सरकार ने पटेल के भाषण करने पर प्रतिबंध लगाया, परंतु सरदार ने उस आशा को न मानकर सत्याग्रह कर दिया।

अतएव सरकार ने उनको भाषण देने से पूर्व ही गिरफ्तार कर लिया और उन पर मुकदमा चलाकर उन्हें जेल की सजा दे दी। गुजरात की समस्त जनता पर इस धरने का भारी प्रभाव पड़ा। वहां का प्रत्येक नागरिक सरकार के विरुद्ध हो गया। अहमदाबाद में साबरमती के तट पर 75,000 नर-नारियों ने एकत्र होकर यह प्रस्ताव पास किया ‘”हम अहमदाबाद के नागरिक, यह संकल्प करते हैं कि जिस मार्ग पर वल्लभभाई गए हैं हम भी उसी पर जाएंगे और ऐसा करते हुए स्वाधीनता को प्राप्त करके छोड़ेंगे।

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हम देश को स्वतंत्र किए बिना न तो स्वयं ही चैन से बैठेंगे और न सरकार को ही चैन से बैठने देंगे। हम शपथपूर्वक घोषणा करते हैं कि भारतवर्ष का उद्धार सत्य और अहिंसा से ही होगा।” 1931 ई० के करांची काग्रेस अधिवेशन के आप अध्यक्ष बने सरदार पटेल ने राष्ट्र की जो सेवा की थी उसके फलस्वरूप उन्हें काग्रेस का सबसे बडा सम्मान मिला।

जब कांग्रेस ने धारा सभाओं में प्रवेश कर मंत्रिमंडल बनाने का निश्चय किया तो इस कार्य के संपादन के लिए कांग्रेस कार्यसमिति ने आपको संसद बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया। आपके सफल संचालन से ग्यारह में से सात प्रातों मे कांग्रेसी सदस्य बहुत बड़ी संख्या में निर्वाचित होकर धारा सभाओं में पहुंचे।

वहा कांग्रेस मंत्रिमंडल बने। कांग्रेस के उम्मीदवारों का निर्णय और मंत्रियों के कार्य का निर्देशन आपके हाथ में था। यदि कोई मंत्री कांग्रेस के सिद्धांतों के प्रतिकूल चलता था तो वह वल्लभभाई के कड़े अनुशासन से बच नहीं पाता था। इस प्रकार कांग्रेस को अनुशासन मे रखने के कठिन कार्य को सरदार ने बड़ी योग्यता से निभाया।

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सन् 1942 में गांधी जी ने जय स्वाधीनंता के अंतिम युद्ध की घोषणा कर दी कि “अंग्रेजो, भारत छोडो” तो आपने भविष्यवाणी की कि स्वाधीनता का यह युद्ध एक सप्ताह से अधिक नहीं चलेगा। एक सप्ताह में अंग्रेजों को घुटने टेकने होंगे। सरदार पटेल तथा कांग्रेस कार्य समिति के अन्य सदस्य गिरफ्तार करके अहमदनगर किले में बंद कर दिये गये और महात्मा गांधी को आगा खां महल में बंद कर दिया गया।

सरदार पटेल को आंतों का पुराना रोग कष्ट देने लगा था। वे न लेट सकते थे, न खाना खा सकते थे। बस जल ग्रहण करते थे।” सन् 1945 में महायुद्ध समाप्त हो गया। मित्रराष्ट्र विजयी हुए। भारत के नये वायसराय ने घोषणा की, “समस्या का हल निकालने के लिए 25 जून से शिमला में राजनीतिक नेताओं का सम्मेलन होगा। काग्रेस कार्य समिति के सभी सदस्यों की रिहाई के आदेश दे दिये गये।

15 जून 1945 ई० को अन्य नेताओं के साथ आपको जेल से मुक्त कर दिया गया। आपने देखा अंग्रेज स्वतंत्रता देने का संकल्प कर चुके हैं, परंतु मुस्लिम लोग मार्ग में रुकावटें डाल रही है। तब आपने कहा था “हम अंग्रेजों से स्वतंत्रता के लिए लड़े हैं, जो मुसलमान मार्ग में रुकावट डालेंगे, उनसे भी हम लड़ेंगे।”

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जेल से छूटने के पश्चात् लार्ड येवल के साथ शिमला और दिल्ली में कांग्रेस कार्य समिति के सदस्यों की निरंतर चर्चा हुई। सरदार पटेल ने इसमें सक्रिय भाग लिया। उन्होंने इस बात का सदैव प्रयत्न किया कि समझौते से कांग्रेस के गौरव एवं उसको परंपरा को ठेस न सगे। परंतु उस सम्मेलन का आधार सांप्रदायिक था इसलिए वह सफल न हो सका। अंततः कांग्रेस में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया।

