Rash Behari Bose – रास बिहारी बोस

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जन्म एवं प्रारंभिक जीवन – रासबिहारी बोस का जन्म 25 मई, 1886 में हुआ था। शिक्षा काल के दौरान ही रासबिहारी बोस के क्रांतिकारी विचार उभरकर सामने आने लगे थे। वह अंग्रेजों के अत्याचार से भारतीय जनता को मुक्त कराने के लिए योजनाएँ बनाने लगे। ऐसी ही एक योजना के तहत वह ब्रिटिश फौज में भरती होने के लिए उत्सुक थे।

Rash Behari Bose – रास बिहारी बोस

एक बार वह घर से भागकर फौज में भरती होने के लिए गए, किंतु किसी कारणवश उन्हें फौज में नौकरी नहीं दी गई। जब यह बात उनके पिता ने सुनी तो वह रासबिहारी पर बहुत नाराज हुए। उन्होंने जब फौज में नौकरी का कारण पूछा तो रासबिहारी ने बताया कि मुझे ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लेना है। इसके लिए हमें आधुनिक युद्धकला सीखनी पड़ेगी, इसीलिए मैं फौज में भरती होना चाहता हूँ।

पिता ने उन्हें फौजी नौकरी के कष्ट समझाए, किंतु रासबिहारी संकल्प पर दृढ़ रहे। इसी उद्देश्य से वह काम की तलाश में घर से निकल गए। रासबिहारी ने शिमला के एक छापाखाने में नौकरी की, लेकिन एक दिन मालिकों से उनका झगड़ा हो गया। फलतः उन्हें वह नौकरी छोड़नी पड़ी।

क्रांतिकारियों से मेलजोल – शिमला से वह नौकरी की तलाश में सन् 1906 में देहरादून पहुँचे, जहाँ उन्हें दूसरी नौकरी मिल गई। लंबे समय तक देहरादून उनके कार्यकलापों का केंद्र रहा। देहरादून में वह वन विभाग के शोध संस्थान में सरदार पूर्ण सिंह के सहायक थे। पूर्ण सिंह रसायन विभाग के प्रभारी थे।

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उनकी यह नौकरी पेट पालने के लिए नहीं थी, बल्कि वह रसायन विभाग में बहुत से रासायनिक पदार्थों का अध्ययन करते थे, ताकि उनका उपयोग बम बनाने में किया जा सके। देहरादून में रासबिहारी बोस ‘टैगोर विला’ नामक स्थान में एकांत में रहते थे। इसमें एक बहुत बड़ा बगीचा और कई कमरे थे। उन्होंने एक कमरे में बम बनाने का कार्य आरंभ कर दिया था।

चंद्र नगर में रहते हुए वह बम बनाने का काम पहले ही सीख चुके थे। में रासबिहारी बोस ने क्रांतिकारी विचारोंवाले युवाओं से संपर्क साधा। धीरे-धीरे उनका आवास क्रांतिकारियों का केंद्र बन गया। वहाँ उनके सहयोगियों में अतुल बोस, हरिपद बोस, शैलेंद्र बनर्जी आदि प्रमुख थे। एक दिन देहरादून में एक बंगाली परिवार के विवाह समारोह में रासबिहारी बोस सम्मिलित हुए। बारात सहारनपुर से आई थी।

दूल्हे के मामा जितेंद्र मोहन चटर्जी से रासबिहारी बोस का परिचय हुआ। जल्दी ही दोनों घुल-मिल गए जितेंद्र मोहन सहारनपुर में एक क्रांतिकारी समिति के संगठक थे। पंजाब के क्रांतिकारियों से भी उनके घनिष्ठ संबंध थे। जितेंद्र मोहन चटर्जी के माध्यम से रासबिहारी ने पंजाब, उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों के अनेक क्रांतिकारियों से संबंध स्थापित किए।

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वायसरॉय को बम से उड़ाने की योजना – सन् 1911 के आरंभ में रासबिहारी बोस को अपनी माताजी की गंभीर बीमारी का समाचार मिला। वे तत्काल माताजी की सेवा के लिए चंद्र नगर पहुँचे, जो उन दिनों फ्रांसीसियों के अधिकार में था। कुछ ही दिनों में उनकी माताजी का देहांत हो गया। तब उन्हें कुछ समय तक चंद्र नगर में ही रहना पड़ा। चंद्र नगर क्रांतिकारियों का गढ़ था।

