History of Akbar in Hindi – अकबर का इतिहास हिंदी

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अकबर का जन्म राजपूत शासक राणा अमरसाल के महल उमेरकोट, सिंध (वर्तमान पाकिस्तान) में २३ नवंबर, १५४२ (हिजरी अनुसार रज्जब, ९४९ के चौथे दिन) हुआ था। यहां बादशाह हुमायुं अपनी हाल की विवाहिता बेगम हमीदा बानो बेगम के साथ शरण लिये हुए थे। इस पुत्र का नाम हुमायुं ने एक बार स्वप्न में सुनाई दिये के अनुसार जलालुद्दीन मोहम्मद रखा।

अकबर ने हिन्दुओं के प्रति उदार धार्मिक नीति अपनायी। उसके उदार धार्मिक विचारों के लिए अनेक तत्व और व्यक्ति जिम्मेवार थे। अकबर की मां (हमीदा बानो) और शिक्षक (बैरम खां) शिया सम्प्रदाय से सम्बंध रखते थे। उनके प्रभाव से अकबर का मन उदार बना। उसके शिक्षक अब्दुल लतीफ के उदार विचारों ने भी उसे प्रभावित किया।

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अकबर की राजपूत पत्नियों ने उसे सहनशील बनने में मदद की। वह अपने मुगल वंश की नींव हिन्दुओं (जो भारत में बहुसंख्यक थे) के सहयोग से सुदृढ़ करना चाहता था। उसने हिन्दुओं के सैनिक नेता राजपूतों को वीर और स्वामीभक्त देखा था। इबादतखाने के वाद-विवाद, भक्ति और सूफी आन्दोलनों ने उसके धार्मिक विचारों को उदार एवं सहनशील बनाया।

हिन्दुओं के प्रति अपनायी नीति के प्रमुख अंग

अकबर ने हिन्दुओं को अपना मित्र बनाने के लिए और उन्हें मुसलमानों के निकट लाने के लिए अनेक प्रयास किये। जिनमें से निम्न प्रमुख थे

(1) अकबर ने हिन्दू और मुसलमानों के साथ समान व्यवहार किया।

(2) उसने जजिया कर समाप्त किया। इससे उसने हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस लगने से बचाया। यद्यपि यह कर भारी नहीं होता था फिर भी इसे पसंद नहीं किया जाता था।

(3) अकबर ने हिन्दुओं के तीर्थ स्थानों जैसे प्रयाग और बनारस पर लगने वाले कर (तीर्थयात्रा कर) को समाप्त कर दिया।

(4) अकबर ने हिन्दुओं को अनेक उच्च पद और मनसब दिए। उसने राजपूत राजा भारमल, भगवानदास और मानसिंह के साथ टोडरमल और बीरबल को उच्च पदों पर नियुक्त किया। उसने टोडरमल को राजस्व एवं भूमि सुधार के मामलों का विशेषज्ञ नियुक्त किया। बीरबल को अपने दरबार के नौरनों में स्थान दिया।

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(5) उसने हिन्दुओं के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए।

(6) अकबर ने युद्धबन्दियों के जबरन धर्म परिवर्तन की प्रथा को समाप्त किया। उसने किसी भी अधिकारी को दीन-ए-इलाही नामक धर्म का अनुयायी बनने के लिये दबाव नहीं डाला।

(7) अकबर ने विश्व के प्रमुख धर्मों के विद्वानों का समान आदर किया। वह सूफी और हिन्दू विद्वानों के सम्पर्क में रहा और उसके विचारों से प्रभावित होकर सुलहकुल की नीति का अनुसरण किया।

(8) अकबर ने इबादतखाने की स्थापना 1575 ई. में की, जहां वह अनेक सम्प्रदायों के विद्वानों को बुलाकर उनके विचार सुनता था। इसी इबादतखाने की चर्चाओं ने उसे कट्टर काजियों द्वारा बदनामी दिलायी। काजियों ने अकबर को धर्म विरोधी बताते हुए अनेक फतबे दिए। लेकिन अकबर ने उन धर्मान्ध और कट्टर लोगों के विद्रोह को कुचल दिया और काजियों को कड़ी सजायें दीं।

(9) अकबर ने तोहीद-ए-इलाही या दीन-ए-इलाही नामक नया धर्म चला कर विश्व के अनेक धर्म अनुयायियों को परस्पर मिलकर रहने का संदेश दिया। यद्यपि अकबर द्वारा प्रारम्भ किया यह धर्म उसके साथ ही समाप्त हो गया, लेकिन उसने यह प्रमाणित कर दिया कि विश्व के सभी धर्मों में कुछ न कुछ अच्छी बातें हैं और सभी धर्म मानव-कल्याण में विश्वास रखते हैं।

