Lala Lajpat Rai – लाला लाजपतराय

Lala-Lajpat-Rai   Lala Lajpat Rai

स्वतंत्रता को बलिवेदी पर बलिदान देने वाले, देशभक्त, पंजाब केसरी लाला लाजपतराय का नाम वर्तमान भारत के निर्माताओं में बहुत ऊंचा है। वे जितने बड़े कांग्रेस-भक्त थे, उतने ही परोपकारी और समाज सुधारक भी थे। राजनैतिक क्षेत्र मे उनकी रुचि और समाज-सेवा ने पंजाब में ही नहीं, समस्त देश में उनका सबसे ऊंचा स्थान बना दिया था। भारत के राष्ट्रीय संग्राम में आपकी सेवाओं का इतिहास स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है।

Lala Lajpat Rai – लाला लाजपतराय

जीवनभर वीरतापूर्वक निर्भयता से लडने के कारण ही उनको देश ने पंजाब का शेर’ कहा था। अपने देश को यह पाठ सिखाया था कि स्वतंत्रता भांगने से नहीं, लड़ने से, बलिदान से, खून देने से मिलेगी। राष्ट्र के नव-जागरण का संभवतः ही कोई ऐसा क्षेत्र था जिसमें उन्होंने सक्रिय भाग न लिया हो। धार्मिक नव-जागरण का क्षेत्र हो या सामाजिक सुधार और पुनरुत्थान का क्षेत्र, शिक्षा का क्षेत्र हो या देश-भक्ति और राष्ट्रीयता का, लाला लाजपतराय किसी से भी किसी से कम नही रहे। वे राष्ट्र, समाज व जाति की चेतना के साथ एकाकार हो गये थे।

ऐसे महान पुरुष लाला लाजपतराय का जन्म 28 जनवरी, सन् 1865 ई० को पंजाब के जिला फ़िरोजपुर के एक छोटे से गांव ढोडोग्राम में हुआ था। यह उनका ननिहाल था। वैसे वह जिला लुधियाना के जगरांव नामक एक कस्बे के निवासी थे । उनके पिता श्री राधाकृष्ण एक स्कूल में अध्यापक थे । लक्ष्मी को कृपा से वंचित होने के बावजूद उन पर सरस्वती की अपार कृपा थो।

वे अरबी, फारसी और उर्दू के विद्वान् थे। वे देश के सार्वजनिक आंदोलन से सदैव प्रेम रखते थे। आप पर पहले इस्लाम धर्म का प्रभाव था, परंतु स्वामी दयानंद के सदुपदेश से आप आर्यसमाजी बन गये। उनकी माता गुलाबदेवी अनपढ़ अवश्य थी, वह अत्यंत धर्मात्मा, उदार और सरल स्वभाव की थी। उनमे आदर्श महिला के सभी गुण थे। वह आर्यसमाजी थी। बालक लाजपतराय के व्यक्तित्व पर अपने माता-पिता का गहन प्रभाव पड़ा था।

Lala Lajpat Rai – लाला लाजपतराय

उन्होंने स्वयं लिखा है “दान, आतिथ्य, उदारता के गुण मुझमें माता से आए। मेरे व्यक्तिगत चरित्र का निर्माण बहुत कुछ मेरी माता ने किया।” “अपने व्यक्तित्व के लिए मैं पिता का कम आभारी नहीं। आपने मेरे धार्मिक विचारों को बनाया, मुझमें विद्या का व्यसन पैदा किया और मुझे देश भक्ति के पाठ पढ़ाए।

जो बीज अंत में फल लाए, है उन्ही के बोए हुए थे।” लाजपतराय की प्रारंभिक शिक्षा पिता की देखरेख मे हुई । अचपन से ही लाजपतराय की स्मरणशक्ति और बुद्धि अत्यत कुशाग्र थी। स्कूल भर में वह सबसे छोटी आयु के थे और कक्षा में सर्वप्रथम रहते थे। 13 वर्ष की आयु में आपने मिडिल पास कर लिया।

उनकी योग्यता के कारण उनको छात्रवृत्ति मिलने लगी। यद्यपि लालाजी के पिता ऋषि दयानंद के सच्चे अनुयायी ये तथा आर्यसमाज के सिद्धांतों के अनुसार बाल विवाह के विरुद्ध थे। परंतु इच्छा न होते हुए भी विवश होकर दबाव में उन्होंने 13 वर्ष की अल्पायु में बालक लाजपतराय का विवाह कर डाला। सन् 1880 में मैट्रिक पास करने के बाद लालाजी कालेज की पढ़ाई के लिए लाहौर आये। यहां आपने इंटरमीजिएट और कानून की पढ़ाई एक साथ की। सन् 1885 मे आपने वकालत की अंतिम परीक्षा पास कर ली।