बंगाल के कई क्रांतिकारी पुलिस का दबाव पड़ने पर चंद्र नगर में पहुँच गए थे। वहाँ बम बनाने के कई कारखाने और भंडार थे। ज्यादातर क्रांतिकारी चंद्र नगर से ही बम एवं हथियार मँगाते थे। चंद्र नगर में रासबिहारी बोस का परिचय शिरीश चंद्र बोस से हुआ। उनके माध्यम से वह चंद्र नगर के क्रांतिकारी दल के नेता मोहन लाल राय के संपर्क में आए।

छुट्टियाँ समाप्त हो जाने पर रासबिहारी बोस को देहरादून लौटना पड़ा, किंतु उनका मन काम में नहीं लग रहा था, क्योंकि चंद्र नगर से वह अपने मन में कई संकल्प और योजनाएँ लेकर देहरादून पहुँचे थे, जिनमें एक संकल्प था-वायसरॉय लॉर्ड हार्डिंग को सबक सिखाना। वह वायसरॉय को बम से उड़ा देना चाहते थे। चंद्र नगर से उनके साथ वसंत कुमार विश्वास नामक नौजवान भी आया था, जो बम बनाने और चलाने को कला में निपुण था।

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दिखाने के लिए वह रासबिहारी बोस का रसोइया और घरेलू नौकर था, किंतु वास्तव में वह बम आदि बनाने में सहयोग देता था। एक दिन रासबिहारी बोस ने योजना के तहत उसे लाहौर भेज दिया। वहाँ क्रांतिकारी भाई बाल मुकुंद के प्रयत्नों से वसंत कुमार को दवाखाने में कंपाउंडर की नौकरी मिल गई। लेकिन पृष्ठभूमि पर वह क्रांतिकारियों से वायसरॉय लॉर्ड हार्डिंग के बारे में अधिक से अधिक जानकारी इकट्ठी करने लगा।

कुछ दिनों बाद रासबिहारी बोस भी लाहौर पहुँच गए। वसंत कुमार द्वारा इकट्ठी की गई जानकारी के आधार पर उन्होंने वायसरॉय पर बम फेंकने की योजना को अंतिम रूप दिया। फिर वह चंद्र नगर गए और वहाँ से देहरादून। अपनी वास्तविक यात्रा को गुप्त रखते हुए उन्होंने परिचितों में यह प्रचारित किया कि अपने अनभिज्ञ नौकर वसंत कुमार को खोजने गए थे।

वायसरॉय पर बम फेंका – 22 दिसंबर को रासबिहारी बोस के देहरादून पहुँचने से एक दिन पूर्व वसंत कुमार भी लाहौर से दिल्ली पहुँच चुके थे। वायसरॉय पर बम फेंकने की पूरी तैयारी कर ली गई थी। 23 दिसंबर, 1912 को दिल्ली में वायसरॉय की सवारी धूमधाम से निकलनी थी। देश के अनेक राजे-महाराजे इस अवसर पर उपस्थित थे। सड़कों पर अपार जनसमूह दर्शक के रूप में मौजूद था।

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जब जुलूस चाँदनी चौक के मध्य स्थित घंटाघर से कुछ आगे बढ़ा तो अचानक बम विस्फोट हो गया। बम के हमले से वायसरॉय के हाथी का महावत मारा गया, किंतु वायसरॉय घायल होकर बेहोश हो गए थे। बम विस्फोट के तुरंत बाद पुलिस ने इलाके की नाकाबंदी कर दी। वसंत कुमार का निशाना कुछ चूक गया था।

वसंत कुमार ने बम सिगरेट की एक डिब्बी में छिपाया था और वह महिलाओं के वेश में एक दर्शक के रूप में पंजाब नेशनल बैंक की इमारत की छत पर महिलाओं के बीच था और नीचे रासबिहारी बोस एक सेठ के रूप में जुलूस का नजारा देख रहे थे। जब बम विस्फोट के बाद महिला वेशधारी वसंत कुमार नीचे उतरे तो सेठ बने रासबिहारी बोस उनके साथ पतली गली से निकल लिये।