(10) अकबर ने हिन्दुओं के साथ-साथ शियाओं और सूफियों के साथ भी समानता का व्यवहार किया।

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अकबर की धार्मिक नीति के अनेक प्रभाव पड़े

(1) धर्मनिरपेक्ष राज्य की नींव – उसकी इसी नीति ने एक ऐसे साम्राज्य की नींव रखी जो किसी धार्मिक भेद-भाव के बिना सभी नागरिकों को समान समझ कर कार्य कर सकता था। उसने सारे समाज में सन्तुलन बनाये रखने के लिए ‘सुलहकुल’ अथवा सबके लिये शांति की नीति अपनायी।

(2) हिन्दुओं का समर्थन व मित्रता – अकबर की सहनशील धार्मिक नीति के कारण हिन्दू उसके मित्र बन गये। उन्होंने मुगलों का विरोध करना छोड़ दिया। वे मुगल साम्राज्य की सेवा व प्रगति में सच्चे हृदय से योगदान देने लगे।

(3) मुगल साम्राज्य का विस्तार और विद्रोहों का दबाना – हिन्दुओं ने अकबर की साम्राज्य विस्तार में योगदान दिया और अनेक मुसलमान अधिकारियों के विद्रोहों को दबाने में योगदान दिया। उन्हीं के सहयोग से मुगलवंश की जड़ें पक्की हो गयी और यह वंश अकबर के बाद अनेक वर्षों तक राज्य करता रहा।

(4) देश का आर्थिक विकास – अकबर की उदार धार्मिक नीति ने देश की आर्थिक दशा को सुधारने में योगदान दिया क्योंकि वह ‘सुलहकुल’ की नीति में विश्वास करता था। इससे अनावश्यक युद्ध नहीं हुए और देश के व्यापार व वाणिज्य के लिये अनुकूल वातावरण मिला।

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दीन-ए-इलाही के प्रमुख सिद्धांत

(1) दीन-ए-इलाही का अर्थ – इबादतखाने में अलग-अलग धर्मों के नेताओं के सम्पर्क में आने के बाद अकबर को यह विश्वास हो गया कि सभी धर्मों में कई अच्छी बातें हैं लेकिन वे धार्मिक नेताओं के परस्पर लड़ाई-झगड़े और विरोध के कारण हमारे सामने पूरी तरह नहीं आयी। इसीलिए उसने सभी धर्मों के अच्छे सिद्धांतों को इकट्ठा करके एक नये धर्म को चलाया। तत्कालीन इतिहासकार अबुलफजल और बदायूंनी ने इस तथाकथित नये धर्म के लिए तोहिद-ए-इलाही शब्द का प्रयोग किया। जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘दैवी एकेश्वरवाद’। साधारणतया इसे दीन-ए-इलाही के नाम से जाना जाता है।

(2) दीन-ए-इलाही के मुख्य सिद्धांत-इस धर्म के अनुयायी निम्न सिद्धांतों में विश्वास करते थे :

(i) ईश्वर एक है और अकबर उस खलीफा या पैगम्बर का प्रतिनिधि है।

(ii) इस धर्म के मिलने वाले जब कभी एक दूसरे से मिलते तो पहला व्यक्ति ‘अल्लाह-उ-अकबर’ कहता तो दूसरा ‘जल्ले-जलालहू’ कहकर उसका उत्तर देता था।

(iii) इस मार्ग में दीक्षित होने वाला नया व्यक्ति इतबार के दिन सम्राट के कदमों पर सिर रखता था और सम्राट उसे उठाकर मंत्र देता था तथा वह व्यक्ति इस मंत्र को बार-बार दोहराता था।

(iv) जहां तक हो इस धर्म का अनुयायी मांस खाने से दूर रहता था।

(v) प्रत्येक सदस्य को अपने जन्म दिन पर भोज तथा दान देना पड़ता था।

(vi) इस मत को मानने वाले सूर्य की उपासना करते थे तथा अग्नि को पवित्र समझते थे।

(vii) इस धर्म के मानने वालों को दीक्षा के अतिरिक्त किसी आडम्बर या पूजा-स्थल, या किसी विशेष पवित्र पुस्तक का सम्मान करने का आदेश नहीं था।

