Khan Abdul Ghaffar Khan – खान अब्दुल गफ्फार खान

Khan-Abdul-Ghaffar-KhanKhan Abdul Ghaffar Khan

खान अब्दुल गफ्फार खान अथवा सरहदी गांधी एक ऐसा व्यक्तित्व है I जिसे न केवल भारत को जनता बल्कि सारे संसार के विचारक व बुद्धिजीवी वर्ग श्रद्धा की दृष्टि से देखते है। उत्तर-पश्चिमी सीमाप्रात के लोगों ने अपने प्यारे नेता खान अब्दुल गफ्फार खान को ‘सरहदो गांधी’ नाम दिया है। खान अब्दुल गफ्फार खान के जीवन की कहानी एक उपन्यास की तरह बड़ी रोचक है। 1910 में मोहमंदजई कबीले के खानो के अमीर घराने में उनका जन्म हुआ।

Khan Abdul Ghaffar Khan – खान अब्दुल गफ्फार खान

उनके पिता खान बेहाम खान पेशावर जिले में चारसद्दा तहसील के उत्तमानजई गाव के प्रमुख खान थे। एडवर्ड मिशन हाईस्कूल में उनकी पढ़ाई हुई परंतु वे मँट्रिक भी पास न कर सके। उन्होंने घर पर ही रहना शुरू कर दिया। उनके बड़े भाई डा. खान साहब उच्च चिकित्सा के अध्ययन के लिए इंग्लैंड गये और पहले विश्वयुद्ध में फ्रांस में सेवा के बाद भारतीय मेडिकल सर्विस के सदस्य के रूप में घर लौटे।

अपनी मां से उन्होंने गहरी धार्मिक भावना और भक्ति पाई थी और अपने पिता से अहंसक वृत्ति | दोनों निरक्षर थे परंतु वे भौतिक दुनिया की अपेक्षा आध्यात्मिक दुनिया में अधिक रहते थे। खान साहब ने बताया कि, नमाज के बाद मेरी मां अवसर बिल्कुल शांत और स्तब्ध प्रार्थना में निमग्न बैठी रहती। पिता ने जिंदगी-भर मित्र तो बहुत बनाये पर शत्रु कोई नहीं I

बदला लेने को बात वह कभी नहीं सोचते थे और उनका कुछ ऐसा विश्वास था कि ठगे जाने में कोई अपमान नहीं है, ठगने मे जरूर है। खान साहब के पिता बहुत सच्चे और अपनी बात के पक्के थे। लोग उनके पास अपनी बचत जमा करवा जाते थे और रसीद कभी नही मागते थे। वे कभी भी अफसरों की खुशामद नही करते थे। बडे-बड़े अंग्रेज अफसर उन्हे ‘चाचा’ कहकर पुकारते थे और उन्हें सदा प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते थे।

Khan Abdul Ghaffar Khan – खान अब्दुल गफ्फार खान

6 अप्रैल, 1919 को उत्तमानजई में एक लाख से अधिक लोगों की सभा की गई, जिसमें अब्दुल गफ्फारखां भी शामिल हुए। यह सभा रोलट एक्ट के विरोध में थी। हस्तनगर के धान एक बडी मस्जिद में जमा हो गये और उन्होंने कहा कि वे उनके बादशाह है। असिस्टंट कमिश्नर सिपाही और तोप खाना लेकर आये और सारे गांव को घेर लिया। उन्होंने गांव वालों के हथियार छीन लिये और उन पर 64000 रु जुर्माना लगा दिया।

1920 मे नागपुर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। उसमे खान साहब ने भाग लिया और उस समय चल रहे खिलाफत आंदोलन में भी उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई। वे काफी संख्या में निर्वासित तिर्थयात्रियों के दल को काबुल लेकर गये। उन्होंने यह यात्रा खिलाफत के विरोध में की। उन्हें इस यात्रा में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। 1921 में ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें पकडकर जेल में डाल दिया। वे राष्ट्रीय शालाएं स्थापित करने के आरोप में पकड़े गये

