Madam Bhikaji Cama – मदाम भीकाजी कामा

Madam-Bhikaji -CamaMadam-Bhikaji -Cama

जन्म एवं प्रारंभिक जीवन –  मदाम भीकाजी कामा एक तेजस्वी, निर्भीक तथा ठोस विचारोंवाली क्रांतिकारी महिला थी। उनका जन्म 24 सितंबर, 1881 को बंबई के एक प्रतिष्ठित पारसी व्यापारी सोहराबजी फ्रामजी पटेल की पुत्री के रूप में हुआ था। भीकाजी के आठ भाई बहन और थे। माता-पिता ने भरे-पूरे परिवार में भीकाजी कामा का लालन-पालन बड़े ही लाड़ प्यार से किया। घर पर सभी लोग प्यार से उन्हें ‘मुन्नी’ कहकर पुकारते थे।

Madam Bhikaji Cama – मदाम भीकाजी कामा

भीकाजी बचपन से ही बहुत होशियार तथा तेज थीं। बहुत कम आयु में ही उन्हें प्रारंभिक शिक्षा के लिए ‘एलेक्जेंड्रा पारसी गर्ल्स स्कूल में दाखिल करा दिया गया। अपनी कक्षा में वे सभी विषयों में प्रथम आती थीं। वे अपना गृहकार्य पूर्ण करने से पहले रात का भोजन कभी नहीं करती थीं पढ़ाई के प्रति उनकी लगन और प्रतिभा के कारण स्कूल के सभी अध्यापक उन्हें बहुत प्यार करते थे।

क्रांति की चिंगारी – उस समय हमारा देश अंग्रेजों के अत्याचारों से त्रस्त था। देश को आजाद कराने के लिए कई तरह के आंदोलन भारत भर में चलाए जा रहे थे। छोटी सी उम्र होते हुए भी भीकाजी के मन में आजादी को लेकर काफी उथल-पुथल रहती थी। वे देश के लिए प्राण न्योछावर करनेवाले देशभक्तों की पूजा करती थीं और आजादी के लिए काम करनेवाले सभी लोगों का आदर-सम्मान करती थीं।

भीकाजी को जैसे-जैसे अंग्रेजों द्वारा भोले-भाले भारतीयों पर किए जानेवाले अत्याचारों का ज्ञान होने लगा, वैसे-वैसे उनके मन में क्रांतिकारी लहरें उठने लगीं। धीरे-धीरे उनके मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा उत्पन्न होने लगी। भीकाजी के मन में पनपती क्रांति की भावना को देखकर उनके पिता को यह चिंता सताने लगी कि कहीं भीकाजी का क्रांतिकारी मन उनके परिवार के लिए कोई बड़ी मुसीबत न खड़ी कर दे।

Click on below links to read more | अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

More Hindi Blogs

History in Hindi Articles

Firozshah Mehta – फिरोजशाह मेहता

 

विवाह एवं विवाह उपरांत समस्याएं – इसलिए उन्होंने भीकाजी का विवाह कर देने का मन बना लिया। उन्होंने सोचा कि शादी कर देने से वे गृहस्थी के बंधन में बँध जाएँगी, जिससे उन्हें इन सब कार्यों के लिए समय नहीं मिल पाएगा। ऐसा सोचकर उन्होंने 3 अगस्त, 1884 को भीकाजी का विवाह बंबई के एक प्रसिद्ध अधिवक्ता रुस्तम के. आर. कामा के साथ कर दिया, किंतु विवाह के बाद भी उनके विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया।

मादाम भीकाजी कामा के दांपत्य जीवन के कुछ प्रारंभिक दिन तो हँसी-खुशी से बीते, परंतु कुछ दिन बाद उनके तथा उनके पति के बीच गहरे मतभेद उत्पन्न हो गए। इसका मुख्य कारण यह था कि उनके पति अंग्रेजी साम्राज्य के प्रति निष्ठावान् थे, जबकि श्रीमती कामा अंग्रेजी शासन की कट्टर विरोधी थीं। वे भारत में अंग्रेजी शासन को समूल नष्ट करके भारत को स्वतंत्रता दिलाना चाहती थीं।

