Madan Lal Dhingra – मदनलाल ढींगरा

Madan-Lal-Dhingra

Madan Lal Dhingra

वीर, निडर और निर्भीक देशभक्त मदनलाल ढींगरा का परिवार अमृतसर में रहनेवाला एक संपन्न और अंग्रेज-भक्त परिवार था। उनके पिता डॉ. दत्तामल अमृतसर के जाने-माने चिकित्सक थे। लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। अंग्रेजी राज में उनकी तूती बोलती थी। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘राय साहब’ के खिताब से सम्मानित किया था।

Madan Lal Dhingra – मदनलाल ढींगरा

डॉ. दत्तामल की आठ संतानें थीं- सात पुत्र और एक कन्या। सभी बेटे मेधावी और उच्च शिक्षा प्राप्त थे। उनमें से दो तो डॉक्टर और बार-एट-लॉ थे। एक पुत्र बिहारी लाल ढींगरा पूर्व जींद एस्टेट के प्रधानमंत्री भी रहे थे। मदनलाल ढींगरा डॉ. दत्तमल के छठे पुत्र थे।

जन्म एवं प्रारंभिक जीवन – उनका जन्म 18 सितंबर, 1883 में हुआ था। बचपन से ही वह अपने परिवार के अन्य लोगों से भिन्न स्वभाव के थे। वह मितभाषी थे। मदनलाल ढींगरा की प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर के मिशन हाई स्कूल में हुई। वहीं से उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा फर्स्ट ग्रेड में उत्तीर्ण की। गणित में उनकी विशेष रुचि थी। तकनीकी विषयों से भी उन्हें विशेष लगाव था। वह सभी प्रकार के यंत्रों और मशीनों को बड़ी पैनी नजर से देखते थे।

मैट्रिक के बाद एफ.एस.सी. की पढ़ाई के लिए उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज (लाहौर) में प्रवेश लिया। वहीं से उन्होंने बी.ए. किया। उच्च शिक्षा के लिए वह विदेश जाना चाहते थे, किंतु उनके पिता उन्हें विदेश भेजने की बजाय अपनी देख-रेख में ही पढ़ाना चाहते थे। जब डॉक्टर साहब का तबादला गुरदासपुर हो गया वह मदनलाल को भी अपने साथ ले गए, किंतु मदनलाल अब पिता के बंधनों से मुक्त होना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपना घर-परिवार छोड़ दिया जाते समय उन्होंने अपने परिवार से कोई न आदि भी नहीं लिया।

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मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष – घर छोड़कर मदनलाल सीधे जम्मू-कश्मीर रियासत में पहुँचे। वहीं उन्होंने सेटलमेंट विभाग में एक साधारण-सी नौकरी कर ली। लेकिन कुछ ही दिनों में वह नौकरी से उत्प गए और नौकरी छोड़कर कालका चले गए। कालका में उन्हें ताँगा चलाने की धुन सवार हुई और वहाँ ताँगा चलाने लगे, लेकिन जल्दी ही वह इस कार्य से भी ऊन गए।

इसके बाद मदनलाल ने वहाँ एक कारखाने में नौकरी कर ली। कारखाने का मालिक अंग्रेजों का भक्त था। वह मजदूरों पर अत्याचार करने में जरा भी नहीं हिचकता था। वहाँ उन्होंने गरीब मजदूरों की दयनीय दशा देखी। उनके जीवन का यह पहला कटु अनुभव था। मजदूरों की अशिक्षा, अज्ञानता और सीधे-सादे स्वभाव ने उनके मन में हलचल मचा दी। ऐसे मजदूरों पर अत्याचार होते देखकर उनका खून खौलने लगता था।

मजदूरों को उनके अधिकार दिलाने के लिए मदनलाल ढींगरा ने कमर कस ली। इसके लिए उन्होंने ट्रेड यूनियन बनाई मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए उन्होंने अपनी नौकरी की भी परवाह नहीं की। वह मजदूरों के सच्चे हितैषी बन गए। कारखाने के मालिक से उनकी ये गतिविधियाँ छिपी नहीं रहीं। उसने ढींगरा को नौकरी से निकालने का निश्चय कर लिया।

