Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

Rani-Durgavati

Rani Durgavati

प्रारंभिक जीवन – इस देश की आन, बान और शान की रक्षा का इतिहास अनेक वीर सपूतों और इन वीरांगनाओ के रक्त से लिखा गया है। बलिदानों की इसी लंबी श्रृंखला में एक नाम आता है, गोंडवाना की रानी दुर्गावती का। वे चंदेल राजा कीर्तिसिंह शालिवाहन की एकमात्र संतान थीं। उनके पिता उन्हें प्यार से ‘दुर्गा’ कहते थे। बाल्यावस्था में ही उनकी माँ का देहांत हो जाने के कारण उनके पिता ने बड़े प्यार से उनका लालन-पालन किया।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

दुर्गावती का बचपन एक स्वतंत्र माहौल में बीता था। उनकी शिक्षा-दीक्षा युवकों के समान ही हुई, क्योंकि उनके पिता उन्हें अपनी पुत्री नहीं वरन् पुत्र मानते थे। दुर्गावती का रुझान भी साज-शृंगार की बजाय शिकार और घुड़सवारी की ओर अधिक रहा। उन्हें बचपन से ही शस्त्र विद्या सीखने तथा घुड़सवारी करने का शौक था। उनके पिता ने उन्हें अस्त्र-शस्त्र चलाने की उत्तम शिक्षा दिलवाई, जिसमें वे कुछ ही समय में निपुण हो गईं। उनका निशाना बहुत अच्छा था।

बाघ, शेर और चीतों का शिकार करने में उन्हें बहुत आनंद आता था। शिकार पर जाते समय वे सदैव हाथी अथवा घोड़े की सवारी किया करती थीं। उनकी अचूक निशानेबाजी तथा शेर-चीतों का शिकार करने की गाथा दूर-दूर तक फैल चुकी थी। उनके पिता इन सबसे बहुत खुश होते थे और समय-समय पर उन्हें प्रोत्साहित करते रहते थे। अब दुर्गावती काफी बड़ी हो चुकी थीं। वे अत्यंत सुंदर तथा रूपवती कन्या थाँ।

उनकी एक सहेली थी रामचेरी। वह सदा छाया की तरह दुर्गावती के साथ लगी रहती और उनका सब तरह से खयाल रखती थी। दुर्गावती भी उसपर विशेष अनुराग रखती थीं। रामचेरी दुर्गावती के साहस और उनकी वीरता से अत्यधिक प्रभावित थी तथा उठते-बैठते उनका गुणगान करती रहती थी।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

रानी दुर्गावती का विवाह – एक दिन गोंडवाना के राजा दलपति शाह चंदेल नरेश कीर्तिसिंह के यहाँ आए। वे कुछ हाथी, कुछ घुड़सवार तथा बारह हजार पैदल सैनिक अपने साथ लेकर आए थे। कीर्तिसिंह ने दलपति शाह का उनके दल-बल सहित बड़ी धूमधाम से स्वागत किया। शाम को कीर्तिसिंह उन्हें मंदिर दिखाने के लिए ले गए। दलपति शाह मंदिर देखकर मंत्रमुग्ध हो गए। इसके पश्चात् दलपति शाह ने दुर्गा माता के मंदिर को देखने की इच्छा जताई।

उस समय मंदिर में दुर्गावती पूजा कर रही थीं। वे पूजा करके मंदिर से निकल और सीधे राजमहल में चली गई। उनकी नजर दलपति शाह पर नहीं पड़ी। इधर दलपति शाह ने राजकुमारी को आज पहली बार देखा था। सुंदरता व साहस का यह अद्भुत संगम देखकर वे दंग रह गए। उनके मन में दुर्गावती से भेंट करने की उत्कट इच्छा उत्पन्न हुई।

अगले दिन कीर्तिसिंह, दलपति शाह और दुर्गावती शिकार खेलने के लिए गए। वहाँ जंगल में अवसर देखकर रामचेरी ने दलपति शाह के साथी मोहनदास को सावधानी से अपनी योजना से अवगत कराते हुए दलपति शाह एवं दुर्गावती की भेंट का समय निश्चित कर दिया। अगले दिन नियत समय पर दलपति शाह सुरंग से होते हुए राजकुमारी की फुलवारी में पहुँच गए। वहाँ दुर्गावती पहले से ही उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं। वे दोनों आपस में बातें करने लगे। अगले दिन दलपति शाह अपनी सेना को लेकर कालिंजर से प्रस्थान कर गए।

