Kamala Devi Chattopadhyay – कमला देवी चट्टोपाध्याय

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जन्म – कमला देवी चट्टोपाध्याय का जन्म मंगलूर राज्य में एक संपन्न सारस्वत परिवार में 3 अप्रैल, 1903 को हुआ था। मंगलूर राज्य विध्याचल के दक्षिण में प्रसिद्ध महाराष्ट्र, आध, मैसूर, तमिल, केरल आदि प्रदेशों के अतिरिक्त एक छोटा-सा प्रदेश है। यह ‘तुलुव-प्रदेश’ का केंद्र है जहा कन्नड-परिवार की भाषा ‘तुलु’ बोली जाती है।

Kamala Devi Chattopadhyay – कमला देवी चट्टोपाध्याय

मुंबई से कोई चार सौ मील दक्षिण केरल के उत्तर में और मैसूर (आधुनिक कर्नाटक ) राज्य के पश्चिम में पश्चिमी घाट के पहाड़ों की उपत्यकाओं में सुंदर नदियों से सिचित तथा विस्तृत समुद्र से सेवित यह प्रदेश अपने आप में एक स्वर्ग-सा प्रतीत होता है। कमला देवी के पिता एक उच्च सरकारी अधिकारी थे। माता कर्नाटक के एक धनाढ्य किसान परिवार से संबंध रखती थी। इतना होते हुए भी इनके घर का रहन-सहन बडा सरल था। कमला देवी का लालन-पालन अत्यधिक स्नेह के बीच हुआ।

प्रारंभिक शिक्षा – प्रारंभिक शिक्षा मां द्वारा ही हुई। सबसे पहले मां ने इन्हें नागरी लिपि सिखायी, तत्पश्चात् मराठी, फिर कन्नड़ लिपि भी सिखायी I उनके तथा अपनी नानी के बारे मे स्वय कमला देवी ने कहा है “मां के पास बहुत पुस्तकें थी। कागज, अखबार उनके पास आते रहते थे। जब भी वे मुझसे पढ़ने को कहती तो आन (पिता) कहते तुम बीच में मत पड़ो, इसे कमला को खेलने दो।

तत्कालीन प्रचलित प्रथा के अनुसार कमला जी का विवाह अल्पायु में ही हो गया था किंतु कुछ समय बाद ही वह विधवा हो गईं। उस समय नारी की स्वतंत्र सत्ता स्वीकार नहीं की जाती थी। अतः कमला पर भी दबाव डाला गया कि वैधव्य के इस दुःख को वह देवी अभिशाप मानकर आजीवन सहें, किंतु कमला जी के मन में तो समाज के इन अंधविश्वासों के प्रति विद्रोह भरा हुआ था। प्रगतिशील मस्तिष्क इन पुरातनपंथी विचारों को अपने में प्रविष्ट नहीं कर सका ।

Kamala Devi Chattopadhyay – कमला देवी चट्टोपाध्याय

कमला की मां मे राष्ट्रीयता और देशभक्ति की भावना थी। तिलक संस्थान की ‘केसरी’ और ‘काल’ पत्रिकाएं उनके पास नियमित रूप से आती थी। एक दिन अम्मा उन्हें श्रीमती एनी बेसेंट से मिलाने ले गईं। उनके बारे में उन्होंने कमला को बहुत कुछ बताया हुआ था। श्रीमती बेसेंट का विवाह ईसाई पादरी से हुआ था।

वह आत्मचितन की स्वतंत्रता चाहती थी और ऊपर से आरोपित विचारों को स्वीकार नहीं कर सकती थी। उन्होंने उसी समय स्वतंत्रता का कार्य ‘होमरूल’ आदि शुरू किया था। उस भेंट के दौरान अम्मां ने श्रीमती बेसेंट से कमला के लिए आशीर्वाद मांगा था कि वह उन्ही के समान स्वतंत्रता की योद्धा बने ।

