Mangal Pande – शहीद मंगल पांडेय

Mangal-Pande     Mangal Pande

प्रथम शहीद – प्रथमस्मरणीय मंगल पाण्डेय स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम शहीद थे जिन्होंने हंसते-हंसते स्वतंत्रता और स्वधर्म के लिए फांसी पर लटकना उचित समझा। मंगल पाण्डेय के त्याग और साहस का फल यह हुआ कि थोड़े ही दिनों के बाद केवल सिपाहियों ने ही नहीं बल्कि समस्त भारतीयों ने स्वतंत्रता संग्राम छेड़ा।

Mangal Pande – शहीद मंगल पांडेय

जन्म – मंगल पाण्डेय उत्तर प्रदेश के बलिया जिला के रहने वाले सरयूपारीण (कान्यकुब्ज) ब्राह्मण थे। उनका जन्म 19 जुलाई 1827 को हुआ था I उनके माता-पिता साधारण परिवार के थे। उन दिनों बंगाली पुलिस में बहुत कम भर्ती होते थे बिहार के आरा, छपरा के अधिक लोग पुलिस में रहते। पूर्वी उत्तर प्रदेश से भी लोग कलकत्ता पुलिस में खूब भर्ती होते।  बलिया के ब्राह्मण निःसन्देह कुछ अधिक कट्टर होते हैं। जो अपने धर्म की मर्यादा और देश की आजादी के लिए मर मिटते हैं।

सैनिकी जीवन – मंगल पाण्डेय कलकत्ता के बैरकपुर के 19वीं रेजीमेण्ट के एक साधारण सिपाही थे। सुनते हैं कि एक दिन वे दमदम के निकट कुएं से पानी भर रहे थे। वहीं एक भंगी ने उनसे लोटा मांगा। उन्होंने उसे लोटा देने से इनकार कर दिया। उस पर भंगी ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा- “बाबा, तुम मुझे लोटा भले ही मत दो लेकिन तुम्हें जब फौज में गाय और सूअर की चर्बी लगे हुए कारतूसों का प्रयोग करना पड़ेगा तब आप अपने धर्म को कैसे बचाओगे।”

१८५७ के संग्राम की चिंगारी – यह बात सुनकर मंगल पाण्डेय का माथा ठनका। उन्होंने सोचा कि भंगी ठीक ही कह रहा है। अब या तो अपना धर्म छोड़ना पड़ेगा या विद्रोह करना पड़ेगा। पाण्डेय ने अत्याचारी अंग्रेज सरकार के विरोध का निर्णय लिया जान भले ही जाए पर धर्म नहीं छोडूंगा। पांडेय ने मन ही मन निश्चय किया। इधर क्रांति का गुप्त रूप से संगठन किया जा रहा था उधर ब्रिटिश सरकार बंगाल में सैनिकों को चर्बीयुक्त कारतूसों के प्रयोग के लिए आदेश जारी करने पर विचार कर रही थी।

Mangal Pande – शहीद मंगल पांडेय

इसके लिए 19वीं रेजीमेण्ट को ही पहले पहल चुना गया। 34वीं रेजीमेण्ट से कुछ सिपाहियों को 19वीं रेजीमेण्ट में भेज दिया गया था। 19वीं रेजीमेण्ट के सिपाही भी क्रांति के लिए प्रस्तुत थे जिसकी जानकारी अंग्रेजों को नहीं थी। ब्रिटिश सरकार ने 19वीं रेजीमेण्ट को ही पहले कारतूस के प्रयोग का आदेश दिया पर सैनिकों ने इस आदेश को नहीं माना। सरकार लाचार हो गयी।

