Ramkrishna Paramhans – रामकृष्ण परमहंस

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श्री रामकृष्ण परमहंस आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ साधक हो गये हैं। उन्हें युगावतार पुरुष भी माना जाता है। फ्रांस के प्रसिद्ध दार्शनिक रोम्यों रोला ने उन्हें सर्वधर्म समन्वय का प्रतीक बतलाया है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘रामकृष्ण एक जीवनी’ में लिखा है कि इस महापुरुष के आदेश से केवल भारत का नहीं, समस्त मानवता का कल्याण संभव है।”

Ramkrishna Paramhans – रामकृष्ण परमहंस

एक साधारण गरीब घर में 18 फरवरी, 1836 में रामकृष्ण देव का जन्म हुआ। माता चन्द्रमणि देवी और पिता खुदीराम चट्टोपाध्याय ने ऐसा एक अनमोल रत्न पैदा किया, जिसने समस्त जगत को जीवनभर आलोकित किया। 15 अगस्त, 1886 को मध्य रात्रि में दिव्य पुरुष माँ काली का नाम तीन बार उच्चारण कर परम तत्त्व में विलीन हो गये।

श्री रामकृष्ण देव को महात्मा बुद्ध, ईसा मसीह आदि की कोटि में रखा जा सकता है जिन्होंने मानवता के सर्वांगीण विकास में अपने को अर्पण कर दिया है। ठाकुर श्री रामकृष्ण कहा करते थे “भूखे पेट धर्म नहीं हो सकता, खाली पेटे धर्म होय ना”। वे सदा दीन-दुःखियों की सेवा करते। गरीबों को देखकर द्रवित होते। यहां एक घटना का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा।

एक बार वे रानी रासमणि के दामाद माथुर बाबू के साथ तीर्थयात्रा पर निकले। देवघर के पास कुछ गरीबों को देखा। उन्होंने माथुर बाबू को दीन-दुःखियों के लिए भोजन और वस्त्र की व्यवस्था करने का अनुरोध किया। जब माथुर बाबू ने अपनी असमर्थता प्रकट की तो उन्होंने बीच में यात्रा रद्द करने की इच्छा प्रकट की।

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उनका कहना था कि सभी तीर्थादनों का फल दीन दुःखियों की सेवा है। अंत में माथुर बाबू ने गरीबों को भोजन कराकर वस्त्र दिया। तब कहीं रामकृष्ण देव संतुष्ट हुए।  रामकृष्ण परमहंस देव का आविर्भाव ऐसे समय में हुआ था, जब भारत में अंग्रेजी हुकूमत कायम थी। उनका साम्राज्य विस्तृत हो चुका था पराजित राष्ट्र अपना गौरव खो देता है।

विजयी राष्ट्र पराजित देश की सभ्यता-संस्कृति पर भी आघात पहुंचाता है। अंग्रेजों ने राजनीतिक सत्ता तो प्राप्त की ही थी, उन्होंने हिन्दू धर्म सभ्यता और संस्कृति पर भी प्रहार करना शुरू कर दिया हिन्दू लोग धड़ाधड़ ईसाई होने लगे। राजा राममोहन राय और स्वामी दयानंद सरस्वती ने क्रमशः ब्रह्मसमाज और आर्य समाज की स्थापना कर भारत में जागृति का शंखनाद किया।

राजा राममोहन राय ने एकेश्वरवाद और दयानंद जी ने वैदिक परंपरा का प्रचार किया। आवश्यकता थी ऐसे एक युगपुरुष की जो हिन्दू धर्म के विविध मतभेदो के बीच समभाव स्थापित करते हुए सर्वधर्म समन्वय का शंखनाद करे यह प्राकृतिक नियम है कि आवश्यकता पड़ने पर भगवान स्वयं आकर अथवा अपना प्रतिनिधि भेजकर सामाजिक अस्त-व्यस्तता और उथल-पुथल को दूर कर देते हैं।

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Swami Shraddhanand – स्वामी श्रद्धानन्द

स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने घोषणा की है कि जब-जब धर्म का विनाश होता है, अधर्म की वृद्धि होती है, तब तब वे अवतार ग्रहण कर असुरों का संहार कर धर्म की रक्षा करते हैं।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानम् अपर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।।

श्री रामकृष्ण परमहंस देव निस्संदेह एक युगपुरुष थे जिन्होंने इस धराधाम पर अवतरित होकर हमें समता, अहिंसा, सत्य, सहनशीलता, सहयोग का ज्ञान दिया। उनका यह कहना कि “सभी मत ठीक हैं कि जो जिस रास्ते से चाहे भगवान को प्राप्त कर सकता है” कितना उपयुक्त और सत्य है। सचमुच उनका “यतो मत ततो पथ” आज भी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को मजबूत करने का ‘रामवाण’ सिद्ध हो सकता है।