Click on below links to read more | अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

More Hindi Blogs

History in Hindi Articles

Kittur Rani Chennamma – कित्तूर रानी चेन्नम्मा

उधर रामचेरी और दुर्गावती ने थोड़े से हीरे, जवाहरात तथा गहने एक गठरी में बाँध लिये और एक-एक बंदूक अपने साथ लेकर सुरंग मार्ग से किले के बाहर निकल गई। यह सुरंग एक पहाड़ी गुफा में जाकर खुलती थी। उस पहाड़ी के पास दलपति शाह दुर्गावती की प्रतीक्षा पहले से ही कर रहे थे।

उन्होंने दुर्गावती और रामचेरी को एक हाथी पर बिठाया और गोंडवाना राज्य की ओर चल पड़े। कुछ दिनों के बाद दुर्गावती भी गोंडवाना राज्य देखकर वापस आ गईं। उनके आने के कुछ दिन बाद दलपति शाह के पिता संग्राम शाह ने कीर्तिसिंह के पास संदेश भिजवाया कि मैं आपकी पुत्री दुर्गा का हाथ अपने पुत्र दलपति के लिए माँग रहा हूँ। यह संदेश सुनकर कीर्तिसिंह को अपना अपमान महसूस हुआ और उन्होंने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया।

जब दुर्गावती को इस बात का पता चला तो उन्होंने दलपति शाह को एक पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने लिखा कि हमारे बीच कुछ सामाजिक बाधाएँ आ रही हैं, लेकिन मुझे उनकी कोई चिंता नहीं है। आप शीघ्र आकर मुझे यहाँ से ले जाएँ। रामचेरी ने वह पत्र दलपति शाह तक पहुँचा दिया। पत्र पाकर दलपति शाह ने अपने पिता से विचार-विमर्श किया और अपनी सेना लेकर चंदेल राज्य की ओर चल पढ़े।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

साथ ही, दूत भेजकर चंदेल नरेश कीर्तिसिंह के पास सूचना भिजवा दी कि गोंड नरेश दलपति शाह ने चंदेल राज्य पर चढ़ाई कर दी है। अंततः कीर्तिसिंह ने अपनी पुत्री दुर्गावती की इच्छा को मान लिया और उनका विवाह दलपति शाह के साथ कर दिया। चंदेल राजकुमारी दुर्गावती अब गोंडवाना की महारानी थीं। सिंगोरगढ़ पहुँचने पर जनता उनकी जय-जयकार करने लगी। कई दिनों तक आनंद उत्सव मनाया गया।

राज्य कारभार में पति का सहयोग – शुरू में कुछ समय तक दुर्गावती को वहाँ की जनता की बोली समझने में कुछ दिक्कत हुई, परंतु धीरे-धीरे वे सब समझने लगीं। वहाँ के रीति-रिवाजों के अनुसार दुर्गावती परदा नहीं करती थीं। कुछ दिनों के बाद तो उन्होंने शिकार पर जाना भी आरंभ कर दिया। एक दिन वे अपने पति दलपति शाह के साथ शिकार खेलने निकलीं। उन्होंने पहले ही दिन एक बाघ-बाघिन के जोड़े को मार गिराया। दलपति शाह उनका अचूक निशाना देखकर दंग रह गए और उनको प्रशंसा करने लगे।

रानी दुर्गावती एक साहसी, निर्भीक तथा गुणवंती महिला थीं। वे अपने पति को शासन से संबंधित कामों में सलाह भी देती थीं। उन्होंने सेना को भली-भाँति प्रशिक्षित करने का भी सुझाव दिया, ताकि दुश्मनों पर आसानी से विजय प्राप्त की जा सके। वे विकट परिस्थितियों में भी अपने पति का साहस बढ़ाती रहती थीं तथा अपनी योजनाओं से उन्हें अवगत कराती रहती थीं।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

साथ ही, वे प्रजा-पालन को प्राथमिकता देती थीं। उनका मानना था कि कठिन परिस्थितियों में भी प्रजा के सुख-दुःख का खयाल रखना राजा का प्रमुख कर्तव्य होता है। रानी दुर्गावती अपने इस नए राज्य के हर क्षेत्र से भली-भाँति परिचित होना चाहती थीं। अतः उन्होंने अपने पति दलपति शाह के साथ राज्य के सभी प्रमुख दर्शनीय स्थलों का भ्रमण किया। वे हर क्षेत्र में जातीं, वहाँ प्रजा के अभावों की पूर्ति का आदेश देतीं।

