Rani Laxmibai – रानी लक्ष्मीबाई

बलिदानों की धरती भारत में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने रक्त से देशप्रेम की अमिट गाथाएँ लिखीं। यहाँ की ललनाएँ भी इस कार्य में कभी किसी से पीछे नहीं रहीं। इन्हीं में से एक नाम है-झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई। उन्होंने न केवल भारत की, बल्कि विश्व की महिलाओं को गौरवान्वित किया। उनका जीवन स्वयं में वीरोचित गुणों से भरपूर, अमर देशभक्ति और बलिदान की एक अनुपम गाथा है।

Rani Laxmibai  – रानी लक्ष्मीबाई

जन्म एवं प्रारंभिक जीवन – रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को काशी में हुआ था। इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम भगीरथीबाई था। पिता मोरोपंत तांबे अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के भाई चिमाजी अप्पा के मुख्य सलाहकार थे। माता भगीरथीबाई सुशील, चतुर और रूपवती महिला थीं।

लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम ‘मनु’ था। मोरोपंत और भगीरथीबाई बड़े ही लाड़ प्यार से मनु का पालन-पोषण करने लगे। इस तरह धीरे-धीरे समय गुजरता गया। इसी बीच मनु 4 वर्ष की हुई तभी उसके ऊपर से माँ का साया उठ गया। मोरोपंत पत्नी की मृत्यु के शोक में डूब गए। यह खबर जब बिठूर में बाजीराव को मिली तो उन्होंने मोरोपंत को अपने पास बुलवा लिया।

पेशवा बाजीराव निस्संतान थे, इसलिए उन्होंने एक बालक को गोद ले लिया था। उसका नाम था नाना साहब। नाना साहब के दो भाई और थे-बालाराव और राव साहब। मनु नाना साहब और राव साहब के साथ ही खेलती-कूदती थी। उसका पालन-पोषण भी लड़कों की भाँति होने लगा। तीनों एक साथ पढ़ा करते थे।

Rani Laxmibai  – रानी लक्ष्मीबाई

उन्होंने घुड़सवारी करना, बंदूक और तलवार चलाना भी साथ-साथ ही सीखा था। मनु इन सब कलाओं मे सबसे निपुण थी| मनु को लड़कियों का साथ बहुत कम मिला था, इसलिए उसमें स्त्रियोचित गुणी के बजाय पुरुषोचित गुणों का अधिक विकास हुआ। एक बार मनु बिठूर में गंगा नदी के किनारे घुड़सवारी करने गई थी। उसके पीछे नाना साहब और एक अन्य घुड़सवार भी अपना घोड़ा सरपट दौड़ाए चले आ रहे थे।

देखत देखते दोनों ने मनु को पीछे छोड़ दिया। मनु ने जोश में आकर अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपने घोड़े को एड़ लगाई। घोड़ा सरपट दौड़ता हुआ उन दोनों से आगे निकल गया। नाना ने मनु को फिर से पछाड़ने के लिए अपने घोड़े को एड़ लगाई। घोड़ा ठोकर खाकर गिर पड़ा। इसमें नाना को गंभीर चोटें आई। यह देखकर मनु ने नाना को अपने घोड़े पर बैठाया और उसे लेकर घर आ गई। उस समय मनु की आयु मात्र 11 वर्ष थी।

वैवाहिक जीवन – धीरे-धीरे मनु विवाह योग्य हो गई। मोरोपंत उसके लिए योग्य वर की तलाश करने लगे। मनु की रुचियों व आचार-व्यवहार को देखते हुए यह भी अपने आप में एक बड़ा कार्य था। अंत में मनु का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव से हो गया। मनु अब झाँसी की रानी बन गई थी। राजा गंगाधर ने रानी लक्ष्मीबाई को किलेवाले महल में स्थान दिया था। वहाँ उनका अधिकतर समय महल के अंदर ही बीतता था।

