Pratham Vishwa Yudh Kab Hua Tha – प्रथम विश्व युद्ध

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प्रथम विश्व युद्ध यूरोप में होने वाला यह एक वैश्विक युद्ध था I जो 28 जुलाई 1914 से 11 नवंबर 1918 तक चला था। सभी युद्धों को समाप्त करने वाला युद्ध के रूप में जाना जाता था। | प्रथम विश्व युद्ध बहुत ही भीषण युद्ध था, जिसमें लगभग आधी दुनिया हिंसा की चपेट में चली गई थी और इसमें लगभग 1 करोड़ से अधिक लोग मारे गये थे, जबकि 2 करोड़ से अधिक लोग घायल हुए थे I

Pratham Vishwa Yudh Kab Hua Tha – प्रथम विश्व युद्ध

प्रथम विश्व युद्ध के कारण – इस युद्ध के प्रथम कारण निम्नलिखित थे I

(1) उग्र राष्ट्रीयता – शैपिरो के अनुसार, ‘राष्ट्रीयता एक नवीन धर्म था, जिसने मानव जाति की गम्भीर समस्याओं को उत्तेजित किया। हेजन ने लिखा है, ‘प्रत्येक राष्ट्र में स्वार्थ की भावना बढ़ती जा रही थी। आपसी जलन और एक दूसरे को नीचा दिखाने की भावनाऐं इतनी बढ़ गयी थीं कि आपसी लड़ाई अनिवार्य हो गई।’ प्रत्येक राष्ट्र अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरे राष्ट्र को नीचे दिखाने पर तुला हुआ था।

फ्रान्स जर्मनी को नीचा दिखाना चाहता था। एशिया, अफ्रीका तथा बल्कान का प्रत्येक देश अपने राष्ट्रीय सम्मान में वृद्धि करने हेतु प्रयत्नशील था। इस प्रकार यूरोपीय राष्ट्रों में घुड़दौड़ शुरू हो गई, परन्तु उग्र राष्ट्रीयता की भावना के कारण उनके सम्बन्ध तनावपूर्ण हो गये, जिसके कारण युद्ध अनिवार्य हो गया। हेज ने लिखा है कि, ‘उग्र राष्ट्रीयता युद्ध का प्रमुख कारण था।

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(2) औपनिवेशिक प्रतिस्पर्द्धा – औद्योगि क्रान्ति के पश्चात् यूरोपियन देश साम्राज्यवादी नीति पर चल रहे थे। अतः उन्होंने कच्चे माल की प्राप्ति एवं तैयार माल को बेचने हेतु उपनिवेशों की स्थापना के लिए प्रयत्न प्रारम्भ कर दिया। इस औपनिवेशिक प्रतिस्पद्धा में प्रत्येक यूरोपीय देश एक दूसरे से आगे निकल जाना चाहता था।

यूरोपियन देशों ने उपनिवेशों की स्थापना हेतु परस्पर गुटबंदिया एवं सैन्य समझौते किए. जिसके कारण 1903 से 1915 के बीच विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय संकट आए। इनमें मोरक्को एवं बाल्कन संकट विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन संकटों के कारण यूरोपीय देशों के आपसी द्वेष एवं मन मुटाव में वृद्धि हुई, जिसके परिणामस्वरूप प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ हो गया।

(3) शस्त्रीकरण की होड़ – बिस्मार्क ने सैनिक शक्ति के द्वारा जर्मनी का एकीकरण उसे यूरोप का एक शक्तिशाली देश बना दिया था। फ्रान्स 1870 ई. में प्रशा के हाथों युद्ध में पराजित हुआ था, अतः उसने जर्मनी से बदला लेने के लिए शस्त्रीकरण की नीति अपनाई जर्मन सम्राट विलियम कैंसर बहुत महत्वकांक्षी था। वह जर्मनी की विश्व की सर्वोच शक्ति बनाना चाहता था।

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इतिहासकार गेरेट के अनुसार, ‘विलियम कैसर का मानना था कि हम जर्मनी निवासियों के लिए दो ही मार्ग हैं, तीसरा नहीं विश्व आधिपत्य अथवा विनाश जर्मनी की भांति अन्य यूरोपिय देशों ने भी अपनी सैनिक शक्ति में वृद्धि करनी प्रारम्भ कर दी। वे अपनी सुरक्षा के नाम पर खुले आम शस्त्रों का संग्रह करने लगे।