यद्यपि इस बम कांड में रासबिहारी बोस का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ था, किंतु वायसरॉय पर बम फेंकना कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। इससे देश भर में तहलका मच गया। बम विस्फोट के बाद रासबिहारी बोस दिल्ली से देहरादून चले गए और वसंत कुमार लाहौर। पुलिस तमाम कोशिशों के बावजूद असली अपराधियों को नहीं पकड़ सकी। बाद में पुलिस ने अपराधियों को पकड़ने के लिए एक लाख रुपए के इनाम की घोषणा की।

Rash Behari Bose – रास बिहारी बोस

देहरादून पहुँचकर रासबिहारी बोस ने वन विभाग के शोध संस्थान में एक सभा का आयोजन कर बम विस्फोट की निंदा की। इतना ही नहीं, उन्होंने नगर में हो इस प्रकार की अन्य सभाओं का आयोजन करते हुए निंदा प्रस्ताव पारित किए। इसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि पुलिस तथा प्रशासन की नजरों में रासबिहारी बोस की छवि एक राजभक्त के समान हो गई और उन्हें पुलिस से सम्मान भी मिलने लगा।

कमिश्नर लॉरेंस गार्डन को मारने की कोशिश –  देहरादून में रासबिहारी ने कुछ दिन शांतिपूर्वक बिताए, लेकिन अधिक समय तक चुपचाप बैठे रहना मुश्किल हो गया था। जल्दी ही मौका मिलने पर वह लाहौर का एक चक्कर लगा आए और वहाँ एक नए बम कांड की योजना भी तय कर आए। यह बम लाहौर के कमिश्नर लॉरेंस गार्डन पर फेंका जाना था। 17 मई, 1913 को लाहौर के मांटगुमरी भवन में लॉरेंस गार्डन में एक जलसा आयोजित किया गया था।

इस अवसर पर कई अंग्रेज अफसर भी सम्मिलित हुए थे। क्रांतिकारियों ने मुख्य फाटक के पास एक डोरी से बम को छिपा दिया था, ताकि जब लॉरेंस बाहर निकलें तो झटके से डोरी को खींचकर बम विस्फोट कर दिया जाए। जब समारोह समाप्त हुआ और लॉरेंस बाहर निकलने वाले ही थे कि तभी उनसे पहले एक चपरासी उधर से निकल गया, जहाँ पर डोरी पड़ी हुई थी।

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उसका पैर डोरी में फँस गया और डोरी के खिंच जाने से बम फट गया, जिससे चपरासी वहीं मारा गया। बम लगानेवाले वसंत कुमार चुपचाप खिसक लिये और पुलिस हाथ मलती रह गई। बम के अवशेषों का जब रासायनिक परीक्षण किया गया तब पुलिस को पता चला कि दिल्ली और लाहौर में फोड़े गए बम एक ही प्रकार के थे। इतना ही नहीं, बंगाल में हुए विभिन्न विस्फोटों के बम भी ऐसे ही थे। अब पुलिस बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब और दिल्ली में तेजी से सक्रिय हो गई।

इसी बीच रासबिहारी बोस ने ‘लिबर्टी’ शीर्षक से कुछ परचे छपवाए और सारे देश में उन्हें बँटवा दिया। इन परचों का उद्देश्य था, भारतीय जन-मन में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध घृणा के बीज बोना। साथ ही, सरकार का ध्यान दिल्ली और लाहौर के बम कांडों के अपराधियों की ओर से हटाकर विद्रोही साहित्य की ओर आकर्षित करना। जगह-जगह छापे मारे जाने लगे, तलाशियाँ होने लगीं, किंतु पुलिस असली अपराधी के निकट भी नहीं पहुँच पाई।

1857 के स्वाधीनता प्रयत्न जैसा एक नया प्रयत्न – रासबिहारी बोस ने भी देहरादून की नौकरी से बीमारी का बहाना बनाकर लंबी छुट्टी ले ली और चंद्र नगर का रास्ता पकड़ लिया। चंद्र नगर में रासबिहारी बोस की मुलाकात क्रांतिकारी ज्योतींद्र नाथ मुखर्जी से हुई। उस समय शचींद्र नाथ सान्याल भी वहाँ थे। इन तीन बड़े क्रांतिकारियों ने मिलकर क्रांतिकारी आंदोलन को एक नई दिशा दी, जिसके अंतर्गत सन् 1857 के स्वाधीनता प्रयत्न जैसा एक नया प्रयत्न किया जाना था।