कमला देवी ने निश्चय किया कि वह आगे अध्ययन कर जीवन में कुछ बनेगी। स्कूल अध्ययन काल में बालिका कमला को अभिनय का बड़ा शौक था। इसके कारण उन्हें कई बार विपत्तियों का सामना करना पड़ा था। मार्गरेट कर्जस जब भारत आई तो उनके पति जेम्स कर्जस ने ‘मीराबाई’ नाटक लिखा । नाटक अंग्रेजी में था। उस समय तक मंगलूर में नेशनल गर्ल्स हाई स्कूल खुल गया था। यह एक राष्ट्रीय विचारधारा का स्कूल था।

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राष्ट्रीयता के प्रचार के लिए इस स्कूल में ‘मीराबाई’ नाटक खेलने का निश्चय किया गया। नाटक में कमला की मुख्य भूमिका थी क्योंकि उसे मीराबाई बनना था। परंतु कट्टरपंथीय लोगों ने समाज में लड़कियों के सबके सामने नाटक करने की बात को लेकर इतना हंगामा मचाया कि स्कूल वाले कठिनाई में पड़ गए। परंतु उन्होंने नाटक करने का निश्चय नहीं छोड़ा।

अंत समय में नाटक को विफल करने के लिए नायक को उठा लिया गया। फलतः नाटक नहीं हो पाया। कमला देवी को जान से मार डालने की धमकी दी गई। इस सबसे डरकर मां ने कमला को कुछ समय के लिए एक कोठरी में बंद कर दिया। पिताजी की मृत्यु के बाद कमला की आंखें खुल गई। उसके सामने बिलकुल साफ हो गया कि उसे स्कूल क्यों जाना चाहिए और आगे पढ़ना क्यों चाहिए ।

विधवा पुनर्विवाह – इसी बीच मद्रास में उनकी बहन सख्त बीमार पड़ गयी। उसकी  देख-भाल के लिए मां उसे साथ लेकर वहां चली गयी। फिर वे वहां ही मकान लेकर रहने लगी। वहां कमला सीनियर केम्ब्रिज परीक्षा के लिए तैयारी करने में जुट गयी। मद्रास में रहते हुए वहां श्रीमती सरोजिनी नायडू के भाई थी हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय के साथ भेंट हुई। उसके आकर्षक व्यक्तित्व का प्रभाव कमला पर ऐसा पड़ा कि उसके साथ विवाह सूत्र में बंध गई।

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उनके व्यक्तित्व के बारे मे कमला जी का कहना है कि — “पहली ही दृष्टि में उनकी प्रतिभा ने मुझे आकर्षित किया- कविता, संगीत, अभिनय, सभी कुछ तो भगवान ने उन्हें दिया था। वास्तव में में उनसे आकर्षित नहीं हुई थी। न ही मैं उनके प्रेम में पड़ गयी थी। हां, उनकी प्रतिभा ने जरूर मुझे अभिभूत कर लिया था। कहा जा सकता है कि उस समय उनकी जीवंतता और प्रतिभा दोनो मुझ पर हावी हो गयी थी। मैं उनसे चमत्कृत जी किंतु एक बाल-विधवा का पुनविवाह और वह भी गैर-जातीय व्यक्ति के साथ !

यह एक ऐसा कदम था जिससे इस खोखले समाज की नीव हिल उठी। इस विवाह के बाद कमला देवी के क्रांतिकारी जीवन का श्रीगणेश होता है। वे दोनों विदेश चले गए। वहां लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स और वेडफोर्ड कालेज में कमला देवी ने डिप्लोमा लिया। कमला देवी को पाकर हरीन्द्रनाथ प्रसन्न थे और हरीन्द्र को पाकर कमला देवी।

दोनों ने अपने को धन्य समझा हरीन्द्रनाथ प्राय. लोगो से कहा करते थे “जब में कमला को साथ लेकर बाहर निकलता हूं तब देवता भी मुझसे ईर्ष्या करते हैं।” यूरोप और अमेरिका में भ्रमण के लिए दोनों साथ-साथ गए और यहाँ उन्होंने भारतीय संस्कृति की पताका फहराई। हरीन्द्रनाथ नाटक लिखते थे और बाद मे पति-पत्नी दोनों मिलकर अभिनय करते थे।

