Kittur Rani Chennamma – कित्तूर रानी चेन्नम्मा

 

Kittur-Rani-Chennamma

Kittur Rani Chennamma

रानी चेन्नम्मा एक सशक्त, निर्भीक तथा कुशल शासिका थीं। उन्होंने दक्षिण भारत के केलाड़ी नामक राज्य पर पच्चीस वर्षो तक शासन किया l केलाड़ी राज्य कर्नाटक के मालनद क्षेत्र मे स्थिर था l  इसके प्रथम शासक चौदप्पा नायक थे, जिन्होंने सन् 1500 में वहाँ के शासन का कार्यभार संभाला था। चौदप्पा नायक के बाद सन् 1645 में राजा शिवप्पा नायक केलाड़ी के शासक बने।

Kittur Rani Chennamma – कित्तूर रानी चेन्नम्मा

वे एक महान् शासक थे। उन्होंने अपने राज्य में अनेक प्रकार के सुधार किए। उनके बाद सन् 1664 में उनका छोटा पुत्र सोमशेखर नायक राजा बना। उस समय केलाड़ी राज्य गोवा से लेकर मलाबार तक फैला हुआ था। सोमशेखर नायक भी अपने पिता की भाँति एक महान् शासक सिद्ध हुआ। उसमें अनेक गुण थे। धर्म में उसकी गहरी आस्था थी।

रानी चेन्नम्मा का विवाह –  सोमशेखर नायक ने काफी उम्र बीत जाने तक भी विवाह नहीं किया। कई राजाओं के यहाँ से उसके पास प्रस्ताव आए और उसने कई सुंदर राजकुमारियों को देखा भी, परंतु उसे कोई भी पसंद नहीं आई। धर्म में उसकी रुचि तथा विवाह न करने की इच्छा को देखकर उसकी प्रजा को यह भय सताने लगा कि कहीं उनका राजा संन्यासी न बन जाए। एक दिन राजा सोमशेखर रामेश्वर का मेला देखने गए।

वहाँ उन्होंने कोटपुरा के सिदप्पा शेट्टी की सुंदर पुत्री चेन्नम्मा को देखा। चेन्नम्मा की सुंदरता और उसके गुणों से वे अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने संकल्प किया कि यदि वह विवाह करेंगे तो इसी लड़की से दूसरे दिन सोमशेखर ने अपने महामंत्री को बुलवाकर उसे पूरी बात बताई। चेन्नम्मा की सुंदरता और उसके गुणों की प्रशंसा करते हुए वे कहे कि उन्होंने वेलम्मा से विवाह करने का निर्णय किया है।

Kittur Rani Chennamma – कित्तूर रानी चेन्नम्मा

इस संबंध में आप सिदप्पा शेट्टी से बात कीजिए। इस पर महामंत्री ने राजा को राज-परंपरा के बारे में बताते हुए कहा कि आज तक सभी राजाओं ने केवल राजपरिवार की राजकुमारियों से ही विवाह किया है, परंतु राजा सोमशेखर ने अपना निर्णय नहीं बदला राज-परंपरा की परवाह न करते हुए उन्होंने अपनी इच्छानुसार चेन्नम्मा से विवाह कर लिया। बिदनूर के एक भव्य राजमहल में राजकीय रीति-रिवाज के साथ उनका विवाह संपन्न हुआ।

विवाह के बाद नवदंपती ने कुलदेवता भगवान् रामेश्वर के मंदिर में जाकर पूजा अर्चना की और गरीबों में अन्न-धन वितरित किया। राजा सोमशेखर तथा रानी चेन्नम्मा का वैवाहिक जीवन आनंदपूर्वक व्यतीत होने लगा। दोनों एक-दूसरे को अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे। राजा सोमशेखर राज्य के सभी कार्यों के बारे में रानी चेन्नम्मा को बताते थे। कुशाग्र बुद्धि रानी चेन्नम्मा थोड़े ही समय में राजनीतिक गतिविधियों से अच्छी तरह परिचित हो गई। उन्होंने हथियार चलाने तथा संगीत में भी निपुणता हासिल कर ली।