कार्यसमिति ने अंतरिम सरकार 2 सितंबर, 1946 को केंद्र में अंतरिम सरकार बनी । इसके नेता पं० जवाहरलाल नेहरू हुए। गृह विभाग सरदार पटेल को सौपा गया। मुस्लिम लीग पहले तो इसमें सम्मिलित नहीं हुई; जय शामिल हुई तो उसने अपने लिए गृह विभाग की मांग की। सरदार पटेल किसी भी तरह तैयार नहीं हुए। मुस्लिम लीग को वित्त विभाग लेकर संतुष्ट होना पड़ा।

कतिपय लोगों का कहना था कि सरदार पटेल को हठ नही करना चाहिए था। पर ऐसा कहने वाले शासन अनुभव से अनभिज्ञ थे। देश में उस समय सांप्रदायिकता की भावना प्रवल थी। पुलिस गृह विभाग के अधीन होती है। मुस्लिम लीग अधिकार का अवश्य दुरुपयोग करती क्योंकि उसने घोषणा कर दी थी कि वह केंद्रीय सरकार को गिराने के लिए ही उसमें सम्मिलित हुई है।

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लीग विधानसभा की तिथियों को टालना चाहती थी। आपने जनता को विश्वास दिलाते हुए कहा था- “आकाश चाहे गिर पड़े, पृथ्वी चाहे फट जाय, विधान सभा का अधिवेशन 9 दिसंबर से पीछे नहीं टल सकता।” आपकी बात पूर्ण हुई। 16 अगस्त, 1946 को ‘पाकिस्तान दिवस मनाया गया। देश भर मे साप्रदायिक दंगे हुए।

मि० जिन्ना ने जब यह कहा कि “मुसलमानों की स्वीकृति के बिना स्वतंत्रता दी गयी तो हिंदुस्तान मे तलवारें चल जाएगी, खून की नदिया वह जाएंगी।” तब पटेल ने उत्तर दिया था “तलवार का जवाब तलवार से दिया जायेगा और खून की नदियां बहाने वाले को भी क्षमा नहीं किया जाएगा।” आपने तब प्रजा को समझाया था कि “आत्मरक्षा के लिए हथियार उठाना हिंसा नही है। अहिंसा निर्बल नही, वीरो का अस्त्र है।”

वायसराय लार्ड माउंटबंटन ने 3 जून 1947 ई० को यह घोषणा की कि भारत 15 अगस्त, सन् 1947 को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया जायेगा और मुस्लिम लीग को पाकिस्तान दे दिया जायेगा। गांधी जी देश-विभाजन की शर्त पर स्वतंत्रता लेने को तैयार नहीं थे। ऐसे तनाव भरे वातावरण में 14 जून, 1947 को इस योजना पर विचार-विमर्श करने के लिए काग्रेस ने महासमिति की बैठक बुलायी। सबके हृदय संतप्त थे। भारत का विभाजन होने जा रहा था। उस समय सरदार पटेल उठे। उनका हृदय भी भरा हुआ था।

Sardar Vallabhbhai Patel – सरदार वल्लभभाई पटेल

उन्होंने कहा “मैं जीवन भर भारत की एकता के लिए प्रयत्नशील रहा हूं। आप सबको इम प्रस्ताव से जो दुःख हुआ है उससे कम मुझे भी नहीं हुआ। परंतु मेरे दिल मे यह बात बैठ गयी है कि इस प्रस्ताव को स्वीकार करना ही पड़ेगा दूसरा कोई मार्ग ही नहीं है। गत नौ महीनों से देश की शासन व्यवस्था हम लोग चला रहे हैं । . इस काल में मुझे अत्यंत दुखद अनुभव हुए हैं।

मैंने अनुभव किया कि द हम यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं करेंगे और गत नौ मास में देश का शासन जिस तरह चला है और ब्रिटिश शासन ने जिस तरह उसे चलने दिया है वैसा ही यदि अधिक समय तक वह चलता रहा तो मुझे निश्चित भय है कि समूचा भारत पाकिस्तान बन जायेगा। वल्लभभाई पटेल ने एक कार्यक्रम रखा, जिसमें रियासतों के शासक और उनके प्रमुख सलाहकार आमंत्रित किये गये। सरदार पटेल और रियासत विभाग के सचिव श्री वी० पी० मेनन भी इसमें सम्मिलित थे। 