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स्वतंत्रता संग्राम में योगदान – सन् 1922 के आसपास भारत मे स्वाधीनता संग्राम तीव्र हो रहा था। मातृभूमि की पुकार पर पति-पत्नी दोनों स्वदेश लौट आए। दोनों राष्ट्रीयता की लहर मे बह रहे थे। उन्होंने मंगलूर जाकर रहने का निश्चय किया। 1923 में उन्हें एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्होंने रामकृष्ण रखा। कमला देवी का राजनीति से प्रत्यक्ष संबंध 1924 मे हुआ जब उन्होंने बेलगांव कांग्रेस में स्वयंसेविकाओं का प्रशिक्षण ग्रहण किया।

अधिवेशन में कमला देवी को एक साधारण स्वयसेविका के रूप में भर्ती किया गया था। उसके बारे मे कमला जी ने बताया है “यहां मेरा परिचय उमाबाई कुडापुर से हुआ। यह स्वयंसेविका दल की प्रशिक्षिका थी। भरती होने पर मैंने स्वयंसेविका कीपवित्र प्रतिज्ञा की- “मैं तब तक काम करूंगी, जब तक देश स्वतंत्र नही होगा।” और इस प्रतिज्ञा का पालन उन्होने किया I

श्रीमती कमला कभी अनुगामिनी बनकर नही चली। जीवन में अपने लिए नए मार्गों का निर्माण उन्होंने स्वयं किया। इसमें उन्हें भांति-भांति की बाधाएं आयो। पर साहस और धैर्य के साथ उनको दूर करके वह अग्रसर होती रही। संभवत हो कोई ऐसा सार्वजनिक क्षेत्र हो जिसे उन्होंने अपनी प्रतिभा के संस्पर्श से संवारा न हो।

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इस संबंध में सन् 1929 में बर्लिन में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन में उनके साहस की एक अनूठी कहानी द्रष्टव्य है। कमला जी उस सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि दल का नेतृत्व कर रही थी। उस सम्मेलन में प्रत्येक देश का अपना राष्ट्रीय ध्वज फहरा रहा था। भारत क्योकि पराधीन था, अतः उसके लिए यूनियन जैक चुना गया। कमला जी ने विरोधस्वरूप गर्जना की “जब तक भारत को अपना तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज फहराने की अनुमति नहीं मिलेगी, भारतीय प्रतिनिधि मंडल इस सम्मेलन का बहिष्कार करेगा।”

विवश होकर सम्मेलन की अध्यक्षा को कहना पड़ा, “यदि भारत का अपना कोई राष्ट्रीय ध्वज है तो भारतीय प्रतिनिधि मंडल उसे ले आए, हमे उसे लगाने में कोई आपत्ति नही होगी।” अब समस्या यह थी कि तिरंगा कहां से लाया जाए ? कमला जी की तीक्ष्ण बुद्धि ने एक उपाय तुरंत खोज लिया। उन्होंने अपनी साडी फाडकर रातो-रात उससे तिरंगा बनाकर अगले दिन नियत समय पर उसे फहराते हुए सभा मंडप मे प्रवेश किया। इसे देखकर सभी उपस्थित विदेशी महिलाएं आश्चर्यचकित रह गयी। ऐसी अनेक अन्य साहसिक घटनाओं को कमला जी के जीवन मे खोजा जा सकता है।

स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में 1930 के आसपास असहयोग आदोलन के दिन सदैव स्मरणीय रहेगे जब महात्मा गांधी के आह्वान पर स्थान-स्थान पर सत्याग्रहियों ने नमक कानून भंग किया था। कमला देवी भी नमक बनाने और बेचने पर प्रतिबंध होते हुए बम्बई में नमक की पुड़िया सरेआम बेचकर कई बार जेल गई। एक बार तो उन्होंने एक घंटे में नमक बेचकर 40000 रु. एकत्र करके समस्त कार्यकर्ताओं को स्तभित कर दिया था।