प्रजा में लोकप्रिय – रानी चेन्नम्मा अपने राज्य की जनता तथा राजमहल के नौकरों के साथ अपने बच्चों की तरह व्यवहार करती थीं। वे राजा सोमशेखर की पत्नी ही नहीं, बल्कि एक कुशल सलाहकार भी थीं। वे राजकार्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर राजा को एक विश्वासपात्र तथा कुशल मंत्री की तरह सलाह देती थीं। वे अत्यंत न्यायप्रिय भी थीं।

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Rani Gaidinliu – रानी गाइडिन्ल्यू

राज्य के किसी व्यक्ति के साथ यदि कोई अन्याय होता तो वह रानी के पास अपनी समस्या लेकर जाता। रानी अपने पति महाराज से कहकर उस व्यक्ति को न्याय दिलाती थीं। इस बात से सारी प्रजा रानी को बहुत प्यार करने लगी। राजा तथा रानी, दोनों ही सभी धर्मों को एक समान मानते थे। उन्होंने केलाड़ी राज्य की कई धार्मिक संस्थाओं तथा मठों के लिए बड़े-बड़े भूखंड दान में दिए थे।

विजयनगर राजाओं के शासनकाल में ‘दशहरा’ राजकीय उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था। केलाड़ी के राजाओं ने इस परंपरा को जीवित रखा। इस उत्सव में भाग लेने के लिए देश के कोने-कोने से कलाकार केलाड़ी राज्य में एकत्र होते थे। नृत्य तथा संगीत के कार्यक्रमों के बाद राजा इन कलाकारों को बहुमूल्य उपहार दिया करते थे।

राजा सोमशेखर पथ से भटके – एक बार दशहरे के अवसर पर जंबूखंड की प्रसिद्ध नर्तकी कलावती ने राजा तथा रानी के सामने अपना नृत्य-कौशल दिखाया। राजा सोमशेखर उसका नृत्य देखकर बहुत खुश हुए और उन्होंने उसे बहुत सा धन उपहारस्वरूप दे दिया। कलावती के नृत्य-कौशल से प्रभावित होकर राजा सोमशेखर ने उसे राजनर्तकी नियुक्त कर दिया। कलावती की माँ तथा पालक पिता भी उसके साथ वहीं रहने लगे।

Kittur Rani Chennamma – कित्तूर रानी चेन्नम्मा

कलावती का पिता जादू तथा अनेक जड़ी-बूटियों का जानकार था। उस समय रानी चेन्नम्मा की कोई संतान न थी। इसका लाभ उठाकर कलावती के पिता ने राजा सोमशेखर से घनिष्ठ संबंध बना लिये। धीरे-धीरे राजा ने राजमहल से दूर कलावती के साथ ही रहना शुरू कर दिया। कलावती और उसके पिता को इसी अवसर की प्रतीक्षा थी।

कलावती के पिता ने राजा पर अपने जादू तथा जड़ी-बूटियों का प्रयोग करना शुरू कर दिया। उसके प्रभाव के कारण राजा सोमशेखर अर्धविक्षिप्त हो गए। धीरे-धीरे उन्हें कई तरह के रोगों ने घेर लिया। नौबत यहाँ तक आ गई कि मंत्री तथा बड़े-बड़े अधिकारियों तक को राजा से सलाह-मशविरा करने के लिए नर्तकी के घर जाना पड़ता था।

राजा की इस स्थिति के कारण रानी चेन्नम्मा को बहुत दुःख हुआ। जो राजा कुछ दिन पहले रानी को अपनी जान से ज्यादा प्यार करता था, वह अब राजमहल तक से दूर रहने लगा। रानी का बुरा हाल था। वह सदैव रोती रहती थीं। राजा के खराब स्वास्थ्य को खबर पूरे राज्य में जंगल की आग की तरह फैल गई। लोगों को चिंता होने लगी कि राजा को कोई संतान नहीं है। ऐसे में राजा की मृत्यु के बाद क्या होगा?