रामकृष्ण देव कामिनी और कंचन से परे थे। ‘टाका माटी, माटी टाका’ कहकर रुपयों को नदी में फेंक दिया करते थे। सभी स्त्रियों में माँ काली के दर्शन करते। यहां तक कि उन्होंने अपनी धर्मपत्नी माँ शारदादेवी की भी पूजा वैसे ही की जैसे माँ काली की किया करते थे। इतिहास में शायद वे ही एक पुरुष हैं जिन्होंने अपनी स्त्री में भी देवी का रूप दर्शन कर उसकी विधिवत् पूजा की है।

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रामकृष्ण देव बचपन में रघुवीर (भगवान राम) की पूजा करते, कारण वे उनके इष्टदेव थे। बचपन में भी उन्हें समाधि का अनुभव हुआ था। दक्षिणेश्वर में काली मंदिर के पुरोहित होने के बाद उन्होंने मां काली के दर्शन किये और सभी मतों का ज्ञान प्राप्त कर उसकी साधना की। रामकृष्ण देव ने भैरवी की देखरेख में तंत्र-मंत्र की साधना की दक्षिणेश्वर में ही उन्होंने राम के बाल-स्वरूप रामलला की उपासना और दर्शन किए।

ब्रह्मज्ञानी तोता पुरी के निर्देशन में उन्हें समाधि लगाई। यहां तक कि वे अपनी तीन दिनों तक सुध-बुध खो बैठे। नामरूप का कुछ भी ज्ञान न रहा। तात्पर्य यह कि उन्हें निर्विकल्प समाधि का अनुभव हुआ और परम तत्व का ज्ञान प्राप्त हुआ। स्वयं उनकी यह अवस्था देखकर तोता पुरी ने आश्चर्यचकित होकर कहा- “इस महापुरुष ने तीन दिनों में ही उस अवस्था का साक्षात्कार कर लिया जिसके लिए मुझे चालीस वर्ष कठोर साधना करनी पड़ी थी।”

वे यहां ग्यारह महीने तक उनके साथ रहे। तदुपरान्त उन्होंने एक इस्लामी फकीर के निर्देशन में इस्लाम धर्म की साधना की। वे एक मौलवी की तरह नमाज अदा करते थे दाढ़ी बढ़ाते और अल्लाह का नाम लेते लेते अपना अस्तित्व ही भूल जाते। उन्हें पैगम्बर मोहम्मद की भी झलक प्राप्त हुई थी। ऐसा कुछ लोग मानते हैं। यही नहीं उन्होंने भगवान ईसा की भी उपासना की। श्री शंभूचरण मल्लिक ने उन्हें बाईबिल सुनाया।

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मिरियम और ईसा मसीह का चित्र देखकर वे फूले नहीं समाते रामकृष्ण परमहंस देव की यह विशेषता थी कि वे जिस स्वरूप का जब चिंतन करते उन्हें उनके दर्शन हो जाते। इस प्रकार उन्होंने हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बीद्ध, जैन आदि सभी मतों के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की और घोषणा की कि ईश्वर एक ही है। कोई उसे भगवान, तो कोई खुदा, तो कोई गॉड कहता है।

उनकी यह विशेषता थी कि वे गूढ़ तत्त्वों को साधारण बातचीत के माध्यम से समझा देते। वे कहते “कोई जल को पानी कहता है, तो कोई नीर, तो कोई वाटर। इससे पानी के स्वरूप में कोई फर्क नहीं पड़ता।” यही कारण है कि उनके पास सभी वर्गों के लोग अपनी आध्यात्मिक पिपासा की तृप्ति के लिए आते। प्रसिद्ध ब्रह्मसमाजी केशवचन्द्र सेन, प्रसिद्ध विद्वान् ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, गिरीश घोष आदि लोग जाते।

नरेन्द्रनाथ दत्त ने अपनी युवावस्था में भी रामकृष्ण के दर्शन किए। नरेन्द्र बड़े ही तार्किक युवक थे। वे सदा तर्क किया करते और वही सिद्धांत स्वीकार करते जो उन्हें ठीक जंचता। एक बार रामकृष्ण देव के दर्शन कर उन्होंने पूछा- “महाशय आपने ईश्वर को देखा है?” रामकृष्ण ने उत्तर दिया मैंने ईश्वर को देखा भी है और चाहे तो दूसरे को दिखला भी सकता हूँ।”