Madan Lal Dhingra – मदनलाल ढींगरा

महीने के अंत में जब ढींगरा अपना वेतन लेने के लिए कार्यालय में पहुँचे तो मैनेजर ने उन्हें वेतन तो दे दिया, लेकिन अगले दिन काम पर नहीं आने के लिए कह दिया। कारण पूछने पर उसने साफ कहा, “आप जैसे यूनियनबाजों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है।” यह नौकरी छूटने के बाद मदनलाल कुछ दिन कालका में ही रहे और फिर अमृतसर लौट आए। माता-पिता ने फिर उन्हें अपने अनुकूल ढालने की कोशिश की, लेकिन वह उनकी बातों में नहीं आए।

विदेश जाने का फैसला – उन्होंने विदेश जाने का फैसला कर लिया। इसलिए उन्होंने दोबारा घर छोड़ दिया और बंबई चले गए। बंबई में उन्होंने पानी के एक जहाज पर नाविक की नौकरी कर ली। वहाँ उन्होंने अपना वास्तविक नाम नहीं बताया और न ही अपने घर-परिवार का कोई पता दिया। उन्होंने यह बात भी छिपाई कि वह अमृतसर के रहनेवाले हैं। औपचारिकताएँ पूरी करने के लिए उन्होंने अपना नाम व पता गलत बताया।

इधर मदनलाल के माता-पिता ने उनकी बहुत खोज की। समाचार पत्रों में फोटो छपवाए, सूचनाएँ प्रकाशित कीं, चारों ओर दौड़-धूप की, ज्योतिषियों की शरण में गए लेकिन इस सबका कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि तब तक मदनलाल उनको पहुँच मे काफी दूर जा चुके थे। वह ईस्ट इंडिया कंपनी के एक जहाज में नाविक का काम करते हुए लंदन पहुँच गए। मदनलाल ने लंदन में खूब सैर की, वहाँ का वैभव देखा।

Madan Lal Dhingra – मदनलाल ढींगरा

कुछ दिन लंदन में घूम-फिरकर वह एक बार फिर अपने घर लौट आए। इससे माता-पिता को बड़ी शांति मिली। उन्होंने अब चैन की साँस ली। “लंदन का ठाठ-बाट भरा जीवन उन्हें लुभा रहा था। इसलिए वह माता-पिता पर लंदन में पढ़ने का दबाव डालने लगे। उनके बार-बार के आग्रह पर बड़े भाई डॉ. बिहारीलाल ढींगरा ने भी पिता से प्रार्थना की कि मदनलाल को विदेश भेज दिया जाए। फिर काफी सोच-विचार के बाद मदनलाल की बात मान ली गई।

विदेश में उच्च शिक्षा की अनुमति मिली – उन्हें विदेश जाकर उच्च शिक्षा पाने की अनुमति मिल गई। सन् 1906 में मदनलाल लंदन के लिए चल पड़े। वहाँ उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज में इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए दाखिला ले लिया। बढ़िया कपड़े पहनकर, मेकअप करके वहाँ की सड़कों पर घूमना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। आईने के सामने खड़े होकर वह देर तक अपने केश सँवारते रहते थे।

इंडिया हाउस से जुड़े –  एक दिन मदनलाल को इंडिया हाउस, जिसकी स्थापना प्रसिद्ध क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा ने की थी, के बारे में पता लगा। जब मदनलाल इंडिया हाउस पहुँचे तब वीर सावरकर भारतीय युवकों के एक समूह को संबोधित कर रहे थे। वह युवकों को भारत की दयनीय दशा के बारे में बता रहे थे। मदनलाल ने वह सब सुना तो उनका खून खौल उठा। उनके मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा पैदा हो गई।

