Haldi Ghati Ka Yudh – हल्दी घाटी का युद्ध

Haldi-Ghati-Ka-YudhHaldi Ghati Ka Yudh

देश की आजादी के लिए जिन राष्ट्रवीरों ने असंख्य कष्ट सहे, जीवन भर संघर्ष किया, त्याग एवं बलिदान दिया, महाराणा प्रताप उनमें से एक  थे I

Haldi Ghati Ka Yudh – हल्दी घाटी का युद्ध

महाराणा प्रताप – महाराणा प्रताप उदयसिंह के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनका जन्म 6 मई, 1540 ई. में हुआ था। उनकी माता का नाम जयवंता बाई था, जो अक्षयराज सोनारा की थी। प्रताप संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ ‘ऐश्वर्य’ होता है। उन्होंने अपने 25 वर्ष के शासनकाल में अपने नाम को सार्थक कर दिखा दिया।

महाराणा उदयसिंह ने अपने छोटे पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, जिसे सलुम्बर के किशनदास एवं देवगढ़ के रावत ने गद्दी पर बिठा दिया, परन्तु ग्वालियर के रामसिंह तथा जालौर के अक्षयराज की सहायता से 28 फरवरी, 1572 ई. को गोगुन्दा में प्रताप मेवाड़ के शासक बने। उस समय प्रताप ने गोगुन्दा को अपनी राजधानी बनाया था।

प्रताप की कठिनाइयां

प्रताप जब मेवाड़ के शासक बने, तब उनके सामने कई कठिनाइयाँ थीं, जो इस प्रकार थीं –

(1) मेवाड़ के अतिरिक्त राजस्थान के समस्त राज्यों (आमेर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, कोटा एवं बूंदी आदि) के शासक अकबर की अधीनता स्वीकार कर चुके थे।

Haldi Ghati Ka Yudh – हल्दी घाटी का युद्ध

(2) प्रताप के भाई जगमाल तथा शक्तिसिंह भी अकबर की सेवा में जा चुके थे। अकबर ने जगमाल को पहले जहाजपुर का परगना तथा बाद में सिरोही का आधा राज्य दे दिया।

(3) चित्तौड़ के किले के साथ मेवाड़ के अधिकांश भाग पर अकबर का अधिकार था।

(4) मेवाड़ – मुगल संघर्ष प्रताप को विरासत में प्राप्त हुआ था। अकबर सम्पूर्ण मेवाड़ पर अधिकार करना चाहता था और प्रताप का पूर्ण समर्पण चाहता था। अतः प्रताप तथा अकबर के बीच युद्ध अनिवार्य था।

सिंहासन पर बैठते समय प्रताप ने यह प्रतिज्ञा की कि वह अन्तिम सांस तक मुगलों से युद्ध लड़ेंगे और सारे मेवाड़ पर अधिकार करने के बाद ही चैन की सांस लेंगे। राणा प्रताप का यह निश्चय बड़ा ही कठिन कार्य था क्योंकि –

Click on below links to read more | अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

More Hindi Blogs

History in Hindi Articles

Battle of Khanwa – खानवा का युद्ध

(i) मुगल सम्राट अकबर अपने समय का सबसे शक्तिशाली और धनवान सम्राट था।

(ii) अकबर को राजस्थान के लगभग सभी राजाओं का समर्थन प्राप्त था।

(iii) अकबर की तुलना में प्रताप के साधन अत्यन्त सीमित थे। दुर्भाग्यवश मेवाड़ की राजधानी पर भी प्रताप का अधिकार नहीं था।

प्रताप भी चाहते , तो आमेर व अन्य राज्यों के शासकों की भांति अकबर से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर अधीनता स्वीकार कर सकते थे और मुगल दरबार में मान सम्मान प्राप्त कर सकते थे, परन्तु उन्होंने स्वतंत्रता का पथ चुना जीवन के अन्तिम समय तक वह अकबर के विरुद्ध संघर्ष करते रहे, परन्तु उसकी दासता स्वीकार नहीं की। यह संघर्ष एक स्थानीय शासक का सम्पूर्ण देश के सम्राट के विरुद्ध संघर्ष था। महाराणा प्रताप अकबर को ‘तुरक’ कहा करते थे, जबकि अकबर प्रताप को ‘कीका’ के नाम से सम्बोधित करता था।

Haldi Ghati Ka Yudh – हल्दी घाटी का युद्ध

अकबर द्वारा वार्तालाप के माध्यम से अधीनता स्वीकार करने के प्रयास –

(1) अगस्त 1572 ई. में अकबर ने जलाल खां को मेवाड़ के महाराणा प्रताप के पास वार्ता के लिए भेजा, परन्तु वह प्रताप को अधीनता स्वीकार करवाने में असफल रहा।

(2) अकबर ने अगस्त, 1573 ई. में आमेर के शासक मानसिंह को प्रताप के पास भेजा, ताकि वह प्रताप को मुगल अधीनता स्वीकार करने हेतु दवाब डाल सके। उसका यह मानना था कि मानसिंह राजपूत जाति का था। अतः या तो बातचीत सफल हो जायेगी या फिर राजपूतों में आपस में फूट पड़ जायेगी। इस प्रकार अकबर ने राजपूतों को राजपूतों से ही (प्रताप को मानसिंह से) लड़ाने का प्रयास किया।

