Lala Hardayal – लाला हरदयाल

Lala-HardayalLala Hardayal

जन्म – महान क्रांतिकारी और गदर पार्टी के संस्थापक लाला हरदयाल का जन्म 14 अक्तूबर, 1884 को दिल्ली के एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री गौरीदयाल माथुर दिल्ली की एक जिला कचहरी में रीडर थे। वे उर्दू और फारसी के अच्छे ज्ञाता थे। माता श्रीमती भोरी एक धार्मिक विचारों की गृहिणी थीं।

Lala Hardayal – लाला हरदयाल

पढ़ाई – जब बालक हरदयाल चार वर्ष के हुए तो उन्हें कैंब्रिज मिशन के प्राइमरी स्कूल में दाखिल कराया गया। वे मन लगाकर पढ़ाई करने लगे। उनकी प्रतिभा की झलक बचपन से ही दिखाई देने लगी थी। उनकी स्मरणशक्ति तो गजब की थी। अपनी प्रतिभा के बल पर वे हर कक्षा में प्रथम स्थान पाते गए। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए हरदयाल का दाखिला दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज में कराया गया।

कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे अपनी पाठ्य-पुस्तकों के अलावा ‘श्रीमद्भगवद्गीता’, ‘मनुस्मृति’, ‘ऋग्वेद’ आदि धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन भी करने लगे। माता के धार्मिक संस्कारों और पिता की विद्वत्ता का हरदयाल पर अच्छा प्रभाव पड़ा था। हरदयाल के हृदय में गरीबों के प्रति बड़ी सहानुभूति थी। एक बार हरदयाल सुबह की सैर से लौटकर घर की ओर आ रहे थे। सर्दियों के दिन थे।

एक भिखारी रास्ते में बैठा हुआ सर्दी से ठिठुर रहा था। हरदयाल को देखकर उसने अपना हाथ उनकी ओर बढ़ा दिया। भिखारी के काँपते हुए शरीर को देखकर हरदयाल के मन में दया उमड़ पड़ी। उन्होंने अपना नया ऊनी कोट उतारकर उस भिखारी को दे दिया। सेंट स्टीफन कॉलेज से इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद हरदयाल ने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में दाखिला ले लिया।  उनकी अद्भुत स्मरणशक्ति से प्रभावित होकर थोड़े ही दिनों में सभी अध्यापक और विद्यार्थी उनका आदर करने लगे।

Lala Hardayal – लाला हरदयाल

कॉलेज के विद्यार्थियों में यह बात जोरों से फैल गई कि हरदयाल में चामत्कारिक प्रतिभा है। वह जिस किसी पुस्तक को एक बार पढ़ या सुन लेते हैं, वह उन्हें पूरी तरह याद हो जाती है। उस समय विद्यार्थी और अध्यापक, दोनों ही उनकी इस चामत्कारिक प्रतिभा से विस्मित थे। सन् 1903 में अंग्रेजी साहित्य से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद हरदयाल ने अगले ही वर्ष इतिहास विषय से भी एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। इन दोनों परीक्षाओं में हरदयाल ने जितने अंक प्राप्त किए थे, उतने पहले कभी किसी विद्यार्थी ने नहीं प्राप्त किए थे।

उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए –  पंजाब विश्वविद्यालय और भारत सरकार ने हरदयाल की प्रतिभा को सम्मानित करते हुए उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजने का कार्यक्रम बनाया। इसके लिए उन्हें भारत सरकार की ओर से छात्रवृत्ति मिलने लगी। इंग्लैंड जाने के कुछ समय पहले ही हरदयाल का विवाह सुंदर रानी नामक कन्या से हो गया। विवाह के बाद वे अपनी पत्नी, माता-पिता और अन्य लोगों से विदा लेकर इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए। हरदयाल ने ऑक्सफोर्ड के सेंट जॉन्स कॉलेज में दाखिला लिया।