Kittur Rani Chennamma – कित्तूर रानी चेन्नम्मा

कठिन परिस्तिति में सुज़ह बजह से काम लिया – उधर, आस-पास के शासक राज्य को हथियाने की बात सोचने लगे। इस अवसर का लाभ उठाकर बीजापुर के सुलतान, जिसे केलाडी के राजाओं ने कई बार हराया था, ने राज्य पर आक्रमण कर दिया। रानी चेन्नम्मा ने साहस से काम लिया। उन्होंने केलाड़ी को इस विपत्ति काल से बचाने का संकल्प लिया। सभी मान-मर्यादाओं को तोड़कर वे राजा से मिलने नर्तकी के घर पहुँच गईं, लेकिन राजा की दशा देखकर उन्हें असहनीय दुःख हुआ।

राजा की हालत चिंताजनक देखकर उन्होंने राजा से कहा, “आप राजमहल चलिए। वहाँ चिकित्सक और वैद्य आपको बिलकुल ठीक कर देंगे। हमें अपने राज्य की रक्षा करनी चाहिए। इसके लिए हम किसी बालक को गोद ले लेंगे।” वे राजा के पैरों पर गिर गई. और महल वापस लौटने की विनती करने लगीं, लेकिन कलावती के पिता के जादू के प्रभाव के कारण राजा ने रानी की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया और रानी को वहाँ से अकेले ही लौटना पड़ा।

अब रानी चेन्नम्मा के सामने राज्य को बचाए रखने का केवल एक ही रास्ता बचा कि वे स्वयं हथियार उठाएँ। रानी ने ऐसा ही किया। उन्होंने अपने पिता से सलाह मशविरा किया और विश्वस्त सेना नायकों को अपने साथ करके स्वयं शासन की बागडोर सँभाल ली। उधर, कुछ विरोधी रानी चेन्नम्मा को एक साधारण महिला समझकर उन्हें धमकियाँ देने लगे।

Kittur Rani Chennamma – कित्तूर रानी चेन्नम्मा

एक दिन महामंत्री थिमन्ना नायक सबनिस कृष्णप्पा को साथ लेकर रानी के पास गया और बोला कि यदि आप मुख्य सेनापति भदरप्या नायक के पुत्र वीरभद्र नायक को अपने पुत्र के रूप में गोद लें तो हम आपका साथ देंगे, अन्यथा राज्य के लोगों को आपके विरुद्ध एकत्र करके हम वीरभद्र को राजा बना देंगे। इसी प्रकार की धमकियाँ रानी को कुछ अन्य मंत्रियों और अधिकारियों की ओर से भी मिलीं।

रानी चेन्नम्मा ने अपने विरोधियों की बात धैर्यपूर्वक सुनी। उनके सामने एक विकट स्थिति थी। एक ओर कलावती और उसके पिता ने राजा को अपने जाल में फैसा रखा था और राज्य को हड़पने की फिराक में थे, तो दूसरी ओर कई मंत्री तथा अन्य प्रतिष्ठित अधिकारी अपनी पसंद का राजा बनाने की जुगत लगा रहे थे। ऐसी स्थिति में रानी ने एक बालक को गोद लेने का फैसला किया, ताकि वह एक कुशल शासक बनाकर उसे राज्य की सत्ता सौंप सकें।

बीजापुर के सुलतान का आक्रमण –  उसी समय बीजापुर के सुलतान को पता चल गया कि केलाड़ी राज्य का राजा बीमार चल रहा है और वह राजकार्य देखने की स्थिति में नहीं है। उसने केलाड़ी राज्य को हड़पने का मन बना लिया। उसने सोचा कि जिस राज्य की सत्ता एक स्त्री के हाथ में हो, उसे जीतना कोई कठिन काम नहीं है। उसने अपने एक प्रतिनिधि जन्तो पंत को बातचीत करने के लिए रानी के पास भेजा। उसके ठीक पीछे उसने अपनी फौज को भी केलाड़ी के लिए रवाना कर दिया।

