Plasi Ka Yuddh Kab Hua Tha – प्लासी का युद्ध

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बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच 23 जून, 1757 ई. को एक युद्ध हुआ, जिसे प्लासी के युद्ध के नाम से पुकारते हैं।

युद्ध के कारण – प्लासी का युद्ध भारतीय इतिहास के मोड़ बिन्दु और निर्णायक युद्धों में से एक माना जाता है। इस युद्ध के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे I

Plasi Ka Yuddh Kab Hua Tha – प्लासी का युद्ध

(1) सन्धि की शर्तों को पूरा न करना – अंग्रेज और नवाब दोनों में से कोई भी अली नगर की सन्धि की शर्तों का पालन करने के लिए तैयार नहीं था। सिराजुद्दौला ने अंग्रेजों को मुआवजा देने का वचन दिया था, परन्तु उसने किसी प्रकार का मुआवजा नहीं दिया। रेम्जेम्योर ने लिखा है कि, ‘नवाब संधि की शर्तों को पूरा करने के लिए तैयार न था, इस कारण युद्ध आवश्यक बन गया।”

इसी प्रकार का आरोप कम्पनी पर भी लगाया जा सकता है, क्योंकि कम्पनी ने नवाब के द्वारा युद्ध की तैयारी करने से पहले युद्ध की तैयारी करना उचित समझा। अंग्रेजों का मानना था कि जब तक सिराजुद्दौला नवाब बना रहेगा, कम्पनी के हितों को खतरा बना रहेगा।

(2) अंग्रेजों द्वारा नवाब पर दोषारोपण – अंग्रेज विद्वानों का मानना है कि नवाब ने अपने कुछ व्यक्तिगत पत्रों में यह आश्वासन दिया था कि वह अंग्रेजों के शत्रुओं से मित्रता नहीं रखेगा। कम्पनी ने इस प्रकार के आश्वासन को भी संधि की शर्तों की भांति माना। जबकि वास्तविकता यह थी कि संधि के समय से ही नवाब ने इस प्रकार की शर्त को मानने से इन्कार कर दिया था।

Plasi Ka Yuddh Kab Hua Tha – प्लासी का युद्ध

संयोग वश इस समय बंगाल के फ्रांसीसियों ने नवाब से सम्बन्ध बढ़ाने का प्रयास किया, तो क्लाइव ने इसे बहुत बुरा माना। उसे यह भय लगा कि कहीं नवाब और फ्रांसीसी मिलकर अंग्रेजों पर आक्रमण न कर दें। इसीलिए क्लाइव ने फ्रांसीसियों की बस्ती चन्द्रगढ़ पर आक्रमण करने के लिये नवाब की अनुमति मांगी। नबाव फ्रांसीसियों का विरोध मोल नहीं लेना चाहता था। अतः उसने अंग्रेजों को गोलमाल जवाब भिजवा दिया।

क्लाइव ने 14 मार्च, 1757 ई. में चन्द्रनगर (बंगाल) पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजों ने नवाब पर अलीनगर की संधि की शर्तों को तोड़ने का आरोप लगाया। नवाब ने इसे स्वीकार नहीं किया। उसका कहना था कि बंगाल में फ्रांसीसियों ने अंग्रेजों के विरूद्ध ऐसा कोई कार्य नहीं किया था, जिसके आधार पर उनको अंग्रेजों का शत्रु कहा जा सके, परन्तु अंग्रेज अपनी ही बात पर डटे रहे।

(3) सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड्यन्त्र – बहुत से विद्वानों का मानना है कि सिराजुद्दौला के विरूद्ध राज्य में असंतोष व्याप्त था। बहुत से मुस्लिम सरदार प्रभावशाली हिन्दुओं की सहायता से नवाब को गद्दी से हटाने का षड्यंत्र कर रहे थे। जब उन्होंने अंग्रेजों से इसमें सहयोग मांगा, तो उन्होंने तत्काल स्वीकृति दे दी। मुस्लिम सरदारों में मीरजाफर एवं मिर्जा अमीर बेग आदि प्रमुख थे। नवाब इनको किसी न किसी रूप में अपमानित कर चुका था। नवाब धार्मिक दृष्टि से कट्टर था।