इस बार उनको तीन साल तक सख्त क़द की सजा दी गई। उन्हें इस जेल जीवन में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पडा, जिससे उनका वजन कम हो गया। उनके शरीर को बहुत-सी बीमारियों ने घेर लिया परंतु वे अपने आदर्श पर डटे रहे। उन्होंने जेल के अधिकारियों से कोई रियायत नही मागी। उन्होंने जेल के अनुशासन का पालन किया। जेल मे उन्होंने भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन शुरू किया।

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Bahadur Shah Zafar – बहादुर शाह ज़फ़र

एक कांस्टेबल ने, जो रिश्वतखोरी के बिना अपना गुजारा नही कर सकता था, अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। जेल के अधिकारी डर गये और उन्होंने बादशाह खान को पंजाब में गुजरात की जेल में भेज दिया। वहा उन्हें दूसरे धर्मों के ग्रंथो को पढ़ने का भी मौका मिला। उन्होंने गीता, कुरान, ग्रंथ साहब का अध्ययन किया।

जनवरी 1931 में ‘गांधी-इरविन’ समझौता हुआ । उसके बाद बादशाह खान को जेल से मुक्त कर दिया गया। पठानों ने इस समझौते को अपनी जीत नही माना। परंतु अधिकाश अग्रेजी अफसर इसको अपनी हार समझते रहे और उसको कसर निकालना चाहते थे। इसलिए इस समझौते के खिलाफ कई घटनायें हुई और पठानो को भी चैन से नहीं बैठने दिया गया।

15 साल तक बादशाह खान अग्रेजो से लड़ते रहे परंतु उनके दिल मे अग्रेजी के प्रति कोई द्वेष नही था। 1931 के ‘गांधी- इरविन’ समझौते के समय उनकी भेंट राबर्ट बनेंस से हुई। उससे उन्होंने कहा, “अग्रेजों ने मुझे जेल में डाला है पर मैं उनसे नफरत नहीं करता। मेरा आदोलन सामाजिक और राजनैतिक दोनो तरह का है। मैं लाल कुर्तीवालों को अपने पड़ोसियों से प्रेम करना और सच बोलना सिखाता हूं। पठान योद्धा जाति है, अहिंसा के संदेश को अपनाना उनके लिए आसान नही। मैं उनको वही सिखाने की कोशिश कर रहा हू।”

Khan Abdul Ghaffar Khan – खान अब्दुल गफ्फार खान

गांधी जी को ईश्वरभक्ति के बारे में बादशाह खान ने कहा, “जब-जब गांधी जी के जीवन में कोई बडा सवाल उठता और गांधी जी कोई अहम फैसला करते, तब सहज ही मुझे ऐसा लगता कि यह निश्चय ऐसे आदमी का है, जिसने अपने को पूरी तरह ईश्वरापित कर दिया है और ईश्वर निश्चय ही कभी गलत रास्ता नहीं बतलाता ।”

सितम्बर 1940 में कांग्रेस ने निश्चय किया कि युद्ध में भाग न लेने के आधार पर गांधी जी के नेतृत्व में वह सविनय अवज्ञा आदोलन शुरू करेगी। इस आंदोलन के अनुसार बाद में सत्याग्रह शुरू हुआ। उसमे खान-बंधुओ ने पूरा भाग लिया। हजारों सत्याग्रहियों को गिरफ्तारियां हुईं परंतु खान-बंधुओ को नही पकड़ा गया।

अगस्त 1942 में क्रिप्स मिशन के साथ बातचीत टूट जाने पर जो ऐतिहासिक ‘भारत छोडो’ संग्राम छिडा, उसमें भी बादशाह खान का पूरा सहयोग रहा। उनको गिरफ्तार कर लिया गया और मार्च 1945 मे जब उत्तर-पश्चिम सीमाप्रांत मे कांग्रेसी सरकार बनी तब उन्हें छोड़ा गया।

Khan Abdul Ghaffar Khan – खान अब्दुल गफ्फार खान

जिन्ना और मुस्लिम लीग ने दो राष्ट्र के सिद्धांत के आधार पर पाकिस्तान की माग 1940 से ही शुरू कर दी थी। इस सिद्धांत के अनुसार मुसलमान हिन्दुओं से अलग थे इसलिए वे अपनी अलग सत्ता स्थापित करने और अलग मातृभूमि के हकदार थे। यह भारत का वह हिस्सा था जहा मुसलमानों की सख्या अधिक थी। उसमे पंजाब, उत्तर-पश्चिमी सीमाप्रात, काश्मीर, सिंध और बलोचिस्तान आते थे। यह सिद्धात और व्यवहार दोनो दृष्टियो से गलत था परतु मुस्लिम लीग और जिन्ना ने अपनी जिद नहीं छोड़ी।