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विद्यार्थी जीवन मे लाजपतराय पर आर्यसमाज के संस्कार पड़ चुके थे। पिताजी के सार्वजनिक आंदोलन से संबंधित होने के कारण वह विद्यार्थी जीवन से ही देश की सार्वजनिक प्रगति का अध्ययन करने लगे थे। मुशी राधाकृष्ण जी स्वयं कांग्रेस के अनुयायो थे। उन दिनों विशेष देशभक्तों में सर सैयद अहमद खा का नाम था राधाकृष्ण भी उनके भक्त थे लेकिन जब सर सैयद के विचारों ने पलटा खाया I

और वे साप्रदायिकता के संकुचित क्षेत्र मे फसकर कांग्रेस पर आक्षेप करने लगे तो राधाकृष्ण ने उनके नाम ‘कोहनूर पत्र मे एक बड़ा ही तर्कपूर्ण खुला पत्र प्रकाशित कराया। उसमें उनकी काग्रेस विरोधी कार्रवाइयो तथा राजनीतिक क्षेत्र में गिरगिट की तरह उनके आकस्मिक रूप परिवर्तन की कड़ी आलोचना की थी।

पिता के इन समस्त गुणों का प्रभाव उनके सुपुत्र पर पड़ा। वे विद्यार्थी जीवन में ही इन सब कार्यों में रुचि लेने लगे। आर्य समाज के प्रति उनके हृदय में अपार श्रद्धा उत्पन्न हो गई। वे विद्याध्ययन करते समय ही समाज सेवा में लग गये पिता राधाकृष्ण के शब्दों मे “यद्यपि यह उस समय वकालत पढता था लेकिन ज्यादातर समय हिंदी-उर्दू के झगड़े और आयंसमाज के प्रचार में खोकर लैक्चरवाजी करता फिरता था।”

Lala Lajpat Rai – लाला लाजपतराय

वकील बन जाने के बाद कुछ दिनों तक आपने हिसार के जिला न्यायालय में वकालत की। अल्प समय में ही आप प्रसिद्ध वकील हो गये। उन्होंने नियमानुसार जब छोटी अदालत में ट्रेनिंग समाप्त कर ली तो वह सार्वजनिक और अदालती कार्य के लिए लाहौर जाने का मोह-संवरण न कर पाये। सन् 1892 में आप लाहौर चले आये । कुछ ही दिनों में आप वहा के विख्यात वकील माने जाने लगे। \

उनके जीवन ने एक नवीन दिशा तब प्राप्त की जब वो आर्यसमाज के सक्रिय सदस्य बन गये। गुरुदत्त के उत्साहवर्धन एवं पथ-प्रदर्शन से इनमें सेवा का भाव बढ़ता गया। लाहौर में ‘दयानद एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना में आपने पर्याप्त हाथ बंटाया। आप उसको मैनेजिंग कमेटी के सदस्य भी रहे । उसके निर्माणार्थं उन्होंने गांव-गांव घूमकर बहुत सारा धन एकत्र किया और उसको विशाल रूप दिया।

उन्होंने पूर्ण निष्ठा एवं लगन के साथ उसकी उन्नति और वृद्धि के कार्य में अपने आपको लगा दिया। उसमें अध्यापकी तक का कार्य करते हुए उसे प्रांत का एक प्रमुख शिक्षालय बना दिया। जिस समय आप लाहौर मे थे यह शहर बड़ी तेजी से बढ़ रहा था। राजनीति का तो यह मन बन गया था। लालाजी ने जनसेवा के लिए वकालत का पेशा छोड़ दिया।

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अब उनकी निस्वार्थ सेवा आर्यसमाज तक ही सीमित नही रही, उन्होंने राजनीति में भी प्रवेश किया। वे स्वय लिखते है कि “मेरे अन्य कार्यों मे सन् 1893 में पंजाब में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन की स्वागत समिति का कार्य तथा सार्वजनिक सभाओं में उपस्थिति शामिल थी। स्वागत समिति में विभिन्न विचारवालों के झगड़ों का निपटारा तथा निरंतर मंथन मे मेरा काफी समय चला जाता था।”