अपने पति के विरोध के बावजूद वे अंग्रेजों के विरुद्ध चल रही विभिन्न गतिविधियों में भाग लेती रहीं। इससे दोनों के बीच मतभेद बढ़ते ही गए और दोनों में अकसर कहा-सुनी होने लगी। धीरे धीरे स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि उन्होंने एक-दूसरे से बातचीत करना भी बंद कर दिया। इस विरोध के चलते उन्होंने अपनी सुख-सुविधाओं की चिंता किए बिना एक दिन अपना घर-बार छोड़कर देशहित के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया।

Madam Bhikaji Cama – मदाम भीकाजी कामा

प्लेग रोगियों की सेवा – उसी समय बंबई में प्लेग फैल गया। अनेक लोग इस भयंकर बीमारी के कारण मरने लगे। मैडम कामा अपने जीवन की चिंता किए बिना बीमार लोगों की सेवा करने के लिए आगे आईं। वे रोगियों की हरसंभव सेवा करने लगीं और उन्हें धैर्य बंधाने लगीं। वे उन्हें जीने का साहस देती तथा उनकी देखभाल करतीं। इस भयंकर महामारी से उन्होंने हजारों लोगों के प्राण बचाए।

प्लेग के रोगियों की सेवा करते-करते मैडम कामा को भी संक्रमण हो गया। उनके प्राण तो बच गए, परंतु काफी समय बाद तक भी उन्हें खोया हुआ स्वास्थ्य प्राप्त न हो सका। स्वास्थ्य सुधार के लिए वे सन् 1902 में यूरोप चली गईं। वहाँ विभिन्न देशों की यात्रा करते हुए वे सन् 1905 में लंदन पहुंचीं। वहाँ उनकी मुलाकात भारत के महान राष्ट्रवादी नेता दादाभाई नौरोजी से हुई।

राष्ट्रीय ध्वज का प्रारूप – मैडम कामा ने लगभग डेढ़ वर्ष तक उनके निजी सचिव के रूप में कार्य किया। इस बीच उनका संपर्क कई देशभक्तों तथा क्रांतिकारियों से हुआ, जिनका उनके जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। इन क्रांतिकारियों में श्यामजी कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर तथा सरदार सिंह राणा प्रमुख थे। लंदन में मैडम कामा ने श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा प्रकाशित ‘दि इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ नामक समाचार पत्र के लिए अनेक लेख लिखे।

Madam Bhikaji Cama – मदाम भीकाजी कामा

इसके पश्चात् उन्होंने श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा स्थापित ‘इंडियन होमरूल सोसाइटी के लिए काम करना प्रारंभ कर दिया। सन् 1905 में ही मैडम कामा ने वीर सावरकर तथा कई अन्य देशभक्तों से मिलकर प्रथम भारतीय राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगा’ का प्रारूप तैयार किया, जिसे उसी वर्ष पहली बार बर्लिन में तथा दूसरी बार सन् 1907 में बंगाल में फहराया गया। उस तिरंगे झंडे में हरे, केसरिया तथा लाल रंग की तीन पट्टियाँ थीं। हरे रंग की पट्टी सबसे ऊपर थी और उस पर आठ कमल पुष्प बने थे, क्योंकि उस समय भारत आठ प्रांतों में बँटा हुआ था।

वे आठ कमल पुष्प इन्हीं आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते थे। बीच की केसरिया पट्टी पर देवनागरी लिपि में ‘वंदे मातरम्’ लिखा था। सबसे नीचे लाल रंग की पट्टी थी, जिस पर दाईं ओर अर्द्धचंद्र तथा बाईं ओर उगता हुआ सूर्य बना था। लाल रंग शक्ति, केसरिया विजय तथा हरा निर्भीकता और जोश का प्रतीक था। मैडम कामा ने इस राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण का श्रेय कर्तव्यनिष्ठ तथा निर्भीक देशभक्त वीर सावरकर को दिया।

Madam Bhikaji Cama – मदाम भीकाजी कामा

अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन – सन् 1907 में अगस्त के तीसरे सप्ताह में जर्मनी के स्टुटगार्ट नगर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में मैडम कामा ने दुनिया भर के विभिन्न देशों से आए हजारों प्रतिनिधियों के समक्ष भारतीय पक्ष को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से रखा। उन्होंने लाखों निर्दोष भारतीयों द्वारा चुपचाप सहन किए जा रहे अंग्रेजों के अत्याचारों को सबके सामने उजागर किया। सम्मेलन में भाषण देते हुए उन्होंने कहा, “संसार की कुल जनसंख्या का पाँचवाँ हिस्सा भारत में निवास करता है।

