Pandit Govind Ballabh Pant – पंडित गोविन्दवल्लभ पंत

Pandit-Govind-Ballabh-PantPandit Govind Ballabh Pant

पंडित गोविन्द बल्लभ पंत भारत माँ के एक अमर सपूत हो गये हैं जिन्होंने अंग्रेजी साम्राज्य को धाराशायी कर भारत के निर्माण में अपनी सारी शक्ति लगा दि वे पर्वतराज हिमगिरि के तरह धीर और गम्भीर थे। जैसे हिमालय प्राकृतिक प्रहारों को सहते हुए अचल रहता है वैसे ही पंतजी बाह्य विपत्तियों और संकटो को झेलते हुए शान्त और गम्भीर रहे।

Pandit Govind Ballabh Pant – पंडित गोविन्दवल्लभ पंत

हिमालय से ही बहुत सी नदियाँ निकलकर भारत को शस्य श्यामला बनती हैं, उसी तरह पतजी की छाया में और उनके आशीर्वाद से अनेक लोग फले-फूले ये गंगा की तरह पवित्र थे और सबका समभाव से कल्याण करने में विश्वास रखते थे। वे जात-पात, क्षेत्रवाद- सम्प्रदायवाद से बहुत ऊपर उठ चुके थे। चाहे वे कांग्रेस के साधारण कार्यकर्ता रहे हों या भारत सरकार के गृहमंत्री, कभी भी अपना होश नहीं खोया।

साधारण लोगों की बातें सुनना, उनका कष्ट निवारण करना पंतजी का धर्म बन गया था। ये एक कालजयी पुरुष रूप में सदा याद किये जायेंगे। शतवार्षिकी समारोह का शुभारम्भ दिल्ली के विज्ञान भवन में करते हुए भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री आर. वेंकटरामन ने उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हमें दिया है, वह अनुकरणीय है।

राष्ट्रपति ने कहा कि पंतजी ने आजादी की लड़ाई में महत्त्वपूर्ण हुए जो संदेश भूमिका निभायी है और आजादी मिलने के बाद देश के निर्माता के रूप में उतना ही महत्त्वपूर्ण काम किया। वस्तुतः उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन तथा स्वतंत्र भारत में नयी तथा पुरानी पीढ़ी के बीच एक पुल का काम किया। भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी ने उनके प्रति सम्मान प्रकट करते हुए कहा कि पंडित पंत ने धर्मनिरपेक्ष, न्यायपूर्ण और मजबूत भारत की कल्पना की थी। निःस्वार्थ भाव से राष्ट्र निर्माण में योगदान करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 

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उन्होंने कहा कि शिक्षा और कृषि के बारे में पंतजी की धारणायें आज भी एकदम सही हैं। वे हमेशा मानते थे कि आर्थिक विकास के लिए शिक्षा सबसे जरूरी है। लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ ने कहा कि पंतजी के तर्क अकाट्य होते थे और अपनी इस प्रतिभा के सहारे उन्होंने जिस पद पर काम किया उसे महान ऊंचाई तक पहुँचा दिया। उन्होंने हर जगह अपनी अमिट छाप छोड़ी।

तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री पी.वी. नरसिंहराव ने उन्हें ‘कुमाऊँ का शेर’ कहा। उन्होंने कहा कि आज उनके आदर्शों पर चलने की जरूरत पहले से भी ज्यादा हो गयी है। हमारी मान्यता है कि पंडित गोविन्दबल्लभ पंत के सिद्धान्त आज भी वैसे ही व्यावहारिक है जैसे उनके जीवन काल में थे।

जन्म – पंडित गोविन्दबल्लभ पंत का आविर्भाव भारत की पुण्य भूमि हिमालय पर्वत के निकट अल्मोड़ा जिले में 15 किलोमीटर की दूरी पर खँट नामक गाँव में अनन्त चतुर्दशी के दिन 10 सितम्बर, 1888 ई. को हुआ था।  यह संयोग ही है कि इनका जन्म गाँव में हुआ, कारण इनके जन्म के 21 दिनों के बाद ही उनकी माँ अल्मोड़ा चली आयीं। पुत्र रत्न की प्राप्ति पर पंत परिवार में आनन्द की लहरें उमड़ी थी।