यहां भी जो बातचीत चली, उसमे राजाओं को समझाया गया, जितनी जल्दी होवे भारत में रियासतों का विलय कर दें। दो चार अभिमानी राजा-महाराजाओ ने इस कार्यक्रम का बहिष्कार भी किया, पर बाद में उन्हें इसका महंगा मूल्य चुकाना पड़ा। शीघ्र ही रियासतो में विलयपत्र भरने की होड़ सी लग गयी।

Sardar Vallabhbhai Patel – सरदार वल्लभभाई पटेल

नई दिल्ली की ओर गजेब रोड पर पहले नंबर की वह कोटी, जहां लौह-पुरुष सरदार पटेल रहते थे, कुछ दिनो तक तो राजा महाराजाओं से भरी रही। सरदार पटेल ने जिस राजा को मिलने के लिए शीघ्र बुला लिया, यह अपने भाग्य की सराहना करता था। सरदार का यह निवास स्थान उन दिनों पूरे देश में आकर्षण का केंद्रबिंदु था। विशाल भारत की एकता का नया मानचित्र विभाजन के बाद यहां तैयार हो रहा था।

कुछ ऐसी भी रियासतें थी, जो सरदार को इसी बहाने अपने यहां निमंत्रित कर गौरवान्वित होना चाहती थी। उसके लिए भी सरदार पटेल, श्री मेनन को साथ लेकर रियासतों के तूफानी दौरे पर निकल पड़े। 15 अगस्त, 1947 से पूर्व जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर को छोड़कर सरदार पटेल के प्रयासों से सभी देशी रियासतें भारत संघ का अभिन्न अंग बन चुकी थी।

दिन-रात सरदार को एक ही धुन सवार थी, कोई रियासत भारत से बाहर न रह जाये । यद्यपि उनका स्वास्थ्य इसको अनुमति नहीं देता था, फिर भी वे लगे रहते थे। एक दिन तो उडीसा की 28 और मध्यप्रदेश को 18 रियासतों से भारत संघ में विलय का प्रपत्र उन्होंने भरवाया। देशी रियासतों को भारत में मिलाने का जो कठिन कार्य सरदार पटेल को सौंपा गया, उसे पूरा करने मे हाथ उठाने की नौबत तो सिर्फ हैदराबाद मे हो आयो ।

Sardar Vallabhbhai Patel – सरदार वल्लभभाई पटेल

अधिकांश रियासतों के राजमुकुट तो प्यार से मुहब्बत से ही उन्होंने भारतमाता के चरणों में उतरवा कर रखवा दिये थे। सरदार ने राजाओं से देशभक्ति और कर्तव्य-बुद्धि दोनों को अपील की। पर रियासतें लेने के बाद भी उनके सम्मान और आदर मे वर्षों तक उन्होंने कोई कमी नहीं आने दो । क्योंकि सरदार कहते थे, जब इन्होंने देश के लिए त्याग किया है, तो भी अपनी उदारता का परिचय देने में कंजूसो नहीं करेगा।

सरदार के शब्दों में यह पांच छ. सो रियासतें यदि हमारा साथ ने देती, तो देश मुसीबत में फंस जाता। दो तो क्या, न जाने कितने टुकड़े देश के हो जाते और सारी कोशिश मिट्टी में मिल जाती । रियासतो के विलीनीकरण की यह प्रक्रिया इतने थोड़े समय में और इतनी सरलता से रक्त की एक बूंद गिराये बिना पूरी हो जायेगी, यह कल्पना भी किसी को नहीं थी।

पांच हजार वर्ष पहले छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे भारत को महान भारत बनाने के लिए भगवान कृष्ण को भी संघर्ष का सहारा लेना पड़ा था। पर सरदार के बुद्धि कौशल से वह अप्रिय इतिहास भी लिखने से बच गया। संविधान सभा मे नेहरू जो ने कहा था, “यह काम सरदार के बूते का ही था, मेरा देशी रियासतो के आंदोलन से सीधा संबंध रहा है।

Sardar Vallabhbhai Patel – सरदार वल्लभभाई पटेल

पर छः महीने पहले मैं भी यह नहीं कह सकता जो आज सैकड़ो साल पुरानी सामंतशाही उखड़ रही है, वह इतनी आसानी से उपड़ जायेगी। मैं समझता हू, इस टेढ़ी और कठिन स्थिति से निपटने के विषय में यह सभा मुझसे सहमत होगी कि हम पर मेरे मित्र तथा सहयोगी उप-प्रधानमत्री (सरदार पटेल) का आभार है।”