मैं सभी स्वतंत्रता प्रेमियों से निवेदन करती हूँ कि इतने बड़े जन-समूह को परतंत्रता से मुक्त कराने के लिए हमारा सहयोग कीजिए।” उन्होंने भारतीयों के मन की बात को बड़ी निर्भीकतापूर्वक तथा प्रभावशाली ढंग से लोगों के सामने रखा। उन्होंने भारत में अंग्रेजी शासन की कड़ी आलोचना की और बताया कि किस प्रकार ब्रिटिश सरकार भारत की अर्थव्यवस्था को दिन-प्रतिदिन कमजोर करती जा रही थी।

अपने भाषण के अंत में भारतीय ध्वज को फहराते हुए उन्होंने कहा, “यह भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज है। मैं आप लोगों से निवेदन करती हूँ कि असंख्य भारतीयों की स्वतंत्रता के प्रतीक इस ध्वज का अभिवादन कीजिए। इस ध्वज के माध्यम से मैं दुनिया भर के स्वतंत्रता-प्रेमियों से इस ध्वज का साथ देने का निवेदन करती हूँ।”

Madam Bhikaji Cama – मदाम भीकाजी कामा

मैडम कामा के व्यक्तित्व और उनके स्वर में इतना प्रभाव था कि वहाँ उपस्थित प्रतिनिधिमंडल के सभी सदस्यों ने उठकर भारतीय ध्वज का अभिवादन किया। मैडम कामा विश्व के अनेक देशों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में विदेशी भूमि पर भारतीय ध्वज फहरानेवाली प्रथम महिला थीं। उन्होंने कहा था, “मैं अपने देश का ध्वज फहराने के बाद ही बोलना प्रारंभ करती हूँ।”

पेरिस क्रांतिकारियों का गढ़ बना –  लंदन में जब भारतीय क्रांतिकारियों की गतिविधियाँ बढ़ने लगीं तो उनके विरुद्ध पुलिस की हलचल भी बढ़ गई। अब लंदन इन क्रांतिकारियों के लिए सुरक्षित नहीं रह गया था। इसी कारण श्यामजी कृष्ण वर्मा लंदन छोड़कर फ्रांस चले गए और उन्होंने पेरिस में रहकर क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन शुरू कर दिया।

उधर प्रसिद्ध क्रांतिकारी लाला हरदयाल को भी ब्रिटिश शासन ने इंग्लैंड से निष्कासित कर दिया। इसपर मैडम कामा अत्यंत क्रुद्ध हुई। अब पेरिस भारतीय क्रांतिकारियों का गढ़ बन चुका था। जर्मनी में सम्मेलन की समाप्ति के बाद मैडम कामा अमेरिका चली गईं। वहाँ रहकर उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए लोगों का समर्थन जुटाना शुरू कर दिया।

Madam Bhikaji Cama – मदाम भीकाजी कामा

न्यूयॉर्क में मैडम कामा ने जब पत्रकारों को अपना उद्देश्य बताया तो उन्होंने उनकी भरपूर प्रशंसा की। पत्रकारों से बातचीत करते हुए मैडम कामा ने बताया कि भारत में रहनेवाले लाखों लोग, चाहे वे गरीब तथा अशिक्षित क्यों न हों, परंतु अपने देश को बहुत प्यार करते हैं और उसे स्वतंत्र देखना चाहते हैं। उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि हम भारतीय आनेवाले कुछ वर्षों में स्वतंत्रता प्राप्त करेंगे और समानता, भाइचारे एवं आजादी के माहौल में जीवन बिताएँगे।

20 अक्तूबर, 1907 को मिनर्वा क्लब द्वारा वॉलडोर्फ एस्टोरिया होटल में एक सभा का आयोजन किया गया, जिसका सभापति मैडम कामा को बनाया गया। वहाँ अपने भाषण में उन्होंने भारतीयों को अपने मत का प्रयोग करने का राजनीतिक अधिकार दिए जाने की वकालत की। इसी प्रकार उन्होंने अन्य अनेक सम्मेलनों में भारतीय जनता का पक्ष रखा और विश्व समुदाय को भारत के प्रति सोचने के लिए प्रेरित किया।