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जब भी वे महल से बाहर निकलतीं, उनके चारों ओर परदा कर दिया जाता था। उनके लिए घुड़सवारी और व्यायाम आदि का प्रबंध किले के भीतर ही था। रानी ने महल की दासियों को हमेशा अपनी सहेलियों की तरह समझा। उन्होंने अपनी सहेलियों को घुड़सवारी और हथियार चलाने का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। राजा गंगाधर को इन सब बातों पर कोई आपत्ति नहीं थी, किंतु वे चाहते थे कि रानी भी सामान्य स्त्रियों की तरह राग-रंग में भी रुचि लिया करें, जबकि रानी को रेशमी वस्त्रों, अलंकारों में कभी रुचि ही नहीं थी।

उन्हें शस्त्रों और घुड़सवारी के अलावा कभी कुछ अच्छा ही नहीं लगता था। वे स्वयं तो तन-मन की मजबूती पर विशेष ध्यान देती ही थीं, साथ ही राजा को भी बार बार प्रोत्साहित करतीं। राजा गंगाधर कभी-कभी रुष्ट भी हो जाते, परंतु उन्हें रानी की कुशाग्र बुद्धि और साहस पर पूर्ण विश्वास था।

उस समय भारत की अधिकांश रियासतों पर अंग्रेजों ने अपनी सेनाएँ तैनात कर रखी थीं। झाँसी की तरह ही कुछ अन्य राज्य भी थे, जिनके कुछ भागों पर अंग्रेजों का अधिकार था। उससे जो आय होती थी, उसे अंग्रेज अपनी सेना पर खर्च करते थे। रानी को अपने ही देश में विदेशियों का इस प्रकार अनधिकार हस्तक्षेप बिलकुल अच्छा नहीं लगता था।

Rani Laxmibai  – रानी लक्ष्मीबाई

लक्ष्मीबाई के विवाह को तीन वर्ष हो गए थे। समय अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता जा रहा था। इसी बीच लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। पुत्ररत्न की प्राप्ति से राजा और रानी की खुशी का ठिकाना न रहा; लेकिन जल्दी ही विधाता ने उनके दामन से यह खुशी छीन ली। जन्म के तीन माह बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। पुत्र के गुजर जाने से राजा और रानी पर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। इसी शोक में राजा गंगाधर राव बीमार पड़ गए।

राजा गंगाधर राव की मृत्यु –  एक दिन उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई के सामने एक बालक को गोद लेने की इच्छा प्रकट की। रानी ने उनसे सहमत होकर एक सजातीय बालक, जिसका नाम आनंदराव था, को गोद ले लिया। रानी ने उस बालक का नाम दामोदर राव रखा। इसी दौरान राजा गंगाधर राव की हालत ज्यादा बिगड़ने लगी। एक दिन उन्हें जोर से खाँसी आई और सीने में दर्द उठने लगा। होनी किसी भी तरह टल न सकी। राजा की आत्मा परमात्मा में विलीन हो गई।

राजा की मृत्यु से पूरे राज्य में हाहाकार मच गया। रानी पति वियोग में असह्य पीड़ा से तड़पने लगीं। उसी समय मोरोपंत दामोदर राव को लेकर आ गए। उन्होंने दामोदर राव को रानी की गोद में बैठा दिया। रानी एक बार फिर से अपने कर्तव्य के प्रति सचेत हुईं। उस समय अंग्रेज भारत के देशी राज्यों पर किसी-न-किसी तरह अपना अधिकार जमाते चले जा रहे थे।

Rani Laxmibai  – रानी लक्ष्मीबाई

झाँसी के किले पर अंग्रेजो का कब्ज़ा – अधिकतर रियासतें या रजवाड़े उनके हाथ में आ चुके थे। भारत के कई राजा-महाराजाओं ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। अंग्रेज राज्य हड़पने के साथ-साथ चारों ओर अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करते जा रहे थे। रानी लक्ष्मीबाई ने दामोदर राव को गोद लेने की अर्जी अंग्रेज गवर्नर को भेज दी थी। एक दिन मेजर एलिस अपने सुरक्षा गार्डो के साथ रानी लक्ष्मीबाई के राजमहल में आया।

उसने महल के दीवान से पूछा, “महारानीजी हैं क्या ?” दीवान ने परदे की ओर इशारा करते हुए बताया कि वे परदे के पीछे विराजमान हैं। तभी मेजर ने अपनी जेब से एक पत्र निकाला और उसे पढ़ने लगा। पत्र में लिखा था—’मैंने महारानी की बालक को गोद लेने की अर्जी गवर्नर जनरल के समक्ष पेश की थी, लेकिन उन्होंने अर्जी को नामंजूर कर दिया।