वे इतिहास विषय में ऑनर्स की पढ़ाई करने लगे। वहाँ भी अपनी विलक्षण प्रतिभा से हरदयाल थोड़े ही दिनों में अपने अध्यापकों के कृपापात्र बन गए। इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान हरदयाल बड़ी सादगी से जीवन व्यतीत करते थे। हमेशा कम-से-कम खर्च में वे अपना काम चलाने की कोशिश करते थे। हरदयाल जिन दिनों ऑक्सफोर्ड में पढ़ रहे थे, उन्हीं दिनों दादा भाई नौरोजी इंग्लैंड में इंडियन एसोसिएशन’ नामक एक संस्था चला रहे थे। इंग्लैंड में पढ़नेवाले भारतीय विद्यार्थी एसोसिएशन की बैठकों में भाग लिया करते थे।

Click on below links to read more | अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

More Hindi Blogs

History in Hindi Articles

Rash Behari Bose – रास बिहारी बोस

छात्रवृत्ति छोड़ दी – सन् 1905-06 में ‘स्वदेशी आंदोलन के दिनों में जब लाला हरदयाल अंग्रेजों के अत्याचारों का समाचार इंग्लैंड में पढ़ते थे तो उनका खून खौल उठता था। उन्हीं दिनों लाला लाजपतराय और सरदार अजीत सिंह के देश से निष्कासन का समाचार सुनकर वे आक्रोश से भर उठे। उन्हें अंग्रेज और अंग्रेजी शासन से पूरी तरह घृणा हो गई।

उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और अंग्रेजी सरकार द्वारा दी जानेवाली छात्रवृत्ति भी लेने से इनकार कर दिया। उनकी प्रतिभा व योग्यता से प्रभावित उनके अंग्रेज मित्रों ने समझाया, ” छात्रवृत्ति भले न लो, मगर अपनी पढ़ाई मत छोड़ो। तुम्हारी पढ़ाई का सारा खर्च हम उठाएँगे।” लेकिन हरदयाल अपने इरादे पर अटल रहे।

उन दिनों लंदन में श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा स्थापित ‘इंडिया हाउस’ भारत के क्रांतिकारियों का अड्डा था। भाई परमानंद और वीर सावरकर जैसे क्रांतिकारी वहाँ आकर परस्पर मिला करते थे। 10 मई, 1907 को यहाँ ‘1857 का गदर दिवस’ मनाया गया, जिसमें भारत का झंडा भी फहराया गया था। उसमें लाला हरदयाल भी शामिल थे। धीरे-धीरे उनके मन में अंग्रेजी शासन के प्रति घृणा और स्वदेश के प्रति प्रेम बढ़ने लगा। अब वे क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे।

Lala Hardayal – लाला हरदयाल

जब ‘इंडिया हाउस’ में लाला हरदयाल की भेंट सावरकर से हुई, तभी दोनों एक-दूसरे के विचारों से प्रभावित हो गए थे। धीरे-धीरे उनमें घनिष्ठता बढ़ती गई और क्रांतिकारी आंदोलन के लिए एक नया युग आ गया। लाला हरदयाल ने जब से छात्रवृत्ति ठुकराई थी, तब से सरकार द्वारा उन पर कड़ी नजर रखी जा रही थी। अंग्रेज गुप्तचरों को इंडिया हाउस के सदस्यों की गतिविधियों की भनक लग चुकी थी, इसलिए इंडिया हाउस के चारों ओर कड़ा पहरा रखा जाता था। और वहाँ आने-जानेवालों पर कड़ी नजर रखी जा रही थी।

छात्रवृत्ति ठुकराने के कारण अब हरदयाल के सामने आर्थिक कठिनाइयाँ भी आने लगीं। अपनी जीविका के लिए वे पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखने लगे। उन्हें आर्थिक कठिनाई में पाकर श्यामजी कृष्ण वर्मा ने उनके लिए इस शर्त के साथ 1,000 रुपए मासिक की व्यवस्था कर दी कि वे ऑक्सफोर्ड छोड़कर इंडिया हाउस में आकर रहें, लेकिन लाला हरदयाल को यह बात जँची नहीं और वे भारत लौट आए।