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यही नरेन्द्रनाथ दत्त बाद में स्वामी विवेकानंद के नाम से विश्वविख्यात हुए। रामकृष्ण देव सदा लोगों को उपदेश दिया करते। उनके पास साधु, संन्यासी, गृहस्थ पहुंचा करते। वे सदा लोगों को काम करते हुए ईश्वर की भक्ति करने का उपदेश देते। काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, मद आदि से ऊपर उठकर ही हम परम सत्ता को प्राप्त कर सकते हैं।

रामकृष्ण परमहंस देव के जीवन काल में ही उनके अनेक प्रशंसक और शिष्य बन गये, जिनमें सर्वप्रधान स्वामी विवेकानंद ही थे, जिन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना कर अक्षय कीर्ति प्राप्त की। आज भी रामकृष्ण मिशन सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहा है। विदेशों में स्वामीजी ने अपने गुरु के अमर उपदेश का प्रचार किया।

सनातन धर्म की संस्कृति और इसके मूल सिद्धांतों से अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि पाश्चात्य राष्ट्रों को परिचित कराया। स्वामी विवेकानंद के अलावा उनके प्रमुख शिष्यों में राखाल, योगीन्द्र बाबू, राम निरंजन, तारक, शरत, शशि, वेणु गोपाल, काली तथा लाहू थे। उनके सिद्धांतों से बहुत से विदेशी भी प्रभावित हुए जिनमें सेवियर दम्पति, मार्गरेट नोबुल, श्रीमती ओलीबुल, गुडविन प्रमुख हैं।

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रामकृष्ण परमहंस देव छुआछूत, जाति-पांति आदि के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने अपनी दाई धनी को ही भिक्षा माँ बनाया। बंगाल में ब्राह्मणों के यज्ञोपवीत के समय एक भिक्षा माँ बनाने की प्रथा है धनी लोहारिन जाति की थी। इसलिए इनके परिवार वालों ने इसका विरोध किया, पर नी वर्ष का बालक (गदाई) रामकृष्ण ने घोषणा की कि जनेऊ वहीं धारण कर सकता है, जो सत्यवादी और दृढ़प्रतिज्ञ हो।

अंत में पनी ही उनकी भिक्षा-मी बनी। वे कभी-कभी जनेऊ उतारकर फेक देते। हरिजनों की जुठी पत्तले माथे पर उठा लेते। यह देखकर लोग उन्हें पागल कहा करते। वे इससे थोड़ा भी विचलित नहीं हुए। उनके इस आचरण के पीछे लोगों को यह बतलाना था कि ब्राह्मण, अब्राह्मण का भेद गलत है। वही आदमी सच्चा साधक हो सकता है जो सबमें एक ही तत्त्व का दर्शन करे।

रामकृष्ण परमहंस देव ने एक बिहार से गये हुए लाहू नामक निरक्षर मजदूर अब्राह्मण युवक को गले लगाया। भगवान राम ने जैसे निपाद और शबरी का उद्धार किया, उसी तरह उन्होंने भी उस अवोध लाहू में परमात्म-तत्त्व भर दिया। यही लाहू बाद में स्वामी अद्भुतानंद के नाम से विख्यात हुए। तात्पर्य यह कि वे तत्वदर्शी महापुरुष थे जो भारत के लोगों और भारत की मिट्टी को बेहद प्यार करते थे।

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स्वामी विवेकानंद को उन्होंने अंतिम समय में अनन्त शक्ति प्रदान की और कहा कि वे इस शक्ति माध्यम से जगन्माता की संतान की सेवा करें। रामकृष्ण के उपदेशों का संकलन महेन्द्रनाथ गुप्त नामक उनके एक भक्त ने किया जिसे कथामृत नामक पुस्तक के रूप में तीन खण्डों में प्रकाशित किया गया है। महाकवि पं. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने इसका अनुवाद ‘वचनामृत’ नाम से किया है।

उनके उपदेश सुंदर कहानियों एवं दैनिक घटनाओं के माध्यम से दिये गये हैं। उनका कहना था कि ईश्वर का हम साक्षात्कार कर सकते हैं तथा उनके साथ वार्तालाप भी किया जा सकता है। प्रत्येक धर्म सत्य है। सारे धर्म एक ही गन्तव्य पर पहुंचने के लिए विभिन्न मार्ग है। भगवत दर्शन ही गंतव्य है, लोग आपस में इसलिए लड़ते हैं कि वे भगवान के असली स्वरूप को नहीं जानते।