(viii) प्रत्येक सदस्य अपने आचरण को ऊंचा रखने और सबकी भलाई का संकल्प करता था।

(ix) इस धर्म के अनुयायी सभी धर्मों का समान आदर करते थे।

(x) इस मत के अनुयायी बालविवाह और बूढ़ी स्त्रियों के विवाह के विरोधी थे।

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(3) ‘दीन-ए-इलाही’ का प्रचार – ‘दीन-ए-इलाही’ वास्तव में सूफी मत से मेल खाता था। इस धर्म के मानने वालों की संख्या बहुत ही कम थी। केवल 18 बड़े-बड़े व्यक्तियों ने ही इस मार्ग को ग्रहण किया। अकबर ने अपना यह धार्मिक मत बलपूर्वक नहीं लादा और उसके अनेक बड़े-बड़े सरदारों ने इसमें शामिल होने से इन्कार कर दिया।

(4) ‘दीन-ए-इलाही’ का महत्व या क्या ‘दीन-ए-इलाही’ अकबर की मूर्खता का प्रतीक था – ‘दीन-ए-इलाही’ की भूमिका और अकबर के इस नये धर्म को चलाने के प्रयत्न को लेकर इतिहासकारों में बहुत मतभेद है। प्रो. एस. आर. शर्मा का कथन है, ‘अकबर का इस मत को चलाने का उद्देश्य राजनैतिक था न कि धार्मिक।

इतिहासकार बदायूनी ने इस मत को चलाने का कारण अयोग्य चापलूसों और विधर्मियों द्वारा अकबर का दिमाग खराब करना बताया है। इस इतिहासकार के अनुसार उन चापलूसों ने अकबर को इन्सान-ए-कामिल’ अथवा ‘परिपूर्ण मनुष्य’ कह कर उसे स्वयं पैगम्बर बनने के लिये उकसाया और इसीलिए उसने अपने लिए केवल खुदा को ही की जाने वाली पाबोस (जमीन पर लेटकर कदम चूमना) की रीति को चालू किया और धीरे-धीरे वह इस्लाम से दूर हो गया।

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इतिहासकार अबुलफजल अकबर के इस प्रयत्न की प्रशंसा करते हुए कहता है कि शासक को अपने लोगों का आध्यात्मिक मार्ग-दर्शन करना चाहिये और अकबर में यह योग्यता थी।

‘सुलहकुल’ की परिकल्पना

अकबर अपने साम्राज्य के विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोगों में शांति और सामन्जस्य (अनुकूलता) का वातावरण पैदा करना चाहता था जिससे विभिन्न धर्मों के लोग परस्पर एक दूसरे के निकट आयें और आपस में एक दूसरे को समझें जिससे नफरत और घृणा के स्थान पर लोगों में प्रेम और सहानुभूति उत्पन्न हो । उसने अपनी हिंदू प्रजा के प्रति एक सच्चे शासक की तरह उदारता और बिना किसी भेदभाव के पिता के समान रखा।

उसने समाज में विभिन्न वर्गों और सम्प्रदाय के लोगों में सन्तुलन बनाये रखने की कोशिश की। उसने सभी धर्मों के विचारकों के विचारों को सुना, समझा और अपनी जनता के सामने हिन्दू, ईसाई, पारसी और इस्लाम सभी धर्मों को मिला कर तोहीद-ए-इलाही या दीन-ए-इलाही नामक धर्म जनता के सामने रखा।

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उसका उद्देश्य परस्पर विरोधी सम्प्रदायों में सुलह और सामंजस्य स्थापित करना था। उसने इसी उद्देश्य के लिये एक अनुवाद विभाग (Translation Department) की स्थापना की। इस विभाग में प्राचीन संस्कृत, अरबी, ग्रीक, आदि भाषाओं की रचनाओं और ग्रन्थों का फारसी भाषा में अनुवाद किया जाता था। उसने अर्थवेद, महाभारत, गीता, रामायण, बाईबल और कुरान का अनुवाद कराया।

उसका विचार यह था कि जब लोग एक दूसरे के साहित्य का अध्ययन करेंगे तो वे एक दूसरे को अधिक समझेंगे और परस्पर निकट आयेंगे। उसने शिक्षा के क्षेत्र में धर्मनिरपेक्ष (Secular) विषयों की जैसे इतिहास, तर्कशास्त्र, कृषि, आदि को पाठ्यक्रम में शामिल कराया। अकबर ने उपर्युक्त सभी प्रयत्न ‘सुलहकुल’ की परिकल्पना को सफल बनाने के लिए ही उठाये थे।