भारतमाता की सेवा में स्वयं को समर्पित – यहाँ वे पूना में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से मिले। तिलक की सलाह पर उन्होंने लाहौर में अपने कुछ साथियों को लेकर एक आश्रम की स्थापना की । विवाह के बाद लालाजी भारत आकर कुछ समय के लिए अपनी पत्नी को इंग्लैंड ले गए थे। स्वदेश वापसी के समय पत्नी को उनके पिता के पास छोड़कर वे इस ओर से निश्चित हो गए और फिर अपने देशसेवा के काम को पूरी तरह समर्पित हो गए।

Lala Hardayal – लाला हरदयाल

उनकी पत्नी उस समय गर्भवती थीं। बाद में उन्होंने एक पुत्री को जन्म दिया। उसके बाद लालाजी अपनी पत्नी से कभी नहीं मिल पाए। देशसेवा का व्रत लेने के बाद तो वे अपनी माता से भी नहीं मिल पाए थे, जो सालोसाल अपने बेटे से मिलने के लिए तरसती रहीं। मोहमाया के सारे बंधनों को तोड़कर लालाजी भारतमाता की सेवा में स्वयं को समर्पित कर चुके थे।

लाहौर में आश्रम की स्थापना करने से पहले लालाजी को आर्य समाज में काम करने का प्रस्ताव मिल रहा था। इसके अलावा गोपाल कृष्ण गोखले भी लाहौर जाकर उनसे मिले थे और उनके सामने ‘सवेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी से जुड़ने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन लालाजी ने दोनों प्रस्ताव यह कहकर अस्वीकार कर दिए, “मैंने राष्ट्रसेवा का व्रत लिया है, किसी धार्मिक या सामाजिक संस्था में काम करने का नहीं।”

लाला हरदयाल के रहन-सहन, उनकी ओजस्वी वाणी और लाहौर के ‘मॉडर्न रिव्यू’ में उनके नियमित छपनेवाले लेखों से प्रभावित होकर अब उच्च कोटि के लेखक, विद्वान् और संपादक भी उनके पास आने लगे थे। इस प्रकार उनकी कीर्ति चारों ओर फैलने लगी थी। लालाजी के बढ़ते प्रभाव को देखकर अंग्रेज सरकार ने उन्हें उच्च पद पर नौकरी देने का लालच दिया; लेकिन वे तो भारतमाता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने का संकल्प ले चुके थे। उन्होंने अंग्रेज सरकार का प्रस्ताव ठुकरा दिया।

Lala Hardayal – लाला हरदयाल

मॉर्डन रिव्यू – सन् 1905 में बंगाल विभाजन के बाद पूरे देश में ‘स्वदेशी आंदोलन’ की लहर दौड़ चुकी थी। देश भर में स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की आँधी चल रही थी। उसके बाद सन् 1908 में खुदीराम बोस को फाँसी दी गई तो इससे लालाजी को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने ‘मॉडर्न रिव्यू’ में लेख लिखकर खुदीराम बोस की बहादुरी और देशभक्ति की प्रशंसा की। इसी दौरान अंग्रेज सरकार ने कई बंगाली युवकों को गिरफ्तार किया और उनमें से कुछ को फाँसी पर चढ़ा दिया।

उसके कुछ समय बाद लोकमान्य तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर उन्हें छह वर्ष की सजा सुना दी गई। इन सभी घटनाओं का विरोध करते हुए लाला हरदयाल समय-समय पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त किया करते थे। ‘मॉर्डन रिव्यू’ में लेख लिखकर वे अंग्रेज सरकार के अत्याचारों को भारतीय जनता के समक्ष प्रस्तुत कर रहे थे।

लालाजी के लेखों और भाषणों का भारतीय जनता पर गहरा प्रभाव पड़ने लगा। भारतीय जनता जागरूक होने लगी थी। लोग अंग्रेज सरकार के अत्याचारों का खुलकर विरोध करने के लिए सामने आने लगे थे। इससे अंग्रेज सरकार बौखला गई। वह लालाजी की गतिविधियों पर नजर रखने लगी और मौका मिलते ही उन्हें गिरफ्तार करने की योजना बनाने लगी।

