Panipat Ka Pratham Yuddh – पानीपत का प्रथम युद्ध

Panipat-Ka-Pratham-YuddhPanipat Ka Pratham Yuddh

पानीपत का प्रथम युद्ध 21 अप्रैल, 1526 ई. को हुआ था। यह युद्ध दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी और बाबर के बीच हुआ था। इस युद्ध में बाबर के पास 25,000, सैनिक और 700 तोपें थी, जबकि इब्राहीम लोदी के पास एक लाख सैनिक थे। और इस युद्ध में बाबर कि विजय हो गई I

Panipat Ka Pratham Yuddh – पानीपत का प्रथम युद्ध

बाबर का वास्तविक नाम जहीरूदीन मुहम्मद था। उसका उपनाम बाबर था। उसका जन्म 14 फरवरी, 1483 को हुआ। उसके पिता का नाम उमर शेख मिर्जा था, जो फरगना का शासक था। बाबर की माता का नाम कुतलग निगार खातम था। वह पिता की ओर से तैमूर और माता की ओर से चंगेज खां के वंश से सम्बन्ध रखता था।

इस प्रकार उसमें मंगोलों की क्रूरता और तुर्कों की योग्यता तथा साहस का समन्वय था। बाबर को इतिहास, ज्योतिष और इस्लामी परम्पराओं का अच्छा ज्ञान था। प्रतिभा सम्पन्न होने के कारण उसने अल्पायु में फारसी पर पूर्ण दक्षता प्राप्त कर ली थी। बाल्यकाल में उसे सैन्य संचालन -साथ शासन-प्रबन्ध की भी अच्छी शिक्षा प्राप्त हुई थी।

डॉ ए. एल. श्रीवास्तव लिखते हैं कि, ‘वह एक अकाल प्रौढ़ बालक था और उसकी मानसिक शक्तियों का एक ऐसा सुन्दर विकास हुआ था कि वह राजनीतिक घटनाओं के महत्व को आसानी से समझ लेता था और मानव चरित्र को सरलता से परख लेता था।”

Panipat Ka Pratham Yuddh – पानीपत का प्रथम युद्ध

बाबर की बारह वर्ष की अवस्था में उसके पिता उमर शेख मिर्जा की मृत्यु हो गई और वह फरगना का राजा बन गया । विश्वासघाती सम्बन्धियों और सरदारों ने स्थिति को अधिक गम्भीर बना दिया। उसके चाचा अहमद मिर्जा ने 1492 ई. में राज्य हथियाने का असफल प्रयत्न किया। बाबर का चाचा अहमद मिर्जा समरकन्द का शासक था।

उसकी 1495 ई. में मृत्यु हो गई। इसका लाभ उठाकर बाबर ने 1497 ई. में समरकन्द पर अधिकार कर लिया। दुर्भाग्यवश बाबर समरकन्द में बीमार हो गया। इस कारण उसे फरगना से भी हाथ धोने पड़े और समरकन्द भी उसके हाथ से निकल गया। बाबर ने स्वस्थ होने पर फरगना और समरकन्द पर पुनः अधिकार करने के लिए प्रयत्न किए, किन्तु असफल रहा।

परिणामस्वरूप बाबर 1497 ई. से लेकर 1504 ई. के लिए निर्वासित हो गया और उसे स्थान-स्थान की ठोकर खानी पड़ी। अन्त में होकर बाबर ने अपनी मातृ-भूमि छोड़ दी और किसी अन्य स्थान पर अपना नसीब आजमाने का प्रयास किया।

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काबुल पर अधिकार – इन प्रतिकूल परिस्थितियों से विवश होकर बाबर काबुल की और चल पड़ा। उसने काबुल के सरवारों की सहायता से 1504 ई में काबुल पर अधिकार कर लिया। बाबर ने लिखा है कि, ‘दूसरी रबी (अक्टूबर, 1504 ई.) के अन्तिम 10 दिनों में बिना किसी लड़ाई के बिना किसी प्रयत्न के मैंने काबुल और गजनी पर अधिकार कर लिया। यह सब ईश्वर की देन थी।