Kittur Rani Chennamma – कित्तूर रानी चेन्नम्मा

फौज का नेतृत्व उसने मुजफ्फर खान को सौंपा। जन्नो पंत ने रानी से मुलाकात की। इधर, रानी को अपने गुप्तचरों से सुलतान की मंशा का पता चल गया, परंतु रानी चेन्नम्मा उस समय युद्ध लड़ने की स्थिति में नहीं थीं। इसलिए उन्होंने जन्नो पंत को तीन लाख रुपए देकर सुलतान के साथ एक संधि कर ली परंतु उधर सुलतान की फौज केलाड़ी की ओर बढ़ती ही जा रही थी।

यह देखकर रानी चिंतित हो उठीं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने अपनी प्रजा को संबोधित करते हुए कहा, “हे कन्नड़ भूमि के नायको! आप लोग महान् योद्धा हैं। आज इस राज्य का भविष्य आपके हाथों में है। याद रखिए, विजय हमें हमारा राज्य देगी और मृत्यु हमें स्वर्ग प्रदान करेगी। हमारे सामने कोई तीसरा विकल्प नहीं है। यदि आप विजयी होते हैं तो आपको योग्यतानुसार इनाम मिलेगा।”

इस प्रकार रानी ने अपनी प्रजा और सैनिकों का हौसला बढ़ाया तथा राजकोष से सभी बहुमूल्य जेवरात उन्हें दे दिए। अपनी रानी की वीरतापूर्ण बातें सुनकर प्रजा में नवचेतना का संचार हुआ और उन्होंने सैनिकों के साथ मिलकर हथियार उठा लिये। उधर, रानी से मिलने के बाद जन्नो पंत सीधा कलावती और उसके पिता के पास पहुँचा। उन्हें तरह-तरह का लालच देकर उसने राजा सोमशेखर को मरवा दिया।

Kittur Rani Chennamma – कित्तूर रानी चेन्नम्मा

जब रानी को अपने पति की मृत्यु का समाचार मिला तो वे दुःख के मारे बेहाल  हो गई, लेकिन उनके पास अपने पति की मृत्यु पर आंसू बहाने का समय नहीं था। ऐसी घोर विपत्ति के समय में उन्होंने मानो माँ दुर्गा का रूप धारण कर लिया और मन में अपने पति की हत्या का बदला लेने की ठान ली।

अब तक बीजापुर की सेना बिदनूर के किले पर अपना कब्जा जमा चुकी थी। कलावती के पिता ने सुलतान की सेना का भरपूर सहयोग किया। शत्रु की सेना विशाल थी। इसे देखते हुए सिदप्पा शेट्टी तथा राज्य के अन्य अधिकारियों ने रानी से कहा कि यद्यपि वे अपनी पूरी शक्ति के साथ लड़ रहे थे, तथापि इतनी बड़ी सेना पर विजय प्राप्त करना हमें संभव नहीं लग रहा था।

उन्होंने रानी को कुछ समय के लिए बिदनूर छोड़ने की सलाह दी। यह रानी के लिए बड़े दुःख की बात थी; परंतु इसके अलावा और कोई रास्ता भी तो नहीं था। अतः राजसिंहासन, राजकीय धन तथा अन्य मूल्यवान् वस्तुओं को घने जंगलों के बीच स्थित भुवनगिरि के किले में स्थानांतरित कर दिया गया।

Kittur Rani Chennamma – कित्तूर रानी चेन्नम्मा

जब शत्रु की सेना ने किले का द्वार तोड़कर राजमहल में प्रवेश किया तो पाया कि न तो वहाँ रानी थी और न ही धन-दौलत। यह देखकर वे बहुत निराश हुए। भुवनगिरि का किला बहुत सुरक्षित माना जाता था। रानी चेन्नम्मा के सभी सरदार तथा सैनिक उनके साथ वहीं थे। बिदनूर को शत्रु के हाथों में जाता देखकर रानी का महामंत्री थिमन्ना नायक, जो रानी से बच्चे को गोद लेने के मामले में मतभेदों के चलते छोड़कर चला गया, अब पुनः रानी के पास वापस आ गया और क्षमा माँगने लगा।