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Pratham Vishwa Yudh Kab Hua Tha – प्रथम विश्व युद्ध

उसने धार्मिक अनुदारता की नीति आरम्भ कर दी थी, जिससे हिन्दू असन्तुष्ट हो रहे थे। जगत सेठ बन्धुओं मेहताबराय और स्वरूपचन्द को भी नवाब ने अपमानित कर दिया था। रामवालभ को दीवान के पद से एवं मीरजाफर को मीरबख्शी के पद से हटा दिया गया था। नदिया का शक्तिशाली जमीदार महाराजा कृष्णचन्द्र भी हिन्दू विरोधी नीति से असंतुष्ट था। इसके अलावा हिन्दू व्यापारियों और अंग्रेजों के आर्थिक हितों में काफी निकटता भी थी।

उपलब्ध साक्ष्यों से पता चलता है कि इस षड्यन्त्र के निर्माण में अंग्रेजों ने पहल की थी। अंग्रेज सिराजुद्दौला को नवाब पद से हटाकर अपने इच्छित व्यक्ति को नवाब बनाना चाहते थे, ताकि उन्हें विभिन्न प्रकार के लाभ प्राप्त हो सके। विरोधी षड्यंत्रकारियों ने मीर जाफर को नवाब बनाने का निर्णय लिया, जिसे अंग्रेजों ने भी स्वीकार कर लिया।

अंग्रेजों ने मीर जाफर से एक गुप्त संधि कर ली, जिसके अनुसार अंग्रेज मीर जाफर को नवाब बना देंगे, बदले में मीर जाफर कम्पनी को व्यापारिक, प्रादेशिक और आर्थिक सुविधाएं प्रदान करेगा। अमीचन्द इस षड्यंत्र में दोनों पक्षों में बातचीत और समझौता कराने में सहायता कर रहा था।

Plasi Ka Yuddh Kab Hua Tha – प्लासी का युद्ध

जब षड्यन्त्र की योजना पूरी हो गई और हर प्रकार का समझौता हो गया, तो अमीचन्द ने धमकी दी कि यदि उसे 30,000 पौण्ड तथा नवाब के कोष का 5 प्रतिशत भाग देने का वायदा नहीं किया गया, तो वह षड्यंत्र का भण्डाफोड़ कर देगा अमीचन्द ने संधि पत्र में इस बात का उल्लेख चाहा। इस अवसर पर क्लाइव ने भी धोखा देने की नीति अपनाई।

उसने दो संधि पत्र तैयार करवाये। एक सफेद कागज पर जो सही था, और दूसरा लाल कागज पर जो झूठा था और जिसमें अमीचंद की शर्तों को भी स्वीकार किया गया था। वाट्सन ने झूठे संधि पत्र पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया। इस कारण क्लाइव ने उसके जाली हस्ताक्षर कर दिये। इस तरह अमीचन्द को जाली संधि पत्र दिखाकर संतुष्ट कर दिया गया।

इस प्रकार क्लाइव अपने षड्यन्त्र की रचना में पूर्णत: सफल रहा। चूंकि क्लाइव ने कम्पनी के हितों की रक्षा के लिए वाट्सन के फर्जी हस्ताक्षर किये थे, इसलिए अंग्रेज इतिहासकारों ने उसके इस कुकृत्य को भुला दिया। डॉडवेल जैसे विद्वान् ने तो क्लाइव के कार्य को उचित माना है।

Plasi Ka Yuddh Kab Hua Tha – प्लासी का युद्ध

नवाब को अपने विरोधियों द्वारा किये जा रहे षड्यन्त्र की जानकारी युद्ध के पूर्व ही मिल चुकी थी, परन्तु उसने षड्यंत्रकारियों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। उसने अपने सेनानायकों, मीर जाफर, रायदुर्लभ, यारलतीफ एवं मीर मुइनुद्दीन खां को अपने घर बुलाकर अपने प्रति वफादार रहने की प्रार्थना की। उन चारों सेनानायकों ने वफादारी की कसम खाई, जिससे नवाब संतुष्ट हो गया। वस्तुत: मीर मुइनुद्दीन के अलावा तीनों सेनानायक षड्यंत्र में सम्मिलित थे।