दलपति शाह अपनी पत्नी के इस प्रजा-वत्सल रूप को देखकर बहुत प्रसन्न व संतुष्ट हुए। रानी दुर्गावती ने जनता की भलाई के लिए मंदिर तथा कुएं बनवाए। उन्होंने माहिष्मती में एक प्रसिद्ध ताल खुदवाया, जिसका नाम ‘रानी ताल’ रखा गया। इसी ताल के पास रामचेरी ने भी अपने गले की मोतियों की माला जनता को भेंट करके एक ताल खुदवाया। इस ताल का नाम ‘चेरी ताल’ रखा गया। रामचेरी के इस पुण्य कार्य से प्रेरित होकर जागीर के प्रधानमंत्री आधारसिंह ने भी वहाँ एक ताल बनवाया। इस ताल का नाम उसने ‘आधार ताल’ रखा।

इस प्रकार एक ही स्थान पर तीन ताल खुद जाने से वहाँ की जनता खुशहाल हो गई। राज्य की जनता रानी को माँ दुर्गा तथा लक्ष्मी के रूप में पूजने लगी। इस प्रकार रानी की प्रसिद्धि पूरे राज्य में फैल गई। रानी दुर्गावती ने लगभग एक वर्ष का समय राज्य का भ्रमण करने में लगा दिया। इस भ्रमण के दौरान उन्होंने राज्य के विभिन्न किलों तथा दर्शनीय स्थलों पर कई-कई दिनों का प्रवास किया।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

वे अपने राज्य को अंदर-बाहर सभी ओर से सुदृढ़ देखना चाहती थीं। अत: इन सब कार्यों के साथ-साथ उन्होंने पति दलपति शाह से कहकर सेना को भी सुसंगठित किया। कुछ महीनों के बाद रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। पुत्र रत्न की प्राप्ति की खबर सुनकर राजा दलपति शाह की खुशी का ठिकाना न रहा।

इस शुभ अवसर पर उन्होंने खूब खुशियाँ मनाई। उन्होंने बालक का नाम ‘वीर नारायण’ रखा। वीर नारायण अपने माता-पिता की ही भाँति सुंदर तथा गुणवान् था। रानी दुर्गावती अपना अधिकांश समय उसके लालन-पालन में लगाने लगीं। अब उन्होंने शिकार पर जाना भी बंद कर दिया था।

राजा दलपति शाह की मृत्यु – अभी वीर नारायण केवल कुछ ही वर्ष का था कि एक दिन अचानक राजा दलपति शाह की तबीयत खराब हो गई। कई दिनों तक इलाज चला, परंतु उनकी हालत नहीं सुधरी। अंततः एक दिन उनका स्वर्गवास हो गया। रानी दुर्गावती के लिए यह एक भीषण आघात था। राजा दलपति शाह के बिना वे स्वयं को अपूर्ण मानती थीं। उनके बिना वे जीवित रहने की कल्पना भी नहीं कर सकती थीं।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

अतः उन्होंने अपने पति के साथ ही सती होने का निश्चय कर लिया। तब रानी दुर्गावती की सखी रामचेरी ने रानी को कर्तव्य-बोध कराते हुए अपने पुत्र तथा प्रजा की याद दिलाई, जिनके सिर से पिता तथा संरक्षक का साया उठ चुका था। रानी को राजा दलपति शाह के अपूर्ण कार्यों का ध्यान आया और वे अपना दुःख भूलकर कर्तव्य पालन में जुट गई।

पुत्र वीर नारायण का राजतिलक – एक ओर महाराज के अंतिम संस्कार की तैयारियाँ हो रही थीं, दूसरी ओर खाली राजसिंहासन पर कई आँखें लगी हुई थीं। आस-पास के शत्रु भी सिर उठाने लगे थे। सभी को गोंडवाना पर कब्जा जमाने के लिए यह एक अच्छा अवसर जान पड़ा। रानी इस स्थिति से अनभिज्ञ नहीं थीं। वे राज्य की नाजुक स्थिति को भाँप गई थीं।

उन्होंने शीघ्र ही स्थिति पर पुनः नियंत्रण कर लिया और बड़ी कुशलता के साथ राज्य के शासन का संचालन करने लगीं। वे सदा प्रजा की भलाई के लिए सोचती तथा नई-नई योजनाएँ कार्यान्वित करतीं। उनके शासनकाल में चारों ओर खुशहाली थी। राजकाज के साथ-साथ उन्होंने वीर नारायण की शिक्षा-दीक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