उन्हें इस प्रकार बडा परिश्रम करना पड़ता था। इससे उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। उन पर निमोनिया का प्रकोप हुआ और दोनो फेफड़े दुर्बल हो गये। वे लगभग दो महीने तक बिस्तर पर पड़े रहे और उनके जीवन की आशा जाती रही। लाजपतराय ने लिखा है “डॉक्टर बेलीराम बड़े स्नेह से मेरी चिकित्सा तथा देखभाल करते रहे। उन्होंने मेरी प्राण-रक्षा का भरपूर प्रयत्न किया। जीवन-भर उनका आभारी रहूगा।”

लाजपतराय ने देश स्वतंत्रता हेतु आंदोलन उस समय आरंभ किया जब भारत की अवस्था अत्यंत शोचनीय थी। उस समय स्वतंत्रता के लिए संगठन करना एक अत्यंत जटिल एवं दुष्कर कार्य था। उन्नीसवी शती के अंत में भारतवर्ष में अनावृष्टि, अकाल और महामारी एक साथ प्रकोप हुआ । सन् 1896-97 में लगभग पूरे भारत में सूखा पड़ गया, जिसने दुभिक्ष के रूप में समस्त देश मे त्राहि-त्राहि मचा दी।

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लोग उससे छूटने के उपायों में ठीक से लग भी न पाये थे कि तब तक प्लेग फूट पड़ी। प्रकृति के इन प्रकोपो से प्रलय का सा दृश्य उपस्थित हो गया। जनता और जन नेताओं की कौन कहे सरकार तक के हाथ-पांव फूल गये। ऐसे भयानक समय मे लाला लाजपतराय ने जिस साहस, तत्परता और जन-सेवा की भावनाओं का प्रमाण दिया उससे देश की जनता ने उन्हें सिर-आंखों पर उठा लिया।

लालाजी ने आपत्तिग्रस्त जनता की जो अवस्था देखी, वह बड़ी हृदयविदारक थी। उन्होंने देखा कि सहस्रों मानव दाने-दाने को तरस कर अकाल मृत्यु मर रहे हैं। प्लेग से प्रभावित लोग कीड़े-मकोड़ों की तरह मर रहे है। एक विशाल समूह अनाथों और निराश्रितों की तरह मर रहा है। समाज की इस शोचनीय अवस्था को देखकर लाला लाजपतराय रो उठे। किंतु उससे भी अधिक दुःख उन्हें यह देखकर हुआ कि उसी समाज में ऐसे नर-पशु भी थे जो मनुष्यों की उस विवशता का लाभ उठा रहे थे।

ईसाई मिशनरी भूवी जनता को थोड़ा-सा भोजन देकर उनका धर्म परिवर्तन कर रहे थे। भ्रष्टाचारी, कालाबाजारिये और मुनाफाखोर भयंकर रूप से उस भूखी जनता का शोषण कर रहे थे। नर-पिशान विवश नारियों के शीर सौदा कर रहे थे। मानवता पर इस प्रकार अमानवीय अत्याचार देखकर सासा जी का हृदय टुकड़े-टुकड़े हो गया।

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उन्होंने उम आपतिग्रस्त जनता सहायता में अपने प्राण तक न्यौछावर करने का संकल्प कर लिया। उन्होंने पीड़ित क्षेत्रों में अंधाधुंध दौरे करने शुरू कर दिये। पीड़ितों के पाग से वे जनता में आकर सभायें करते थे। अन्न, वस्त्र और धन-जन के लिए अपीस निकालते थे। समाचार पत्रों में सहायता के लिए प्रेरणादायक लेख लिखते थे।

साथ ही वे अकाल और आपत्ति से लाभ उठाने वाले नर-पिशाचो की निंदा भी करते थे। लालाजी की इन प्रेरक और मार्मिक अपीलो ने देशभर में एक हलचल मचा दी । हृदय से निकली हुई उनकी बातें सीधे लोगो के हृदय पर चोट करती थी। सोते हुए लोगों में जागरण का वातावरण छा गया और उनकी मनुष्यता अपने भाइयो की सेवा-सहायता करने के लिए मचल उठी।

लालाजी की इस तत्परता और सेवा भावना का फल यह हुआ कि देश-विदेश से अकाल-पीड़ितों की सहायतार्थ सामग्री आने लगी। पं० मदनमोहन मालवीय और गोखले जैसे चोटी के नेता भी जन-सेवा के क्षेत्र में सक्रिय रूप से उतर आये और उन्होंने लालाजी का नेतृत्व सहर्ष स्वीकार किया।