प्लासी के युद्ध की घटनाएं – षड्यंत्र पूरा होते ही क्लाइव ने सिराजुद्दौला से युद्ध छेड़ने का बहाना खोजना शुरू किया। उसने नवाब को एक पत्र लिखा, जिसमें उस पर अलीगनर की संधि को भंग करने का आरोप लगाया। नवाब का उत्तर आने के पूर्व ही क्लाइव ने एक सेना के साथ बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद की ओर कूच कर दिया। 19 जून, 1757 ई. को अंग्रेजों ने कटवा पर अधिकार कर लिया।

इसकी सूचना मिलते ही नवाब भी अपनी राजधानी से चल पड़ा। दोनों पक्षों की सेनाएं प्लासी के मैदान में आमने-सामने आ डटीं । नवाब की सेना में 50,000 सैनिक थे, जबकि क्लाइव के पास 800 यूरोपियन तथा 2200 भारतीय सैनिक थे। नवाब की विशाल सेना को देखकर क्लाइव घबरा गया था, क्योंकि नवाब ने युद्ध से पूर्व मीर की जाफर के घर जाकर अपनी पगड़ी उसके सामने रखकर कहा है कि- ‘मीर जाफर इस पगड़ी की लाज तुम्हारे हाथ में है। इस पर मीर जाफर ने कुरान को हाथ लगाकर वफादारी की कसम खाई।

Plasi Ka Yuddh Kab Hua Tha – प्लासी का युद्ध

इससे क्लाइव को यह सन्देह हो गया कि कहीं मीर जाफर नवाब से तो नहीं मिल गया। इन्द्र विद्यावाचस्पति के अनुसार, ‘एक बार क्लाइव की आंखों में आंसू आ गये थे। वह प्लासी के मैदान में एक वृक्ष के नीचे बैठा-बैठा काफी देर तक आंसू बहाता रहा। इसी समय मीर जाफर ने क्लाइव को सन्देश भेजा कि सब तैयार है। भीषण आक्रमण कर दो।’ इससे उत्साहित होकर 23 जून, 1757 ई. को क्लाइव ने आक्रमण कर दिया।

षड्यंत्र के कारण नवाब का सेनापति मीर जाफर और दुर्लभराय अपने-अपने सैनिक, दस्तों के साथ चुपचाप युद्ध का तमाशा देखते रहे। उन्होंने न तो युद्ध में भाग लिया और न ही नवाब की रक्षा का कोई प्रयास किया। नवाब अपने लोगों के विश्वासघात से घबरा गया और जान बचाकर युद्ध क्षेत्र से भाग खड़ा हुआ, परन्तु राजमहल के निकट उसे पकड़ लिया गया और मुर्शिदाबाद भेज दिया गया।

26 जून, 1757 ई. को अंग्रेजों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब घोषित कर दिया। इस प्रकार क्लाइव ने बिना किसी विशेष प्रयास के षड्यंत्र द्वारा युद्ध जीत लिया। प्लासी के युद्ध को अंग्रेज इतिहासकारो ने एक निर्णायक युद्ध माना है और इसी आधार पर क्लाइव को एक महान् सेनापति एवं महान् योद्धा कहा है, लेकिन वास्तविकता कुछ और है। वस्तुत: प्लासी के युद्ध को युद्ध मानना एक बहुत बड़ी भूल होगी। अंग्रेजों का पक्ष लेने वाले ब्रिटिश इतिहासकार पी. ई. रॉबर्टस ने भी लिखा है कि प्लासी के युद्ध को युद्ध की संज्ञा नहीं दी जा सकती।

Plasi Ka Yuddh Kab Hua Tha – प्लासी का युद्ध

मीर जाफर और रायदुर्लभ दोनों ने प्लासी के मैदान में सिराजुदीला को धोखा दिया। इस कारण नवाब की विशाल सेना की पराजय का मूल कारण उसके सेनानायकों का विश्वासघात और क्लाइव की कूटनीति तथा षड्यन्त्र था। क्लाइव ने जगलसेठ बन्धुओं और मीर जाफर जैसे देश विद्रोहियों की महत्त्वाकांक्षाओं का पूरा-पूरा लाभ उठाया। स्पष्ट है कि इसमें शौर्य का प्रदर्शन नहीं हुआ था, वरन् क्लाइव ने षड्यन्त्र के माध्यम से नवाब की सेना को पराजित किया था।