शस्त्रीकरण की इस होड़ के कारण यूरोप का वातावरण विषाक्त तथा तनावपूर्ण बन गया। ब्रेलिसफोर्ड के अनुसार, ‘इस शस्त्रीकरण की होड़ से युद्ध आरम्भ हो गया।’ शस्त्रीकरण की होड़ को समाप्त करने हेतु हेग ने दो निःशस्त्रीकरण सम्मेलन बुलाये गये, परन्तु उनको सफलता प्राप्त नहीं हुई। इस प्रकार युद्ध का वातावरण बन गया।

(4) गुप्त सैनिक शक्तियां – इतिहासकार फे ने लिखा है, ’19 वीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में और 20 वीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में गठित विभिन्न सैनिक समझौतों के कारण प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ हो गया।’ इतिहासकार बेन्स ने लिखा है, ’20 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में सम्पूर्ण यूरोप दो सशस्त्र सैनिक शिविरों में विभाजित हो गया था।’

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जी. पी. गूच ने लिखा है, ‘बिस्मार्क ने राजनीति व कूटनीति के ऐसे दावं पेच – चलाये कि आपसी तनाव बढ़ता ही गया, जो उन्हें 1914 ई. की भीषण दुर्घटना की तरफ ले गया। बिस्मार्क ने फ्रान्स को मित्र विहीन बनाये रखने के लिए 1897 में आस्ट्रिया के साथ, 1882 में इटली और आस्ट्रिया के साथ त्रिगुट का निर्माण किया।

दूसरी ओर 1894 ई. में रूस ने फ्रांस से संधि की, जो द्वि मैत्री सन्धि कहलाती है। 1907 ई. फ्रान्स, इंगलैण्ड और रूस का त्रीगुट बन गया। इस प्रकार सम्पूर्ण यूरोप दो सशस्त्र शिविर में विभाजित हो गया था, जिसमें एक गुट में जर्मनी, आस्ट्रिया तथा इटली थे, तो दूसरे गुट में इंग्लैण्ड, फ्रान्स और रूस है I

इन गुप्त सैनिक संधियों से यूरोप का वातावरण विषाक बन गया। इन गुल के सैनिक सदस्य अपने मित्र देश का सैनिक समर्थन संधियों के कारण करने के लिए हुए थे यदि कोई राष्ट्र युद्ध छेड़ता, तो उसको गुट के सदस्य को भी उसके समर्थन में युद्ध में शामिल होना पड़ता।

शैपिरो ने इन गुटबन्दियों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है, ‘अपनी प्रतिष्ठा को ही सब कुछ समझने वाले तथा भावना रहित दो सशस्त्र गुटों के बन जाने से शान्ति और सभाओं की बात असम्भव हो गयी।’

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(5) समाचार पत्रों द्वारा वातावरण को विषाक्त बनाना – प्रोफेसर फे ने लिखा है. समाचार पत्र और साहित्य ने यूरोप में कटु वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण सहायता की।” 1914 ई. यूरोपीय देशों के समाचार पत्रों तथा साहित्य ने वातावरण को विषाक्त बना दिया। कुछ यूरोपीय देशों के समाचार पत्रों ने राष्ट्रीय भावना को उभाड़ा।

इस समय कई देश समस्याओं को शांतिपूर्ण ढंग से हल करना चाहते थे, परन्तु समाचार पत्रों ने उन्हें सफल नहीं होने दिया। 1914 में आस्ट्रिया के युवराज की हत्या की समस्या को लेकर सर्बिया के समाचार पत्रों ने वातावरण विषाक्त बना दिया, अत: यह शांतिपूर्ण तरीके से हल नहीं हो सकी।

(6) विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय संकट

(i) मोरक्को संकट – 1911 ई. में मोरक्को संकट उठ खड़ा हुआ इस सयम जर्मनी ने मोरक्को में हस्तक्षेप किया, परन्तु इंगलैण्ड तथा फ्रांस के कारण उसे झुकने के लिए विवश होना पड़ा। अतः जर्मनी के सम्बन्ध इंगलैण्ड और फ्रांस से कटु हो गये।