उचित देख-रेख के फलस्वरूप वीर नारायण ने जल्दी ही कई क्षेत्रों में निपुणता प्राप्त कर ली। अपने पंद्रह वर्ष के शासनकाल में रानी दुर्गावती ने अपने आस-पास के कुछ और क्षेत्रों को भी अपने राज्य में मिला लिया था। अब वे अपने बेटे वीर नारायण को राज-काज सौंपना और स्वयं इस दायित्व से मुक्त होना चाहती थीं।

इसी समय उन्हें मुगलों द्वारा अपने साम्राज्य के विस्तार की योजना का पता चला। इस खबर को सुनकर वे जरा भी वे विचलित नहीं हुई और युद्ध की तैयारी में जुट गईं। इसी बीच उन्होंने अपने पुत्र वीर नारायण का राजतिलक करवा दिया और स्वयं उसकी संरक्षिका के रूप में कार्य करने लगीं। उनका प्रधानमंत्री आधार सिंह बड़ी लगन तथा निष्ठा के साथ अपने नए राजा की सेवा में रहने लगा। राज्य की प्रजा नए राजा के राज-काज से बहुत खुश थी।

मालवा का आक्रमण –  एक दिन अचानक रानी को सूचना मिली कि मालवा का सुलतान बाज बहादुर एक विशाल सेना लेकर उनके राज्य पर आक्रमण करने आ रहा है। रानी ने भी अपनी सेना को मुकाबला करने के लिए तैयार कर लिया। उन्होंने अपने सभी सैनिकों से कहा कि युद्ध केवल शक्ति से नहीं, बल्कि बुद्धि और शक्ति के मेल से जीते जाते हैं।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

अतः वे शत्रु की विशाल सेना से भयभीत हुए बिना पूरे साहस के साथ टूट पड़े। रानी के शब्दों ने सेना में अपार उत्साह भर दिया। गढ़ के उत्तर-पश्चिम में रानी ने पहाड़ियों की आड़ में अपने हाथियों को मोरचे पर लगा दिया। कुछ दिनों के बाद बाज बहादुर की सेना घाटियों में पहुँच गई।

वहाँ रानी के सैनिकों, जो पहाड़ियों में पहले से ही मौजूद थे, ने शत्रु सेना को घेर लिया और उस पर तीरों की बौछार कर दी। इस कारण बाज बहादुर के हाथियों में भगदड़ मच गई और वे पैदल सैनिकों को कुचलने लगे। यह देखकर उसके सिपाही घबरा गए और मैदान छोड़कर भागने लगे। रानी दुर्गावती ने बिजली जैसी फुरती दिखाई और मालवा की सेना के मुख्य भाग पर आक्रमण कर दिया।

उन्होंने जमकर युद्ध किया और बाज बहादुर के चाचा फतेह खाँ को मौत के घाट उतार दिया। फतेह खाँ के मरते ही मालवा की सेना पीछे हटने लगी। अपने सरदारों को मरते देख बाज बहादुर का साहस टूट गया और वह अपने कुछ सैनिकों को लेकर वहाँ से भाग गया। महारानी की विजयी सेना राजधानी की ओर जयघोष करती हुई लौट आई।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

मुगलो पर रानी दुर्गावती का कहर – सन् 1555 से 1560 के बीच मालवा के सुलतान ने गोंडवाना राज्य पर कई बार आक्रमण किया, परंतु हर बार उसे रानी दुर्गावतों के हाथों परास्त होना पड़ा। रानी ने इन युद्धों में अपने अदम्य साहस, दूरदृष्टि तथा बुद्धिमत्ता का परिचय दिया। शेरशाह के बाद जब अकबर दिल्ली के सिंहासन पर बैठा, तब रानी की चिंता कुछ बढ़ गई। रानी जानती थीं कि अकबर बहुत ही महत्त्वाकांक्षी था। एक दिन अकबर के सेनापति ने मालवा पर हमला कर दिया। बाज बहादुर अपनी जान बचाने के लिए चौरागढ़ की पहाड़ियों में छुप गया।