निष्कर्ष के रूप में यही कहा जा सकता है कि न तो क्लाइव महान् सेनापति और महान योद्धा था और न ही प्लासी की घटना कोई युद्ध थी, क्योंकि क्लाइव ने छल कपट, प्रपंच और कुटिलता से प्लासी के मैदान में सफलता प्राप्त की थी।

प्लासी के युद्ध का महत्व और परिणाम – यद्यपि सैनिक दृष्टिकोण से प्लासी के युद्ध को युद्ध नहीं कहा जा सकता। फिर भी इसके परिणाम बड़े महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए। यह भारतीय इतिहास की एक युगान्तकारी घटना सिद्ध हुई। जे. एन. सरकार ने लिखा है कि, “23 जून 1767 ई. को भारत में मुगलकाल का अवसान हो गया तथा आधुनिक काल का प्रार्दुभाव हुआ।” वस्तुतः इस घटना ने सत्ता में एक महान परिवर्तन किया।

Plasi Ka Yuddh Kab Hua Tha – प्लासी का युद्ध

कल तक जो जाति भारतीय शासकों की दया दृष्टि पाकर व्यापार के लिए प्रयत्नशील थी, जिसका अस्तित्व भारतीय शासकों की कृपा पर निर्भर था, अब वे ही भारतीय शासक इन व्यापारियों की कृपा पर निर्भर हो गये। अंग्रेज जाति को इसने व्यापारी से शासक बना दिया।

वास्तव में ऊपर से देखने पर यह घटना साधारण दिखाई देती है, जिसमें सिराजुद्दौला को नवाब पद से हटाकर मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया गया, लेकिन गहराई से विचार करने पर ज्ञात होता है कि इसके परिणाम अत्यन्त दूरगामी एवं युगान्तकारी प्रमाणित हुए। इसीलिए इस युद्ध की गणना भारत के निर्णायक युद्धों में की जाती है।

(1) राजनीतिक महत्त्व – प्लासी के युद्ध से मुगल शासन व्यवस्था का खोखलापन स्पष्ट हो गया। इससे अंग्रेजों को भारतीयों की दुर्बलता का पता चल गया और यह भी स्पष्ट हो गया कि बंगाल के हिन्दू मुस्लिम शासन से असन्तुष्ट हैं। वे मुस्लिम शासन को समाप्त करने के लिए विदेशियों के साथ सांठ-गांठ भी कर सकते हैं।

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इससे अंग्रेजों के साहस में वृद्धि हुई और वे यह मानने लगे कि षड्यन्त्रों और कुचक्रों भारतीयों को भारतीयों के माध्यम से परास्त करके अपने साम्राज्य की स्थापना की जा सकती। है। युद्ध के बाद मीर जाफर नवाब अवश्य बन गया था, परन्तु वह नाम मात्र का शासक था। उसकी शासन सत्ता कम्पनी के सैनिक सहयोग पर टिकी हुई थी।

इस प्रकार मीर जाफ़र कम्पनी के हाथ की कठपुतली बन गया और शासन की वास्तविक शक्ति अंग्रेजों के हाथों में चली गई थी एवं अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेज ही बंगाल के मालिक बन गये थे। 6000 सैनिकों की एक अंग्रेजी सेना नवाब की सहायता के लिए रहती थी। प्लासी के युद्ध के पूर्व अंग्रेल केवल एक व्यापारिक कम्पनी के मालिक थे और उस समय कम्पनी पर नवाब का नियन्त्रण था।

प्लासी में नवाब की हार से कम्पनी पर उसका नियन्त्रण समाप्त हो गया और नवाब पर कम्पनी का मजबूत नियन्त्रण स्थापित हुआ। नवाब मीर जाफर की असहायता इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि वह चाहते हुए भी दीवान राय दुर्लम और बिहार के डिप्टी दीवान रामनारायण को अंग्रेजों के दबाव के कारण किसी प्रकार का दण्ड नहीं दे सका।