‘सुलहकुल’ का महत्व

अकबर की सुलहकुल की परिकल्पना का चाहे बहुत प्रभाव पड़ा या नहीं लेकिन उसका प्रयत्न अवश्य ही प्रशंसनीय था। उसके प्रयत्नों के कारण देश में सर्वप्रथम धर्मनिरपेक्ष राज्य, सांस्कृतिक एकता और उदारता व सहानुभूति के वातावरण की नींव रखी गयी।

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अकबर की राजपूत नीति

अकबर ने राजपूतों के प्रति एक विशेष प्रकार की नीति अपनायी। जहां तक सम्भव था उसने राजपूतों से मित्रता तथा मेल मिलाप की नीति को ही अपनाया। उसने राजपूतों से समानता का व्यवहार किया। उनकों उच्च पद दिये एवं उनसे वैवाहिक सम्बंध स्थापित किये। अकबर ने राजपूतों को पूरी धार्मिक स्वतंत्रता भी प्रदान की। लेकिन जब कभी वह मित्रता की नीति से उनको मनाने में असफल हो जाता था तो वह (अकबर) युद्ध का तरीका अपनाने में भी नहीं चूकता था। उसकी राजपूत नीति की मुख्य विशेषतायें या अंग निम्न थेः

(1) अकबर के राजपूतों से वैवाहिक संबंध – अकबर ने राजपूतों को अपने समीप लाने के लिये उनसे वैवाहिक सम्बंध स्थापित किये। उसने 1562 ई. आमेर के राजा भारमल की पुत्री से विवाह किया। बाद में उसी से उत्पन्न अपने पुत्र शहजादा सलीम को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। राजा भारमल का अनुसरण करते हुए बीकानेर, मारवाड़ तथा जैसलमेर, आदि के राजाओं ने भी अकबर से वैवाहिक सम्बंध स्थापित किये।

उसने अपनी राजपूत पत्नियों से समानता और सम्माननीय व्यवहार किया। उसने उन सभी को पूरी धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की। उनके सम्बंधियों को उच्च मनसब और पद प्रदान किये। अकबर ने राजपूतों से संधियां करते वक्त उन्हें अपने साथ वैवाहिक सम्बंध जोड़ने के लिये विवश नहीं किया। उदाहरणार्थं, रणथम्भोर के हाड़ावंश के राजपूत राजाओं ने अकबर से वैवाहिक सम्बंध स्थापित नहीं किये लेकिन वे उसके मित्र और कृपापात्र थे।

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(2) राजपूतों को उच्च पद एवं मनसव दिये – अकबर ने परम्परावादी संकीर्ण मुस्लिम शासकों की गलत नीतियों को त्याग कर राजपूतों को शाही सेवा में अनेक उच्चपद और मनसव प्रदान किये उसने राजा भारमल को अपने दरबार में बहुत ही सम्मानीय पद दिया। उसका पुत्र भगवानदास 5,000 मनसब तक पहुंचा और उसका पौत्र (grandson) राजा मानसिंह तो 7,000 के सर्वोच्च मनसव तक पहुंचा।

अकबर ने 7,000 का मनसब केवल एक मुस्लिम अजीजखां कोका (जो अकबर का धाय पुत्र था) को ही प्रदान किया। इतना सर्वोच्च मनसव अत्यधिक विश्वसनीय व्यक्ति को ही दिया जा सकता था। अनेक राजपूतों को सैनिक और असैनिक पदों पर भर्ती किया गया।

(3) धार्मिक स्वतंत्रता – अकबर ने अपने सभी राजपूत अधिकारियों और कर्मचारियों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की। वे राजदरबार और महलों में रहकर भी अपने सभी त्यौहार और रीति-रिवाज मना सकते थे।

(4) जजिया हटाना व तीर्थकर समाप्त करना – अकबर ने अपनी सहनशील धार्मिक नीति के कारण 1564 ई. में जज़िया जैसे निन्दनीय कर को हटा दिया जजिया कर का प्रयोग उससे पूर्व प्रायः सभी रूढ़िवादी मुस्लिम शासकों ने हिन्दुओं और गैर-इस्लामी लोगों को नीचा दिखाने के लिए वसूल किया। उसने हिन्दुओं से लिया जाने वाला तीर्थ यात्राकर भी समाप्त कर दिया।