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किंतु सरकार अभी तक अपने कर्तव्य मे उदासीनता प्रकट कर रही थी। लालाजी के प्रयत्नों से ‘दुभिक्ष कमीशन’ की स्थापना हुई। कमीशन की रिपोर्टों मे लालाजी ने अपनी योजनाओं का समावेश कराया और सरकार से हर प्रकार की सहायता प्राप्त की। उन्होंने सन् 1901 ई० के ‘दुर्भिक्ष कमीशन के सामने एक महत्त्वपूर्ण गवाही भी दी।

इसमें उन्होंने अकाल के समय ईसाई मिशनरियो द्वारा की जाने वाली धर्म परिवर्तन विषयक धाधलियों के प्रति ध्यान आकर्पित करते हुए अनाथ बच्चों की रक्षा के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किया। वास्तव मे उन्ही के प्रयत्नों से उत्तरी भारत में सर्वप्रथम सुसंगठित रूप से आधुनिक ढंग के अनाथालयो की प्रस्थापना हुई थी।

इस प्रकार उस समय लगभग दो हजार असहाय बच्चों की विधर्मियों के हाथों में पड़ जाने से उन्होंने रक्षा की थी। पीड़ितों की सहायता पहुचाने का जो यह अद्वितीय सेवाकार्य लालाजी ने किया उसका आभारपूर्वक उल्लेख सरकार तक ने सन् 1911 को अपनी जनसंख्या रिपोर्ट में किया ।

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सन् 1905 मे कांग्रेस ने एक शिष्ट-मडल इंग्लंड भेजा ताकि वह वहां के संसद सदस्यों के समक्ष भारतीय स्थिति में सुधार के प्रस्ताव रख सके। श्री गोखले के साथ आप इस शिष्टमंडल में भेजे गए वहा आपने एक मास में 40 समाओ में व्याख्यान दिये। समाचार पत्रों में लेख लिखे और प्रतिष्ठित सदस्यों से मिले। परंतु वहां आपको सर्वत्र निराशा ही दिखाई पड़ी। स्वदेश लौटने पर आपने जनता को बता दिया कि भिक्षावृत्ति से काम नही चल सकता। हमें अपने पैरों पर स्वयं खड़ा होना होगा।

अब लालाजी ने समस्त भारत का दौरा किया। बिना लाउडस्पीकरों के हजारों की भीड़ उनके जोशीले भाषणों को सुनकर मंत्रमुग्ध रहती थी। उसी समय आपने यह नारा बुलंद किया- “अगर कोई ऐसा आदमी है, जो अपने देश और जाति की सेवा अपना कर्तव्य नही समझता तो उससे कह दो कि तुम्हें मनुष्य शरीर तो मिला है, पर तुम अभी मनुष्य नहीं बन पाये ।”

जनता ने हर स्थान पर लालाजी का हृदय से स्वागत किया। इसी समय यह ‘पंजाब केसरी’, ‘हिंद केसरी’ बना सरकार को यह भली भांति विदित होने लगा कि उसने एक शेर की पूंछ को हाथ लगा लिया था। सन् 1908 में भारत की स्थिति बड़ी भयंकर हो गई। बंगाल के कुछ नव युवकों ने बम बना डाले। मुजफ्फरनगर में बमवाजों के बम से दो अंग्रेजो को हत्या हो गई, जिसके कारण सरकार ने बड़े जोर से दमन आरंभ कर दिया। इस दमन की चपेट मे कई नेता पकड़े गये।

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इस राजनीतिक निराशा और अधकार के घटाटोप के वातावरण से एक प्रकार से खिन्न होकर लालाजी कुछ समय के लिए इंग्लैंड चले गए, परंतु विलायत के अपने इस प्रवासकाल का भी उपयोग उन्होंने स्वदेश के हित के लिए हो किया। वहां जाकर आपने भारत विषयक लेख लिखने आरंभ कर दिये। वहा आपने प्रवासी भारतीय युवकों में जागरण का मंत्र फूकने का स्तुत्य कार्य किया। वहां से सन् 1909 ई० में आप भारत लौटे।

उस समय गांधी जी के नेतृत्व में दक्षिण अफ्रीका का इतिहास प्रसिद्ध सत्याग्रह-संग्राम अपने पूरे बल पर था। गोपालकृष्ण गोखले द्वारा सहायता अपील की जाने पर लालाजी ने अपने प्रांत से लगभग पचीस हजार रुपये एकत्रित कर भिजवाए | कांग्रेस की ओर से सत्याग्रह के संबंध में जब एक शिष्टमंडल विलायत भेजने का निश्चय किया गया, तो उसके सदस्य के रूप में वह पुनः इंग्लैंड गये।