इस संबंध में वे एक कहानी का अवलम्बन लेकर समझाते हैं कि जैसे कुछ अंधों ने हाथी का एक-एक अंग का स्पर्श किया और किसी ने हाथी का पैर छूकर उसे खभे के समान बतलाया। दूसरे ने तो उसके कान छूकर उसे सूप के समान बतलाया, तो तीसरे ने उसे अजगर बताया, क्योंकि उसने केवल हाथी की सूड़ का ही स्पर्श किया था तो किसी ने उसे ढोल बतलाया।

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रामकृष्ण इसके माध्यम से यह कहना चाहते हैं कि जिन्होंने भगवान के किसी एक स्वरूप का दर्शन किया है, वे इन्हीं अज्ञानी दृष्टिहीनों के समान बातें करते हैं। वे केवल अपनी अनुभूति को सत्य मान बैठते हैं। वास्तव में भगवान के अनेक रूप हैं। तुलसी भी तो यही मानते है कि “हरि अनंत हरि कथा अनंता” । वे तो समस्त जगत को ही सियाराममय मानते हैं।।

रामकृष्ण के अनुसार हम भगवान का संतत स्मरण कर उन तक पहुंच सकते हैं। वे मानते हैं कि व्यक्ति सांसारिक कामों में फंसा रहता है। “गृह कारज नाना जंजाला” के चक्कर में पडा रहता है। इसलिए सदा ईश्वर स्मरण करना कठिन है। इस संबंध में उनका एक बहुत ही व्यावहारिक उपदेश है कि जैसे कोई दाई किसी के यहां काम करती है पर उसका मन सदा अपने घर में रहता है, इसलिए भक्तों को चाहिए कि वे अपना काम करते हुए मन में सदा ईश्वर का ही ध्यान रखें काम करते चलो, नाम जपते चलो” के सिद्धांत में वे विश्वास रखते थे।

वे में और गेरा को ही अज्ञान का आधार मानते हैं। मेरा-तेरा का चक्कर ही तो माया है। “में अरु मोर तोर ते माया, जैहि वश कीन्हेऊं जीव निकाया।” तुलसी भी यही मानते थे कि अपनापन का ख्याल रखना और किसी वस्तु को अपना समझना ही माया है। रामकृष्ण भी यही कहते थे कि जब हम अपने आदमी, परिवार को ही केवल प्यार करें तो वह माया है।

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लेकिन जब हम समस्त धर्मावलंबियों को समस्त प्राणियों को माने और उन्हें गले से लगाये तो यही दया है। माया से मनुष्य बंध जाता है, ईश्वर से विमुख हो जाता है और दया से ईश्वर की प्राप्ति होती है। तुलसी की तरह रामकृष्ण भी मानते हैं कि साकार और निराकार में कोई मूल अंतर नहीं है. दोनों ही सत्य है। निराकार में मन अधिक देर तक टिक नहीं सकता। इसलिए भक्त साकार का ही अधिक ध्यान करते हैं।

रामकृष्ण परमहस देव कहा करते थे कि जिसे जो रूचे उसे वही खाना चाहिए, जो पचे वैसा ही अन्न ग्रहण करना चाहिए। तात्पर्य यह कि व्यक्ति अपनी इच्छानुसार ईश्वर की आराधना करें, किसी पर दबाव देने की जरूरत नहीं है। यहीं अब भी धर्मनिरपेक्षवाद के नाम से जाना जाता है। हमारे संविधान निर्माताओं ने रामकृष्ण देव के सर्वधर्म समन्वय के सिद्धांत से प्रेरणा प्राप्त की थी।

यही कारण है कि हमारे यहां किसी धर्म को राजधर्म नहीं माना गया है। संविधान की धारा 25 से लेकर 28 तक में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। यहां तक कि 42वें संशोधन के द्वारा संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ दिया गया है। रामकृष्ण देव कहते हैं कि सभी ईश्वर की खोज करना चाहते हैं। ज्ञानी, योगी, भक्त सभी उन्हें खोज रहे हैं।

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वे कहते हैं कि चित्तशुद्धि होने पर विषय भोग की आसक्ति दूर हो जाने पर व्याकुलता आयेगी, तब हमारी प्रार्थना ईश्वर तक पहुंच सकती है। वे कहते हैं कि आपस में झगड़ना ठीक नहीं हिन्दू, मुसलमान, ब्रह्मसमाजी, शाक्त, वैष्णव, शैव सब एक-दूसरे से लड़ाई-झगड़ा करते हैं। यह बुद्धिमानी नहीं है। वे कहते हैं, कि जिन्हें कृष्ण कहते हैं, वे ही शिव है, वे ही आद्य शक्ति हैं, वे ही ईसा हैं, वे ही अल्लाह हैं।