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कम्पनी की कृपा प्राप्त करके कोई भी व्यक्ति प्रशासन में उच से उच पद प्राप्त कर सकता था और नवाब मजबूर था। अपनी असहाय स्थिति के कारण ही क्लाइव के जाते ही नवाब ने अंग्रेजों के प्रभाव से मुक्त होने का प्रयास किया था, जिसमें वह असफल रहा। अंग्रेजों का राजनीतिक प्रभुत्व इस बात से भी स्पष्ट होता है कि बाद में मीर जाफ़र को पदचुत करने में उन्हें किसी रकपात अथवा युद्ध का सहारा नहीं लेना पड़ा।

प्लासी के महत्व की चर्चा करते हुए इतिहासकार मेलीसन ने लिखा है कि, “इतना तात्कालिक, और प्रभावशाली परिणामों वाला कोई युद्ध नहीं हुआ।” अल्फ्रेड लायल के अनुसार, “प्लासी में क्लाइव की सफलता ने बंगाल में युद्ध तथा राजनीति का एक अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र अंग्रेजों के लिए खोल दिया।”

प्लासी के युद्ध ने अंग्रेज व्यापरीयो को शासक बना दिया I वे बंगाल के नवाब के निर्माता बन गये। इस युद्ध में विजयी होने के कारण उन्हें दक्षिण के युद्धों में भी सफलता प्राप्त हो गई और बंगाल की राजनीति से अब अन्य यूरोपियन शक्तियों का प्रभाव क्षीण हो गया। फ्रान्सीसी बंगाल में फिर कभी नहीं पनप सके और डचों को अंग्रेजों ने बुरी तरह पराजित कर दिया। इस प्रकार बंगाल में अंग्रेजों की सर्वोचता कायम हो गई।

Plasi Ka Yuddh Kab Hua Tha – प्लासी का युद्ध

प्लासी का युद्ध मुगल साम्राज्य के लिए भी घातक सिद्ध हुआ। बंगाल का नवाब मुगल सम्राट के अधीन होता था। मुगल सम्राट ही बंगाल में नवाब की नियुक्ति करता था, लेकिन इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद अंग्रेजों ने मुगल बादशाह के अधिकृत नवाब को हटा दिया और दूसरे व्यक्ति को नवाब बना दिया। सारी घटना को मुगल सम्राट मूक दर्शक की भांति देखता रहा।

इससे एक और तो बंगाल का सूबा मुगल साम्राज्य के हाथों से पूरी तरह निकल गया और दूसरी और इससे उसकी सत्ता एवं शक्ति का खोखलापन स्पष्ट हो गया। इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि कोई भी शक्ति अपने बल पर सूबेदार को हटा सकती है और नियुक्त कर सकती है। संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि राजनीतिक दृष्टि से यह युद्ध बहुत अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। इसके फलस्वरूप भारत में अंग्रेजों का प्रभाव व्यापक ही नहीं हो गया, बल्कि अंग्रेजी साम्राज्य की नीव पड़ गई।

(2) सैनिक महत्व – प्लासी के युद्ध के बाद बंगाल पर अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थापित हो गया था, जो सैनिक दृष्टि से उनके लिए बड़े महत्व का था। दक्षिण भारत में निजाम तथा मराठों की उपस्थिति के कारण अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना का काम सरल न था. परन्तु बंगाल इन शक्तियों से काफी दूर था।

Plasi Ka Yuddh Kab Hua Tha – प्लासी का युद्ध

अंग्रेज बंगाल पर आधिपत्य स्थापित कर सुगमता के साथ मुगलों की राजधानी दिल्ली का द्वार खटखटा सकते थे। इसके अतिरिक्त बंगाल समुद्र तट पर स्थित था। अतः इस पर अधिकार होने के बाद अंग्रेजों के लिए जाल मार्ग से अपनी सेनाएं लाना आसान हो गया।