जब यह शिष्ट-मंडल वापस स्वदेश लौटा तो लालाजी उसके साथ न आकर वहीं रुक गए। वहां ठहरकर उन्होंने ‘आर्यसमाज’ नामक एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक अंग्रेजी में लिखी, जो पर्याप्त समादृत हुई।

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सन् 1913 में लालाजी जापान और अमेरिका गए। वह अमेरिका में ये तभी प्रथम विश्वयुद्ध छिड गया। महायुद्ध छिड़ जाने के कारण आपको भारत वापस आने की अनुमति नहीं मिली। अतः 1919 के अंत तक आपको अमेरिका में ही रहना पड़ा। अमेरिका प्रवास का समय लालाजी ने यों ही नहीं खोया। उन्होंने वहां भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से संबद्ध विपुल साहित्य का सृजन किया।

उन्होंने अनेक लेख लिखे और अमेरिकी जनता के समक्ष भारत की वास्तविक स्थिति को रखने के लिए अनेक भाषण दिये। उन्होंने भारत की सामाजिक तथा राजनीतिक समस्याओं पर पत्र-पत्रिकाओं में कई गवेषणापूर्ण लेख लिखकर मातृभूमि के हितार्थ जो प्रबल प्रचार किया उसका जनता पर गहन प्रभाव पड़ा ।

जिस समय आप अमेरिका में सामाजिक कार्य कर रहे थे उन्ही दिनों मे पंजाब में जलियांवाला बाग का भयकर हत्याकांड हुआ। वहां की जनता पर किए गए अत्याचारों का समाचार पाकर पंजाब के इस सिंह का हृदय अपनी बेबसी को देख मानो तिलमिला उठा ! उनका मन भारत आने के लिए छट पटाया, मगर वो विवश थे। उस समय की अपनी अंतर्वेदना को उन्होंने इन शब्दों में प्रकट किया I

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“मैं इस अवसर पर जबकि मेरे देशवासी ऐसी विकट आपदाओं का सामना करते हुए स्वतंत्रता की लड़ाई लड रहे है, उस सग्राम में अपना हिस्सा अदा करने के लिए देश में उपस्थित न रहने के कारण एक कटु आत्मग्लानि और लज्जा के भाव से दबा जा रहा हूं। यहां तक कि यह तथ्य भी कि भारत न जा पाने की अपनी इस विवशता में स्वतः मेरा अपना कोई अपराध नहीं है, मेरे लिए कोई सांत्वना की बात नही है।

यद्यपि भारत के लिए होमरूल के पक्ष मे बाहरी दुनिया में अनुकूल मत उत्पन्न करने का यह काम भी एक महत्त्व का काम है, फिर भी हमारा सच्चा कार्य क्षेत्र तो है भारतवर्ष ही। वस्तुतः सारे ससार का नैतिक समर्थन प्राप्त कर लेने पर भी हमें निर्णयात्मक रूप से सहायता नही पहुचेगी। भारत की यथार्थ स्वतंत्रता तो स्वयं भारतीयो द्वारा भारत मे ही सिद्ध हो सकेगी।”

अमेरिका में रहकर लालाजी और उनके सहयोगियों ने स्वदेश हित रक्षा के लिए जो आदोलन किया उससे विश्व के समक्ष भारत की वास्तविक स्थिति प्रकट हो गई। लोग विदेश में आदोलन के महत्व को समझ गये। यों तो यूरोपीय महायुद्ध से पूर्व अनेक विद्वान् भारतीय नेता इन पाश्चात्य देशों में आये परंतु उन्होंने भारत के संबंध में राजनैतिक आंदोलन करने की आवश्यकता कभी भी अनुभव नही की। लालाजी सर्वप्रथम ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने विदेशों में रहकर स्वदेश के लिए अनेकानेक कष्ट सहन करके भी इतना सुंदर और सुव्यवस्थित आंदोलन कर दिखाया।

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सौभाग्य से विश्व युद्ध समाप्त होने के शीघ्र ही पश्चात् उन पर स्वदेश वापस आने संबंधी प्रतिबंध हटा लिया गया। वे 20 फरवरी, 1920 के दिन बम्बई बंदरगाह पर पुनः मातृभूमि के तट पर उतरे देशवासियों द्वारा उनका बड़ी धूमधाम से स्वागत किया गया । 1920 ई० में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का एक विशेष अधि वेशन हुआ। लालाजी ने उसकी अध्यक्षता की। इसी वर्ष नागपुर में कांग्रेस अधिवेशन हुआ, जिसमे असहयोग प्रस्ताव पास हुआ।