Rash Behari Bose – रास बिहारी बोस

इसके लिए 21 फरवरी, 1915 का दिन निश्चित किया गया। एक दिन रासबिहारी बोस अपने क्रांतिकारी साथी शिरीश चंद्र बोस के साथ कुछ हथियारों का निरीक्षण कर रहे थे कि अचानक गलती से भरे हुए रिवॉल्वर का घोड़ा दब गया, जिससे निकली हुई गोली उनके बाएँ हाथ की मध्यमा उँगली का अगला भाग बुरी तरह घायल कर गई, जो एक तरह से उनकी पहचान बन गया।

19 फरवरी, 1914 को अवध बिहारी, अमीर चंद, बाल मुकुंद आदि क्रांतिकारी आपत्तिजनक साहित्य के साथ गिरफ्तार हो गए। वसत कुमार विश्वास भी अपने गाँव परगाचा में गिरफ्तार कर लिये गए। यह समाचार रासबिहारी बोस के लिए खतरे की घंटी था। ब्रिटिश सरकार ने उनके लिए गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए थे। यह जानकर रासबिहारी बोस भूमिगत हो गए और बनारस जा पहुँचे।

वहीं से उन्होंने क्रांति सूत्रों को जोड़कर विप्लव की योजना आगे बढ़ाई। बनारस में वह समय-समय पर अपना निवास स्थान बदलते रहते थे। किसी संदिग्ध व्यक्ति से मुलाकात होने पर वह जल्दी ही आवास बदल देते थे। वहाँ वे दिन के समय बिलकुल भी नहीं निकलते थे। शाम के बाद ही क्रांतिकारी साथियों से मिलकर आगे की तैयारी करते थे।

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बनारस में रासबिहारी बोस के संपर्क में विष्णु गणेश पिंगले आए, जो गदर पार्टी के सदस्य थे। पिंगले ने उन्हें बताया कि गदर पार्टी के लगभग 6 हजार सदस्य अमेरिका और कनाडा से भारत पहुँच चुके हैं। रासबिहारी बोस पिंगले से बहुत प्रभावित हुए। पिंगले रासबिहारी बोस को पंजाब में आमंत्रित करने आए थे; क्योंकि वहाँ के क्रांतिकारी विप्लव योजना के नेतृत्व के लिए रासबिहारी बोस की आवश्यकता महसूस कर रहे थे।

रासबिहारी बोस ने पिंगले का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और पिंगले के साथ शचींद्र नाथ सान्याल को पंजाब भेज दिया, ताकि पंजाब का जायजा ले सकें। तदनुसार ही रासबिहारी बोस को वहाँ जाने का फैसला करने में आसानी हो। जब शचींद्र नाथ ने अपनी रिपोर्ट में रासबिहारी बोस को हरी झंडी दिखा दी तो वे जनवरी 1915 में अमृतसर पहुँच गए। वहाँ वह श्रीमती अत्री के मकान में ठहरे।

क्रांतिकारियों से उनकी भेंट धर्मशाला में होती थी। वहीं से वह विप्लव की योजना तैयार करने लगे। उन्होंने विप्लव के लिए कार्यकर्ताओं को तरह-तरह से प्रशिक्षित किया और भारी मात्रा में हथियार भी जुटाए। यह दुर्भाग्य ही था कि क्रांतिकारी दल के एक गद्दार सदस्य ने विप्लव के समय की सूचना पुलिस को दे दी।

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भेद खुलने पर बोस ने 21 फरवरी को जगह 19 फरवरी तय कर दी। गद्दार सदस्य ने यह सूचना भी पुलिस को दे दी और यह प्रयास किया कि रासबिहारी बोस और उनका पूरा दल एक साथ गिरफ्तार हो जाएँ। गद्दार सदस्य एक सीमा तक अपनी योजना में सफल भी हो गया। कई क्रांतिकारी भी पकड़े गए, किंतु रासबिहारी बोस अपनी सूझ-बूझ से बच गए। लाहौर से वह सीधे बनारस पहुँचे। वहाँ उन्होंने क्रांतिकारियों के साथ स्थिति की समीक्षा की।