इंडिया हाउस में भाषण – सन् 1908 में मैडम कामा पुनः लंदन लौट आईं। वहाँ उन्होंने ‘इंडिया हाउस में आयोजित एक सभा को संबोधित किया। वहाँ उन्होंने जो भाषण दिया, उसे छोटी छोटी पत्रिकाओं में छापा गया, जिनमें से बहुत सी पत्रिकाएँ भारत में पहुँच गईं। उनमें स्वतंत्रता संग्राम के विकास की संक्षिप्त जानकारी दी गई थी। मैडम कामा का कहना था कि हमारे जीवन की सार्थकता अपने देश के लिए मर मिटने में है।

Madam Bhikaji Cama – मदाम भीकाजी कामा

हम भारतीय हैं और अपने देश भारत के लिए प्राण न्योछावर करना हमारा सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने भारतीय युवाओं को दिए गए एक संदेश में कहा था, बढ़ो, मित्र! आगे बढ़ो। भारत माता के सपूतों को क्रूर ब्रिटिश शासन ने अपने पैरों तले आगे दबा रखा है। वे असहाय होकर निरंतर कुचले जा रहे हैं, उन्हें स्वराज्य के लिए प्रेरित करो। आगे बढ़ो! हमारा केवल एक ही उद्देश्य होना चाहिए कि हम भारत के लिए है और भारत हम भारतीयों का है।”

किसी भी सभा को संबोधित करते समय मैडम कामा सदैव ही आपसी भाईचारे और एकता पर बल देती थीं। वे कहती थीं कि जातिवाद को एक तरफ हटा देना चाहिए, क्योंकि हम सब भारतीय हैं और एक ही परिवार के सदस्य हैं। वे हमेशा यही चाहती थीं कि हमारे समाज के अंदर भाईचारे की भावना जागे और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिले। उन्होंने सभी को ब्रिटिश सरकार के अधीन छोटी या बड़ी नौकरी न करने के लिए आगाह किया तथा लोगों को अपने बल पर जीने, व्यापार को बढ़ाने तथा सबकुछ भारतीय बनाने के लिए प्रोत्साहित किया।

दादाभाई नौरोजी की निजी सचिव रहते हुए ही मैडम कामा कई स्थानों पर अपने भाषण दे चुकी थीं और वे अब तक एक सशक्त वक्ता के रूप में प्रसिद्ध हो चुकी थीं। लंदनवासी भी उन्हें देखकर आश्चर्यचकित थे। वे सोचते थे कि यह महिला तो शेर की गुफ़ा में घुसकर शेर को ललकार रही है। इस तरह मैडम कामा की बढ़ती प्रसिद्धि को देखकर ब्रिटिश सरकार की नींद उड़ गई।

Madam Bhikaji Cama – मदाम भीकाजी कामा

वह सोचने लगी कि आनेवाले समय में यह महिला भारत में ब्रिटिश शासन की नींव हिला सकती है। इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें डराना-धमकाना शुरू कर दिया, ताकि वे लंदन छोड़कर कहीं और चली जाएँ। मैडम कामा ने सरकार की इस चाल का विरोध किया, परंतु जब उन्होंने देखा कि कुछ लोग उन्हें जान से मारने के प्रयास में हैं तो वे चुपचाप वहाँ से निकल गई और इंग्लिश चैनल पार कर फ्रांस पहुँच गईं।

फ्रांस में प्रमुख समाजवादी नेताओं ने मैडम कामा का जोरदार स्वागत किया। कुछ ही दिनों में फ्रांस में मैडम कामा का घर एक गोपनीय केंद्र बन गया, जहाँ विभिन्न देशों के क्रांतिकारी आकर मिलते थे। भारत के जनरल बापत तथा हेमचंद्र दास के अतिरिक्त रूसी क्रांति के जनक लेनिन भी मैडम कामा से मिलने आते थे तथा अपने विचारों का आदान-प्रदान करते थे। फ्रांस में चल रही उनकी इन गतिविधियों के कारण ब्रिटिश सरकार काफी पसोपेश में थी।