उसने रानी से फिर सेवा करने की अनुमति माँगी तो रानी ने उदारता का परिचय देते हुए उसे उसका पद दे दिया। अब राज्य के अन्य अनेक लोग भी रानी की सहायता के लिए भुवनगिरि आ गए और वे अपने राज्य तथा रानी के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करने के लिए तैयार थे। थिमन्ना नायक ने अन्य सरदारों तथा राज्य के सैनिकों को एकजुट किया और पुनः एक सेना को तैयार करके वह बिदनूर की ओर चल पड़ा।

उधर, सुलतान की सेना भी भुवनगिरि की ओर बढ़ती चली आ रही थी। घने जंगल के बीच एक संकीर्ण रास्ते में सुलतान के सैनिकों को रानी के सैनिकों ने घेर लिया। काफी देर के संघर्ष के बाद रानी के सैनिकों ने सुलतान के सैनिकों को मार भगाया और फिर से बिदनूर पर अपना अधिकार जमा लिया।

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अब केलाड़ी राज्य की जनता ने रानी को पूरी तरह अपनी शासिका मान लिया। सन् 1671 में भुवनगिरि के किले में रानी चेन्नम्मा का विधिवत् राज्याभिषेक कर दिया। गया। उसके बाद रानी ने राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले ली। युद्ध में लड़नेवाले सैनिकों, सरदारों और मंत्रियों को उन्होंने उचित पुरस्कार दिए। रानी चेन्नम्मा ने अपनी सूझ-बूझ और साहसपूर्ण प्रयासों से थोड़े ही दिनों में राज्य की स्थिति को पूर्ववत् बहाल कर लिया।

उन्होंने अपने पति के हत्यारे कलावती के पिता तथा जन्नी पंत को गिरफ्तार करवा लिया और उन्हें मौत की सजा सुना दी। उसके बाद उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में राज्य को हड़पने का प्रयत्न करनेवाले सभी लोगों को सजा दी और उन्हें राज्य से बाहर निकाल दिया। अब रानी कुशलतापूर्वक राज्य का शासन चलाने लगीं। वे अपनी प्रजा के दुःख-सुख का सदैव ध्यान रखती थीं। प्रजा भी उन्हें पहले से अधिक प्यार तथा सम्मान देने लगी।

मैसूर के राजा का आक्रमण –  रानी चेन्नम्मा के शासनकाल में केलाड़ी राजवंश के ही एक व्यक्ति, जिसका नाम अंधक वेंकट नायक था, ने मैसूर के राजा से मिलकर रानी के खिलाफ युद्ध की तैयारी शुरू कर दी। मैसूर के राजा ने रानी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। ऐसी परिस्थिति में रानी ने साहस और सूझ-बूझ से काम लिया। उन्होंने भदरप्पा नायक के नेतृत्व में एक से विशाल सेना शत्रु से लड़ने के लिए भेज दी।

Kittur Rani Chennamma – कित्तूर रानी चेन्नम्मा

ठीक उसी समय सोडे, सिरसी तथा बनवासी के सरदारों ने भी रानी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी; परंतु रानी ने साहस का परिचय दिया और सभी को बड़ी सरलता से पराजित कर दिया। अगले वर्ष मैसूर की सेना ने केलाड़ी पर पुनः आक्रमण करके उसे पराजित कर दिया। कुछ समय बाद रानी की सेना ने मैसूर की सेना को पुनः पराजित कर दिया और उनके कई सरदारों को बंदी बना लिया, लेकिन रानी ने बंदियों के साथ अच्छा व्यवहार किया और कुछ समय बाद उन्हें छोड़ दिया।