सिपाहयों ने स्पष्ट कहा–“जरूरत पड़ी तो हम तलवार भले उठा लेंगे पर चर्बीयुक्त कारतूस का प्रयोग नहीं करेंगे।” सरकार ने पहले कड़ा रुख अपनाया। लेकिन लाचार होकर उसे अपना विचार बदलना पड़ा। कारण, उस समय बंगाल में अंग्रेज सेना की एक भी रेजीमेंट नहीं थी। उन्होंने वर्मा से अंग्रेज सेना बुलाने का निश्चय किया और यह भी तय हुआ कि अंग्रेज सिपाहियों के आने के बाद भारतीय सैनिकों को विशेषकर बैरकपुर के सिपाहियों को निःशस्त्र कर दिया जायेगा तथा रेजीमेण्ट को भी बन्द कर दिया जायेगा।

कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी थी या नहीं यह कुछ दिनों तक विवादास्पद बना रहा। सरकार की ओर से यह घोषणा की गई कि कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी नहीं है पर हिन्दू और मुसलमान दोनों वर्गों के सिपाही इस बात को जानते थे कि सरकार उन्हें धोखा दे रही है। अतः “जुल्मी सरकार का आदेश कभी नहीं मानेंगे।” यह उनका दृढ़ निश्चय था।

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बाद में अंग्रेज इतिहासकारों ने भी स्वीकार किया है कि कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी का प्रयोग किया गया था। सर जॉन के. जो 1857 ई. की क्रांति का सबसे अधिक प्रामाणिक लेखक माना जाता है का कहना है कि इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस मसाले के बनाने में गाय की चर्बी का उपयोग किया गया था।” उसने यह भी लिखा है कि दिसम्बर सन 1853 में कर्नल रक्कर ने बहुत साफ शब्दो में इस बात को लिखा था कि नये कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी लगायी जाती थी।

“लाई राबर्ट्स के अनुसार, “मिस्टर फोरेस्ट ने भारत सरकार के कागजों की हाल में जाँच की है, उस जाँच से सिद्ध होता है कि “कारतूसों के तैयार करने में जिस चिकने मसाले का उपयोग किया गया था, वह मसाला वास्तव में दोनों निषेध पदार्थों अर्थात् गाय की चर्बी और सूअर की चर्बी को मिलाकर बनाया जाता था। अर्थात् इन कारतूसों के बनाने में सिपाहियों के धार्मिक भावों की ओर इतनी बेपरवाही दिखाई जाती थी कि जिसका विश्वास नहीं होता।

इसी तरह मिस्टर लैकी ने तो यहाँ तक लिखा है कि “यह एक लज्जाजनक और भयंकर सत्य है कि जिस बात का सिपाहियों को विश्वास था, वह बिल्कुल सच थी। इस घटना पर फिर से दृष्टि डालते हुए अंग्रेज लेखकों को लज्जा के साथ स्वीकार करना चाहिए कि भारतीय सिपाहियों ने जिन बातों के कारण बगावत की उनसे अधिक जबरदस्त बातें कभी किसी विद्रोह को जायज करार देने के लिए हो ही नहीं सकती।”

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उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि सिपाहियों की आशंका सही थी, उनके विद्रोही होने के अलावा उनके पास अब बचा ही क्या था?क्रांति के वरिष्ठ नेता घूम-घूमकर इसका प्रचार करते सैनिकों में इसकी सूचना इतनी गुप्त रूप से दी गई कि सरकार को पता न लग सके नेताओं ने यह तय किया कि 31 मई को सारे देश में क्रांति प्रारंभ कर दी जायेगी। बैरकपुर से संबंधित केन्द्रों को भी गुप्त पत्र भेजे गये।

29 मार्च का दिन भारतीय इतिहास में बहुत महत्त्व का दिन माना जाना चाहिए। इसी दिन 1857 में सिपाहियों को परेड के लिए मैदान में बुलाया गया। मंगल पाण्डेय के लिए यह बड़ा उपयुक्त अवसर था किन्तु अन्य लोग निश्चित तिथि पर ही विद्रोह करना चाहते थे। जब उन्हें यह जानकारी हुई तो वे आग-बबूला हो गए। आजादी के विचार से उनके रक्त में विद्युत की लहर दौड़ पड़ी। उनकी धर्मपरायणता और स्वतंत्रता प्रतीक्षा के लिए तैयार नहीं थी। 