(3) सितम्बर, 1573 ई. में भगवन्त दास को राजा के पास भेजा गया, परन्तु उसे भी अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त नहीं हुई।

Haldi Ghati Ka Yudh – हल्दी घाटी का युद्ध

हल्दी घाटी के युद्ध की ओर

जब अकबर को वार्तालाप के द्वारा प्रताप की मुगल अधीनता स्वीकार करवाने में सफलता नहीं मिली, तब उसने 1576 ई. में मानसिंह और आसफ खां को एक विशाल सेना के साथ राणा के विरुद्ध भेजा। अकबर का यह मानना था कि प्रताप खुले मैदान में आकर युद्ध करेंगे, अत: मुगल सेना के लिए उसको पराजित करना बहुत आसान हो जायेगा।

युद्ध के कारण

इस युद्ध के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

(1) अकबर राणा प्रताप की व्यक्तिगत उपस्थिति के लिए जिद्द करता रहा। प्रताप ने बादशाह के प्रति मैत्री भावना प्रदर्शित की, परन्तु फिर भी अकबर ने उनके विजित प्रदेश नहीं लौटाये। अतः प्रताप का असंतोष बढ़ने लगा। अतः उसने अकबर से असंतुष्ट राजाओं के साथ मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने के प्रयास किए।

Haldi Ghati Ka Yudh – हल्दी घाटी का युद्ध

इनमें ग्वालियर के राजा रामसिंह, सिरोही के राव सुरताण तथा जोधपुर के शासक राव चन्द्रसेन का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। प्रताप द्वारा स्थापित किये जा रहे इन मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों को अकबर कभी बर्दास्त नहीं कर सकता था।

(2) अकबर मालवा तथा गुजरात पर अधिकार करना चाहता था। अतः इसके लिए मेवाड़ पर अधिकार करना अत्यन्त आवश्यक था।

(3) जब अकबर को वार्तालाप द्वारा प्रताप को मुगल अधीनता स्वीकार करवाने में सफलता नहीं मिली, तो उसके सामने युद्ध के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं रह गया था।

Haldi Ghati Ka Yudh – हल्दी घाटी का युद्ध

हल्दी घाटी का युद्ध – डॉ. ए. एल. श्री वास्तव के अनुसार हल्दी घाटी का युद्ध 18 जून, 1576 ई. के लड़ा गया था। इस तिथी के समर्थन में उन्होंने अकबर नामा, जिल्द 3 पृष्ठ 174 को उद्धृत किया है, जबकि डॉ. जी. एन. शर्मा के अनुसार हल्दी घाटी का युद्ध 21 जून को हुआ था। वे अपनी तिथी के समर्थन में बदायूँनी, अबुल फजल और जगन्नाथ राय अभिलेख का हवाला देते हैं।

हाटी गोद (उदयपुर) के पास स्थित थी. जिसका अरण दिया गया है। यह युद्ध हल्दीघाटी के प्रवेश पर हुआथा, हल्दी घाटी में नहीं, क्योंकि हल्दीघाटी इतनी कड़ी थी कि दो घुड़सवार उसमें से एक साथ नहीं गुजर सकते थे। अबुल फजल ने इसे खमनीर का युद्ध तथा बदायूँनी ने इसे गोगुन्दा का युद्ध कहा है।

मेवाड़ के महाराणा प्रताप ने हल्दी घाटी नामक स्थान पर मुगल सेना का डटकर मुकाबला किया। इस युद्ध में मुगल सेना में मानसिंह, आसपा खां एवं बदायूँनी के अतिरिक्त पांच हजार सैनिक थे। इसके अतिरिक्त जगन्नाथ कच्छावा तथा माधोसिंह कछावा (ये दोनों मानबाई के भाई थे) तथा सांभर का राजा लूणकरण भी मुगल सेना में उपस्थित था।

Haldi Ghati Ka Yudh – हल्दी घाटी का युद्ध

दूसरी ओर प्रताप की सेना में तीन हजार सैनिक थे। उनकी सेना में सुलम्बर का किशन दास, सादही का झाला, बदनौर का रामदास, हकीम खां सूर, ग्वालियर का रामसिंह एवं असंख्य भील तीर कमान हाथ में लिए हुए मौजूद थे। बदायूँनी ने अकबर से कहा था कि हल्दी घाटी के युद्ध में जाकर में अपनी काली दाढ़ी और मूंछों को काफिरों के खून से रंगना चाहता हूँ।

इस पर अकबर ने बदायूँनी को युद्ध में जाने की अनुमति दे दी थी। बदायूँनी ने आसफ खां से पूछा कि कौन से पक्ष के और कौन से विपक्ष के राजपूत सैनिक है। इस पर आसफ खां ने कहा कि राजपूत किसी भी पक्ष के हों, उनको मारने से इस्लाम का लाभ ही होगा। इस पर बदायूँनी ने दोनों पक्षों के राजपूतों को मारा I