उसका कारण यह था कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद का पूरा समर्थन उनको प्राप्त था। खान-बंधुओ ने खुले शब्दो में ‘दो राष्ट्रों’ के सिद्धांत का विरोध किया। सरहदी सूबे के चुनाव मे मुस्लिम लीग बुरी तरह हार गई जिसके कारण हिंसा का प्रचार शुरू हो गया। अगस्त 1946 में कलकत्ता मे भयानक कत्लेआम हुआ। पूर्वी बंगाल के नोआ खाली क्षेत्र में बहुत हिंसा हुई। यह सब मुस्लिम लीग के साथ मिलकर ब्रिटिश अधिकारियों ने करवाया।

अक्तूबर 1946 मे गाधी जी हिन्दू-मुसलमानों के बीच फिर से मेल करवाने के लिए नोआखाली गये। नोआखाली के दंगे के बाद बिहार और देश के दूसरे हिस्सों में भी वैसे ही साम्प्रदायिक दंगे शुरू हो गये। खान-बन्धुओं पर इन घटनाओं का बहुत बुरा प्रभाव पडा। जनवरी 1947 मे गांधी जी नोआखाली से अपने शाति मिशन पर बिहार गये। वहां उन्होंने बादशाह खान को बुलाया। उस आधी-तूफान से भरी अंधेरी रात मे बादशाह खान की शानदार दिलेरी, सहनशीलता, पहाड़ जैसी मजबूती और श्रद्धा एक चमकते हुए मार्गदर्शक प्रकाश की तरह सामने आई।

Khan Abdul Ghaffar Khan – खान अब्दुल गफ्फार खान

बादशाह खान जब बिहार मे थे, तब उन्होंने सोचा कि वे राजनीति से पूरी तरह सन्यास ले लेंगे परन्तु अग्रेजों की राजनीति और स्वार्थ की भावना को देखकर उन्होंने यह विचार बदल दिया। उन्होंने सोचा कि ऐसी परीक्षा की घडी मे पठानों को बीच में ही छोड़ देना अच्छा नही है। उस समय उनको ऐसा महसूस हुआ कि मुस्लिम लीग और अंग्रेज दोनों मिलकर एक बहुत बड़ा षड्यंत्र रचना चाह रहे है।

3 जून को कांग्रेस ने बंटवारे की योजना मान ली। इस पर बादशाह खान बहुत उदास हो गये। उन्होंने गांधी जी को कहा, “सरहदी सूबे में हमारा भविष्य भारी खतरे से भरा हुआ है। हमे क्या करना चाहिए, यह कुछ नहीं सूझता।” गांधी जी ने उत्तर दिया, “खान साहब, अहिंसा में निराशा को स्थान नही है। यह आपको परीक्षा की घड़ी है। आप कह सकते हैं कि पाकिस्तान आपको बिल्कुल नामंजूर है और ऐसे रुख के कारण जो मुसीबतें आयें उन्हें झेलने को तैयार रहें। ‘करेंगे या मरेंगें’ की प्रतिज्ञा लेने वालों को डर किस बात का है !”

बादशाह खान ने यह मांग की कि पठानों को अपने मामलों को तय करने की पूरी स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए। वे यह चाहते थे कि एक ऐसी इकाई बनाईये जिसमें सभी पीढियों के लोग रहें चाहे उनकी जाति या धर्म अलग-अलग हों और इस इकाई के लोग अपना संविधान बनायें। यह संविधान तब बनाया जाये जब हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों का संविधान बन जाये।

Khan Abdul Ghaffar Khan – खान अब्दुल गफ्फार खान

इसके बाद वे तय करेंगे कि वे किस उपनिवेश के साथ रहेगे। मुस्लिम लीग ने यह बात स्वीकार नही कि। वे यह चाहते थे कि उन्होंने अंग्रेजों को सहयोग दिया है इसलिए वे उसके नजराने के तौर पर उन्हें उत्तर-पश्चिमी सीमाप्रांत दे दें। लार्ड माउंटबेटन की योजना को मुस्लिम लीग स्वीकार करे इसी पर उसकी सफलता निर्भर करती थी। अंग्रेज भी असफलता के साथ यहां से जाना नहीं चाहते थे।