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सभी इस होनहार बालक को आशीर्वाद देने आये। कौन जानता था कि यह पहाड़ी क्षेत्र में जन्मा बालक एक दिन भारत का कर्णधार होगा जिसके नाम से ब्रिटिश शासन काँपने लगेगा। सचमुच पंत साहस और दृढ़ता के प्रतीक थे। “होनहार बिरवान के होत चिकने पात’ यह कहावत पंतजी के संबंध में पूर्णतः सही उतरती है। उनकी स्मरण शक्ति बड़ी प्रखर थी। घर में संस्कृत श्लोक सुनकर ही याद कर लेते।

शिक्षा – उनकी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में ही आरम्भ हुई। सभी परीक्षाओं में वे अच्छे अंक प्राप्त करते। इलाहाबाद के मयूर सेन्ट्रल कॉलेज से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। पुनः लो की परीक्षा में विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया। यह पंतजी के शैक्षणिक जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि कही जा सकती है। उन्होंने अल्मोड़ा में ही वकालत करना शुरू किया और शीघ्र ही वे अपने क्षेत्र के प्रमुख वकील माने जाने लगे। जब न्यायालय में पंतजी बहस करते तो वह दृश्य देखने लायक होता उनका शरीर तो विशाल था ही, वृहत्काय पंत जी जब ओजस्वी वाणी में अकाट्य तर्क प्रस्तुत करते तब न्यायाधीश दंग रह जाते।

पंडित गोविन्दबल्लभ पंत सार्वजनिक कार्यों में आरम्भ से ही अभिरुचि लेने लगे। उन्होंने 1921 ई. में ही सरकार से यह मांग की कि सभी बच्चों के लिए निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा का प्रबंध करे। कारण, वे आर्थिक सम्पन्नता के लिए शिक्षा को आवश्यक मानते थे। वे मानते थे कि शिक्षा मनुष्यों को अन्यकार से हटाकर प्रकाश की ओर ले जाती है। वे ऋषियों द्वारा उद्घोषित विचार ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ में पूर्ण आस्था रखते थे।

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गोविन्द बल्लभ पंत और भारत का स्वतंत्र संग्राम – पंडित पंत राजनीति में अपना पथ-प्रदर्शक महामना मदनमोहन मालवीय और पंडित मोतीलाल नेहरू को मानते थे। बाद में वे महात्मा गाँधी के निकट अवश्य आये, पर गाँधीजी के वैसे विचारों को उन्होंने अपनाया जो उन्हें तर्कसंगत लगे। 1916 ई. में ये अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य बने। 1922 के गया कांग्रेस में पंडित मोतीलाल नेहरू और चितरंजन दास ने गांधीजी के विचारों से अपनी असहमति प्रकट की।

कांग्रेस कौंसिल में प्रवेश को लेकर दो भागों में विभक्त हो गयी। महात्मा गाँधी और उनके कट्टर अनुयायी कौंसिल प्रवेश के लिए विरोधी थे, उन्हें अपरिवर्तनवादी कहा जाता था जबकि मोतीलाल और देशबन्धु चितरंजन दास कौंसिल में प्रवेश कर सरकार की नीतियों की आलोचना कर उसे ध्वस्त करना चाहते थे। इन दलों को परिवर्तनवादी नाम से जाना जाता था। अंत में महात्मा गाँधी से पंडित मोतीलाल, देशबन्धु चितरजदास आदि ने हटकर 1923 में इलाहाबाद में स्वराज पार्टी की स्थापना की।

चुनाव में स्वराजवादियों ने बहुत शानदार सफलता प्राप्त की। केन्द्रीय विधानमंडल में विरोधी दल के नेता पंडित मोतीलाल नेहरू निर्वाचित हुए। और बंगाल के विधानसभा में चितरंजन दास नेता बने संयुक्त प्रान्त में पंडित गोविन्दबल्लभ पंत नेता बनाये गये। मोतीलाल जी ने पंत पर ही संयुक्त प्रान्त में स्वराज दल के संचालन का भार दिया था। पंतजी के निर्देशन में स्वराज दल का खूब प्रचार हुआ।

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स्वराज दल चाहता था कि वे विधानसभा में प्रवेश कर सरकार की आलोचना करें और जनता को सरकार की त्रुटियों से अवगत कराते रहें। तात्पर्य यह कि वे भीतर और बाहर दोनों जगहों से सरकार को दुर्बल बनाना चाहते थे, जबकि महात्मा गाँधी और उनके अनुयायी रचनात्मक कार्यों के द्वारा जनता को शिक्षित कर औपनिवेशिक स्वराज प्राप्त करना चाहते थे। पंडित गोविन्दबल्लभ पंत ने केवल स्वराज दल में ही भाग नहीं लिया, देश ने जब-जब उनकी जरूरत महसूस की, पंडितजी प्रथम पंक्ति में खड़े रहे।