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उस अवसर पर उनकी सिंह-गर्जना थी “नमक कानून तोड़ना हमारा उद्देश्य नही। हमारा उद्देश्य तो इस अग्रेजी प्रभुत्व का अंत करना है।’ नमक की यह चुटकी हमारे विरोध की शुरुआत है।” इस संदर्भ में जब इन्हे मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित किया गया तब भी इनके अदम्य साहस में तनिक शिथिलता नही दिखाई पड़ी।

अपितु इन्होंने मजिस्ट्रेट को ही नौकरशाही के जंजाल से मुक्त होने का परामर्श दिया और अदालत में नमक बेचना आरंभ कर दिया। बम्बई के निकटवर्ती नमक-निर्माण क्षेत्र पर धावा बोलने की योजना भी कमला देवी ने ही शुरू की थी। सन् 1930 के मई महीने में विदेशी बहिष्कार आंदोलन चल रहा था। 17 मई को कमला जी स्वयं सेविकाओं की सभा में उन्हें विदेशी कपड़ो को दुकानो पर धरना देने के आदेश देकर घर लौट रही थी।

घर में प्रवेश करते ही कमला जी को गिरफ्तार कर लिया गया। तीन दिन तक जेल में अंधेरी कोठरी में वेश्याओं, हत्या के अपराधियों और इधर-उधर चक्कर काट रहे चमगादड़ो के बीच बंद रहने के बाद उन्हें अदालत में पेश किया गया। उन्होंने कोई बचाव प्रस्तुत नही किया फलतः उन्हें साढ़े नौ महीने की साधारण कैद की सजा सुनायी गयी। कारावास अवधि में उन्होंने जेल के कई अनुचित नियमों को तोड़ने का अदम्य साहस प्रदर्शित किया।

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सन् 1934 से 38 तक कमला देवी का अधिक समय अपने परिवार के साथ मगलूर में बीता। इस काल में उन्होंने सेवा दल, किसान-मजदूर यूनियन, युवा छात्र संगठन के कार्यों में अपना समय लगाया। इस संबंध में उन्हें बहुत भ्रमण करना पड़ा और देश के बहुत बडे भाग में प्रचार का कार्य करना पड़ा ।

1939 से 1941 तक कमला देवी देश से बाहर थी। उनके सामने कई समस्याएं थी, जिनमें प्रमुख अपने पुत्र की शिक्षा थी। अमेरिका में रहते हुए भी वह समय-समय पर ब्रिटिश साम्राज्य की पोल खोलती रही और उनके रक्त रंजित हथकंडों से अमेरिका निवासियों को अवगत कराती रही। 1941 मे वहां भयकर युद्ध छिड़ा हुआ था।

फारेन डिपार्टमेंट शिमला से ब्रिटिश गवर्नर, हांगकांग को 15 अगस्त, 1941 को भेजे गए तार की प्रति में कहा था कि- “भारत सरकार की मुख्य चिंता यह है कि कमला देवी चट्टोपाध्याय को यथा संभव शीघ्र भारत लोट आना चाहिए।” 1941 के अंत में जब कमला देवी भारत लौटी तो पुनः स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ी।

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9 अगस्त 1942 को गांधी जी ने “अग्रेजो ! भारत छोड़ो” का नारा दिया और स्वतंत्रता सेनानियों से कहा, “करो या मरो” । कमला देवी को राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के कारण पकड़कर जेल भेज दिया गया। बिना कोई अभियोग लगाए लगभग 21 महीने उन्हें जेल मे नजरबंद रखा गया। इस बार जेल मे वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गयी।

अंत मे इन्हें डाक्टरी सलाह के आधार पर छोड़ दिया गया तब तक 1944 हो चुका था। जेल से छूटने पर उन्हें तुरंत महिला परिषद के बम्बई अधिवेशन की अध्यक्षता करने जाना था। बम्बई सरकार ने उनके बम्बई प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। इसका समाचार पत्रों में खूब प्रचार हुआ।