उधर, मुगल सेना उसका पीछा करती हुई बढ़ी चली आ रही थी। रानी किसी भी कीमत पर मुगल सेना को अपनी सीमा में प्रवेश नहीं करने देना चाहती थीं, इसलिए रानी ने बाजबहादुर को चौरागढ़ की पहाड़ियों से वापस खदेड़ दिया। एक बार अकबर अपने सूबेदार आसफ खाँ के यहाँ कड़ा नामक स्थान पर ठहरा हुआ था। उसी समय आसफ खाँ ने अकबर को बताया कि गोंडवाना एक बहुत ही साधन-संपन्न तथा खुशहाल राज्य है। वहाँ की शासक दुर्गावती नाम की एक रानी है, जो वास्तव में बहुत योग्य तथा कर्मठ है।

उसके पास हाथियों की भरमार है। यह सुनकर अकबर ने आसफ खाँ से गोंडवाना की फौज के बारे में जानकारी प्राप्त करने को कहा और उचित अवसर देखकर उसका लाभ उठाने की बात कहकर वहाँ से दिल्ली लौट आया। कुछ दिनों के बाद आसफ खाँ ने रानी दुर्गावती को एक धमकी भरा संदेश भेजकर सफेद हाथी को अपने हवाले करने के लिए कहा।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

अकबर ने रानी के पास सोने का एक पिंजरा और एक पत्र भेजा था, जिसमें उसने लिखा था कि औरत होकर राज-काज करना आपको शोभा नहीं देता। आप इस पिंजरे में बंद हो जाइए और आराम से रहिए। यह सुनकर रानी दुर्गावती क्रोध से आगबबूला हो गई और उन्होंने उस पिंजरे का जवाब पिंजरे से देने के लिए अपने प्रधानमंत्री को आदेश दिया।

रानी ने प्रधानमंत्री से कहा कि अकबर के पास इससे भी भारी सोने का एक पिंजरा भेजो और उसके साथ ही यह संदेश भी भिजवा दो कि पुरुष होकर एक स्त्री को सतानेवाला राजा बनने के लायक बिल्कुल नहीं हो सकता। तुम जैसे व्यक्ति को तो राज-काज छोड़कर रुई धुननी चाहिए। और उन्होंने यह पिंजरा अकबर के पास भिजवा दिया।

इसके जवाब में अकबर का सूबेदार एक विशाल सेना लेकर गोंडवाना की ओर चल पड़ा। रानी को अपने गुप्तचरों के द्वारा इस बात की सूचना जैसे ही मिली, रानी ने युद्ध की पूरी तैयारी कर ली। उन्होंने कुछ विशेष स्थानों पर गुप्त रूप से अपनी सेना लगा दी। मुगल सेना विशाल और अत्याधुनिक हथियारों व तोपों से लैस थी, और इधर रानी की सेना में इनका अभाव था।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

फिर भी उनकी सेना ने वीरतापूर्वक युद्ध किया; परंतु अंत में उनकी सेना को पीछे हटना पड़ा। महारानी अपनी इस आरंभिक विफलता से काफी चिंतित हो उठीं। फिर भी वह बड़े आत्मविश्वास तथा कुशलता के साथ युद्ध का संचालन करती रहीं। उन्होंने अपने सैनिकों के मनोबल को जरा भी कम नहीं होने दिया। वे स्वयं भी एक घोड़े पर सवार होकर उनके साथ मुगल सेना से मुकाबला करने के लिए निकल पड़ीं।

उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए शत्रु की शक्ति को भाँप लिया और चतुराई से अपने सैनिकों को पीछे हटने के लिए कहा। रानी का संकेत पाते ही उनके सैनिक पीछे हटने लगे और घने जंगलों में छिप गए। आसफ खाँ ने सोचा कि रानी के सैनिकों के पैर उखड़ चुके हैं। उसने अपनी सेना को रानी के सैनिकों का पीछा करने के लिए कहा। मुगल सैनिक जैसे ही घने जंगलों में पहुॅचे, वहाँ पहले से छिपे बैठे रानी के सैनिकों ने उनपर आक्रमण कर दिया और अधिकतर मुगल सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।

जो सैनिक बच गए वे वहाँ से भाग खड़े हुए। इस घटना पर आसफ खाँ को बहुत पश्चात्ताप हुआ। वह समझ गया कि रानी बड़ी ही चतुर महिला थीं। वह अपने बचे-कुचे सैनिकों के साथ वापस लौट गया। रानी ने अपने घायल सैनिकों का समुचित उपचार कराया और फिर सिंहगढ़ लौट आई।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