ब्रिटिश सरकार ने भारत में संवैधानिक स्थिति के अध्ययन के लिए सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में साइमन आयोग का 1927 में गठन करने की घोषणा की। उसमें सात सदस्य थे। किसी भी भारतीय को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। भारत में प्रायः सभी दलों ने साइमन आयोग का बहिष्कार करने का निर्णय लिया।

7 फरवरी, 1928 में साइमन बम्बई (मुम्बई) पहुँचा, तब उसे काला झंडा दिखाया गया। ‘साइमन वापस जाओ’ नारे से समस्त वायुमंडल गुंजरित हो उठा। बम्बई के बाद कमीशन के लाहौर पहुँचने पर लाला लाजपतराय के नेतृत्व में साइमन आयोग का बहिष्कार किया गया। अंग्रेज सिपाहियों ने लालाजी पर ऐसी लाठियाँ बरसायी कि वे उन्हीं की चोट से बाद में परलोक सिधारे।

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लखनऊ में पंडित गोविन्दबल्लभ पंत और पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में साइमन आयोग के विरोध में बड़ा प्रदर्शन का आयोजन किया गया। यह इतना बड़ा प्रदर्शन था कि उसे देखकर साइमन की आश्चर्य का ठिकाना न रहा। पुलिस वालों ने धड़ाधड़ लाठियाँ चलाना शुरू किया। पंडित गोविन्दबल्लभ पंत ने जवाहरलाल जी को बचाने के लिए स्वयं अपने कंधे पर लाठियाँ सहीं।

नेहरूजी को चोट नहीं आने दी यह था पंडित पंत का अनुपम त्याग और नेहरूजी के प्रति अगाध प्रेम यह दर्द बहुत दिनों तक पंडित पंत महसूस करते रहे। जवाहरलाल जी पंत के प्रति सदा नतमस्तक रहे। देशबन्धु की मृत्यु के बाद स्वराज पार्टी बिखर गई और स्वराज दल के प्रायः सभी लोग कांग्रेस में ही आ गये।

पंडित गोविन्दबल्लभ पंत 1927 ई. में उत्तर प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष चुने गये और अलीगढ़ में अध्यक्षता की। इस रूप में पंतजी के कार्य बहुत महत्त्वपूर्ण थे। उन्होंने घर-घर घूमकर कांग्रेस का संदेश लोगों को बतलाया। उनमें अद्भुत संगठनात्मक प्रतिभा थी। महात्मा गाँधी और उनके अनुयायी भी पंडितजी के इस गुण का बड़ा आदर करते थे।

Pandit Govind Ballabh Pant – पंडित गोविन्दवल्लभ पंत

पंडित गोविन्दवल्लभ पंत ने 1930 में नमक तोड़ो आन्दोलन में भाग लिया। वे बाद में जेल में बन्द कर दिये गये। उन्हें पहले नैनीताल में और बाद में देहरादून जेल में रखा गया। जेल में इनका स्वास्थ्य गिरने लगा। इसलिए वे छोड़ दिये गये। 1932 में आन्दोलन में कूद पड़े और सरकार ने पुनः उन्हें 3 महीने की जेल और 350 रुपये का आर्थिक दंड भी दिया जो उनकी गाड़ी को 500 रुपये में बेचकर पूरा कर दिया गया। बाकी 150 रुपये श्रीमती पंत को भेजा गया जिसे उन्होंने लेने से इन्कार कर दिया।

इससे स्पष्ट होता है कि पंडित गोविन्दबल्लभ पंत भारत के स्वतंत्रता संग्राम में मनसा-वाचा-कर्मणा भाग लेते थे। वे अपने हरे-भरे परिवार की कुछ भी चिन्ता नहीं करते थे। अगर वे वकील बने होते तो शायद वे उस समय तक लखपति बन जाते सचमुच त्यागी पुरुष कभी ऐश-आराम की जिन्दगी पसन्द नहीं करते। पंडित पंत नेहरूजी की तरह कभी घर में, तो कभी जेल में रहते।