उसके बाद उनकी गतिविधियां बहुत तीव्र हो गईं। असहयोग आंदोलन का एक प्रमुख कार्यक्रम था अंग्रेजी स्कूलों तथा कालेजों का बहिष्कार करना। अतः लालाजी ने लाहौर में नेशनल कालेज तथा तिलक आफ पॉलिटिक्स की स्थापना की, जो भारतीय वातावरण के अनुकूल थे। इसी समय उन्होंने तिलक स्वराज कोष के लिए दस दिन में नौ लाख रुपये एकत्रित किये।

इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय कार्यकर्ता तैयार करने तथा सुव्यवस्थित देशसेवा करने के लिए आपने 9 नवंबर, 1921 को एक अद्वितीय संस्था ‘लोक सेवक मंडल’ की स्थापना की। इस मंडल का एकमात्र उद्देश्य निस्वार्थ भावना से जनता की सेवा करना था। इसके सदस्यों को जीवन निर्वाह के लिए नाममात्र भत्ता दिया जाता था। इसी मंडल से हमे लालबहादुर शास्त्री जैसे देशरत्न प्राप्त हुए ।

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हिंदी को राजभाषा का पद दिलाने वाले राजवि टंडन भी इस मंडल के सदस्य थे। इस मंडल के सदस्य लालाजी में पिता, माता, दार्शनिक, पथ-प्रदर्शक, मित्र और गुरु सभी का रूप पाते थे । स्वभावतः ही लालाजी द्वारा होने वाली इस प्रकार की राष्ट्रीय जागृति को भला सरकार क्यों कर चुपचाप सहन कर सकती थी। अतः 3 दिसम्बर, सन् 1921 ई० को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 18 मास की कैद तथा 500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई।

गिरफ्तार होने के समय आपने देश वासियों के नाम अपना एक संदेश इस प्रकार प्रकाशित कराया – “मैं अमेरिका से चलते समय खुद सोचता था कि मैं बहुत थोड़े समय तक ही जेल से बाहर रह सकूगा में अपनी गिरफ्तारी पर बहुत खुश हू क्योकि हमारा ध्येय पवित्र है। हमने जो कुछ किया है वह अपनी आत्मा एवं परमात्मा की इच्छानुकूल हो किया है।

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हमारा मार्ग ठीक है इसलिए मुझे विश्वास है कि हमें अपनी उद्देश्य सिद्धि में अवश्य सफलता मिलेगी। मुझे यह भी यकीन है कि मै बहुत जल्द वापस आकर आपकी खिदमत करूगा। लेकिन अगर ऐसा न भी हो तो भी मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि मुझे निहायत खुशी है कि खुद में अपने परमात्मा के सामने हाजिर हो जाऊगा ।”

इस कारावास से आप अवधि से पहले ही छोड़ दिए गए। गांधी जी की इच्छा थी कि अब लालाजी अपने आपको गिरफ्तारी से बचायें। यह वह समय था जब देश के वीर नवयुवक हंसते-हंसते स्वदेश सेवा के लिए जेल-यात्रा कर रहे थे। लालाजी जैसे नरकेसरी को सरकार भला किस प्रकार स्वतंत्र छोड़ सकती थी।

शीघ्र ही राजद्रोह के आरोप में आपको सख्त सजा देकर जेल भेज दिया गया। जेल जाने पर आपका स्वास्थ्य बिगड़ गया और आपके शरीर मे क्षय के लक्षण दिखाई देने लगे। उनको मुक्त करने के लिए देश-विदेश मे सब कही जोरों से पुकार उठाई गई। विवश होकर सरकार को 16 अगस्त, 1923 ई० को उन्हें रिहा करना पड़ा।

तब तक देश के राजनीतिक वायुमंडल ने कुछ और ही तरह का रंग दिखाना शुरू कर दिया था। एक तरफ गांधी जी जेल के सीखचों की आड़ मे बद थे, दूसरी तरफ देशबंधु दास और पं० मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में कौंसिल-प्रवेश के पक्ष में एक शक्तिशाली मोर्चा तैयार हो रहा था। असहयोग के समय के हिंदू मुस्लिम ऐक्य संबंध बिखर रहे थे।