1946 में कमला देवी को कांग्रेस को कार्यकारिणी में ले लिया गया था। अतएव उनसे आशा की जाती थी कि वे कार्यकारिणी के अन्य सदस्यों के साथ ‘संविधान सभा की कार्यवाही में भाग लेगी। परंतु राजनीति में कमला देवी की भूमिका समाप्त हो चुकी थी। कमला देवी की दृष्टि सौंदर्य की दृष्टि थी, जो समस्त विश्व मे उसी परम सुंदर की छवि देखती थी।

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राजनीति की साठ-गांठ और एक-दूसरे को पृथक् करने को वृत्ति से उनका संबंध बहुत देर तक नहीं रह सकता था। 15 अगस्त 1947 को देश की स्वतंत्रता के दिन उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र देकर राजनीति से संन्यास ले लिया क्योंकि 24 वर्ष पहले ली हुई प्रतिज्ञा कि वे देश के स्वतंत्र होने तक कांग्रेस में पूर्ण निष्ठा से काम करेंगी, पूरी हो चुकी थी।

स्वतंत्रता के पश्चात् सितम्बर 1947 में कार्यवश कमला देवी दिल्ली आयी। उन्होंने यहां फटे चीथडे पहने, नगे पांव, सूनी आंखें और सूखे मुह लिए जब शरणार्थियों को देखा तो उनका मन द्रवित हो गया। वह शरणार्थियों की समस्या से जूझ गईं। दिल्ली के पास फरीदाबाद की स्थापना वस्तुतः उन्ही द्वारा शरणार्थियों को पुनर्स्थापित करने के लिए हुई थी।

सहकारिता को योजना बना कर बापू के आशीर्वाद से जो कार्य उन्होंने शुरू किया उससे जनता को कितना लाभ हुआ यह लाभान्वित व्यक्ति ही बता सकते है। पति को उनका इस प्रकार रात-दिन सामाजिक कार्य करना पसंद नहीं था, अतः वह पति से अलग हो गई। उनके साहसिक और क्रांतिकारी कदमों में यह भी एक अन्य कदम था। समाज-सेवा में संलग्न व्यक्तियों को कभी-कभी ऐसे कठोर कदम भी उठाने पड़ते हैं।

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सामाजिक कार्य –  वस्तुतः राजनीति से पृथक् होने के बाद ही कमला देवी का सामाजिक जीवन आरंभ होता है। वे ‘अखिल भारतीय महिला परिषद’ की अध्यक्ष, ‘थोमन्स वालन्टियर कोर की कमांडर इंचार्ज रही। साथ ही भारतीय सहकारिता सघ और ‘नेशनल थिएटर सेंटर एकेडेमी आफ डांस एण्ड ड्रामा’ की ये उपाध्यक्ष रही।

लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य जो उनके जीवन के साथ जुड़ा है वह है पुरातन हस्तशिल्प का पुनरुद्धार । वह अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड की वर्षो ‘अध्यक्ष’ रही। अपनी इन अमूल्य सेवाओं के कारण वे कई बार पुरस्कृत हो चुकी हैं।

भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से अलकृत किया। सन् 1966 में उन्हें दस हजार डालर के ‘अंतर्राष्ट्रीय रैमन मेगसेसे ‘ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। विश्व भारती, शांतिनिकेतन की ओर से उन्हें आजादी और उसके सांस्कृतिक वैभव के संरक्षण के लिए ‘दशिकोत्तम’ की उपाधि से विभूषित किया गया।

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मृत्यु – 29 अक्टूबर 1988 के दिन 85 वर्ष की आयु में भारत की इस महान् स्वतंत्रता सेनानी, साहसी महिला, समाज सेविका, कला संरक्षिका की महाराष्ट्र के मुंबई मृत्यु हो गयी I 

Shetkaryancha Asud

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