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(5) कुछ शासकों से व्यक्तिगत सम्बंध – अकबर ने अनेक राजपूत राजाओं के साथ बहुत ही निकट और प्रशंसनीय सम्बंध स्थापित किये। सन् 1539 में जब बीकानेर शासक रायसिंह का दामाद पालकी से गिरने के कारण मर गया तो अकबर स्वयं उसकी शवयात्रा में गया। उसने रायसिंह की लड़की को सती होने से रोका क्योंकि उसके बच्चे बहुत छोटे थे। उसने राजा रायसिंह और उसके दुखी परिवार को सांत्वना दी।

(6) कुछ राजपूतों के विरूद्ध सैनिक बल का प्रयोग – अकबर ने जब कभी अपनी प्रभुता और उदारता की नीति से राजपूतों को अपनी अधीनता स्वीकार करने में असफलता देखी तब युद्ध का सहारा लिया। जब अम्बर, जोधपुर और जैसलमेर के राजाओं ने अकबर के प्रभुत्व को मान लिया तो अकबर ने उनके सम्मान को अनावश्यक ठेस नहीं पहुंचाई और उनसे मित्रता के सम्बंध बनाये।

मेवाड़ ही एक ऐसा राजपूत राज्य था जहां के महान शासक महाराणा प्रताप एवं उनके उत्तराधिकारी उदयसिंह ने अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं किया। वे जीवन भर अकबर का सामना वीरतापूर्वक करते रहे। मेवाड़ को अकबर पूरी तर अपने आधीन नहीं कर सका। यद्यपि मेवाड़ की तरह मारवाड़ ने भी अकबर का विरोध किया लेकिन उसे शीघ्र ही पराजित कर दिया गया और उसे अकबर के प्रभुत्व को मानना पड़ा।

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अकबर की राजपूत नीति के परिणाम

(1) राजपूतों द्वारा मुगल साम्राज्य की सेवा – अकबर की मित्रवत और उदार राजपूत नीति के फलस्वरूप मेवाड़ के अतिरिक्त सभी राजपूत राजाओं ने एवं उन राज्यों के लोगों ने अनेक सैनिक और प्रशासनिक पदों पर कार्य करके मुगल साम्राज्य की सेवा की। राजपूतों के सैनिक और प्रशासनिक सहयोग के कारण अकबर ने केवल अनेक विजयें ही प्राप्त नहीं कीं बल्कि एक कुशल प्रशासन भी लोगों को प्रदान किया। उसके काल में प्रशासन में अनेक सुधार किए गये और अनेक क्षेत्रों में प्रगति हुई।

(2) साम्राज्य विस्तार – राजपूतों के सैनिक सहयोग एवं सेवा के कारण अकबर ने उत्तरी भारत की अधिकांश रियासतों के साथ-साथ काबुल, कंधार और दक्षिण की कुछ रियासतों को अपने साम्प्रजय का अंग बनाने में सफलता प्राप्त की।

(3) राजस्थान में शांति और समृद्धि – अकबर एवं राजपूतों में मित्रता के फलस्वरूप राजस्थान अनावश्यक युद्धों के विनाश एवं अशांति से बचा रहा। शांति और व्यवस्था के वातावरण ने वहां के लोगों को अपनी आर्थिक दशा सुधारने में सहयोग दिया।

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(4) सांस्कृतिक समन्वय – राजपूतों के प्रति अपनायी गयी उदार नीति के कारण कला, साहित्य एवं भाषा के क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति का सुन्दर समन्वय हुआ। राजपूत और मुगल कलाकारों ने अकबर काल में स्थापत्य कला और चित्रकला के क्षेत्रों में राष्ट्रीय शैली को जन्म दिया।

(5) मुगल साम्राज्य की नींव सुदृढ़ – अकबर की दूरदर्शिता और राजपूतों के प्रति मित्रवत् नीति के कारण ही मुगल साम्राज्य की नींव इतनी सुदृढ़ और गहरी हो गयी कि वह उसके बाद भी कई वर्षों तक चलता रहा। उसने हिन्दू-मुस्लिम को एक-दूसरे के नजदीक आकर परस्पर समझने के लिए उच्छा वातावरण तैयार किया।

यद्यपि अकबर शत-प्रतिशत राजपूतों से मित्रता के सम्बंध बनवाने में सफल नहीं हुआ लेकिन उसने अपने उत्तराधिकारियों के लिए एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया। जब तक वे अकबर की उदार नीतियों पर चलते रहे, मुगल साम्राज्य उन्नति के मार्ग पर बढ़ता रहा। 

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