(3) आर्थिक महत्व – आर्थिक दृष्टि से भी इस युद्ध के परिणाम अत्यन्त महत्वपूर्ण रहे। आर्थिक दृष्टि से बंगाल भारत का सर्वाधिक समृद्ध प्रान्त था। 1757 ई. से 1760) ई. के मध्य मीर जाफ़र ने लगभग 3 करोड़ रुपये रिश्वत के रूप में अंग्रेजों को दिये। प्लासी के युद्ध के बाद स्वयं क्लाइव को 30,000 पॉण्ड प्राप्त हुए और बाद में 37,70,833 पॉण्ड क्षतिपूर्ति के रूप में प्राप्त हुए। (कुछ विद्वानों के अनुसार 17 लाख रुपये और कुछ के अनुसार अंग्रेजों को 2 से 3 लाख पॉण्ड के बीच रकम प्राप्त हुई थी) मीरजाफर ने कम्पनी के अधिकारियों को और सैनिकों को अच्छी-खासी रकम उपहार में दी।

ऐसा माना जाता है कि अंग्रेजों को सन्तुष्ट करने के लिए मीर जाफर को अपने महल के सोने-चांदी के बर्तन और अन्य सामान बेचना पड़ा था। वस्तुतः बंगाल की सम्पति पर अधिकार करके अंग्रेजों ने कर्नाटक के युद्धों में विजय प्राप्त की और भारत में अपनी राजनीतिक स्थिति को दृढ़ किया। अंग्रेजों को बंगाल में 24 परगनों की जागीर प्राप्त हुई।

बंगाल से प्राप्त धन से कम्पनी की आर्थिक स्थिति में पर्याप्त विकास हो रहा था, परन्तु इससे बंगाल की आर्थिक दशा दिनोंदिन गिरती जा रही थी। अंग्रेजों ने बंगाल का, जो आर्थिक शोषण किया, उसकी कल्पना करना आसान नहीं हैं। प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में व्यापार करने की पूर्ण स्वतंत्रता मिल गई। कम्पनी ने इन सूबों के विभिन्न भागों में अपनी फैक्ट्रियों तथा कोठियां स्थापित कीं। अंग्रेजों ने 19 अगस्त, 1747 ई. में सबसे पहले कलकत्ते में अपनी टकसाल स्थापित की और अपना रुपया चलाया।

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(4) नैतिक महत्व – नैतिक दृष्टि से भी प्लासी के युद्ध का विशेष महत्व है। जे. एन. सरकार एवं दत्त ने लिखा है कि, “एक विदेशी व्यापारिक कम्पनी के द्वारा प्रान्त के सूबेदार की बेइजती ने कम्पनी की प्रतिष्ठा और प्रभाव और बढ़ाया। प्लासी के युद्ध ने ही स्पष्ट रूप से दिखला दिया कि बंगाल का राजनैतिक जीवन पूर्णतः भ्रष्ट अवस्था में है और मुसलमान शासकों के पतनोन्मुख शासन के विरूद्ध हिन्दू ज़मीदारों और सौदागरों का असन्तोष बढ़ा है। इससे लाभ उठाकर अंग्रेजों की व्यापारिक उन्नति और प्रादेशिक प्रगति का नया काल आरम्भ हुआ।”

युद्ध में विजय प्राप्ति से अंग्रेज कम्पनी की प्रतिष्ठा और प्रभाव में भारी वृद्धि हो गई, लेकिन मुगल बादशाह और नवाब की इज्जत धूल में मिल गई। इस युद्ध के बाद कम्पनी के व्यापारियों का नैतिक पतन होने लगा। अब उन्होंने नैतिक-अनैतिक सभी साधनों से धन प्राप्त करना आरम्भ कर दिया। उनके लोभ की कोई सीमा नहीं रही। लार्ड क्लाइव ने तो नाजायज तरीके से अत्यधिक धनराशि प्राप्त की थी।

भ्रष्टाचार व्यापक हो गया तथा नवाब और कम्पनी दोनों प्रजा का भयंकर आर्थिक शोषण करने लगे। अंग्रेजों ने भारतीयों की विश्वासघात प्रवृति का पूरा-पूरा लाभ उठाना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार षड्यन्त्रों और कुचक्रों का भरपूर प्रोत्साहन मिला।

Chhava

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