बाबर ने 1504 ई. से लेकर 1525 ई. तक काबुल पर राज्य किया। इस अवधि बाबर ने खोये हुए प्रदेशों को पुनः प्राप्त करने का असफल प्रयास किया।

भारत विजय की ओर – मध्य एशिया में अपनी असफलता के पश्चात् बाबर ने भारत-विजय का निश्चय किया 1526 ई. में उसने स्वयं लिखा है कि, ‘काबुल विजय करने के समय से अब तक में हिन्दुस्तान पर अधिकार करने के लिए सदैव तुला हुआ परन्तु कभी अपने अमीरों के दुराचरण के कारण, कभी अपने भाइयों आदि के विरोध के कारण मुझे हटना पड़ा।

Panipat Ka Pratham Yuddh – पानीपत का प्रथम युद्ध

अन्त में वह बाधाएं दूर हो गई और मैं एक सेना एकत्रित करके बाजीर और स्वात की ओर चला, जहां से झेलम नदी के पश्चिम में मेरा की ओर बढ़ा।” 1519 ई. से 1524 के बीच बाबर ने चार बार सिन्ध नदी को पार करके पंजाब पर आक्रमण किया, परन्तु लाहौर से आगे नहीं बढ़ सका।

पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रैल, 1526) – नवम्बर, 1525 में बाबर ने अन्तिम बार भारत पर विजय के लिए काबुल से प्रस्थान किया। इस समय तक उसके पास पंजाब के सूबेदार दौलत खां लोदी और इब्राहीम के चाचा आलम खां के पास से भारत पर आक्रमण के निमन्त्रण आ चुके थे। काबुल से रवाना होते समय बाबर के सेना की संख्या 12,000 थी, परन्तु दिल्ली के पास पहुंचते-पहुंचते उसकी सेना की संख्या लगभग 25,000 हो गई।

पानीपत के युद्ध के पूर्व इब्राहीम का एक प्रमुख सरदार बिब्बन अपने तीन हजार सैनिकों के साथ बाबर से आ मिला। राणा सांगा ने भी इसी समय आगरा की ओर से आक्रमण करने का सन्देश बाबर के पास भिजवाया था। इन अनुकूल परिस्थितियों के कारण बाबर के उत्साह असाधारण वृद्धि हुई और वह पानीपत के समीप पहुंच गया, जहां इब्राहीम लोदी पह से ही अपनी सेनाओं सहित उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

Panipat Ka Pratham Yuddh – पानीपत का प्रथम युद्ध

युद्ध की घटनाएं

पानीपत का प्रथम युद्ध 21 अप्रैल, 1526 ई. को हुआ था। यह युद्ध दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी और बाबर के बीच हुआ था। इस युद्ध में बाबर के पास 25,000, सैनिक और 700 तोपें थी, जबकि इब्राहीम लोदी के पास एक लाख सैनिक थे। इब्राहीम लोदी एक कुशल सेनापति नहीं था और उसकी सेना के अधिकांश सैनिक भाड़े के टट्टू थे।

साहस, अनुशासन तथा वीरता का उनमें सर्वथा अभाव था। दोनों पक्षों की व्यूहरचना के बारे में एस. आर. शर्मा ने इस प्रकार लिखा है एक ओर निराशाजनित साहस और वैज्ञानिक युद्ध प्रणाली के कुछ साधन थे, दूसरी और मध्यकालीन ढंग के सैनिकों की भीड़ थी, जो भाले और धनुष बाणों से सज्जित थी और मूर्खतापूर्ण तथा अव्यवस्थित ढंग से जमा हो गई थी।

इब्राहीम लोदी और बाबर की सेनाएं एक सप्ताह तक रणक्षेत्र में आमने सामने खड़ी रहीं। अन्त में 21 अप्रैल, 1526 ई. को बाबर ने अपने सैनिकों को आक्रमण करने का आदेश दिया। दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध प्रारम्भ हो गया। अन्त में इब्राहीम लोदी स्वयं 16,000 सैनिकों के साथ रणक्षेत्र में काम आया। बाबर को पूर्ण विजय प्राप्त हुइ I