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(ii) बाल्कन संकट- आस्ट्रिया ने सर्बिया के विरोध के बावजूद भी बाल्कन प्रायद्वीप में बोस्निया तथा हर्जेगोबिना पर अधिकार कर लिया। बाल्कन संकट के कारण दो बाल्कन युद्ध हुए। इससे आस्ट्रिया के सम्बन्ध सर्बिया के साथ तनावपूर्ण हो गये। एचरन ने अपनी पुस्तक ‘डेस्टींग ऑफ यूरोप में’ में लिखा है, ‘आस्ट्रिया द्वारा बोस्निया तथा हर्जेगोबिना का अपहरण तथा सर्विया को सदा के लिए समुद्र से दूर कर देना इन दोनों शोचनीय घटनाओं ने युद्ध अनिवार्य कर दिया।’

(7) अन्तर्राष्ट्रीय संस्था का अभाव – इस समय युद्ध की सम्भावनाएँ दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी, किन्तु ऐसी कोई अन्तर्राष्ट्रीय संस्था नहीं थी, जो युद्ध को रोक सके एवं समस्याओं को शांतिपूर्ण तरीके से हल कर सके। उस समय अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय भी नहीं था। अतः सभी राष्ट्र स्वेच्छारी बनते जा रहे थे। इसलिए युद्ध को रोकना असम्भव हो गया I

(8) रूस का जापान के साथ युद्ध – जापान ने 1905 में रूस जैसे बड़े राष्ट्र को युद्ध में पराजित कर दिया था। अतः रूस ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए बाल्कन प्रदेश में पुनः हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया, जिसके कारण युद्ध अनिवार्य हो गया।

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(9) तत्कालीन कारण – 1914 ई. तक युद्ध का वातावरण तैयार हो चुका था और केवल एक चिंगारी की आवश्यकता थी। इसी समय 28 जून, 1914 ई. को आस्ट्रिया के युवराज आर्क ड्यूक की सपत्नीक हत्या कर दी गई। यह हत्या बोस्निया की राजधानी सिरोजेवो में सर्बियन क्रान्तिकारियों द्वारा की गई थी।

जब इस हत्या की जांच करवाई गई, तो पता चला कि हत्यारे आस्ट्रिया के नागरिक थे तथा बोस्निया के निवासी थे। फिर भी आस्ट्रिया ने राजकुमार की हत्या के लिए सर्बिया को दोषी ठहरा कर उसे ‘हत्यारों के राष्ट्र की संज्ञा दे दी। इतिहासकार ग्राण्ट एवं टेम्परले ने लिखा है ‘जांच ने सर्बिया सरकार को निर्दोष ठहराया।

‘इतिहासकार स्ट्रोंग ने लिखा है, ‘यह हत्या का काम सर्बिया की सरकार का न होकर वहीं के उग्र राष्ट्रवादियों का था। इसके विपरीत इतिहासकार स्लोशन ने लिखा है, ‘सर्बिया की सरकार ने आस्ट्रिया विरोधी प्रचार को प्रोत्साहन दिया।’

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वास्तविकता जो भी रही हो, 28 जुलाई, 1914 ई. को आस्ट्रिया ने सर्बिया के विरूद्ध युद्ध घोषित कर दिया। रूस ने भी इस अवसर को लाभ उठाने के लिए युद्ध में भाग लिया। जर्मनी को आस्ट्रिया के पक्ष में युद्ध घोषित करना पड़ा। 28 जुलाई से 9 अगस्त तक विलियम ने शांति स्थापित करने का हरसम्भव प्रयास किया, परन्तु उसे सफलता नहीं मिली।

6 अगस्त को फ्रांस ने जर्मनी पर आक्रमण कर दिया और 9 अगस्त को जर्मन सैनिकों ने मित्र राष्ट्रों के सैनिकों की पिटाई शुरू कर दी। सर्बिया, हर्जेगोबिना, बोस्निया, पौलैण्ड, जर्मनी, फ्रांस, रूस, आस्ट्रिया, बेलजियम व इंगलैण्ड आदि देश आपस में जूझने लगे।

प्रथम महा युद्ध की घटनाएँ – 1914 में विश्व युद्ध प्रारंभ होणे से पूर्व सम्पूर्ण विश्य दो गुटों में विभाजित हो गया।