Lala Hardayal – लाला हरदयाल

एक दिन लाला लाजपतराय ने लाला हरदयाल को अपने पास बुलाकर कहा, “आपको शीघ्र ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा। मेरी राय है कि आप हिंदुस्तान से बाहर चले जाएँ।” लाला हरदयाल गिरफ्तारी या सजा से नहीं डरते थे। वह जिस काम में लगे थे, उसके परिणाम के बारे में वे भलीभाँति जानते थे। उन्हें मालूम था कि सरकार एक-न-एक दिन उन्हें गिरफ्तार अवश्य करेगी।

उसके बाद उन्हें या तो जेल होगी या फाँसी अथवा देश निकाला दे दिया जाएगा; लेकिन अभी वे देश के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे। अंततः वे हिंदुस्तान छोड़कर विदेश जाने और वहाँ से भारतमाता को आजाद कराने का प्रयास करने की योजना बनाने लगे। हिंदुस्तान छोड़कर जाने में लालाजी के सामने एक कठिनाई यह आ रही थी कि उनके आश्रम के विद्यार्थी कहाँ जाएँगे और क्या करेंगे?

काफी सोच-विचार करने के बाद उन्होंने अपने आश्रम के विद्यार्थियों को मास्टर अमीरचंद को सौंपने का निर्णय किया। मास्टर अमीरचंद एक योग्य शिक्षक और बहुत बड़े क्रांतिकारी भी थे। वे लालाजी का बहुत सम्मान करते थे। अपने विद्यार्थियों की ओर से निश्चित होने के बाद लालाजी ने हिंदुस्तान छोड़ दिया। पहले वे कोलंबो गए, फिर इटली और उसके बाद पेरिस जा पहुँचे।

Lala Hardayal – लाला हरदयाल

पेरिस में उन्होंने श्यामजी कृष्ण वर्मा आदि देशभक्तों से मुलाकात की। वहाँ पहुँचने के बाद लाला हरदयाल के पास धन की बात तो दूर, पर्याप्त वस्त्र तक नहीं थे और श्यामजी कृष्ण वर्मा की शर्तों पर उनसे कुछ सहायता लेने से वे पहले ही इनकार कर चुके थे। वहीं कुछ दिनों तक रहकर लालाजी लंदन चले गए। उसके बाद ऑक्सफोर्ड के अपने कुछ शिष्यों से मिलने के लिए वे ऑक्सफोर्ड चले गए।

वंदे मातरम् समाचार पत्र – उन्हीं दिनों मैडम कामा आदि क्रांतिकारियों ने पेरिस में ‘वंदे मातरम्’ समाचार पत्र प्रकाशित करने का निश्चय किया। इसके लिए उन्हें एक योग्य संपादक की तलाश थी। मैडम कामा ने इस काम के लिए लाला हरदयाल को ऑक्सफोर्ड से पेरिस बुलवा लिया। लालाजी लंदन से पेरिस आ गए और वहीं रहकर ‘वंदे मातरम्’ का संपादन करने लगे। लाला हरदयाल ‘वंदे मातरम्’ का संपादन करने के साथ-साथ उसमें अपने लेख भी लिखा करते थे।

अपने संपादन काल में उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ में कई ऐसे लेख छापे थे, जो अंग्रेजों के लिए जहर के घूँट की तरह कड़वे थे। लालाजी के इस कार्य से अंग्रेज बहुत चिढ़े हुए थे। वे उनकी सारी गतिविधियों पर बराबर नजर रख रहे थे। अंततः लालाजी ने पेरिस छोड़ देने का निश्चय कर लिया। पेरिस छोड़कर लालाजी यूरोप के अन्य देशों में घूमने लगे। कहीं व्याख्यान देकर, कहीं पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखकर वे अपनी जीविका कम-से-कम खर्च में चलाने लगे।

Lala Hardayal – लाला हरदयाल

भाई परमानंद भेंट –  कुछ समय बाद लालाजी की इच्छा शांत वातावरण में रहने की हुई। वे लामार्टिन द्वीप में जाकर रहने लगे। वहाँ कम खर्च में जीवन व्यतीत किया जा सकत था। इसके अलावा वहाँ का जीवन अत्यंत शांतिमय था। जिन दिनों लाला हरदयाल लामार्टिन में एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे थे, उन्हीं दिनों भाई परमानंद भी लामार्टिन में ही रह रहे थे। एक दिन संयोग से उनकी मुलाकात लालाजी से हो गई।