जापान के लिए रवाना – बंगाल से वह बनारस चले गए। वहाँ से वह 12 मई, 1915 को जापान के सामकी मारू जहाज से जापान के लिए रवाना हो गए और 5 जून, 1915 को जापान की भूमि पर उतरे। उनका यह जापान प्रवास गिरफ्तारी से बचने के लिए नहीं था, बल्कि मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए उठाया गया एक कदम था। टोकियो पहुँचने पर रासबिहारी बोस को पता चला कि शंघाई में जर्मनी के राजदूत से मिलकर बड़ी मात्रा में हथियार प्राप्त किए जा सकते हैं।

अत: रासबिहारी बोस वहाँ से चीन के लिए रवाना हो गए। वहाँ जर्मनी के राजदूत से तो उनकी बात नहीं बनी, किंतु कुछ चीनियों के माध्यम से उन्होंने तमाम हथियार भारत भेजे। शंघाई से वह पुनः जापान लौटे। 27 नवंबर, 1915 को टोकियों में उन्होंने एक विशाल सभा का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध भाषण दिया। जब ब्रिटिश सरकार को उनके जापान पहुँचने की खबर लगी तो उसने जापान पर दबाव डाला कि वह रासबिहारी बोस को गिरफ्तार करके उन्हें सौंप दे।

Rash Behari Bose – रास बिहारी बोस

जापानी पुलिस ने रासबिहारी बोस की गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया। यह खबर मिलते ही रासबिहारी जापान में भूमिगत हो गए और जापान की ब्लैक ड्रैगन सोसाइटी के अध्यक्ष तोयामा से मिले। जापान के सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों में तोयामा का बहुत दबदबा था। उन्होंने बोस को एजोसोमा परिवार में आश्रय दिलवा दिया। सन् 1916 से 1923 तक जापान में कम-से-कम सत्रह बार उन्हें अपने निवास स्थान बदलने पड़े। इस दौरान वह हियाची के छद्म नाम से रहने लगे।

आई.एन.ए. की स्थापना – उन्हें पकड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार ने अपने एक उच्च गुप्तचर अधिकारी डी. पोटरी को जापान भेजा, लेकिन वह बोस को नहीं पकड़ पाया। रासबिहारी बोस ने प्रसिद्ध पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की पुत्री से विवाह कर लिया और १९२३ में वहाँ की नागरिकता ले ली। जापान में वह पत्रकार और लेखक के रूप में रहने लगे।

जापानी अधिकारियों को भारतीय राष्ट्रवादियों के पक्ष में खड़ा करने और देश की आजादी के आन्दोलन को उनका सक्रिय समर्थन दिलाने में भी रासबिहारी बोस की अहम भूमिका रही। २२ जून १९४२ को रासबिहारी बोस ने बैंकाक में लीग का दूसरा सम्मेलन बुलाया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए आमन्त्रित करने का प्रस्ताव पारित किया गया।

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जापान ने बर्मा और मलय के मोर्चे पर कई भारतीय युद्धबन्दियों को पकड़ा था। इन युद्धबन्दियों को इण्डियन इण्डिपेण्डेंस लीग में शामिल होने और इंडियन नेशनल आर्मी (आई.एन.ए.) का सैनिक बनने के लिये प्रोत्साहित किया गया। रासबिहारी बोस शक्ति और यश के शिखर को छूने ही वाले थे कि जापानी सैन्य कमान ने उन्हें और जनरल मोहन सिंह को आई.एन.ए. के नेतृत्व से हटा दिया लेकिन आई.एन.ए. का संगठनात्मक ढाँचा बना रहा।

बाद में इसी ढाँचे पर सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आई.एन.ए. का पुनर्गठन किया। भारत को ब्रिटिश शासन की गुलामी से मुक्ति दिलाने की जी-तोड़ मेहनत करते हुए किन्तु इसकी आस लिये हुए २१ जनवरी १९४५ को इनका निधन हो गया। 

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