मंगल पाण्डेय की देशभक्ति जैसा कि दामोदर सावरकर ने लिखा है, उन्माद में बदल गई और झट उन्होंने बन्दुक भरी और परेड मैदान में अपने दोस्त सिपाहियों को ललकारा – “भाइयों उठो किस बात का विलम्ब है? में तुम्हें धर्म की शपथ देता हूँ कि तुम सब आओ आर स्वाधीनता के लिए धूर्त शत्रु पर वार करो।” “क्या तुम्हें भगवद्गीता का अमर संदेश याद नहीं है? यदि विद्रोह करते हम मारे जायेंगे तो स्वर्ग मिलेगा, अगर जीत जायेंगे तो अत्याचारी सरकार का विनाश हो जायेगा।” “दोस्तो, ऐसा अवसर बहुत कम मिलता है।”

Mangal Pande – शहीद मंगल पांडेय

लेकिन इसका कोई असर भारतीय सिपाहियों पर नहीं पड़ा। वे किंकर्तव्यविमूढ़ थे, एक तरफ सरकारी आदेश की अवमानना और दूसरी तरफ नेताओं द्वारा निश्चित तिथि से पहले विद्रोह का बिगुल बजाना। इस दुविधा में वे अपना कर्तव्य सुनिश्चित न कर सके। यह सही है कि बहादुर किसी के सहयोग की उम्मीद नहीं करते।

सार्जेण्ट मेजर ह्यूसन को जब यह पता चला तो उसने मंगल पाण्डेय को तुरन्त बंदी बना लेने की आज्ञा दी पर भारतीय सिपाहियों ने भले ही मंगल पाण्डेय का साथ न दिया हो लेकिन वे उन्हें बंदी बनाने के लिए तैयार न थे। सिपाहियों ने साफ कह कि “हम ब्राह्मण देवता को कभी बंदी नहीं बनायेंगे।” मंगल पाण्डेय ने झट गोली चलाकर ह्यूसन को धाराशायी कर दिया।

तुरंत लेफ्टिनेंट बाघ घोड़े पर बैठकर आया। मंगल पाण्डेय तो हिम्मत हारने वाले थे नहीं, उन्होंने पुनः घोड़े को अपना निशाना बनाया। तुरन्त बाघ घोड़ा सहित जमीन पर गिर पड़ा। शीघ्र ही बाघ ने भी मंगल पाण्डेय पर गोली चला दी पर ईश्वर की कृपा से वे बाल-बाल बच गये। बाघ अपनी तलवार को म्यान से बाहर निकाल ही रहा था कि मंगल पाण्डेय ने उसे अपनी गोली का निशाना बना लिया और देखते-देखते उसके प्राण पखेरू उड़ गये।

Mangal Pande – शहीद मंगल पांडेय

यह देखकर किसी अंग्रेज ने मंगल पाण्डेय पर तुरन्त वार करना चाहा, तभी किसी भारतीय सिपाही ने उसका सिर बंदूक के कुदे से चकनाचूर कर दिया। सिपाहियों के समूह से आवाज आयी- “मंगल पाण्डेय को छूने का साहस मत करो।” अब यह विद्रोह एक मगल पाण्डेय तक ही सीमित न रहा। इस घटना से यह सिद्ध हो गया कि भारतीय सिपाही मंगल पाण्डेय के विरुद्ध कुछ भी करने के लिए तैयार न थे।

इसी बीच घटनास्थल पर कर्नल नीतर पहुंचा। उसने भी पाण्डेय को गिरफ्तार करने का हुक्म दिया पर सिपाहियों ने वही बात फिर कही- “हम ब्राह्मण पर हाथ नहीं उठा सकते।” कर्नल ने अनुभव किया कि अब सिपाहियों के अंदर विद्रोह की भावना घर कर गई है। झटपट वह जनरल के बंगले में जा छिपा। मंगल पाण्डेय का हाथ रक्तरंजीत था। वे उच्च स्वर में ललकार रहे थे भाइयो हथियार उठाओ। समय आ गया है।