उनके सुझाव पर लालाजी होनोलूलू चले गए। बाद में भाई परमानंद कैलिफोर्निया चले गए। फिर उन्होंने लालाजी को अपने पास ही बुला लिया। वहाँ उन दोनों ने मिलकर एक योजना बनाई। उस योजना के अनुसार, भारत से कुछ विद्यार्थियों को बुलाकर उन्हें प्रशिक्षित करने का निश्चय किया गया। यह भी निश्चय किया गया कि वे विद्यार्थी प्रशिक्षित होने के बाद भारत लौट जाएँगे और देशसेवा में अपना जीवन व्यतीत करेंगे।

कैलिफोर्निया में बहुत से पंजाबी सिख भी रहते थे। लाला हरदयाल और भाई परमानंद ने सबसे पहले उन्हें संगठित किया। इस संगठन के माध्यम से कुछ पैसा एकत्र किया गया और उसके बाद भारतीय विद्यार्थियों को कैलिफोर्निया बुलवाने की व्यवस्था की गई। लालाजी अपने भाषणों के द्वारा प्रचार करते थे और साथ ही अमेरिकी अखबारों में लेख भी लिखा करते थे।

Lala Hardayal – लाला हरदयाल

उनके लेख या तो भारतीय धर्म और दर्शन पर होते थे या भारत की आजादी पर अपने उच्च कोटि के लेखों के कारण वे अमेरिका में बहुत चर्चित हो गए। लालाजी की वाणी में अद्भुत सम्मोहन था। उनका एक-एक शब्द अपने देश भारत की गौरवगाथा प्रस्तुत करता हुआ तथा भारतीयों की स्वतंत्रता का आह्वान करता हुआ होता था।

लालाजी की विद्वत्ता के कारण उन्हें स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर रख लिया गया। लालाजी वहाँ भारतीय संस्कृति पढ़ाते थे। इस कार्य के लिए वे कोई वेतन नहीं लेते थे। प्रोफेसर के पद पर रहते हुए भी वे एक छोटे से कमरे में रहते थे। उनके शरीर पर मामूली कपड़े होते थे और वे सादा भोजन करके जमीन पर ही सोते थे। लालाजी की गतिविधियों की खबर अंग्रेज सरकार तक पहुँच रही थी।

अमेरिका में उनके प्रशंसकों की बढ़ती संख्या से अंग्रेज सरकार अत्यंत चिंतित हो उठी। उसके गुप्तचर बराबर लालाजी की गतिविधियों पर नजर रखे हुए थे। स्टील नाम के एक गुप्तचर ने लालाजी के संबंध में एक रिपोर्ट तैयार करके अंग्रेज सरकार के पास भेजी। रिपोर्ट में लिखा था-‘लाला हरदयाल अराजकता और विप्लव को बढ़ावा दे रहे हैं। वह अमेरिकी जनता में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध और भारत की आजादी के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं।’

Lala Hardayal – लाला हरदयाल

लाला हरदयाल ने अपने सुखों और अभिलाषाओं की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। इसका एकमात्र कारण था- हिंदुस्तान की दासता और गरीबी उनकी दृष्टि जब भारत के मानचित्र पर पड़ती तो उन्हें कोटि-कोटि भारतवासी नंगे और भूखे दिखाई पड़ते। वह विकल हो उठते और अपने आपको भूल जाते।

एक बार सेनफ्रांसिस्को की एक बड़ी सभा में लालाजी अपना भाषण दे रहे थे। भाषण समाप्त होने के बाद जब वे चलने लगे तो उनके सामने एक भारतीय मुसलमान उपस्थित हुआ। उसने लालाजी से कहा, “आपके कपड़े बहुत गंदे हैं, आपके योग्य नहीं हैं। मैं आपके लिए नए कपड़े ला रहा हूँ। कृपया इन्हें उतारकर उन्हें पहन लीजिए।” . लालाजी ने उत्तर दिया, “मेरे देश के कोटि-कोटि मनुष्य गंदे और फटे कपड़े पहनते हैं। जब तक देश के सभी लोगों को पहनने के लिए अच्छे कपड़े नहीं मिलेंगे, मैं इसी तरह के गंदे और फटे कपड़े ही पहनूँगा।”