माउंटबेटन ने कहा कि मतगणना उनको अवश्य करवानी पड़ेगी क्योकि वे वचन दे चुके हैं और यदि मतगणना न हुई तो यह उनके लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न था। यह भी हो सकता था कि कांग्रेस ही आगे आ जाये। कांग्रेसी नेता बटवारा नही चाहते थे परन्तु उनको यह कड़वा घूंट पीना पड़ा और उन्हें बंटवारे की योजना को मानना पड़ा।

गाधी जी के सख्त विरोध के बावजूद उन्होंने उत्तर-पश्चिमी सीमाप्रात मे मतगणना की शर्तों को मान लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि खान बंधु और उत्तर-पश्चिमी सीमाप्रात के खुदाई खिदमतगार जो कई सालो से स्वतंत्रता के संघर्ष मे हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड रहे थे उन्हे हमसे अलग कर दिया गया। बादशाह खान ने कुछ समय बाद कहा था, “उन्हें भेडियों के हवाले कर दिया गया।”

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इस तरह की भड़काने वाली हिंसा और अंग्रेज अफसरों और मुस्लिम लीगियो के खुले गठबंधन के वातावरण में मतगणना की गई। खुदाई खिदमतगार और उनकी पार्टी ने उसमें कोई हिस्सा नहीं लिया और सरहदो सूवा पाकिस्तान का हिस्सा करार दे दिया गया। 30 जुलाई, 1947 को गांधी जी कश्मीर गये और बादशाह खान अपने प्रांत को लौट गये। गांधी जी ने कहा कि उनका काम वही है, “पाकिस्तान को पाक बनाने का।”

बादशाह खान ने विदा होने तक गांधी जी के साथ के आदमियों से कहा, “महात्मा जी ने हमे सच्चा रास्ता दिखाया है। जब हम नहीं रहेंगे तब भी बहुत बरसों तक हिन्दुओं की आने वाली पीढ़ियां उन्हें याद करेंगी भगवान् कृष्ण के अवतार की तरह। मुसलमान उन्हें मसीहा मानेंगे और ईसाई दूसरा शांतिदूत। वह हिन्दुस्तान के लिए गर्व का दिन होगा। ईश्वर करे कि वह दीर्घायु हों, जिससे हमें प्रेरणा और शक्ति मिलती रहे और हम सत्य और न्याय के लिए अन्त तक लड़ते रहें।” इसके बाद वह गांधी जी से फिर कभी नही मिले।

डेढ़ सौ वर्षों की परतंत्रता के पश्चात् 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया परन्तु खान-बन्धुओं के लिए नये सघर्प का सूत्रपात हुआ। डा० खान साहब का मंत्रिमंडल बंटवारे के बाद भी जारी रहा। साधारण ढंग से तो उसे हटाया जाना मुश्किल था । अतः 21 अगस्त को पाकिस्तान के गवर्नर जनरल जिन्ना में एक जारशाही फरमान जारी करके उसे बर्खास्त किया।

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बादशाह खान इससे जरा भी विचलित नही हुए और पठानिस्तान के अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए जनमत को शिक्षित करने का प्रयत्न करते रहे। बादशाह खान ने घोषणा की, “मैं सारो जिन्दगी पठानिस्तान बनाने के लिए काम करता रहा हूं। पठानों के बीच मेल-जोल पैदा करने के लिए ही 1929 मे खुदाई खिदमतगार का संगठन बनाया गया था। 1929 मे मेरे जो सिद्धांत थे उन्ही के अनुसार आज भी चलता हूँ। मेरा रास्ता साफ है, मैं उसे कभी नही छोडूंगा, चाहे मुझे दुनिया मे अकेला ही क्यो न खड़ा होना पड़े।”