सरकार की ओर से महारानी को पाँच हजार रुपए पेंशन के रूप में दिए जाएँगे। ये रुपए उनके गुजारे के लिए काफी हैं। बालक को गोद लेने की अर्जी नामंजूर करने का मतलब था कि रानी का (झाँसी का) कोई उत्तराधिकारी न होना। उस अवस्था में झाँसी का राज्य अंग्रेजों के हाथ में चला जाना था।

Rani Laxmibai  – रानी लक्ष्मीबाई

पत्र में लिखी बातों को सुनकर दीवान हाय-हाय करने लगा। रानी ने भी परदे के अंदर से ही सारी बातें सुन ली थीं। उन्होंने परदे के पीछे से ही कहा, “जब तक मेरी साँस चलेगी, तब तक मैं झाँसी को अपने हाथ से नहीं जाने दूँगी। गवर्नर ने मेरे साथ अन्याय किया है। मुझे उसकी पेंशन की कोई जरूरत नहीं है।” अर्जी नामंजूर हो जाने की खबर सुनकर रानी की दासी सुंदर, जिसे रानी ने सखियों से बढ़कर स्नेह दिया था, बिलख-बिलखकर रोने लगी।

रानी ने उसे ढाढ़स बँधाते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों का सामना आँसुओं से नहीं, तलवारों से किया जाता है। हम हार नहीं मानेंगे। अंग्रेज सरकार ने झाँसी का किला अविलंब खाली करने का आदेश रानी को दिया। मेजर ने दीवान से झाँसी के दफ्तरों की चाबियाँ ले लीं। पूरे झाँसी नगर में अंग्रेजी राज का ढिंढोरा पिटवा दिया गया। झाँसी के थाने पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। रानी लक्ष्मीबाई को भी किला खाली करना पड़ा।

अब वे झाँसी शहर के महल में रह रही थीं। उनके साथ उनकी तीन सहेलियाँ भी रह रही थीं। किला छूटने से रानी के सभी साथियों को गहरा दुःख पहुँचा था, परंतु रानी सभी को बार-बार समझाती कि दुःख की घड़ी में ही साहस और धैर्य की वास्तविक परीक्षा होती है। रानी की इस प्रकार की साहसपूर्ण बातों से उनमें उत्साह का संचार होता रानी ने अपने राज्य की सभी स्त्रियों को घुड़सवारी व हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिलवाकर उन्हें विपरीत परिस्थितियों के लिए तैयार करना शुरू कर दिया।

Rani Laxmibai  – रानी लक्ष्मीबाई

बालक दामोदर राव की उम्र उस समय पाँच वर्ष थी। रानी उसे हमेशा अपने साथ ही रखती थीं। रानी लक्ष्मीबाई जब स्वयं पुरुष वेश में घुड़सवारी करती थीं, उस समय वे अपने सिर पर लोहे का कुला धारण करती थीं। कुला के ऊपर वे साफा बाँधती थीं। उनकी दोनों बगलों में पिस्तौल और तलवारें लटकी दिखाई देती थीं।

उनके सिर के बाल कुला बाँधने में बाधा डालते थे। वे काशी जाकर मुंडन करवा लेना चाहती थीं, लेकिन कमिश्नर ने उन्हें काशी जाने की अनुमति नहीं दी। रानी ने यह संकल्प लिया कि जब तक हिंदुस्तान आजाद नहीं होगा तब तक मैं अपना मुंडन नहीं कराऊँगी।

१८५७ के स्वाधीनता संग्राम की तैयारि – स्वाधीनता संग्राम की तैयारियाँ जोरों पर थीं। रानी ने पर्याप्त युद्ध सामग्री का प्रबंध करने के आदेश दे दिए थे। झाँसी की सेना बड़े उत्साह से इस कार्य में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रही थी। रानी की सहेलियों और झाँसी की अन्य स्त्रियों ने भी बड़े उत्साह से इस स्वाधीनता यज्ञ में भाग लिया। रानी ने स्थान-स्थान पर अपने गुप्तचर नियुक्त किए हुए थे, जिनसे उन्हें अंग्रेजों की गतिविधियों के साथ-साथ अपने बीच के विश्वासघातियों का पता भी चलता रहता था।