1935 में भारत सरकार अधिनियम पारित किया गया। इस अधिनियम के अनुसार एक प्रस्तावित संघवाद की व्यवस्था थी, पर इसे कई कारणों से लागू नहीं किया गया। इसी अधिनियम में संघीय न्यायपालिका बनी जो 1950 में 25 जनवरी तक चलती रही और आधुनिक सर्वोच्च न्यायपालिका 26 जनवरी, 1950 से बनी।

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भारत सरकार ने 1935 के अधिनियम में यह व्यवस्था की कि प्रान्तों को स्वायत्तता प्रदान की जायेगी। फलस्वरूप 1937 में चुनाव हुए। कांग्रेस की अधिकांश प्रान्तों में विजय हुई। 1937 में 17 जुलाई को पंडित गोविन्दबल्लभ पंत के नेतृत्व में संयुक्त प्रान्त में सरकार का गठन किया गया। बिहार में डॉ. श्री कृष्ण सिंह के नेतृत्व में मंत्रीमंडल बना। पंडित पंत ने बड़ी योग्यतापूर्वक सरकार का संचालन किया।

वे अपने सहयोगियों के लिए सदा चिन्तित रहते और उनका उचित सम्मान करते। कांग्रेस दल को मजबूत बनाने के लिए ये प्रयत्नशील रहते। यहाँ एक घटना का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा। रफी साहब ने कुछ कारणवश मंत्रीमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। पंतजी को जब यह मालूम हुआ, झट उन्होंने भी अपने सचिव को बुलाकर राज्यपाल के पास त्यागपत्र लिखने को कहा।

त्यागपत्र सचिव ने लाकर दिया तो सभी अवाक् रह गये। अंत में रफी साहब के त्यागपत्र वापस लेने के बाद ही पंतजी ने अपना निर्णय बदला- यह था उनका अद्भुत संकल्प। मुख्यमंत्री इच्छानुसार मन्त्रियों को हटाते रहते हैं, यहाँ तक कि उन्हें बर्खास्त कर देते हैं। पर पंतजी मंत्रिमंडलीय उत्तरदायित्व के सिद्धान्त में पूर्ण आस्था रखते थे। साथ डूबने और उत्तराने के सिद्धान्त में विश्वास करते थे।

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1939 के सितम्बर महीने में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ। ब्रिटिश सरकार ने बिना भारतीय नेताओं की राय लिये भारत को भी युद्ध में झोंक दिया। प्रतिक्रियास्वरूप कांग्रेस मंत्रिमंडल ने पद त्याग कर दिया। घनघोर संग्राम चल रहा था। भारत के कुछ कांग्रेस नेता इस अवसर से लाभ उठाना चाहते थे।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का महात्मा गाँधी एवं उनके समर्थकों के साथ इतना मतभेद बढ़ गया कि उन्होंने भारत माँ को गुलामी से मुक्त कराने के लिए देश छोड़ दिया और आजाद हिन्द फौज की स्थापना कर ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया। इधर ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन स्टाफर्ड क्रिप्स को भारत में संवैधानिक गतिरोध को दूर करने के लिए 1941 में भेजा, पर प्रायः सभी राजनीतिक दलों ने किस के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

1942 ई. में भारत का अंतिम स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ जिसे अगस्त क्रान्ति के नाम से जाना जाता है। बम्बई में 8 अगस्त को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने अंग्रेजों भारत छोड़ो’ प्रस्ताव को कार्यान्वित करने के लिए दृढ़ निश्चय किया। गाँधीजी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया। ब्रिटिश सरकार ने तुरन्त सभी नेताओं को जेल में बन्द कर दिया। पंडित गोविन्दबल्लम पंत अब तक कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में आ चुके थे। उन्हें सरकार ने अहमदनगर जिले में बन्द कर दिया।

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1947 के 15 अगस्त को भारत स्वाधीन हुआ। शहीदों के सपने पूरे हुए। 1946 में ही पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में केन्द्र में अन्तरिम सरकार की स्थापना की गयी थी। अन्य प्रान्तों की तरह संयुक्त प्रान्त में भी सरकार बनायी गयी जिसके मुख्यमंत्री पंडित गोविन्दबल्लभ पंतजी थे। प्रथम आम निर्वाचन 1952 में हुआ।