Panipat Ka Pratham Yuddh – पानीपत का प्रथम युद्ध

इस युद्ध के बारे में बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में लिखा है कि, ‘सवेरे सूर्य निकलने के बाद लगभग नौ दस बजे युद्ध आरम्भ हुआ था, दोपहर के बाद तक दोनों सेनाओं के बीच भयानक युद्ध होता रहा। दोपहर के बाद शत्रु कमजोर पड़ने लगा और उसके बाद वह भीषण रूप से परास्त हुआ। उसकी पराजय को देखकर हमारे शुभचिन्तक बहुत प्रसन्न हुए। सुल्तान इब्राहीम को पराजित करने का कार्य बहुत कठिन था, लेकिन ईश्वर ने उसे हम लोगों के लिए सरल बना दिया।’

युद्ध के परिणाम – पानीपत का युद्ध मध्यकालीन भारतीय इतिहास की एक युगान्तकारी घटना है। इसके परिणामस्वरूप बाबर दिल्ली का सुल्तान बन गया। डॉ. ईश्वरी प्रसाद के शब्दों में, लाये वंश की सत्ता टूटकर नष्ट हो गई और हिन्दुस्तान का प्रभुत्व चुगताई तुकों के हाथों में चला गया।’ इस युद्ध के प्रमुख परिणाम निम्नलिखित हुए I

(1) इस युद्ध के परिणामस्वरूप लोदी वंश की शक्ति समाप्त हो गई और दिल्ली में मुगल वंश की स्थापना हुई। लेनपूल के अनुसार, ‘अफगानों के लिए पानीपत का युद्ध बड़ा भयंकर सिद्ध हुआ। इससे उनका साम्रज्य समाप्त हो गया और उनकी का अन्त हो गया।” 1 डॉ. आर. पी. त्रिपाठी के अनुसार, ‘इससे लोदी वंश का भाग्य का सूर्य स्थायी रूप से उसी तरह अस्त हो गया, जिस प्रकार तैमूर के हाथ तुगलक का अन्त हुआ था।

Panipat Ka Pratham Yuddh – पानीपत का प्रथम युद्ध

‘डॉ. ए. एल. श्री वास्तव ने लिखा है कि, ‘जोदियों की सैन्य शक्ति पूर्णतः छिन्न-भिन्न हो गई और उनका राजा युद्ध क्षेत्र में मारा गया। हिन्दुस्तान की सर्वो सा कुछ काल के लिए अफगान जाति के हाथों से निकलकर मुगलों के हाथ में चली

(2) इस युद्ध के पश्चात् बाबर का दिल्ली और आगरा पर अधिकार हो गया। उसे भविष्य में अब राज्य विस्तार के लिए युद्ध योजनाओं में ही शक्ति लगानी थी। शत्रुक विलियम्स ने लिखा है कि, ‘बाबर के इधर-उधर भटकने के दिन बीत गये थे और उसने अब अपने प्राणों की रक्षा के लिए अथवा सिंहासन को सुरक्षित रखने के लिए चिन्तित होने की जरूरत नहीं रही थी, उसे तो अब राज्य विस्तार के लिए युद्ध योजनाओं में शक्ति लगानी थी।

(3) बाबर को दिल्ली और आगरा से अपार धन-दौलत प्राप्त हुई। विख्यात कोहिनूर हीरा भी उसके हाथ लगा। इससे उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो गई। डॉ. आर. पी. त्रिपाठी के अनुसार, ‘बाबर ने जो धन दिल्ली व आगरे में प्राप्त किया था। उसमें से बहुत-सा धन अपने सैनिकों को दे दिया। वह समरकन्द, इराक, खुरासान व काश्गर में स्थित सम्बन्धियों को तथा समरकन्द, मक्का व मदीना तथा खुरासान के पवित्र आदमियों को भी भेंट भेजना न भूला ।’

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(4) इस युद्ध के बाद बाबर के नाम का खुतबा पढ़ा गया। इस विजय ने बाबर के गौरव को बढ़ा दिया। डॉ. स्मिथ का कहना है कि, ‘वह अपने समय का एशिया का महान् प्रतिभाशाली राजा था तथा भारत के सम्राटों में एक उच्च स्थान के योग्य