Rani Laxmibai  – रानी लक्ष्मीबाई

इन गुप्तचरों में प्रमुख थीं, रानी की नाटकशाला की नृत्यांगना मोतीबाई एवं जूही। ये दोनों ही मुसलमान युवतियाँ थीं और रानी की बड़ी विश्वासपात्र थीं। मोतीबाई रानी को मीराबाई के भजन सुनाने के बहाने आती और उन तक विशेष समाचार पहुँचा जाती। रानी के सुझाव पर ही जूहों ने नाच गाने के बहाने अंग्रेजी सेना के हिंदुस्तानी सिपाहियों से मेल-जोल बढ़ाना शुरू कर दिया।

इन बातों की भनक कुछ अंग्रेज अफसरों को भी पड़ गई थी। उन्होंने चालाकी से मोतीबाई और जूही से सच्चाई उगलवानी चाही, परंतु सफल नहीं हो सके। धीरे-धीरे रानी के समर्थकों और विश्वासपात्रों की संख्या बढ़ती जा रही थी। साथ ही, अंग्रेज सरकार का शिकंजा भी कसता जा रहा था। आर्थिक रूप से उन्हें काफी कमजोर कर दिया गया था। अपने ही धन को पाने के लिए रानी को अर्जी और जमानत देनी पड़ती।

रानी विपरीत परिस्थितियों को देखते हुए खून के घूँट पीकर रह जात, परंतु अंदर ही अंदर उनके प्रतिशोध की ज्वाला और तीव्र हो जाती। क्रांति के लिए 31 मई की तारीख तय की गई। समय ने करवट बदली। स्वाधीनता की लड़ाई के लिए ‘कमल का फूल और रोटी’ को प्रतीक चिह्न के रूप में प्रयोग किया गया। कमल और रोटी को एक गाँव से दूसरे गाँव में भेजा जाने लगा।

Rani Laxmibai  – रानी लक्ष्मीबाई

इस बीच सांप्रदायिक सद्भाव की अनेक मिसालें देखने में आईं। सभी का साझा लक्ष्य था-स्वाधीनता हासिल करना। की सेना में भारतीय सिपाहियों के असंतोष और विरोध के गुप्त समाचार भी फैल रहे थे। उसी दौरान मेरठ छावनी में मंगल पांडे नामक सैनिक ने अपने अफसर पर गोली चला दी। चरबी वाले कारतूसों को लेकर सेना में असंतोष फैल गया।

समय से पूर्व उठाव की चिंगारी – अभी 31 मई का दिन दूर था और इधर मेरठ व दिल्ली की हिंदुस्तानी फौज ने बगावत कर लालकिले को अपने कब्जे में कर लिया। बहादुरशाह जफर को भारत का बादशाह घोषित कर दिया गया। समस्त उत्तर भारत में क्रांति की आग दहकने लगी थी। रानी ने अपने महल में लोगों का आना-जाना बहुत कम कर दिया था। उसी दौरान एक हवलदार कुछ सैनिकों को लेकर झाँसी के छोटे किले में घुस गया।

उस किले में अंग्रेजों ने अपने हथियार और कुछ धन छिपा रखा था। झाँसी के सैनिक अस्त्र-शस्त्र और रुपए-पैसे लेकर पलायन कर गए। रानी के आदेश से समय से पहले ही युद्ध शुरू हो गया था। जिस किले में अंग्रेज छिपे हुए थे, उस किले पर रानी के सिपाही आक्रमण करते रहे, परंतु अंग्रेजों ने अपनी गोलियों की बौछारों से उन सिपाहियों को पीछे धकेल दिया। अगले दिन शाम को लड़ाई में कुछ ढील रही।

Rani Laxmibai  – रानी लक्ष्मीबाई

अंग्रेज भूख से छटपटा रहे थे। उन्होंने रानी से भोजन का प्रबंध करवाने की प्रार्थना की। रानी को उन पर दया आ गई। उन्होंने अंग्रेज सैनिकों के लिए रोटियाँ बनवाकर सुरंग के माध्यम से किले तक भिजवाई। रोटी खाकर अंग्रेज सैनिकों ने अपनी भूख मिटाई। वे रानी की इस दयाशीलता का गुणगान करने लगे।