ब्रिटिश सरकारने मैडम कामा से वापस भारत जाने का आग्रह किया। इसके साथ ही उसने फ्रांस की सरकार से भी उन्हें वापस अपने देश में भेजने का आग्रह किया। मैडम कामा तथा फ्रांस की सरकार, दोनों ने ही ब्रिटिश सरकार के आग्रह को ठुकरा दिया। इससे चिढ़कर भारत की ब्रिटिश सरकार ने मैडम कामा के भारत आने पर हमेशा के लिए पाबंदी लगा दी तथा उनकी लगभग एक लाख रुपए की संपत्ति जब्त कर ली।

Madam Bhikaji Cama – मदाम भीकाजी कामा

वंदे मातरम् पत्रिका में कार्य –  इस घटना से मैडम कामा को और अधिक प्रसिद्धि तथा प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। अब उनकी ख्याति उन देशों में भी पहुँच चुकी थी, जहाँ वे कभी गई भी नहीं थीं। पेरिस में रहते हुए उन्होंने अन्य भारतीय क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ‘वंदे मातरम्’ नामक एक क्रांतिकारी पत्रिका का प्रकाशन शुरू कर दिया। उसके संपादन कार्य के लिए निर्भीक क्रांतिकारी तथा योग्य व्यक्ति लाला हरदयाल को नियुक्त किया गया।

मैडम कामा अपना अधिकांश समय इस पत्रिका के लिए लेख लिखने में लगाती थीं। इतना सबकुछ करने के बाद भी वे यही सोचती थीं कि वे अपने देश के लिए कुछ खास नहीं कर पा रही हैं। कुछ समय पश्चात् उन्होंने उस पत्रिका के साथ एक और पत्रिका ‘मदन की तलवार’ का भी प्रकाशन प्रारंभ कर दिया। इन दोनों पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने भारतीयों के दिल में सुलगती क्रांति की चिनगारी को हवा देने का काम किया।

उधर लंदन में लगातार क्रांतिकारी गतिविधियों में संलग्न रहने के कारण वीर सावरकर का स्वास्थ्य काफी गिर चुका था स्वास्थ्य सुधार के लिए वे पेरिस में मैडम कामा के पास आ गए। वहाँ मैडम कामा तथा श्यामजी, राणा डे, हरदयाल, वीरेंद्र नाथ एवं अन्य साथियों की देख-रेख में उनका स्वास्थ्य बेहतर हो गया। इसके साथ-साथ भारतीय क्रांतिकारियों से लगातार संपर्क बनाए रखने, उनको एकजुट करने तथा उनके लिए हथियारों की आपूर्ति का कार्य निरंतर चलता रहा।

Madam Bhikaji Cama – मदाम भीकाजी कामा

स्वतंत्रता की गतिविधियां तेज़ की – सन् 1907 में वीर सावरकर ने सन् 1857 के विद्रोह की स्वर्ण जयंती मनाने का कार्यक्रम बनाया। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम पर एक पुस्तक लिखी, जिसमें विद्रोह का विस्तार से वर्णन किया गया था। मैडम कामा 1857 के संग्राम में मारे गए शहीदों के परिवारों को भी कुछ धन लगातार भिजवाती थीं।

उन्होंने ब्रिटिश सरकार के विरोध के बावजूद सावरकर द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘द फर्स्ट वॉर ऑफ इंडियन इंडिपेंडेंस ऑफ 1857 प्रकाशित की तथा कुछ गुप्त माध्यमों के द्वारा इस पुस्तक की प्रतियाँ लोगों तक पहुँचाईं। यह पुस्तक भारतीयों के बीच बड़ी लोकप्रिय हुई। मई 1912 में ऑक्सफोर्ड से भारत भेजी गई ‘वंदे मातरम्’ तथा अन्य पत्रिकाओं की प्रतियाँ ब्रिटिश सरकार के हाथों लग गई और भारतीय क्रांतिकारियों तक नहीं पहुँच सकीं।