बादशाह खान पाकिस्तान में सब पददलित और शोषित लोगों की दृष्टि में पहले ही काफी प्रसिद्ध हो चुके थे परन्तु गाधी जी के महाप्रयाण के बाद सारे प्रगतिशील और उदार तत्वों के केन्द्र भी यही बन गये। कराची में उनके सम्मान में दी गई एक चायपार्टी में सिंध को अल्पसंख्यक श्रेणी के एक प्रतिनिधि ने कहा कि महात्मा गांधी जब तक जिन्दा थे तब तक अपनी कठिनाइयों के समय समाधान के लिए हम हमेशा उनके पास जाया करते थे मगर अब आपके पास आया करेंगे। क्योंकि, “महात्माजी के बाद हम आपको ही मानते हैं।” यह कहकर जो कठिन समय आगे आ रहा है, उसमें अपनी रहनुमाई के लिए उन्होंने बादशाह खान से प्रार्थना की ।

उन्होंने कहा कि पठान और देश के अन्य प्रगतिशील लोगों के लम्बे स्वातंत्र्य संग्राम के परिणामस्वरूप पाकिस्तान बना। अगर उन्होंने अंग्रेजों को सत्ता छोड़ने पर मजबूर न किया होता, तो पाकिस्तान का निर्माण ही नहीं होता। पर देश छोड़ते हुए अग्रेज शासकों ने सत्ता सौंपते समय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वालों के हाथ में सत्ता न देकर ऐसे लोगों को दी, जिन्होंने उसके लिए कुछ नहीं किया था। यही आज की दुर्दशा का मुख्य कारण है।

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उन्होंने आगे कहा कि वे देश के बंटवारे के विरुद्ध थे पर जब पाकिस्तान बन गया तो पाकिस्तान के अच्छे-बुरे को वे अपना अच्छा-बुरा समझते है। वे जानना चाहते हैं कि उनकी ठीक-ठीक जगह क्या होगी? क्या उन्हें बराबर के हफ मिलेंगे या नहीं ? उनकी इच्छा थी कि पाकिस्तान की शासन व्यवस्था के बारे में उनसे सलाह ली जानी चाहिए । सरहदी सूबे में लौटने पर बादशाह खान ने लोगों के सामने जमीअत-उल अवाम का कार्यक्रम रखते हुए बताया :

“मैं पाकिस्तान की संविधान सभा का तमाशा देखकर आया हूं। मुझे इन पाकिस्तानी लोडरों और उन पुराने वरतानवी नौकरशाहों में कतई कोई फर्क नजर नहीं आया।” 13 मई को बादशाह खान ने ऐलान कर दिया कि खुदाई खिदमतगारों का आंदोलन पाकिस्तान के तमाम सूवों में फैला दिया जाएगा।

उन्होंने बताया कि खुदाई खिदमतगार वालटियरों के तौर पर जनता की सेवा करेंगे, जिसके कि वह पहले मंत्री चुने गये हैं। इस पर उन्हें तोड़फोड़ करने वाला’ कहा गया और सर हदी सूबे के बड़े वजीर खान अब्दुल कयूम ने बादशाह खान के लिए यहां तक कहा कि “वह दुश्मन हैं और पाकिस्तान को हकूमत की जड़ खोखली करने की कोशिश कर रहे है।”

इसके तीन महीने बाद बादशाह खान को गिरफ्तार कर लिया गया और इसी दिन उनके बेटे अब्दुल वली खान को भी उनके गाव मे अपने घर से गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर बगावत करने का दोष लगाया गया। उन पर मुकद्दमा चलाया गया। बादशाह खान ने कहा कि उनका कोई कसूर नही है। परंतु सरहदी अपराध कानून की धारा 40 के अधीन उनसे तीन साल तक अपनी नेकचलनी की जमानत मांगी गई। बादशाह खान ने जमानत देने से इंकार कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि उन्हें तीन साल की सख्त कंद की सजा सुना दी गई।

बादशाह खान को जेल में रहते हुए तीन साल हो गये थे, उसी समय एक दिन उन्हें जेल के सुपरिन्टेडेंट ने आकर कहा कि लियाकत अली के आदेशानुसार उनसे पूछा गया है कि अब वे मुस्लिम लीग में शामिल होने के लिए तैयार हैं या नही और बंटवारे के बारे में उनका क्या विचार है ? तब खान साहब ने उत्तर दिया, “हम तो कैदी हैं, सियासी झगडों से हमारा क्या मतलब ?” जहां तक लीगी हुकूमत में शामिल होने का ताल्लुक था, उन्होंने कहा, “लीगियों के लिए हकूमत का मकसद है जाती ताकत हासिल करना, जबकि हमारी निगाह में यह अवाम की खिदमत करने का एक जरिया है, इसलिए हम दोनों किस तरह एकजुट हो सकते है ?”