कांग्रेस की शानदार विजय हुई और फिर उन्होंने पर्वतीय क्षेत्र में बेगारी प्रथा को समाप्त कराया। पंडित गोविन्दबल्लभ पंत के नेतृत्व में ही सरकार बनी पंडित पंत बड़ी योग्यता के साथ सरकार का संचालन करते। सभी प्रशासनिक गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाते। अपने प्रांत के सर्वांगीण विकास के लिए एड़ी-चोटी का पसीना एक कर देते।

अपने शासन काल में पंतजी ने उत्तर प्रदेश की जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया। एक ही कलम से दो लाख से अधिक तालुकदारों के अधिकार समाप्त कर समतावादी समाज की स्थापना कर दी। अपने गाँव के निकट उन्होंने हरिजनों के गाँव में जाकर छुआछूत के विरुद्ध आवाज बुलन्द की स्वयं उनके हाथ से जल ग्रहण पंतजी ने शिक्षा, कृषि, सिचाई, स्वास्थ्य, लोक-प्रशासन आदि सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया वे सचमुच अपने प्रदेश आर देश को बेहद प्यार करते थे, सबके सुख में अपना सुख मानते थे।

Pandit Govind Ballabh Pant – पंडित गोविन्दवल्लभ पंत

पंडित जवाहरलाल नेहरू की यह विशेषता थी कि अपने मंत्रिमंडल में योग्यतम व्यक्ति को स्थान देते। पंडित पंत जैसे व्यक्ति को कब तक प्रदेश की राजनीति में रहने देते। तुरन्त 1955 में उन्होंने पंतजी को अपने मंत्रीमण्डल में गृहमंत्री का पद दिया जिसे उन्होंने बड़ी खूबी के साथ निभाया। सरदार पटेल के बाद मेरी समझ में ये सर्वाधिक योग्य गृहमंत्री सिद्ध हुए।

उन्होंने बड़ी योग्यता के साथ राज्यों का पुनर्गठन कराया और हिन्दी भाषा की प्रतिष्ठा बढ़ायी है पहले मुख्यमंत्री थे जिन्होंने हिन्दी भाषा में ही कार्य करने का निर्देश दिया था। वे राष्ट्रभाष समिति के सदस्य थे और हिन्दी के विकास के लिए गृहमंत्री के रूप में भी उन्होंने प्रशंसनीय कार्य किया।

पंडित गोविन्दबल्लभ पंत की सेवाओं को कृतज्ञ भारत सदा याद रखेगा। उनकी सेवाओं का सम्मान करते हुए 1957 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्रप्रसाद ने राष्ट्र की सर्वोच्च उपाधि भारतरत्न से उन्हें विभूषित किया। उनके गौरव से समस्त देश गौरवान्दित हो उठा।

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मृत्यु – पंडित पंत जब तक जिन्दा रहे, देश के लिए काम करते रहे। संसार में आने के बाद जाना अनिवार्य है। भला ये इसका व्यवधान कैसे करते? काम करते-करते वे थक चुके थे। भारत माँ के अमर सपूत को काल ने 7 मार्च, 1961 को देश से सदा के लिए छीन लिया। उनकी मृत्यु से समस्त देश मर्माहत हो उठा। देश-विदेश के नेताओं ने अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

पंडित नेहरू ने अपने शोक संदेश में कहा “आज सचमुच मेरा दिल उनके निधन से टूट गया है। मैं दुर्बल हो गया हूँ।” उन्होंने पंडित पंतजी के संबंध में कहा था कि वे पर्वत पुत्र थे, उनका दृष्टिकोण हिमालय की तरह व्यापक, साहस हिमालय की तरह दृढ, विश्वास हिमालय की तरह अडिग तथा व्यक्तित्व हिमालय की तरह शांत और महान था। पंडित गोविन्दबल्लभ पंत में अनेक सद्गुणों का समावेश था।

वे दैविक गुणों से युक्त थे। वे दृढनिश्चयी, परिश्रमी, उदार और अनुशासनप्रिय थे। वे अनुशान को विकास का मेरुड मानते थे। सादा जीवन और उच्च विचार के सिद्धान्त में विश्वास रखते थे। श्रीमद्भगवद्गीता की भाषा में वे एक विशुद्ध कर्मयोगी थे जो बिना फल की इच्छा के सत्कर्म में प्रवृत्त रहते। पंतजी दुःख-सुख, हानि-लाभ, जय-पराजय को समान मानते थे। ये स्थितप्रज्ञ थे। 

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