शहादत – जनरल हीयरसी तुरंत कुछ अंग्रेज सेना के साथ आ धमका। परेड के मैदान में उसे देखकर मंगल पाण्डेय डरे नहीं, लेकिन अनुभव किया कि सिपाही उनको प्रत्यक्ष साथ नहीं दे रहे हैं। ऐसी हालत में अकेले लोहा लेना संभव नहीं है। गोरों के हाथ से मरने की अपेक्षा स्वयं मरना अच्छा है। यह विचार आते ही उन्होंने अपनी ही गोली से अपने को आहत कर लिया।

Mangal Pande – शहीद मंगल पांडेय

उनका रक्तरंजित शरीर जमीन पर लोटने लगा, अंग्रेजों ने इस वीर पुरुष को घायल अवस्था में ही अस्पताल पहुंचा दिया। सभी सिपाही आश्चर्यचकित थे और भगवान से मन ही मन प्रार्थना करते कि उनके मंगल बाबा ठीक हो जायें। घाव तुरंत ठीक हो गया, लेकिन मंगल पाण्डेय पर सैनिक अदालत में मुकदमा चलाया गया। उनसे अन्य विद्रोहियों के नाम पूछे गये पर उन्होंने किसी का नाम बतलाने से इनकार कर दिया।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि अंग्रेज आफिसरों से उनका कोई व्यक्तिगत संघर्ष नहीं है। ये तो केवल मातृभूमि की आजादी और धर्म की रक्षा के लिए विद्रोह कर रहे थे। मंगल पाण्डेय ने देश तथा धर्म को अपने प्राणों से अधिक महत्त्व दिया। सैनिक अदालत ने उनके विरुद्ध मृत्युदण्ड का आदेश जारी किया। यह तय हुआ कि 8 अप्रैल, 1857 को उन्हें फांसी दे दी जाए।

मंगल पाण्डेय की लोकप्रियता इतनी बढ़ गयी कि फांसी पर चढ़ाने के लिए कोई जल्लाद तैयार नहीं था। अंत में इस कुकर्म के लिए विशेष पारिश्रमिक देकर कलकत्ता से बार जल्लादों को बुलाया गया। 8 अप्रैल के प्रातःकाल इधर सूर्य की रश्मियों समस्त जगत को प्रकाशित कर रही थी, उधर मंगल पाण्डेय का बलिदान भारतीयों में नवोत्साह और प्रेरणा का शंखनाद कर रहा था।

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देखते देखते भारत माँ के इस महान सपूत को फांसी के तख्ते पर लटका दिया गया। उस समय उनका मस्तक गर्व से ऊंचा था। उनके हृदय में अदम्य साहस था। फसी की रस्सी गले में पड़ जाने पर भी यह वीर युवक किसी भी कांतिकारी का नाम जुबान पर नहीं लाया। यह था पाण्डेय का देश के लिए अमर त्याग। वे इस क्रांति के प्रथम शहीद थे। मंगल पाण्डेय के बलिदान से समस्त भारतभूमि तिलमिला उठी।

सिपाहियों ने बदला लेने को ठान लिया, पर ब्रिटिश सरकार भी अब सावधान हो गई 34वी रेजीमेण्ट के एक सूबेदार पर क्रांतिकारियों की मदद करने का आरोप लगाया गया और उसकी हत्या कर दी गयी। मंगल पाण्डेय के अमर बलिदान की खबर विद्युत के समान समस्त देश में फैल गयी और चारों तरफ क्रांति शीघ्र भड़क उठी। मेरठ, दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, बिहार आदि सभी इसकी चपेट में आ गए।

मंगल पाण्डेय निःसन्देह भारत के एक अनमोल रत्न थे, जिसका मूल्य कृतज्ञ भारत कभी भी नहीं चुका सकता। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि व्यक्ति चाहे गरीब हो या अमीर, छोटा हो या बड़ा, अपने कर्म से महान बनता है। मंगल पाण्डेय ने एक साधारण सिपाही होते हुए भी अपने त्याग और बलिदान से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया। 

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