रानी की इस उदारता को देखकर मैसूर के राजा ने रानी के साथ संधि कर ली। रानी चेन्नम्मा ने बसप्पा नायक को गोद ले लिया था। उनके बाद बसप्पा नायक को ही केलाड़ी का शासक बनना था। अतः रानी ने उसकी शिक्षा तथा लालन पालन का विशेष ध्यान दिया। वे बसप्पा नायक को एक कुशल तथा पराक्रमी शासक बनाना चाहती थीं। अतः उसके मन में राज्य के उत्तरदायित्वों के प्रति रुचि जगाने के लिए अपने मंत्रियों से विचार-विमर्श के समय उसे अपने पास बैठाए रखती थीं और आवश्यकता पड़ने पर उससे भी सलाह लेती थीं।

राजाराम महाराज की मदद – रानी चेन्नम्मा प्रतिदिन स्नान-ध्यान करने के बाद राजदरबार में जाती थीं और वहाँ दोपहर तक रहती थीं। वहाँ वे अपनी प्रजा के कष्टों को ध्यान से सुनतीं तथा उनका उचित समाधान करती थीं। दोपहर के पूजा-पाठ से निवृत्त होकर वे एक घंटे तक गरीबों तथा साधु-संन्यासियों को दान दिया करती थीं। एक दिन दोपहर में जब रानी दान दे रही थीं तो चार भिक्षु उनके पास आए और चुपचाप खड़े रहे। जब रानी ने सभी को दान दे दिया, तब उन भिक्षुओं के प्रमुख ने रानी का अभिवादन किया।

Kittur Rani Chennamma – कित्तूर रानी चेन्नम्मा

इस पर रानी ने उससे पूछा, “मैं आपकी क्या सेवा कर सकती हूँ ?” वह रानी के पास आया और बोला, “मैं भिक्षु नहीं हूँ। मैं छत्रपति शिवाजी महाराज का पुत्र राजाराम हूँ।” यह सुन जानकर रानी ने उन्हें आराम से बैठाया और उनकी बात ध्यानपूर्वक सुनी। उन्होंने रानी को बताया, “मेरे भाई संभाजी को औरंगजेब ने मरवा दिया है और अब उसने मुझे मारने के लिए एक बड़ी सेना भेजी है। उसकी सेना ने हमारे कई किलों पर कब्जा कर लिया है।

मुझे मरवा देने के बाद वह पूरे महाराष्ट्र को हड़प लेगा। मैं किसी प्रकार से छिपकर यहाँ तक पहुँचा हूँ। इससे पहले मैंने कई राजाओं से शरण माँगी, परंतु औरंगजेब के डर से किसी ने भी मुझे शरण देने की हिम्मत नहीं की।” राजाराम की बातें सुनकर रानी ने कहा, “केलाड़ी राज्य में आनेवाला कोई भी याचक आज तक निराश नहीं लौटा है। मैं तुम्हें भी निराश नहीं करूंगी। मैं तुम्हारी हर संभव सहायता करूंगी।” रानी ने अपने सभी दरबारियों से इस संबंध में विचार-विमर्श किया।

लगभग सभी ने औरंगजेब की शक्ति का हवाला देते हुए उन्हें राजाराम को केलाड़ी में शरण न देने की सलाह दी। अपने दरबारियों का कायरतापूर्ण जवाब सुनकर रानी चेनम्मा ने कहा, “केलाड़ी राजवंश की यह परंपरा रही है कि यहाँ शरण में आए हुए व्यक्ति की सदैव रक्षा की जाती है और फिर, राजाराम तो छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र है, जिन्होंने हिंदुत्व की रक्षा के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया। शरण में आए हुए व्यक्ति की रक्षा अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी हमें करनी चाहिए।”

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रानी के दत्तक पुत्र बसप्पा नायक ने भी रानी की बात का समर्थन किया। अब दरबार के अन्य पदाधिकारी भी रानी के आग्रह पर औरंगजेब से लोहा लेने के लिए तैयार हो गए। औरंगजेब को जब राजाराम के केलाड़ी राज्य में छिपे होने का पता चला तो उसने अपने पुत्र अजमथ आरा को एक बड़ी सेना लेकर केलाड़ी पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया, लेकिन तब तक राजाराम को सुरक्षित जिंजी के किले में पहुंचा दिया गया था। उधर, औरंगजेब ने रानी चेन्नम्मा के पास भेजे एक पत्र में लिखा था कि वे राजाराम को उसे सौंप दें, अन्यथा उन्हें मुगल सेना के आक्रमण का सामना करना पड़ेगा।