(i)मित्र राष्ट्र (Allied Powers) इस गुट में फ्रांस, सर्बिया, रूस, जापान, पुर्तगाल, इटली, संयुक्त राज्य अमेरिका, रुमानिया, यूगाम, धीन क्यूबा पनागा और ब्राजील आदि देश थे।

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(ii)केन्द्रीय शक्तियाँ (Axis Powers) – इस गुट में जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी, तुका और बुल्गेरिया आदि देश थे।

युद्ध के शुरू में जर्मनी तथा उसके साथी देशों को शानदार विजय प्राप्त हुई। 1917 ई. में जर्मनी ने रूस को पराजित कर दिया और इसको ब्रेस्ट लिटी-वरक की सन्धि पर हस्ताक्षर के लिये विवश किया।

रूस ने इस समय बाल्शेविक क्रान्ति हो चुकी थी, जिसके नेता युद्ध से अलग होकर शांतिपूर्वक रूस का विकास करना चाहते थे। इसलिये 15 दिसम्बर 1917 को रूस तथा जर्मनी के बीच युद्ध बन्द हो गया। इस समय जर्मनी ने अमेरिका के जहाज डबो दिये, जिसमें कई अमेरिकन मारे गये।

जर्मनी की इस कार्यवाही से कुद्ध होकर अमेरिका के राष्ट्रपति विल्सन ने 6 अप्रैल, 1917 ई. को जर्मनी के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया। अमेरिका द्वारा मित्र राष्ट्रों के पक्ष में युद्ध घोषित करने से उनका पलड़ा भारी हो गया। मित्र राष्ट्रों ने धुरी राष्ट्रों की इस प्रकार से नाके बन्दी की कि उन्हें कच्चा माल प्राप्त नहीं हो सका। उनके सभी उपनिवेशों पर मित्र राष्ट्रों ने अधिकार कर लिया।

अन्त में मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी व उसके साथी देशों को युद्ध में पराजित कर दिया। इस प्रकार मित्र राष्ट्रों का शानदार विजय हुई। 29 सितम्बर, 1918 को बुलोरिया ने 31 अक्टूबर को तुर्की और 3 नवम्बर को आस्ट्रिया ने आत्म समर्पण कर दिया। 9 नवम्बर, 1918 को जर्मन सम्राट के सर विलियम द्वितीय ने सिंहासन छोड़ दिया।

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10 नवम्बर, 1918 को जर्मनी में गणतन्त्रात्मक शासन व्यवस्था स्थापित करने की घोषणा की गई। अमेरिका के राष्ट्रपति विल्सन ने 14 सिद्धांतों से सहमत होकर जर्मनी ने 10 नवम्बर, 1918 को आत्म समर्पण कर दिया। 11 नवम्बर 1918 को प्रातः 11 बजे युद्ध विराम हो गया। इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति हुई। इस युद्ध काल की मुख्य घटना रूस की बालेशेविक क्रान्ति थी।

प्रथम विश्व युद्ध का उत्तरदायित्व – वर्साय की संधि में मित्र राष्ट्रों ने युद्ध के लिए जर्मनी को दोषी ठहराया और इसकी सारी जिम्मेवारी उसके कंधों पर डाल दी। इस समय सभी देशों ने अपनी अपनी बुक प्रकाशित की और यह स्पष्ट करने का प्रयास किया की युद्ध के लिए उसका विरोधी दोषी या उत्तरदायी था।

वास्तव में इस युद्ध के लिए सभी देश जिम्मेदार थे। सर्बिया इस युद्ध के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार था क्योंकि उसकी सरकार ने आस्ट्रिया के युवराज के हत्यारों को नहीं लौटाया। आस्ट्रिया ने सर्विया के उत्तर से असन्तुष्ट होकर उसके विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। रूस ने भी सैनिक तैयारी करके समझौते के द्वार बंद कर दिये।

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इस युद्ध के लिए सबसे अधिक दोषी जर्मनी था। उसने आस्ट्रिया को सहायता का आश्वासन दिया और उसे युद्ध के लिए भड़काया कैंसर विलियम ने द्रुतगति से जर्मनी का शस्त्रीकरण प्रारम्भ किया, जिसके कारण अन्य देश उसे शंका की दृष्टि से देखने लगे। फ्रांस ने रूस को इसलिए सहायता देने का आश्वासन दिया, ताकि उसे फिर एकाकी न होना पड़े। इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए किसी व्यक्ति विशेष या किसी एक देश को युद्ध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए सभी देश दोषी थे।