सरदार पटेल 71 वर्ष के थे, जब वे अंतरिम सरकार में गृह और सूचना व प्रसारण मंत्री के रूप में आये। वे 72 वर्ष के थे, जब उप-प्रधानमंत्री पद के कार्यों के साथ-साथ उन्होंने देश के विभाजन की समस्याओ से जूझना शुरू किया और रियासतों का भी भार उन्ही पर सौपा गया। उनकी जिंदगो का 73-74 और 75वा वर्ष देश के भू-भाग को एकसूत्र में पिरोने, देश के प्रशासन और संगठन के ने को पूरा करने देश में शांति स्थापित करने, देश के भविष्य की समृद्धि की नीव रखने और प्रशासनिक, कानूनी और आर्थिक व्यवस्था को नया रूप देने और देश के संविधान का गणतंत्रीय आधार पर निर्माण करने में बारी-बारी से बीतता गया।

इस समय में ही वे 500 से ऊपर छुटपुट रियासतो को संविधान के अंतर्गत लाने में सफल हुए और जब उनका 75वां वर्ष पूरा हुए केवल छः सप्ताह ही बीते थे कि उनकी आखे मुंद गयी, वे पंचतत्त्वों मे लीन हो गये । इतिहास मे सभवतः ही कोई ऐसा उदाहरण मिले, जब किसी राजनीतिज्ञ या राष्ट्रनिर्माता को सत्तर वर्ष होने पर अपने जीवन के अंतिम तीन-चार वर्षो में इतनी सफलताएं मिली हो और उसका जीवन महान कार्यों से भरा-पूरा हो ।

Sardar Vallabhbhai Patel – सरदार वल्लभभाई पटेल

यदि इसके साथ यह बात भी जोड़ दी जाये कि इन वर्षों में उन्हें हृदय रोग भी घेर चुका था और उनके पेट की बीमारी भी भयंकर हो चली थी, तो उनके जीवन के चार वर्षों की चर्चा कर स्तब्ध रह जाना पड़ता है। स्वतंत्रता संग्राम के इस सेनानी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए, जवाहर लाल नेहरू ने ठीक ही लिखा था I

“स्वातंत्र्य युद्ध की हमारी सेनाओ के एक महान सेनापति के रूप में उनको हममे से अनेक व्यक्ति संभवतः सदा स्मरण करते रहेगे। वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने संकट काल मे तथा विजयवेला मे सदा ही ठोस और उचित परामर्श दिया। वे एक ऐसे मित्र, सहयोगी तथा साथी थे जिनके ऊपर निविवाद रूप से शक्ति की ऐसी मीनार के रूप में भरोसा किया जा सकता था, जिसने हमारे संकट के दिनों में हमारे द्विविधा मे पड़े हुए हृदयों को पुनः शक्ति प्रदान की।

वह ऐसे शक्ति-स्तम्भ ये जिससे दुर्बल हृदय भी मजबूत हो जाते थे।” वस्तुतः सरदार पटेल राष्ट्रीय एकता के शिल्पी थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में महान कार्य किया। उनका परिस्थिति का अध्ययन सर्वांगपूर्ण होता था। वह बुद्धिवादी राजनीतिज्ञ थे। बुद्धि और कर्तव्य की कसौटी पर जो बात उन्हें ठीक जंचती थी, उसे ही वह मानते थे। उनके शत्रुओं ने भी कभी उनकी देशभक्ति पर संदेह प्रकट करने का साहस नही किया था।

Sardar Vallabhbhai Patel – सरदार वल्लभभाई पटेल

कांग्रेस विरोधियो को वह राष्ट्र विरोधी मानते थे और इसी दृष्टि से उनके साथ व्यवहार करते थे। विदेशो पत्रकारों ने उनके लिए जो ‘भारत के लौह-पुरुष’ का प्रयोग किया था, वह सम्यक् ही था। उन्हें जो कहना होता था, उसे वह डंके की चोट कहते थे । वास्तव मे वल्लभभाई पटेल केवल नाम में ही सरदार नहीं थे वह हमारे दिलो के सरदार भी थे।

वह आधुनिक भारत के शक्ति-पुरुष और उस लौह-दंड के प्रतीक थे, जिसे मनु ने ‘शासक’ की सज्ञा प्रदान की है। नि.सदेह उनका नाम भारत के राष्ट्र निर्माता और एकीकरण करने वालों के रूप में इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। 

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