इसके बाद भी मुगल सेना ने गोंडवाना राज्य पर कई बार आक्रमण किया, परंतु उसे सफलता नहीं मिली। लगातार पराजय का मुँह देखते-देखते एक बार किसी तरह आसफ खाँ अपनी सेना को लेकर सिंगोरगढ़ तक पहुँच ही गया। उसने सिंगोरगढ़ को चारों ओर से घेर लिया और अपनी तोपों को पहाड़ियों पर चढ़ा दिया।

रानी के पास किले की सुरक्षा के लिए केवल तीन ही तोपें थीं, जो पर्याप्त सिद्ध नहीं हो सकीं। फिर भी रानी अपने अविचल धैर्य के साथ मुगल सेना से लड़ती रहीं। उधर, आसफ खाँ ने सैनिकों की एक टुकड़ी को राजधानी गढ़ पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया। रानी ने बड़ी सूझ-बूझ का परिचय दिया और उन्हीं तीन तोपों की सहायता से शत्रुओं को पराजित कर दिया।

इस विजय से रानी ने थोड़ी राहत की साँस ली और फिर वे वापस किले में लौट आई; परंतु दुश्मन की बड़ी तैयारियों को देखते हुए वे अधिक निश्चित नहीं हो पाई थीं। अगला युद्ध जीतने की उनकी आशा क्षीण हो चली थी। वे वीर नारायण को चौरागढ़ वापस भेजना चाहती थीं, परंतु ऐसी विकट परिस्थिति में वह अपनी माँ को अकेला छोड़कर वहाँ से नहीं गया। शत्रु सेना अगले दिन फिर एक बार सामने थी।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

रानी अपनी पूर्ण शक्ति के साथ दुश्मन की सेना पर टूट पड़ीं; परंतु कुछ ही देर बाद उनकी सेना को पीछे हटना पड़ा। रानी वहाँ से सिंहगढ़ पहुँच गई। वहाँ उन्होंने मंडला की पहाड़ियों के पास अपनी सेना का मोरचा लगा दिया। वहाँ मुगल सेना के साथ घमासान युद्ध हुआ। आसफ खाँ को इस बार भी हार का मुँह देखना पड़ा। ऐसे समय में आसफ खाँ को रानी के एक दुश्मन की ओर से तुरंत सहायता मिल गई और वह फिर से लड़ने के लिए तैयार हो गया।

रानी दुर्गावती वीर गति को प्राप्त हुई – अगले दिन फिर घमासान युद्ध हुआ। रानी ने अद्भुत शौर्य का परिचय दिया। रानी के भयंकर संहार के कारण दुश्मन के सैनिक मैदान छोड़कर भागने लगे। तभी अचानक एक तीर आकर रानी दुर्गावती की आँख में लगा रानी ने अटूट साहस का परिचय देते हुए तीर को निकाल फेंका, परंतु उनकी एक आँख खराब हो गई और वे खून से लथपथ हो गईं।

आँख में असहनीय दर्द होने के बावजूद वे मैदान में डटी रहीं और शत्रु- सेना का संहार करती रहीं। वे अपनी प्राणाहुति देकर भी अपने धर्म तथा प्रजा की रक्षा करना चाहती थीं; परंतु उनकी सेना के पैर उखड़ने लगे। रानी मजबूर होकर मंडला की ओर चल पड़ीं। तभी एक और तीर आकर उनकी गरदन में धँस गया।

Rani Durgavati – रानी दुर्गावती

अब रानी को अपने जीवित रहने की आशा नहीं रही। उन्होंने अपने हाथी के महावत से कहा, “मेरे सीने में अपना अंकुश घुसा दो, ताकि जीते जी दुश्मन मेरे शरीर की पवित्रता को दूषित न कर सके।” जब महावत ऐसा करने का साहस नहीं जुटा पाया तो उन्होंने अपनी कटार स्वयं ही अपनी छाती में भोंककर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।

इसके कुछ ही समय बाद मुगल सैनिकों से दुर्ग की रक्षा करते हुए राजकुमार वीर नारायण भी वीरगति को प्राप्त हो गया। महान् वीरांगना दुर्गावती ने जहाँ अपना पवित्र शरीर त्यागा था, अब वहाँ उनका एक भव्य स्मारक बना हुआ है, जो आज भी उनके शौर्य और बलिदान का अटल प्रमाण प्रस्तुत करता है। 

Chhatrapati Shivaji Maharaj : छत्रपती शिवाजी महाराज चरित्र

 

Leave a Comment