Jahangir History in Hindi – जहांगीर का इतिहास हिंदी

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जहांगीर अपने पिता अकबर की मृत्यु के बाद 1605 ई. में भारत का सम्राट बना। जहांगीर युवावस्था में अवध और बंगाल प्रान्तों का सूबेदार रह चुका था। इस तरह उसे प्रशासन का कुछ अनुभव प्राप्त था। यद्यपि वह अकबर की तरह कुशाग्र बुद्धि नहीं रखता था लेकिन उसे साहित्य एवं कला में बहुत रूचि थी। उसने मुगल साम्राज्य के विस्तार के लिये किसी सीमा तक महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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जहांगीर के आधीन मुगल साम्राज्य का विस्तार

जहांगीर का काल उसके उत्तराधिकारियों के काल की तुलना में सामान्यतः शांतिपूर्ण था। यद्यपि उसने बड़ी संख्या में युद्ध नहीं किये तो भी उसने मुगल साम्राज्य के विस्तार में निम्न ढंग से सहयोग दिया :

(1) मेवाड़ – जहांगीर को मेवाड़ के मामले में अकबर से अधिक सफलता मिली। वह मेवाड़ राज्य से चले आ रहे लम्बे संघर्ष को समाप्त करने में सफल रहा। उसने मेवाड़ से निपटने के लिये आसफखां तथा महावतखां जैसे योग्य सेनापतियों को भेजा। उन्हें पूर्ण सफलता न मिलने पर 1613 ई. में उसने शहजादा खुर्रम को भेजा। खुर्रम ने अपना सैनिक प्रभुत्व जमाने के लिये सारे प्रदेश लूटमार मचा दी तथा सारे मेवाड़ में सैनिक चौकियां स्थापित कर लीं।

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मेवाड़ के में शासक अमरसिंह ने 1615 ई. में अपने राजपूत अधिकारियों का परामर्श मानकर मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। उसने अपने पुत्र को जहांगीर के दरबार में भेजा। जहांगीर ने उदारता प्रदर्शित करते हुए उस राजकुमार को गले से लगा लिया। सम्राट जहांगीर ने अकबर की राजपूत नीति पर चलते हुए मेवाड़ राज्य को मुगलों के प्रभुत्व को मान लेने के बाद राज्य के लिए अमरसिंह को ही लौटा दिया। इस तरह मेवाड़ मुगलों के अधीन आ गया।

(2) दक्षिण में अहमद नगर की विजय – जहांगीर ने अहमद नगर के शासक के संरक्षक और सेनापति मलिक अम्बर को परास्त करने के लिए समय-समय पर सैनिक अभियान भेजे। उसके पुत्र शहजादा खुर्रम को मलिक अम्बर को परास्त करने में (1617 ई. एवं 1621 ई.) दो बार सफलता मिली।

खुर्रम के विद्रोह के समय मलिक अम्बर व उसके उत्तराधिकारी, सेनापति हमीदखां ने धीरे-धीरे अहमद नगर राज्य के अनेक प्रदेश मुगलों से छीन लिए लेकिन अहमद नगर के दुर्ग पर जहांगीर के सैनिकों का ही आधिपत्य रहा। जहांगीर की अहमद नगर की विजय पूर्ण और स्थायी नहीं कही जा सकती।

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(3) बीजापुर द्वारा अधीनता स्वीकार – 1633 ई. में जब मलिक अम्बर एवं बीजापुर के शासक इब्राहीम आदिलशाह में अनबन हो गयी तो बीजापुर ने तुरंत मुगलों की अधीनता स्वीकार करके 5,000 सैनिकों को सम्राट की सेवा में स्थायी रूप से भेज दिया।

(4) बंगाल विजय – जहांगीर के काल में बंगाल के कई भागों में अफगान सिर उठा रहे थे उन्होंने जैसार, कामरूप (पश्चिमी असम) एवं कछाड़ प्रांतों के हिन्दू शासकों का समर्थन प्राप्त किया हुआ था। 1608 ई. में जहांगीर ने इस्लामखां को एक विशाल सेना के साथ बंगाल भेजा।

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उसने जैसार के हिन्दू राजा को अपनी ओर मिला लिया और उसके सहयोग से वह एक के बाद दूसरे अफगान सरदार को परास्त करता गया। अफगानों ने आत्म-समर्पण कर दिया। कुछ समय बाद जैसार तथा कामरूप को मुगल साम्राज्य का अंग बना लिया गया। ढाका को बंगाल की नई राजधानी बनाया गया।

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(5) कांगड़ा विजय – 1620 ई. में जहांगीर ने शहजादा खुर्रम को कांगड़ा जीतने के लिए भेजा। 14 महीने के भयंकर एवं लम्बे संघर्ष के बाद वह सफल हुआ तथा कांगड़ा को मुगल साम्राज्य का अंग बना लिया गया।

(6) कंधार हाथों से निकल गया – 1621 ई. में ईरान के शाह अब्बास ने कंधार पर अधिकार कर लिया। जहांगीर ने शहजादा खुर्रम को कंधार जीतने के लिये भेजना चाहा लेकिन खुर्रम ने इस अभियान पर अपने को भेजा जाना नूरजहां की राजनीतिक चाल समझकर वहां जाने से इंकार कर दिया। खुर्रम के विद्रोह के कारण कंधार जहांगीर के हाथों से निकल गया। जहांगीर जो इस समय बीमार था, वह ईरान का कुछ भी न बिगाड़ सका।

जहांगीर की मृत्यु शीघ्र ही 1627 ई. में हो गयी उसके बाद शहजादा खुर्रम शाहजहां के नाम से गद्दी पर बैठा।