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लीग तथा शुद्धि के नारों के बढ़ते हुए स्वर के साथ देश के राजनीतिक आंगन में साम्प्रदायिकता का भी रग चढ़ता जा रहा था। इस परिवर्तित वातावरण का प्रभाव लालाजी पर पड़े बिना न रह सका। वह जहा कौसिलों पर धावा करने के लिए कटिबद्ध हुए, वहां युग की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप उन्ही दिनों ‘मुस्लिम लीग’ की तरह ‘हिंदू महासभा’ के नाम से एक संस्था को स्थापित करने में उन्होंने योग दिया।

सन् 1925 मे आपने कलकत्ता हिंदू महासभा का अध्यक्ष पद सुशोभित किया। आपने बड़ी गंभीर स्थिति में हिंदुओं को संमार्ग दिखाया। सारी शक्ति हिंदू संगठन की ओर झुका देने पर भी लालाजी देशहित को न भूल सके। हिंदू मुस्लिम ऐक्य के लिए उन्होंने सदैव सहयोग का हाथ बढ़ाये रखा।

मुसलमानी नेताओं की भांति अपनी जाति का कार्य हाथ में लेकर वे अपने मुख्य ध्येय “स्वराज्य प्राप्ति” को एक क्षण भी न भूले। यह आप ही का पुरुषार्थ था कि हिंदू महासभा साप्रदायिक संस्था होते हुए भी सदैव राष्ट्रहित को पोषिका बनी रही। सांप्रदायिकता के रंग मे रंगे हुए कुछ हिंदू समावादी महासभा की इस नीति से असंतुष्ट भी थे।

Lala Lajpat Rai – लाला लाजपतराय

ऐसे लोगों के समाधान के लिए लालाजी ने कहा “हिंदू नेताओं ने स्वराज्य के आंदोलन को विकसित रूप देने के लिए अबतक जो कुछ किया है उस पर मुझे तनिक भी दुःख नहीं है। मुझे आशा है कि भावी इतिहासकार उन नेताओं को ऐसे आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रशंसा करेंगे। हमें यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि कोई भी जीवित राष्ट्र राजनीति की उपेक्षा नहीं कर सकता।

राजनीति संघटित जीवन का प्राण है और सामाजिक उन्नति और राष्ट्रीय समृद्धि के लिए उचित ढंग की राजनीति के कार्यकलाप नितांत आवश्यक है। राजनीति के कार्यकलाप दो प्रकार के है सरकार विरोधी और सरकार के पक्ष में केवल विरोध करने के उद्देश्य से सरकार का विरोध करना मूर्खता होगी।

साथ ही व्यक्तिगत या जातिगत हितो के लिए सरकार की सहायता करना भी कम मूर्खता न होगी। अबतक हिन्दुओ ने राष्ट्रीय नीति बर्ती है और मैं समझता हूं कि उन्हें इस नीति पर दृढ़ रहना चाहिए। यदि वे राष्ट्रीयता का स्थान सांप्रदायिकता को देंगे तो उनके लिए इससे बडे कलंक की दूसरी बात न होगी।”

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अंग्रेज सरकार ने अपनी तथाकथित सुधार योजना का परिणाम परखने के लिए साइमन कमीशन की नियुक्ति की थी। यह आयोग भारतीय शासन प्रबंध संबंधी क्षमता का मूल्यांकन एवं स्वायत्त शासन संबंधी संभावनाओं के बारे में भी स्थिति का कथित अध्ययन कर रहा था। सरकार के ढोग से क्षुब्ध भारतीय जनता इस नाटक से और भी उत्तेजित हो उठी। जहां-जहां भी यह कमीशन पहुंचा, इसके विरोध में प्रचंड प्रदर्शन और हडतालें हुई ।

जनता इस ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ वाले कमीशन के विरोध में काले झंडो का जुलूस निकालकर कमीशन के प्रति अपना विरोध प्रकट करना चाहती थीं। उधर कमीशन को बहिष्कार प्रदर्शन से बचाने के लिए पुलिस भी पूर्ण तैयारी में थी। नगर मे 144 की घोषणा हो चुकी थी मगर जनता जुलूस निकालने और सभा करने पर कटिबद्ध थी। लालाजी इटावा हिंदू सम्मेलन से उसी दिन लाहौर पहुंचे थे। उन्होंने भी जुलूस में सम्मिलित होने का विचार कर लिया।