स्वाधीनता संग्राम दिन-प्रतिदिन जोर पकड़ता जा रहा था। झाँसी के दक्षिणी और पश्चिमी मोरचे पर भी घमासान युद्ध शुरू हो गया। रानी की सेना में दुल्हाजू नाम का एक देशद्रोही भी था। वह छुपकर अंग्रेजों को सहायता कर रहा था। रानी को इस बात की भनक लग गई। जिस समय वह अंग्रेज सैनिकों को लेकर किले के फाटकों पर लगे ताले तोड़ रहा था, तभी रानी की सहेली सुंदर ने उसके ऊपर तलवार से वार किया, लेकिन वह बच निकला।

उसी समय एक अंग्रेज सैनिक ने सुंदर पर गोली चला दी, जिससे वह वहीं पर शहीद हो गई। रानी के सभी प्रिय एवं विश्वासपात्र साथी धीरे-धीरे मारे जा रहे थे। सैनिकों की संख्या भी दिन पर दिन कम होती जा रही थी। सुंदर के बाद रानी का वफादार सेनापति खुदाबख्श भी दुश्मनों के हाथों मारा गया।

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इस खबर से रानी का खून खौल उठा। वे अपनी तैयारी कर अंग्रेजों पर टूट पड़ीं और उनका सफाया करना शुरू कर दिया। समय-समय पर वह अपने सैनिकों का हौसला बढ़ाती रहती थीं। वे चिल्ला-चिल्लाकर कह रही थीं-“वीर सैनिको, आज दिखा दो अपनी तलवार की ताकत! अंग्रेजों को दिखा दो कि हिंदुस्तानी सिपाहियों के सामने टिक पाना मुश्किल है!”

माँ चंडी का रूप धारण किया – धीरे-धीरे युद्ध भयानक होता जा रहा था। रानी के कई योद्धा लड़ाई में मारे जा चुके थे। यह देखकर रानी ने अपने कुछ सहयोगियों से विचार-विमर्श किया। उसके बाद उन्होंने अपने कुछ सैनिकों को साथ लिया और स्वयं रणचंडी की तरह मैदान में कूद पड़ीं। पुत्र दामोदर राव को उन्होंने अपनी पीठ पर चादर से कसकर बाँध लिया। रानी को टोली जब कोतवाली के पास पहुँची तो वहाँ भीषण युद्ध शुरू हो गया। अंग्रेजी सेना को चीरती हुई वे लगातार आगे बढ़ती जा रही थीं।

उनकी तलवार निर्दयतापूर्वक दुश्मनों को मौत के घाट उतार रही थी। लगता था, जैसे रानी की तलवार की रक्त-पिपासा शांत हो नहीं होना चाहती थी। इस युद्ध में रानी लक्ष्मीबाई साक्षात् दुर्गा लग रही थीं। अंग्रेज सैनिकों का संहार करती हुई रानी जब पहूज नदी के किनारे पहुंची तो उन्हें जोरों की प्यास लगी। उन्होंने वहाँ थोड़ी देर रुककर जलपान किया, परंतु अभी विश्राम का समय दूर था।

Rani Laxmibai  – रानी लक्ष्मीबाई

उन्हें पुनः दुश्मन से टकराना पड़ा। वे लगातार आगे बढ़ती जा रही थीं। उनके सामने जो भी दुश्मन आता था, उसका सिर धड़ से अलग हो जाता था। इसी बीच रानी का घोड़ा भी घायल हो गया था। वह एक अन्य घोड़े पर सवार होकर आधी रात में कालपी पहुँचीं। वहाँ उन्हें खबर मिली कि अंग्रेज सैनिक ग्वालियर को घेरने के लिए आ रहे हैं। समाचार मिलते ही क्षण भर का विलंब किए बिना वे उनका सामना करने के लिए निकल पड़ीं।