लालाजी की गिरप्तारी – सेनफ्रांसिस्को में रह रहे सिखों में प्राण फूंकने के लिए लालाजी ने ‘गदर’ नाम का एक पत्र निकाला। अमेरिका से देशी भाषा में निकलनेवाला यह पहला पत्र था। उसके हर अंक में अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किए जानेवाले अत्याचार और भारत की आजादी के लिए मर-मिटनेवाले वीर शहीदों के वृत्तांत प्रमुखता से छपते थे। अमेरिका और भारत के अलावा यह पत्र उन सभी देशों में जाता था, जहाँ प्रवासी भारतीय रहते थे।

Lala Hardayal – लाला हरदयाल

लालाजी ने सेनफ्रांसिस्को की एक पहाड़ी पर ‘युगांतर आश्रम’ नाम से एक आश्रम की स्थापना की। आश्रम में ही उन्होंने ‘गदर पार्टी’ का कार्यालय भी खोल लिया। बाद में अमेरिका और कनाडा के कई नगरों में उन्होंने इसकी शाखाएँ खोलीं। लालाजी की गतिविधियों से अंग्रेज सरकार बुरी तरह बौखला गई थी। वह उन्हें गिरफ्तार करने की योजना बनाने लगी, लेकिन अमेरिका सरकार की अनुमति के बिना वह ऐसा नहीं कर सकती थी।

अंततः वह अमेरिका सरकार की अनुमति प्राप्त करने में सफल हो गई। अनुमति मिलते ही लालाजी की गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया गया। उस समय लालाजी एक सभा में भाषण देने के बाद अपने निवास स्थान की ओर लौट रहे थे। अचानक एक पुलिस इंस्पेक्टर ने उनके सामने पहुँचकर उन्हें गिरफ्तारी का वारंट दिखाया। लालाजी से उसने कहा, “आपके नाम वारंट है, आप या तो अभी अमेरिका से बाहर चले जाएँ या जेल जाना स्वीकार करें।”

वारंट गैर-जमानती नहीं था। लालाजी के साथियों ने जमानत की रकम जमा कर उन्हें गिरफ्तारी से बचा लिया। बाद में उनके एक अमेरिकी वकील मित्र ने उनसे कहा, “अभी तो आप बच गए हैं, मगर अपने आपको सुरक्षित मत समझिए। अंग्रेज सरकार आपको बाहर नहीं रहने देगी। शायद जल्दी ही अमेरिका को आपको उसे सौंपने पर विवश हो जाना पड़े, इसलिए अच्छा हो कि आप स्विट्जरलैंड चले जाएँ।”

Lala Hardayal – लाला हरदयाल

मृत्यु – लालाजी अपनी गिरफ्तारी या मृत्यु से नहीं डरते थे, परंतु वे अंग्रेजों के हाथों में पड़ना नहीं चाहते थे। देश की आजादी के लिए वे जीवित रहना चाहते थे। अतः वे अमेरिका से स्विट्जरलैंड चले गए। पहले विश्वयुद्ध के दौरान जब अंग्रेज युद्ध में फँस गए तो क्रांतिकारियों ने भारत में व भारत से बाहर अपनी गतिविधियाँ तेज कर दीं। लालाजी भी वहाँ से जर्मनी की राजधानी बर्लिन जा पहुँचे।

जर्मनी में उन्हें अच्छा सम्मान दिया गया और भारत की आजादी के लिए हरसंभव सहायता देने का आश्वासन भी मिला। कुछ समय तक वहाँ रहने के बाद वे स्वीडन चले गए। 4 मार्च, 1939 को भारत सरकार से अनुमति पत्र प्राप्त करके लालाजी जब भारत लौटने की तैयारी कर रहे थे तभी फिलाडेल्फिया में अचानक उनका निधन हो गया। वे अपनी कुरसी पर बैठे-बैठे समाधि लीन हो गए।

Chhava

Leave a Comment