क्या युद्ध टाला जा सकता था – प्रथम विश्व युद्ध अप्रत्याशित था, जिसके लिए कोई भी देश तैयार नहीं था। जर्मनी ने युद्ध को सीमित रखने के लिए अंत समय तक प्रयास किया था। रूस भी किसी बड़े युद्ध के लिए तैयार नहीं था। इंगलैण्ड हर सम्भव युद्ध को टालने का प्रयास किया था। यूरोपियन देशों को यह आशा ही नहीं थी कि आस्ट्रिया के युवराज की हत्या के प्रश्न को लेकर प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ हो जायेगा।

इस समय यूरोपीय देश परस्पर भय, आशंका तथा मनमुटाव से इतने ग्रस्त थे कि ये एक दूसरे के विचारों को सही ढंग से नहीं समझ पा रहे थे। यदि उस समय कोई अन्तर्राष्ट्रीय संस्था होती, तो शांतिपूर्ण ढंग से आस्ट्रिया के युवराज की हत्या की समस्या को सुलझाया जा सकता था, परन्तु उस समय न तो ऐसी कोई संस्था थी और न ही वातावरण I

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निष्कर्ष – यूरोपीय देशों की इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा लगता है कि युद्ध को आगे टाला जा सकता था, उसे एक दम रोकना असम्भव था। उग्र राष्ट्रीयता की भावना, गुप्त सैनिक संघियां तथा शस्त्रीकरण की होड़ ने प्रथम विश्व युद्ध का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

प्रथम विश्व युद्ध के परिणाम

(1) जन तथा धन की अपार क्षति – इस युद्ध में जन तथा धन की अपार क्षति हुई। इसमें दोनों पक्षों की ओर से 6 करोड़ सैनिकों ने भाग लिया था। इसमें से एक करोड़ तीस लाख सैनिक मारे गये और 2 करोड़ 20 लाख सैनिक घायल हुए जिनमें से 70 लाख व्यक्ति तो एकदम पंगु तथा बेकार हो गये थे।

युद्ध के पश्चात् महामारी फैली, जिसके कारण 40 लाख व्यक्ति मृत्यु के ग्रास बन गये। इस प्रकार अपार जन क्षति हुई। परिणामस्वरूप कई यूरोपियन देशों में तो पुरुषों की कमी हो गई। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि, ‘प्रथम विश्व युद्ध में 2 खरब 70 अरब डालर रुपया खर्च हुआ था।

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(2) आर्थिक असंतुलन – युद्ध के दौरान प्रत्येक देश ने अपनी उत्पादन शक्ति युद्ध के कार्यों में लगा दी। इससे आर्थिक संगठन को भारी क्षति पहुंची। युद्ध के दौरान फसलें नष्ट हो गयीं। रेलमार्ग छिन्न-भिन्न कर दिये गये। बम्बारी ने खेतों की फसलें नष्ट कर दी, जिससे खेतों की उर्वरा शक्ति नष्ट हो गयी। इसके अतिरिक्त कारखाने एवं मकान नष्ट हो गये।

इससे आर्थिक संगठन को गहरा आघात पहुंचा। युद्ध की समाप्ति के पश्चात् पुनर्वास एवं बेरोजगारी की भयंकर समस्या उठ खड़ी हुई। इसके अतिरिक्त खाद्य सामग्री तथा अन्य वस्तुओं के भाव मंहगाई बढ़ जाने के कारण आकाश को छूने लगे।

(3) एकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था की समाप्ति – इस युद्ध की समाप्ति के पश्चात् मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी, तुर्की एवं बुल्गेरिया में एकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था को समाप्त कर दिया और उसके स्थान पर गणतंत्रात्मक शासन व्यवस्था की स्थापना की। इसके अतिरिक्त चेकोस्लोवाकिया, लिथूनिया, लैटविया, एस्टोनिया और फिनलैण्ड आदि नवस्थापित राज्यों में भी गणतंत्रात्मक शासन व्यवस्था की स्थापना की गई। इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् यूरोप में प्रजातंत्र की बाढ़ आ गयी।