रानी ने बुद्धिमत्ता का परिचय दिया और अपने मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श करके औरंगजेब को जवाबी पत्र लिख दिया, जिसमें उन्होंने लिखा कि राजाराम इस राज्य में नहीं है। ऐसा सुनने में आया है कि वह इस राज्य से होकर गया है। उधर रानी ने युद्ध की भी पूरी तैयारी कर ली थी। जब तक रानी का जवाब औरंगजेब के पास पहुँचता और उसका संदेश उसकी सेना तक पहुँचता, तब तक रानी की सेना ने मुगल सेना के बहुत बड़े भाग को नष्ट कर दिया था और उनका बहुत सा सामान भी जब्त कर लिया था।

औरंगजेब का आदेश मिलने पर अजमथ आरा अपनी बची हुई सेना के साथ पीछे हट गया और जिंजी के किले की ओर बढ़ने लगा। इस सफलता से खुश होकर रानी ने अपने बहादुर सैनिकों को उचित पुरस्कार देकर उनका हौसला बढ़ाया। इस सहायता के लिए राजाराम ने एक पत्र द्वारा रानी का आभार प्रकट किया तथा उन्हें बधाई दी। उन्होंने रानी की दीर्घायु के लिए प्रार्थना भी की।

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अंतिम समय – रानी चेन्नम्मा ने अपने शासनकाल में अनेक सुधार किए और पुर्तगाल तथा अरब देशों के साथ व्यापार को बढ़ाया। उन्होंने अपनी सेना को शक्तिशाली बनाने के लिए अरब देशों से अच्छी नस्ल के घोड़े भी मँगवाए। उन्होंने बासवपट्टन के पास स्थित हुलीकर को भी अपने राज्य में मिला लिया तथा वहाँ के खंडहर बन गए किले का पुनर्निर्माण करवाकर अपने दत्तक पुत्र की माँ के नाम पर उसका नाम ‘चेन्नागिरि’ रख दिया।

जब रानी का दत्तक पुत्र बसप्पा नायक राज्य-भार सँभालने के योग्य गया तो रानी ने शासन की जिम्मेदारियाँ उसे सौंप दीं और स्वयं दूसरों की सेवा करने लगीं। उन्होंने एक सुंदर सा रथ बनवाकर भगवान् नीलकंठेश्वर मंदिर के लिए समर्पित कर दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई मंदिरों और अन्य धार्मिक संस्थाओं को भूमि दान में दी।

रानी चेन्नम्मा ने सन् 1671 से लेकर 1696 तक बड़ी कुशलतापूर्वक शासन किया। उनका संपूर्ण जीवन महान् आदर्शों से भरा हुआ था। जीवन के अंतिम समय में जब वे अपनी मृत्यु शय्या पर लेटी थीं तब उन्होंने अपने दत्तक पुत्र तथा केलाड़ी के राजा बसप्पा नायक को अपने पास बुलवाकर राज्य के विस्तार तथा राज्य और जनता की रक्षा करने का हरसंभव प्रयत्न करने का निर्देश दिया।

Kittur Rani Chennamma – कित्तूर रानी चेन्नम्मा

उन्होंने जीवन में महान् कार्य करने तथा गलत कार्यों से सदैव दूर रहने की सलाह उन्हें दी। अंततः सावन के पवित्र मास में इस महान् तथा कुशल रानी ने अपने प्राण त्याग दिए। बिदनूर के कोप्पालु मठ में उनकी समाधि बनाई गई। रानी चेन्नम्मा का नाम भारत तथा कर्नाटक के इतिहास के पन्नों में सदा के लिए स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।

Shetkaryancha Asud

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