30 अक्तूबर, 1928 को यह कमीशन लाहौर पहुंचा। लाहौर रेलवे स्टेशन के बाहर जनता का एक बड़ा समूह वंदेमातरम् की शब्दध्वनि कर रहा था। उस गूंज से चारों दिशाएं कांपने लगी। स्टेशन पर चारों ओर बाडा बंधा हुआ था जिसे पुलिस घेरे खडी थी। देशभक्त भारतीय जनता ने प्रतिबंधो को तोड़कर एक भव्य जुलूस निकाला। इसका नेतृत्व लाला लाजपतराय कर रहे थे।

Lala Lajpat Rai – लाला लाजपतराय

विरोध प्रदर्शन पूर्णतः अहिंसक था। पुलिस तो उपद्रव करने के लिए सदैव अवसर ढूढा करती है मगर लाहौर में तो बिना कोई अवसर पाये हुए ही शांत जुलूस पर लाठियां चलनी शुरू हो गईं। ब्रिटिश सरकार के दूत इसी अवसर की खोज मे थे कि अब अपने रास्ते के इस कांटे को हटायें। पुलिस ने निहत्थी भारतीय जनता पर खूब लाठिया बरसायी।

लालाजी के प्राण लेना इस समय को लाठियों का मुख्य उद्देश्य था। उन पर इतनी पाशविकता से लाठी चार्ज किया गया कि उनकी छाती पर गहरा घाव हो गया। पंजाब का यह शेर इस अपमानपूर्ण आघात से छटपटा कर रह गया। उसके सकेत पर पंजाब के नौजवान रक्त की नदियां बहा सकते थे। किंतु उसने तो अहिंसा का व्रत लिया हुआ था। उनका यही सदेश था कि किसी प्रकार का हिंसात्मक कदम न उठाया जाये। उन्होंने गंभीर रूप से घायलावस्था में भी विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा

“में इस मंच पर खड़ा होकर यह घोषणा करता हूं कि आज हम पर जो वार हुआ है, वह अंग्रेजी साम्राज्य का अंत निकट आ जाने की सूचना देता है। जिस किसी ने पुलिस के इस क्रूर कर्म को देखा है वह उसे कभी नहीं भूल सकता। वह दृश्य हमे बुरी तरह अंतहित हो गया है। हमें इस कायरतापूर्ण आक्रमण का बदला चुकाना है। बदला चुकाने से मेरा मतलब खून-खराबा करना नही बल्कि स्वाधीनता प्राप्त करना है में सरकार को चेतावनी देना चाहता हूं कि अगर इस देश मे रक्तरंजित क्राति हो गई तो उसकी जिम्मेदारी आज का दुष्कर्म करने वाले गोरे अफसरों पर हो होगी। हमारा ध्येय तो यही है कि हम स्वराज्य का युद्ध शांतिपूर्ण एवं अहिंसात्मक ढंग से ही लड़ें लेकिन अगर सरकार और सरकारी अफसरो के यही ढंग रहे और इसके जवाब में हमारे नौजवानों ने हमारे कहने को परवाह न करके यह निश्चय कर लिया कि अपने मुल्क को आजादी हासिल करने के लिए जो कुछ भी करना पड़े वह सब ठीक है तो उसमें कोई आश्चर्य की बात न होगी। मैं नहीं जानता कि मैं उस दिन को देखने के लिए जीता रहूंगा या तब तक मर जाऊंगा। लेकिन चाहे मैं जीता रहूं या मर जाऊं, और मेरे देश के नौजवानों को लाचार होकर उस दिन का सामना करना ही पड़ेगा तो मेरी आत्मा उन्हें युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए आशीर्वाद देगी।”

Lala Lajpat Rai – लाला लाजपतराय

वे अपनी मृत्यु से पूर्व करारी चोटों से कराहते हुए कहा करते थे – “मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के कफन में कील सिद्ध होगी।” इस चोट ने अंततः भारत के इस भीष्म महारथी को भारतीयों से सदैव के लिए पृथक कर दिया। 17 नवंबर, 1928 को उनका स्वर्गवास हो गया।

63 वर्ष तक भारतमाता की अमूल्य सेवा करते हुए स्वतंत्रता की बलिवेदी पर आहुति देकर वो शहीद हो गये। वस्तुत: ऐसे कर्मठ, तपस्वी, देशभक्त महापुरुष शताब्दियों में एकाध होते है। उनका नाम राष्ट्र निर्माताओं में सदा जगमगाता रहेगा।

Shetkaryancha Asud

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