Madan Lal Dhingra – मदनलाल ढींगरा

चूंकि उनका परिवार अंग्रेजभक्त था, इसलिए उन्हें देशवासियों की दयनीय दशा और उनपर होनेवाले अंग्रेजों के अत्याचारों का आभास नहीं था। उस दिन से सावरकर ढींगरा के हृदय सम्राट् बन गए। उनके भाषण सुनने के लिए वह रोज इंडिया हाउस जाने लगे। सन् 1908 में वीर सावरकर ने लंदन में एक अभियान छेड़ा देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) की इक्यावनवीं वर्षगाँठ के रूप में इसके माध्यम से भारतीय युवकों में देशप्रेम की भावना भरने का उन्हें अच्छा अवसर मिला।

उस अभियान के एक समारोह में लंदन में प्रायः सभी अप्रवासी भारतीय छात्र सम्मिलित हुए। वे ‘1857 स्मारक’ के बिल्ले लगाकर अपनी कक्षाओं में गए। यह देखकर अंग्रेज अध्यापक बहुत नाराज हुए। इन्हीं युवा छात्रों में मदनलाल ढींगरा भी थे। वह बढ़िया सूट पहनकर, बिल्ला लगाकर बड़ी शान से महाविद्यालय की इमारत में घूम रहे थे।

एक अंग्रेज ने उनके कोट पर लगा बिल्ला खींचने का प्रयास किया तभी ढींगरा ने उसके मुँह पर एक तमाचा जड़ दिया और उसे जमीन पर पटककर उसकी छाती पर चढ़ बैठे तथा अपनी जेब से चाकू निकाल लिया। बेचारा अंग्रेज दया की भीख माँगने लगा। उन्होंने उसे माफ कर दिया।” ढींगराजी में कष्ट सहने की असाधारण क्षमता थी। एक दिन वह इंडिया हाउस में अपने भारतीय मित्रों के साथ बैठे थे। मित्रों में जापानियों के साहस और बलिदान की चर्चा चल रही थी। ढींगरा को यह बात अच्छी नहीं लगी।

Madan Lal Dhingra – मदनलाल ढींगरा

उन्होंने कहा, “जापानियों की प्रशंसा बहुत हो गई। क्या तुम समझते हो कि हम भारतीय किसी से कम हैं ?” इसपर सभी दोस्त खिलखिलाकर हँस पड़े, क्योंकि वे ढींगरा को केवल छैल छबीला समझते थे। एक दोस्त ने ताना मारते हुए कहा, “अरे, हम तुझे अच्छी तरह जानते हैं। तू केवल बातूनी है, समय आने पर तू कुछ नहीं कर सकता।” ढींगरा को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने साहस और सहनशीलता का परिचय देने के लिए हर चुनौती स्वीकार की। अंत में एक मित्र एक लंबी और मोटी सूई ले आया।

उसने ढींगरा से मेज पर अपना पंजा रखने के लिए कहा। ढींगरा ने अपना पंजा मेज पर रख दिया। युवक ने सूई पंजे में चुभोनी शुरू कर दी। वह सूई चुभोता गया, मगर ढींगरा ने ‘आह’ तक नहीं की। यहाँ तक कि सूई हथेली को भेदकर आर-पार हो गई। खून बह रहा था, दर्द हो रहा था, फिर भी ढींगरा अविचलित रहे। यह देखकर मित्र ने अंततः सूई निकाल ली।

वीर सावरकरजी के बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर भी क्रांतिकारी थे। अंग्रेज सरकार ने उन्हें बंदी बनाकर काले पानी की सजा दे दी। यह जानकर ढींगरा अंग्रेजों से बदला लेने के लिए कटिबद्ध हो गए। उन्होंने अपनी योजना को सफल बनाने के लिए एक पिस्तौल खरीदी तथा उसे चलाने का अभ्यास किया। साथ ही साथ पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के आधार पर काम शुरू कर दिया।