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(4) लोकतंत्र के सिद्धान्तों की उपेक्षा – यद्यपि मित्र राष्ट्रों ने प्रजातंत्र के सिद्धान्तों की रक्षा के नाम पर यह युद्ध लड़ा था, किन्तु यह दूसरे देशों को आकर्षित करने का एक बहाना मात्र था जब प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ हुआ, तो इंगलैण्ड की सरकार ने युद्ध की समाप्ति के पशचात् भारत को स्वतंत्रता प्रदान करने का वचन दिया था I

परन्तु ब्रिटेन की सरकार ने अपना वायदा पूरा नहीं किया और भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन को कुचलने के लिए रोलेट एक्ट पास किया इस एक्ट के अनुसार 13 अप्रैल, 1919 ई. को जनरल डायर ने पंजाब के जलियांवाला बाग में निहत्थे भारतीयों को (जिनमें स्त्री पुरुष एवं बच्चे आदि सभी थे) गोलियों से भुनवा दिया।

इस प्रकार प्रजातंत्र के हिमायती देश इंगलैण्ड ने भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन के दमन में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। युद्ध की समाप्ति के बाद आयोजित पेरिस शांति सम्मेलन में मित्र राष्ट्रों ने पराजित राष्ट्रों के साथ सन्धियां करते समय लोकतंत्र के सिद्धान्तों की खुलकर उपेक्षा की थी।

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(5) नवीन वादों का जन्म- प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1917 में रूस में बोल्शेविक क्रान्ति हुई, जिसके कारण वहां साम्यवादी शासन व्यवस्था स्थापित हुई। इस नवीन व्यवस्था ने पूंजीवादी देशों की नींद हराम कर दी। वर्साय की सन्धि में जर्मनी तथा इटली के साथ अन्याय हुआ था। अतः इन दोनों देशों में वर्साय की सन्धि के प्रति जबरदस्त असंतोष बना रहा।

परिणामस्वरूप जर्मनी में हिटलर के नेतृत्व में नाजी वाद तथा इटली में मुसोलिनी के नेतृत्व में फासिस्टवाद का जन्म हुआ। यदि वर्साय की सन्धि में जर्मनी के साथ इतना अन्याय नहीं किया जाता, तो शायद वहां नाजीवाद का विकास नहीं हो पाता। इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् यूरोप में जर्मनी में नाजीवाद, इटली में फासिस्टवाद का उदय हुआ, जिसके कारण यूरोप में फिर शस्त्रीकरण की होड़ प्रारम्भ हुई।

(6) बेरोजगारी की समस्या – युद्ध के कारण कारखाने तथा उद्योग धंधे आदि नष्ट हो गये, जिसके कारण बेरोजगारी की एक मंयकर समस्या उठ खड़ी हुई। इस समस्या के कारण प्रजातंत्रात्मक शासन व्यवस्था डगमगाने लगी।

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(7) नवीन राज्यों का उदय – इस युद्ध के फलस्वरूप पौलेण्ड को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार कर लिया गया। लिथूनिया, लैटविया एवं फिनलैण्ड आदि नवीन राज्यों का उदय हुआ। आस्ट्रिया को जर्मनी से अलग करके उसे एक छोटा सा राष्ट्र बना दिया किया। चेकोस्लोवाकिया को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी गई। साबिंया का नाम बदल कर यूगोस्लाविया नामक एक नये राज्य का निर्माण किया गया।

(8) स्त्रियों की दशा में सुधार – प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अधिकांश युवक युद्ध में भाग लेने चले गये थे, जिसके कारण सरकारी कार्यालयों में कर्मचारियों का अभाव हो गया। परिणामस्वरूप सरकारी काम-काज ठप्प हो गया। ऐसी स्थिति में महिलाओं ने सरकारी कार्यालयों में काम करना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध से विषयों की दशा में सुधार हुआ अब वे घर की बार दिवारी से बाहर निकल कर पुरुषों की भांति कार्यालयों में काम करने लगी।