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नूरजहां

नूरजहां मिर्जा ग्यासबेग की पुत्री थी, जो ईरानी था। नूरजहां का असली नाम मेहरून्निसा था। नूरजहां का पिता अकबर के काल में आगरा आया और धीरे-धीरे उसने अपनी योग्यता व बुद्धि से 300 का मनसब प्राप्त किया। नूरजहां एक सुन्दर और बुद्धिमान स्त्री थी। वह अपनी माता के साथ महल में कभी-कभी जाया करती थी।

उसके रूप और सौंदर्य को देखकर शहजादा सलीम (जहांगीर) उस पर मोहित हो गया वह उससे विवाह करना चाहता था लेकिन अकबर ने इसका विरोध किया तथा मेहरून्निसा की शादी शेर अफगान के साथ करा दी। अकबर ने शेर अफग़ान को वर्दवान का सवेदार नियुक्त कर दिया। 1607 की एक लड़ाई में शेर अफगान मारा गया और महरून्निसा वापस आगरा आ गयी। 1611 ई. में जहांगीर ने मेहरून्निसा से विवाह किया और उसे नूरजहां की उपाधि दी।

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नूरजहां की राजनीतिक भूमिका – जहांगीर से विवाह होने के बाद नूरजहां ने राज्य प्रशासन में बड़ी रूचि ली। जब जहांगीर बहुत समय तक बीमार रहा तो उसने प्रशासन कार्य को सम्भाला और साम्राज्य का प्रबंध चलाया। कुछ आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि उसने धीरे-धीरे अपने पिता, भाई आसफखां और जहांगीर के पुत्र खुर्रम को अपने साथ मिला कर दरबार में एक गुट बना लिया।

कुछ समय तक इस गुट ने राज्यों के मामले में अपनी ही इच्छा के अनुसार जहांगीर को चलाया। कुछ समय बाद नूरजहां की पुत्री लाडली बेगम का विवाह जहांगीर के दूसरे पुत्र शहरयार से हो गया। इस घटना के बाद नूरजहां के गुट में फूट पड़ गयी। नूरजहां जो पहले खुर्रम को जहांगीर का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी अब अपने दामाद शहरयार को गद्दी दिलाने का प्रयत्न करने लगी। 1622 ई. में खुर्रम विद्रोही हो गया और कुछ समय बाद महावतखां ने भी विद्रोह किया।

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डॉ. स्थिम जैसे इतिहासकार नूरजहां के प्रभाव को साबित करने के लिए कहते हैं कि “सिंहासन के पीछे वास्तविक शक्ति नूरजहां थी।” जहांगीर स्वयं कहा करता था: “जब नूरजहां के पास तख्त की बागडोर है, मुझे केवल आधा सेर मांस और एक प्याला शराब की ही आवश्यकता है।” वास्तव में जहांगीर नूरजहां से प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य में उसकी राय लिया करता था। राज्य के सिक्कों पर जहांगीर के नाम के साथ उसका नाम भी लिखा जाता था।

कुछ अन्य इतिहासकार उपर्युक्त दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार तुजके जहांगीरी (जहांगीर की आत्म-कथा) से यह स्पष्ट है कि जहांगीर 1622 ई. तक सभी राजनैतिक निर्णय स्वयं लिया करता था। वास्तव में 1622 ई. से जहांगीर का स्वास्थ्य खराब होने के बाद कुछ समय के लिए नूरजहां का प्रभाव बढ़ा। इन विचारकों के अनुसार 1611 ई. से 1622 ई. की अवधि में नूरजहां की राजनैतिक भूमिका स्पष्ट नहीं है।

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वे इस बात को मानते हैं कि नूरजहां का प्रभाव केवल शाही घराने तक ही सीमित था। उसने फारसी कला और संस्कृति को बढ़ावा दिया और वह जहांगीर को कभी-कभी कुछ लोगों की भलाई के लिए सिफारिश कर देती थी। इस दूसरी विचारधारा के इतिहासकार इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है कि जहांगीर पूरी तरह उस पर या उसके गुट पर निर्भर था।

जो भी हो नूरजहां ने अपने पति के प्रशासन भार को कम करने में सहयोग दिया। उसने फैशन, पोशाक और आभूषण के डिजाइनों में क्रांतिकारी परिवर्तन किये। उसने गरीब और दुःखी महिलाओं को राज्य सहायता प्रदान की। नूरजहां की राजनीतिक भूमिका के जहां अच्छे परिणाम हुए वहां उसी के बढ़ते प्रभाव और चालों के कारण शहजादा खुर्रम ने विद्रोह किया और खुर्रम के विद्रोह के कारण कंधार मुगलों के हाथों से निकलकर ईरान के पास चला गया ।

उसी के बढ़ते प्रभाव और चालों के विरोध में 1626 ई. में महावतखां ने भी विद्रोह किया लेकिन नूरजहां ने अपनी चालाकी से जहांगीर को उसकी कैद से मुक्त कराकर पुनः अपनी बुद्धिमता का परिचय दिया। महावतखां ने जहांगीर की अधीनता स्वीकार कर ली और जहांगीर ने उसे क्षमा कर दिया।

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महावतखां के कुछ ही महीनों बाद (1627 ई.) जहांगीर की मृत्यु हो गयी। नूरजहां ने अपने दामाद शहरयार को लाहौर में हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित किया लेकिन शाहजहां अपने ससुर आसफखां की सहायता से नूरजहां की इस चाल को असफल कर स्वयं गद्दी पर बैठने में सफल हुआ। उसने नूरजहां को राजनीति से पूरी तरह अलग कर दिया। नूरजहां की मृत्यु 1645 ई. में हो गयी। 

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