Madan Lal Dhingra – मदनलाल ढींगरा

नेशनल इंडियन एसोसिएशन – लंदन में एक संस्था थी-‘नेशनल इंडियन एसोसिएशन’, जिसका काम था, इंग्लैंड गए भारतीय युवकों को अंग्रेजों का प्रशंसक बनाना। मार्च 1909 में ढींगरा इस संस्था के कार्यालय में गए और संस्था की सचिव कुमारी एमा से मिले। उन्होंने पहले उससे दोस्ती गाँठी और फिर संस्था के सदस्य बन गए। इस संस्था के तीन महत्त्वपूर्ण सदस्यों में सर विलियम कर्जन वायली भी था।

वह बहुत धूर्त और चालाक था। भारतीय युवकों का ब्रेन-वॉश करने में माहिर वह अंग्रेज ऐसे युवकों को अंग्रेजभक्त और देशद्रोही बनाने का प्रयास करता था। इसीलिए भारतीय विद्यार्थी उससे प्रायः घृणा करते थे। कर्जन वायली ढींगरा के पिता और बड़े भाई का अच्छा मित्र भी था, इसलिए वह ढींगरा का कुछ ज्यादा ही खयाल रखता था।

वायली ढींगरा को इस बात के लिए धीरे धीरे मनाने लगा कि वह इंडिया हाउस की गुप्त खबरें उसे बताया करे ढींगरा ने यह बात वीर सावरकर को बताई। सावरकरजी की सलाह पर डींगरा ने इंडिया हाउस की कुछ बातें वायली को बताई भी, लेकिन वह सब एक ड्रामा था।

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कर्जन वायली का वध –  1 जुलाई, 1909 को नेशनल इंडियन एसोसिएशन’ की वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में एक समारोह होने वाला था। ढींगरा कुमारी एमा से मिले और समारोह की पूरी जानकारी हासिल कर ली। उन्हें यह जानकर खुशी हुई कि इस समारोह में कर्जन वायली भी सम्मिलित होगा। उस दिन वार्षिक समारोह के लिए इंपीरियल का जहांगीर हॉल रंग-बिरंगे गुब्बारों और कागज की झंडियों से सजाया गया था।

ढींगरा रात आठ बजे वहाँ पहुँचे। हॉल में एक तरफ बने-ठने छैल छबीले पुरुष थे, दूसरी तरफ सजी-सँवरी लड़कियाँ I ढींगरा सीधे हॉल में चले गए। उन्होंने वहाँ उपस्थित लोगों से कुछ देर तक इधर उधर की बातें कीं, फिर कुमारी एमा से मिले। रात दस बजे के करीब कर्जन वायली और उसकी पत्नी भी वहाँ आ गए। उनके आते ही मानो समारोह में जान आ गई। हँसी-खुशी का माहौल बढ़ गया।

एक घंटे तक आमोद-प्रमोद चलता रहा। रात ग्यारह बजे समारोह समाप्त हुआ। कर्जन वायली मंच से उतर आया। अब ढींगरा कर्जन वायली की ओर बढ़े और उससे गर्मजोशी से मिले ढींगरा उससे सटकर ऐसे खड़े हो गए मानो कोई खास बात बताना चाहते हो। बात सुनने के लिए कर्जन वायली ने जैसे ही अपनी गरदन ढींगरा की ओर झुकाई, वैसे ही ढींगरा ने अपनी पिस्तौल से गोली चलाई गोली की आवाज सुनकर लोग सहम गए।

Madan Lal Dhingra – मदनलाल ढींगरा

सभी की नजरें ढींगरा की ओर उठ गईं। ढींगरा तब तक अपना काम कर चुके थे। कर्जन वायली एक चीख मारकर धराशायी हो गया। डींगरा ने उस पर दो गोलियाँ और चलाई। तभी कावसजी लाल काका नामक एक व्यक्ति कर्जन वायली की सहायता के लिए दौड़ा ढींगरा ने उसे भी गोलियों से धराशायी कर दिया।