(9) वर्ग – संघर्ष का प्रारम्भ होना – युद्ध के बाद मजदूर वर्ग के संगठित हो जाने के कारण वर्ग संघर्ष तेजी से प्रारम्भ हुआ। अब मजदूरों ने पूंजीपतियों के शोषण के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ कर दिया। युद्ध की समाप्ति के बाद मजदूर वर्ग कारखानों में शोषित होने के लिए तैयार नहीं था, क्योंकि वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो चुका था और उसने इन्हें प्राप्त करने के लिए संघर्ष आरम्भ कर दिया था।

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(10) शक्ति सन्तुलन अमेरिका के पक्ष में – युद्ध से पूर्व ब्रिटेन विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली देश था। अत: विश्व का नेतृत्व उसके हाथ में था युद्ध की समाप्ति के पश्चात् पेरिस शांति सम्मेलन में अमेरिका ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। अतः शक्ति सन्तुलन अमेरिका के पक्ष में हो गया।

(11) साम्राज्यवाद को प्रोत्सहान – इस युद्ध ने साम्राज्यवाद को प्रोत्साहन दिया। इटली ने एडियाट्रिक सागर पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इंगलैण्ड और फ्रांस ने मध्यपूर्व में अपने प्रभाव का विस्तार किया और मैण्डेट व्यवस्था के अन्तर्गत अपने उपनिवेशों में वृद्धि की इस समय जापान एक शक्तिशाली देश के रूप में प्रकट हुआ। यह अपने आपको सुदूरपूर्व की सर्वोच्च शक्ति मानने लगा।

(12) राष्ट्रीयता की भावना का विकास – इस युद्ध से राष्ट्रीयता की भावना का जबरदस्त विकास हुआ। इस युद्ध के बाद अरब एवं भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन की गति तीव्र हो गई।

(13) अमेरिका के प्रभाव में वृद्धि – इस युद्ध में पहली बार अमेरिका ने भाग लेकर यूरोप के मामले में हस्तक्षेप किया। इस युद्ध में अमेरिका ने मित्र राष्ट्रों का साथ दिया और जर्मनी तथा उसके साथी देशों के युद्ध में पराजित कर अपने को विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली देश साबित कर दिया। अमेरिका ने युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों को गोला-बारूद और हथियार दिए।

Pratham Vishwa Yudh Kab Hua Tha – प्रथम विश्व युद्ध

इसके अतिरिक्त युद्ध समाप्त होने के बाद उसने यूरोपियन देशों को आर्थिक सहायता दी, ताकि उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके। अब अमेरिका विश्व का एक प्रतिष्ठित साहूकार माना जाने लगा। उसने बहुत से राष्ट्रों को कर्जा दिया। युद्ध के बाद उसने वाणिज्य के माध्यम से धन कमाना प्रारम्भ किया। इस प्रकार इस युद्ध से अमेरिका विश्व शक्ति के रूप में उदित हुआ।

(14) राष्ट्र संघ की स्थापना – प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद भविष्य में युद्ध सम्बन्धी सम्भावनाओं को रोकने के लिए एवं शांति स्थापित करने के लिए अमेरिक के राष्ट्रपति विल्सन ने 1919 ई. में राष्टसंघ की स्थापना की। यद्यपि राष्ट्रसंघ को अपने उद्देश्य में पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं हुई, तथापि इसने बीस वर्ष तक शान्ति स्थापित करने के लिए अथक प्रयत्न किये इस संघ ने मानव समाज के कल्याण के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए।

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(15) शस्त्रीकरण की प्रतिस्पर्द्धा – युद्ध के बाद निःशस्त्रीकरण के लिए कई बार प्रयत्न किये गये, परन्तु यह असफल रहे और शस्त्रीकरण की जारी रही। यूरोप का प्रत्येक देश अपने सैनिक शक्ति एवं युद्ध सामग्री में वृद्धि करने में लगा हुआ था। इससे यूरोपियन देशों में शस्त्रीरण की होड़ प्रारम्भ हुई, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

निष्कर्ष – प्रथम विश्व युद्ध के बाद एक युग की समाप्ति हुई। फिर भी मनुष्य ने युद्ध के परिणामों से कोई शिक्षा नहीं ली। इसके फलस्वरूप 20 वर्षों बाद ही पहले से भी अधिक विनाशकारी महायुद्ध हुआ। 

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