अंतिम युद्ध – पेशवा के राव साहब की सेना भी रानी के साथ मिल गई। रानी ने अंग्रेजो सेना का डटकर मुकाबला किया। घमासान युद्ध आरंभ हो गया। रानी ने अपने रण-कौशल से अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिए। अगले दिन सुबह रानी ने पुनः युद्ध में जाने की तैयारी की। आज वह आर-पार की लड़ाई लड़ने जा रही थीं। उन्होंने अपने सरदार रामचंद्र से कहा, “अगर मैं लड़ते लड़ते मृत्यु को प्राप्त हो जाऊँ तो भी तुम मेरा शव दुश्मनों को मत छूने देना।” चारों ओर से मोरचा सँभाल लिया गया।

रानी भी अपनी दोधारी तलवार निकालकर मोरचे पर डट गई। देखते-देखते भीषण युद्ध शुरू हो गया। रानी लगातार दुश्मनों पर हमला करके उन्हें मौत के घाट उतारती जा रही थीं। उनके विकराल रूप को देखकर दुश्मन थर-थर काँप रहे थे। इसी बीच रानी को अपने मोरचे की शेष सेना की आवश्यकता अनुभव हुई तो वे उनसे मिलने पश्चिम दिशा की ओर मुड़ीं, परंतु अंग्रेज सैनिक उनके सामने आ गए।

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इस स्थिति में रानी ने घोड़े की लगाम अपने दाँतों में दबाई और दोनों हाथों से तलवार चलाती हुई आगे बढ़ गई। अब तक उनके अधिकांश सैनिक मारे जा चुके थे। रानी अकेली पड़ती जा रही थीं। अंग्रेज सैनिकों ने रानी और उनके बचे हुए थोड़े से साथियों को एक घेरे में ले लिया। फिर भी रानी ने हार नहीं मानी। उनकी तलवार से रास्ता साफ होता चला जा रहा था।

दुश्मन के पैदल सैनिक रानी के पीछे लगे हुए थे। उनसे पीछा छुड़ाना रानी के लिए मुश्किल हो रहा था, तभी अचानक एक सैनिक ने उनके पेट पर वार किया। रानी के पेट से रक्त बहने लगा। रानी ने अपने साथी रघुनाथ सिंह को आवाज देकर कहा, “रघुनाथ सिंह, दुश्मन मेरे शरीर को छूने न पाएँ।”

घायल अवस्था में भी रानी दुश्मन के सैनिकों को गाजर-मूली की तरह काट रही थीं। उन्होंने बच निकलने का प्रयास किया और एक झटके से घोड़ा दौड़ाती हुई सैनिकों के बीच से निकल गईं; परंतु दुर्भाग्यवश यह घोड़ा पहलेवाले घोड़े की ही भाँति कुशल नहीं था। कुछ दूर जाकर वह अचानक अड़ गया। रानी ने लगाम को झटके दिए, घोड़े को पुचकारा, परंतु घोड़ा टस से मस नहीं हो रहा था।

Rani Laxmibai  – रानी लक्ष्मीबाई

शहादत – उधर दुश्मन के सैनिक समीप आते जा रहे थे। स्थिति हाथ से निकलती जा रही थी और अंततः दुश्मन सिर पर आ पहुँचा। तभी एक सैनिक ने एक गोली दागी, फिर भी रानी रुकी नहीं। उन्होंने किसी तरह घोड़े को आगे बढ़ाया और कई अंग्रेज सैनिकों को काटते हुए आगे बढ़ने लगी रानी की सहायता करने के लिए उनका एक सरदार आगे आया। लेकिन तभी एक अंग्रेज सैनिक ने रानी लक्ष्मीबाई के सिर पर वार किया, जिससे उनके सिर का दायाँ हिस्सा कट गया और रानी वीरगति को प्राप्त हुईं।

झाँसी का तेजस्वी सूर्य सदा के लिए अस्त हो चुका था। रानी के कुछ विश्वासपात्र सैनिकों ने वहीं रानी का दाह संस्कार कर दिया। आज वीरता की प्रतिमूर्ति रानी लक्ष्मीबाई हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी देशभक्ति और अदम्य साहस की अमर गाथा लाखों-करोड़ों स्त्रियों को हमेशा प्रेरणा प्रदान करती रहेगी।

Chhava

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