एक राम उनके हजार नाम वस्तु एक ही है, केवल उसके नाम अलग है। सब लोग एक ही वस्तु की चाह कर रहे हैं। अन्तर इतना ही है कि देश अलग है, पात्र अलग और नाम अलग। भगवान श्री रामकृष्ण देव के अनुसार ईश्वर के नाम और रूप अनन्त है। जिस मनुष्य को जो पसंद है उसी रूप से वह पुकारता है और पूजता है। सर्वान्तर्यामी परमात्मा सभी कुछ जानते हैं।

ईश्वर पास ही है, पर अविद्या आवरण के चलते उन्हें कोई नहीं देखता है, यथा अंगोछे से ढंके मुंह को कोई नहीं देख सकता। ईश्वर प्राप्ति के लिए अनेक मार्ग हैं। अंत में सभी एक ही स्थान पर ले जाते हैं। मक्खी जैसे कभी मिठाई में, तो कभी विष्ठा में बैठती है, संसारी मनुष्य का भी मन वैसे ही कभी ईश्वरीय बात में तो कभी कामिनी-कंचन में मग्न होता है। व्याकुल होकर पुकारो परमेश्वर जरूर मिलेंगे।

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जल में डुबोये जाने पर बाहर निकलने के लिए जैसे वह घटता है, वैसे ही उनके दर्शन के लिए जब प्राण व्याकुल हो उठता है, तभी वे मिलते हैं। धन के लिए और पुत्र के लिए सभी आंसू बहाते हैं, पर भक्ति नहीं हुई, ईश्वर नहीं शांति मिला, कहकर एक बूंद भी आंसू नहीं बहाते। हृदय से पुकार के एक रोज भी देखो, मिलती है कि नहीं। उनकी कृपा प्राप्त होती है कि नहीं।

ईश्वर प्राप्ति के लिए यह तीन आकर्षण जैसे एक ही साथ हृदय में उदय हो, तभी साधक का मनोरथ सफल होता है। पति के प्रति सती का, कंजूस का धन के प्रति और माता का पुत्र के प्रति जैसा प्रेम रहता है। रेशम के कीड़े जैसे अपने जाल में आप ही फंस जाते हैं, वैसे ही जीव अपने कर्मफल से आप ही बंधन में आ पड़ता है। विवेक वैराग्य होने पर वह कर्म अकर्म से मुक्त होता है।

शास्त्रों से बढ़कर ईश्वर के बारे में लोगों को समझाना और नक्शे में काशी बताना एक-सा है। अंत में अनुभव ही कामयाव होता है। पेड़ जब छोटा रहता है, तब घेरा डालकर उसकी रक्षा करनी पड़ती है, नहीं तो गाय-बकरिया नष्ट कर देंगी। वही पेड़ जब बड़ा हो जाता है तो उससे हाथी भी बांध सकते है। प्रारंभ में साधक या भक्त को खूब सावधान रहना चाहिए, अभ्यास दृढ़ हो जाने पर फिर डर नहीं है।

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मन व मुख एक कर कहो, परमेश्वर, तुम ही मेरे सर्वस्व हो, जरूर मिलेंगे। मन में तो विषय पर ही प्रीति रहती है और मुंह में ईश्वर की बातें इसलिए साधना व्यर्थ होती है। वासनाशून्य मन में ही ईश्वर का दर्शन होता है। आज भगवान श्री रामकृष्ण परमहंस देव के उपदेशों के प्रचार-प्रसार की सर्वाधिक आवश्यकता है। समस्त विश्व में घृणा, वैमनस्य, ईर्ष्या, द्वेष, संघर्ष का वातावरण व्याप्त है।

श्रीलंका में सिंहली और तमिल एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं। भारतवर्ष में कुछ उन्मत्त सिक्ख युवक खालिस्तान के लिए प्रतिदिन निरीह लोगों की हत्याएं कर रहे हैं। भारत में जातीयता, सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयता का नग्न नृत्य हो रहा है। हमारी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है। हम सभी भारतवासियों का ही नहीं, बल्कि समस्त संसार के सभ्य और सुसंस्कृत लोगों का यह दायित्व है कि रामकृष्ण देव के सर्वधर्म समन्वयवाद का केवल उद्घोष ही न करें, बल्कि अपने जीवन में भी उसे कार्यान्वित करें। व्यक्ति कथन से नहीं, आचरण से महान बनता है। 

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