एक अन्य व्यक्ति ढींगरा को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा तो ढींगरा ने उसकी गरदन पर जबरदस्त चोट की, जिससे उसकी गरदन टूट गई। वह जमीन पर गिर पड़ा। उसके मुँह से खून बहने लगा। इस पूरी घटना के बीच ढींगरा शांत खड़े रहे। उनके चेहरे पर कोई डर, घबराहट या बेचैनी नहीं थी। पुलिस आई और उन्हें गिरफ्तार करके ले गई। ढींगरा ने जहाँगीर हॉल जाने से पूर्व अपनी जेब में एक वक्तव्य लिखकर रख लिया था, जिसे पुलिस ने निकालकर छिपा लिया।

लंदन के सभी समाचार पत्रों ने इस घटना को सुर्खियों में छापा लंदन के उच्च न्यायालय में ढींगरा पर मुकदमा चलाया गया। मुकदमे की काररवाई के दौरान ढींगरा उदासीन बने रहे। अदालत में उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और साथ ही यह बयान भी दिया कि लाल काका को मारने का मेरा कोई इरादा नहीं था, लेकिन आत्मरक्षा में गोली चलाना जरूरी हो गया था।

Madan Lal Dhingra – मदनलाल ढींगरा

अदालत में मदनलाल ढींगरा ने पुलिस से वह वक्तव्य पढ़ने के लिए भी कहा, जिसे पुलिस ने गिरफ्तारी के बाद उनकी जेब से निकालकर छिपा लिया था; किंतु पुलिस इस बात से साफ मुकर गई। जब यह बात वीर सावरकर को मालूम हुई तो उन्होंने उस वक्तव्य को सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित कराने का विचार बना लिया। गौरतलब है कि उनके पास उस वक्तव्य की एक प्रति पहले से ही मौजूद थी।

वीर सावरकर ने वक्तव्य को समाचार पत्रों में प्रकाशित कराने का दायित्व अपने मित्र ज्ञानचंद्र वर्मा को सौंप दिया। वक्तव्य लेकर ज्ञानचंद्र तब गुप्त रूप से पेरिस गए। वहाँ उन्होंने उस वक्तव्य की हजारों प्रतियाँ कराई और इंग्लैंड, जर्मनी, इटली, अमेरिका आदि देशों के समाचार पत्रों के पास भेज दीं। जब वह वक्तव्य विभिन्न समाचार पत्रों में छपा तो मदनलाल ढींगरा खुशी से नाच उठे।

शहादत – मदनलाल ढींगरा को ब्रिक्स्टन जेल में रखा गया था। वीर सावरकर उनसे मिलनेके लिए गए। उन्हें ढींगरा के कार्य पर गर्व था। अदालत में उनपर 25 जुलाई तक मुकदमा चला। अदालत ने मदनलाल ढींगरा को मृत्युदंड दे दिया। उस समय उनके 17 अगस्त, 1909 को मदनलाल ढींगरा को फाँसी दे दी गई। हाथ में ‘गीता’ थी और होंठों पर राम तथा कृष्ण का नाम।

Madan Lal Dhingra – मदनलाल ढींगरा

वीर सपूत की अस्थियां वापस लाई गयी – लगभग पैंसठ वर्षों के बाद (13 दिसंबर, 1976 को) पंजाब सरकार मदनलाल ढींगरा की अस्थियाँ भारत लाने में सफल हो पाई। इस कार्य में भारत सरकार ने भी प्रभावशाली भूमिका निभाई। उक्त तिथि को अस्थियाँ दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर लाई गईं। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ आदि ने उन अस्थियों पर फूलमालाएँ चढ़ाकर ढींगरा को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

14 दिसंबर को वे अस्थियाँ दिल्ली से पंजाब ले जाई गईं। 20 दिसंबर को अपराह्न साढ़े तीन बजे पंजाब सरकार की ओर से उन्हें राजकीय सम्मान प्रदान किया गया। उस समय ढींगरा के परिवारजन भी वहाँ उपस्थित थे। 25 दिसंबर, 1976 को प्रात: दस बजे अस्थि-कलश राजपुरा से अंबाला, जगाधरी, सहारनपुर होता हुआ हरिद्वार पहुँचा और उसी दिन गंगा में उसका विसर्जन कर दिया गया।

Shetkaryancha Asud

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