(5) यह एक निर्णायक युद्ध था। इस युद्ध के महत्त्व के बारे में एस. एम. जाफर ने लिखा है कि ‘इस युद्ध से भारतीय इतिहास में एक नये युग का आरंभ हुआ। लोदी वंश के स्थान पर मुगल वंश की स्थापना हुई। इस नये वंश ने समय आने पर ऐसे प्रतिमाशाली तथा महान् बादशाहों को जन्म दिया, जिनकी छत्रछाया में भारत ने असाधारण उन्नति तथा महानता प्राप्त की।

बाबर की सफलता के कारण – पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहीम लोदी अपनी विशाल सेना के होते हुए भी पराजित हुआ और बाबर की विजय हुई। बाबर की विजय अथवा इब्राहीम लोदी की हार के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

Panipat Ka Pratham Yuddh – पानीपत का प्रथम युद्ध

(1) बाबर एक अनुभवी सैनिक और महान् सेनानायक था। डॉ. आर. पी. त्रिपाठी ने लिखा है कि वास्तव में उत्कृष्ट नेतृत्व, वैज्ञानिक रण-कला, श्रेष्ठ शस्त्राशस्त्र तथा सौभाग्य के कारण बाबर की विजय हुई। बाबर की विलक्षण सैन्य-कुशलता के सामने इब्राहीम लोदी एक अनुभवहीन सेनापति था। लेनपूल ने इसी तथ्य का समर्थन करते. हुए लिखा है कि, ‘पानीपत के रणक्षेत्र में मुगल सेनाओं ने घबराकर युद्ध आरम्भ किया, परन्तु उनके नेता की वैज्ञानिक योजना तथा अनोखी चालों ने उन्हें आत्मविश्वास और विजय प्रदान की।

(2) बाबर के पास एक कुशल तोपखाना था, जिसकी सहायता से वह इब्राहीम लोदी को पराजित करने में सफल हुआ। आर. बी. विलियम्स के अनुसार, ‘बाबर के शकिशाली तोपखाने ने भी उसे सफल होने में बहुमूल्य सहायता दी।’

(3) बाबर के सौभाग्य से इब्राहीम लोदी की सेना में एकता और संगठन का सर्वथा अभाव था इब्राहीम लोदी के व्यवहार से उसके सरदार असन्तुष्ट थे। वह अपनी विवेकहीन नीति के कारण जनता में अप्रिय हो गया था। उसकी सेना के अधिकांश लोग किराये के टट्टू थे। बाबर ने अपनी आत्मकथा में उसके सैनिकों के बारे में लिखा है कि, ‘हिन्दुस्तान के सैनिक मरना जानते हैं, लड़ना नहीं।”

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(4) इब्राहीम लोदी स्वयं एक अयोग्य सेनापति था। जे. एन. सरकार ने लिखा है। कि, ‘इब्राहीम लोदी ने भारत के राजसी तरीके से लड़ाई के लिए कूच किया था अर्थात् दो-तीन मील तक कूंच करता था और तदुपरान्त दो दिन तक अपनी सेनाओं के साथ आराम करता था। उसका फौजी खेमा एक चलते फिरते अव्यवस्थित शहर की तरह था।’

बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, कि ‘इब्राहीम एक योग्य सेनापति नहीं था। वह बिना किसी योजना के कुंच कर देता था और बिना सोचे-समझे पीछे हट जाता था। इसके अतिरिक्त वह बिना दूरदर्शिता के युद्ध में कूद पड़ता था। ऐसे अयोग्य सेनापति पर विजय प्राप्त करना बाबर के लिए कोई कठिन कार्य नहीं था।

(5) अफगानों का सैनिक संगठन मुगल सैन्य-प्रबन्ध की अपेक्षा दुर्बल था। सुल्तान लोदी के अधिकांश सैनिक किराये के थे। उनमें एकता, अनुशासन, संगठन और राष्ट्रीय हित का अभाव था। इसके विपरीत मुगल सैनिक बड़े अनुभवी तथा कुशल योद्धा थे। उनमें अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपनी जान कुर्बान करने की लगन थी। 

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