इसी समय उनसे जेल में मिलने एक सरदार बहादुर खान गये। उन्होंने बादशाह खान को बताया कि केन्द्रीय सरकार अधिक देर उन्हें जेल में रखने के हक में नहीं है परंतु उन्हें यह डर है कि खुदाई खिदमतगारों के साथ जो जुल्म हुए हैं वे उनके दिल में है। इस पर खान साहब ने कहा कि वे तो अहिंसा के पुजारी है।

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इसके बाद सरदार बहादुर चले गये, लेकिन थोडी देर बाद फिर आये और खान बहादुर की रिहाई का फैसला सुना गये फैसले के बाद भी उन्हें बंगाल रेगूलेशन ऐक्ट के आधीन चार साल तक और जेल में रखा गया। इन चार सालों में से एक साल उन्होंने सर्किट हाउस में बिताया। इस तरह सात साल बीत जाने के बाद भी सरकार का इरादा उन्हें छोड़ने का नहीं था। अब उन पर यह इलजाम लगाया गया कि वे अफगानिस्तान के साथ मिलकर साजिश कर रहे है और पाकिस्तान के लोगों को भड़काते हैं।

जून 1956 से जनवरी 1957 तक लाहौर जेल में विचाराधीन कैदी की तरह रहने के बाद उन्हें अदालत के उठने तक की कैद और 14,000 रु० जुर्माना की सजा दी गई। उन्होंने जुर्माना देने से इन्कार किया तो उनकी जाय दाद जब्त कर ली गई । अक्टूबर 1958 मे उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया और 1960 के अंत तक वे जेल में ही रहे।

फिर अप्रैल 1961 में गिरफ्तार किया गया और 30 जनवरी, 1964 को तब छोड़ा गया जब उनका स्वास्थ्य बिल्कुल गिर गया। पाकिस्तानी शासक यह नहीं चाहते थे कि उनकी मौत जेल में हो और उससे मुल्क मे उनकी बदनामी हो इसलिए उन्हें घर में नजरबद रखा गया। अधिकारियों ने शायद समझ लिया था कि अब यह बचेगे नही, लेकिन ऐसा नही हुआ।

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बादशाह खान के इस तरह लगातार जेल में रहने के कारण दुनिया भर की निगाह उन पर गई। एमनेस्टी इन्टर नेशनल ने तो उन्हें ‘उस साल के महान् बन्दी’ के रूप में चुनकर इस तथ्य को प्रकाश में ला दिया। अन्त मे अक्टूबर 1964 में जब उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया तो उन्हें इंग्लैंड इलाज करवाने जाने के लिए स्वीकृति दे दी। उसके बाद 1965 में वे काबुल आ गये ।

अठारह साल तक लगातार उन्होंने अन्याय के विरुद्ध अपना आदोलन जारी रखा। जेल मे रहे या जेल से बाहर उनके सामने एक ही लक्ष्य था और वह था एक करोड़ पठानों की आजादी हासिल करना। वे करेंगे या मरेंगे और अहिंसा का हथियार उठाकर काम करते रहते हैं।

सितम्बर 1967 में सेवाग्राम आश्रम की एक बहन अम्तुस्सलाम, जो बचपन से ही बापू जी के पास पली थी, बादशाह खान से मिलने अफगानिस्तान गईं। जाने का कारण यह था कि खुदाई खिदमतगार जिस चीज का प्रचार कबाइली इलाके में करना चाहते थे उसकी पुष्टि के लिए वहा रचनात्मक कार्य आरम्भ किया जाय।

वे वहां नहीं मिले, बाहर दौरे पर गये हुए थे। वही वे लोग पहुंच गये उनका पैर बहुत खराब हो चुका था। डाक्टरों ने आराम करने के लिए कहा। परंतु वे आराम कर करके थक गये थे इसलिए घूमने निकल गये, जिसमे पैर की सूजन स्वतः ठीक हो गई। भारत में गांधी जन्म शताब्दी के अवसर पर बादशाह खान को भारत आने के लिए निमंत्रित किया गया परंतु उन्होंने उत्तर दिया कि आना मुश्किल है क्योकि उनको अलग हुए बहुत समय बीत चुका है।