इन विपरीत परिस्थितियों में भी मैडम कामा ने किसी-न-किसी तरह पत्रिकाएँ भारतीय क्रांतिकारियों तक पहुँचाई। तमाम चौकसी के बाद भी ब्रिटिश सरकार ऐसा करने से उन्हें नहीं रोक सकी 30 मई, 1913 को शिमला के डायरेक्टर ऑफ क्रिमिनल इन्वेस्टीगेशन ने भारत सरकार के सेक्रेटरी से कहा कि ‘वंदे मातरम्’ का प्रकाशन हॉलैंड से किया जा रहा है, जिसे बंद करने के लिए भारतीय ब्रिटिश सरकार को हॉलैंड सरकार से कहना चाहिए, परंतु इस विषय पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की गई।

Madam Bhikaji Cama – मदाम भीकाजी कामा

सन् 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध के समय मैडम कामा के मन में स्वतंत्रता को लालसा तीव्र होने लगी। उन्होंने भारतीय सैनिकों से युद्ध में भाग न लेने के लिए कहा। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा, “भारत माता के सपूतो। तुम्हें धोखा दिया जा रहा है। तुम इस युद्ध में भाग मत लो। तुम अपने प्राण भारत के लिए नहीं बल्कि उन अंग्रेज के लिए न्योछावर करने जा रहे हो, जिन्होंने तुम्हारी भारत माता के हाथों में हथकड़ियाँ पहना रखी हैं। उन्हें वहाँ से हटाने के बारे में सोची। यदि तुम अंग्रेजों की सहायता करोगे तो भारत माता के हाथों की हथकड़ियों को और कड़ा कर दोगे।”

उन्होंने स्वयं भी मार्सीलिस में सेना के कैंप का दौरा किया और भारतीय सैनिकों से मुलाकात की। उन्होंने उनसे प्रश्न पूछा, “क्या आप उन्हीं लोगों के लिए लड़ने जा रहे हैं, जिन्होंने तुम्हारी माँ को कैद कर रखा है ?” प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान फ्रांस की सरकार ने उनके देश छोड़कर जाने पर पाबंदी लगा दी तथा उन्हें पेरिस से बाहर भेज दिया। युद्ध समाप्त होने पर उनपर से यह पाबंदी हटा ली गई और वे फिर से स्वतंत्रतापूर्वक क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करने लगीं।

अब तक उनकी प्रसिद्धि इतनी फैल चुकी थी कि चीन, तुर्की आदि पूर्वोत्तर के अनेक देशों के लोगों द्वारा उनकी प्रशंसा की जाने लगी। इन देशों के क्रांतिकारी उनसे सलाह लेने के लिए उनके पास आने लगे। इधर स्वास्थ्य पर बिलकुल ध्यान न दिए जाने के कारण मैडम कामा का स्वास्थ्य जब-तब खराब रहने लगा। उनका शरीर भी कमजोर हो चुका था, क्योंकि अब तक उनकी उम्र लगभग 70 वर्ष से अधिक हो चुकी थी।

Madam Bhikaji Cama – मदाम भीकाजी कामा

आखरी साँस भारत माँ की गोदी में ली – उस अवस्था में उन्होंने अपनी मातृभूमि भारत वापस आने की इच्छा जताई, लेकिन भारत आने के लिए उन्हें भारतीय ब्रिटिश सरकार से अनुमति लेना आवश्यक था। सर कोवासजी जहांगीर के अथक प्रयास के बाद मैडम कामा को भारत आने की अनुमति सशर्त मिल गई, परंतु उन्होंने उन शर्तों को मानने से इनकार कर दिया। बाद में मित्रों तथा रिश्तेदारों के आग्रह पर उन्होंने उन शर्तों को मान लिया।

जब उन्हें भारत लाया जा रहा था तब रास्ते में ही वे अधिक बीमार पड़ गई और बिस्तर से उठने की स्थिति में भी न रहीं। बंबई पहुँचने पर उन्हें अपार खुशी हुई, परंतु उन्हें बंदरगाह से सीधे ही ‘पेटिट अस्पताल ले जाया गया, जहाँ वे आठ महीने तक जीवन और मृत्यु के बीच झूलती रहीं। अंततः 13 अगस्त, 1936 को यह महान् क्रांतिकारी महिला चिर निद्रा में लीन हो गई।

Shetkaryancha Asud

Leave a Comment