Khan Abdul Ghaffar Khan – खान अब्दुल गफ्फार खान

इस बीच नेहरू अवार्ड फोर प्रोमोटिंग इण्टरनेशनल अण्डरस्टैडिंग कमेटी द्वारा पारितोषिक के लिए बादशाह खान को चुना गया। उनकी तरफ से आने की स्वीकृति मिल गई। बादशाह खान को यहा लाने के लिए एक विशेष विमान की सरकार की तरफ से व्यवस्था की गई। टिकट भेजने की व्यवस्था हो रही थी परंतु बादशाह खान ने मना कर दिया और पहली अक्टूबर को सुबह 9 बजे दिल्ली पहुंच गये।

तेईस साल के वियोग के बाद इस तरह बादशाह खान हिन्दुस्तान पहुंचे। भारत पधारने पर उनका बड़ी गर्मजोशी से स्वागत एवं सम्मान हुआ। अनेक संस्थाओं ने उन्हें आमंत्रित कर पुष्पांजलियां अर्पित की। वस्तुतः उनका ऐसा हार्दिक स्वागत स्वाभाविक ही था क्योंकि भारतीय लोग उन्हें दूसरा गांधी ही मानते हैं ।

निष्कयंतः स्वाधीनता संग्राम के सुप्रसिद्ध नायक खान अब्दुल गफ्फार खान एक अद्भुत एवं विलक्षण व्यक्तित्व हैं। महात्मा गांधी के समान इन्हें भी लोग श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखते है। सीमाप्रांत के होते हुए भी वे भारतीयता से ओत-प्रोत हैं। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन मे गांधी जी से प्रभावित होकर आप कांग्रेस में सम्मिलित हुए।

Khan Abdul Ghaffar Khan – खान अब्दुल गफ्फार खान

वहां रहते हुए आपने जिस अनन्य देशभक्ति का परिचय दिया वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सदा चिरस्मरणीय रहेगी। उनकी इस असाधारण देशभक्ति का मूल्यांकन करते हुए पं० जवाहरलाल नेहरू ने कहा था : “खान अब्दुल गफ्फार खान के व्यक्तित्व में सीमाप्रांत ने एक महान गौरव शाली मनुष्य पैदा किया है- ऐसा मनुष्य जिस पर सारा हिन्दुस्तान गौरव कर सकता है I

उसने सीमाप्रात के रहने वालों को अवनति के गढ़े से निकाला और अपने अद्वितीय बलिदानो से न केवल सीमाप्रांत प्रत्युत सारे हिन्दुस्तान का सिर ऊंचा किया। उसने खुदाई खिदमतगारों की सेना तैयार करके एक महान् कार्य किया है। अहिंसा एक प्रबल शस्त्र है। इसे केवल बहादुर और दिलेर मनुष्य ही प्रयोग कर सकते है। सीमाप्रात के स्वाभिमानी लोगो ने खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में इस शस्त्र को पूरी बहादुरी से अपनाया है।” इसी भांति अविभाजित भारत के विख्यात राष्ट्रवादी मुसलमान डा० संयद महमूद कहते हैं I

Khan Abdul Ghaffar Khan – खान अब्दुल गफ्फार खान

“पठानों ने स्वाधीनता के लिए गोलिया खाईं, परंतु पीठ नही दिखाई। यह भाव सीमाप्रात के पठानों में खान अब्दुल गफ्फार खान के प्रयत्नों से पैदा हुआ है। सीमाप्रांत के पठानों के बलिदानों के कारण समस्त देश के हिन्दू और मुसलमान उन्हे सारे देश का रक्षक समझते है और सीमाप्रात के पठानों को यह गौरव उनके नेता खान अब्दुल गफ्फार खान के कारण प्राप्त हुआ है। मुसलमानों और विशेषतः पठानों को इस बात का गर्व है कि उन्होंने हिन्दुस्तान मे राष्ट्रीयता को फैलाया और इसके सबसे पहले प्रवर्तक भी वही है।” 

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