युद्ध के दौरान ही यह खबर फैल गई कि अकबर सेना लेकर स्वयं रणक्षेत्र में पहुंच रहा है। इस झूठी खबर को सुनकर मुगल सैनिक जमकर प्रताप की सेना से युद्ध करने लगे, परन्तु प्रताप ने युद्ध क्षेत्र से कोलियारी की और प्रस्थान कर दिया, परन्तु कुछ दूर पहुंचने पर ही उनके वफादार घोड़े चेतक के प्राण पखेरू हो गए।

Haldi Ghati Ka Yudh – हल्दी घाटी का युद्ध

हल्दी घाटी के इस युद्ध में प्रताप की ओर से बदनौर का शासक रामदास एवं ग्वालियर का शासक रामसिंह लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए। जगदीश मंदिर प्रशस्ति के अनुसार इस युद्ध में हजारों सैनिक मारे गये थे, परन्तु बदायूँनी जो इस युद्ध में उपस्थित था. उसके अनुसार इसमें दोनों पक्षों के लगभग 500 सैनिक मारे गये थे।

बदायूँनी का कथन सत्य प्रतीत होता है। इस युद्ध में राणा प्रताप का एक हाथी रामप्रसाद मुगलों के हाथ में लगा। यह हल्दी घाटी की उल्लेखनीय लूट थी। बदायूँनी ने इसका नाम ‘पीर प्रसाद’ रखा, क्योंकि उसके अनुसार यह सब पीर की कृपा से ही प्राप्त हुआ था। हल्दी घाटी के युद्ध में प्रताप की पराजय एवं मुगल सेना की विजय हुई थी।

डॉ. वी. ए. स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘दी ग्रेट मुगल’ में लिखा है कि यह ऐसा युद्ध था. जिसमें जीतने वालों की अपेक्षा हारने वाले अधिक प्रशंसा के पात्र थे। बदायूँनी ने लिखा है कि जब उसने लोगों को मुगल सेना के विजयी होने का समाचार बताया तो उन्हें उसकी बात पर विश्वास नहीं किया।

Haldi Ghati Ka Yudh – हल्दी घाटी का युद्ध

हल्दी घाटी के युद्ध के बाद न तो पकड़े गए और न ही सम्पूर्ण मेवाड़ पर अकबर का अधिकार हो सका। अत: इससे क्षुब्ध होकर दो माह बाद अकबर ने स्वयं एक विशाल सेना लेकर प्रताप को पकड़ने के लिए मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया, परन्तु उसको भी असफलता हाथ लगी।

1576 से 1585 ई. तक प्रताप मुगल सेना का सामना करते रहे। मुगल सेना ने एक-एक करके प्रताप के सारे दुर्ग छीन लिए, वह वन में रहने लगे लेकिन स्वतंत्रता संघर्ष जारी रखा ऐसे संकटपूर्ण समय में दानवीर भामाशाह ने महाराणा प्रताप को बीस हजार स्वर्ण मोहरे भेंट की अकबर अपने जीवन के अन्तिम समय तक सम्पूर्ण मेवाड़ पर अधिकार करने में असफल रहा।

दूसरी और प्रताप ने अपनी मृत्यु से पूर्व मेवाड़ के अधिकांश प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था। 1585 ई. में प्रताप ने चावंड में अपनी नई राजधानी बनाई और वहां पर महल तथा चामुण्डा देवी के मन्दिर का निर्माण करवाया 19 जनवरी, 1597 ई. को चावन्ड से 1- मील दूर बण्डोली नामक गांव में इस महान सपूत की मृत्यु हो गई।

Haldi Ghati Ka Yudh – हल्दी घाटी का युद्ध

इस गांव के निकट नाले के तट पर अग्नि संस्कार हुआ, जहां उसके स्मारक के रूप में एक छोटी छतरी बना दी गई। प्रताप की यह समाधि पानी में डुबी हुई है। इस प्रकार प्रताप की समाधि आज भी अपनी रक्षा के लिए संघर्ष कर रही है। प्रताप ने अपनी मृत्यु से पूर्व अपने पुत्र अमरसिंह को यह प्रतिज्ञा करवा दी कि वह कभी भी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं करेगा।

छापामार प्रणाली (गुरिल्ला वारफेयर) महाराणा प्रताप ने अकबर के विरुद्ध संघर्ष करते समय छापामार प्रणाली, जिसे गुरिल्ला वार फेयर भी कहते हैं, का प्रयोग किया। उन्हें इस युद्ध प्रणाली का जनक माना जा सकता है। इसका अनुसरण छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी किया। महाराणा प्रताप की गुप्तचर एवं संचार व्यवस्था अत्यन्त कुशल थी।

महाराणा न केवल योद्धा थे, अपितु कला के सरंक्षक भी थे। चावंड में उनके द्वारा बनवाये गये महल एवं मंदिर इस बात की पुष्टि करते हैं। महाराणा प्रताप न केवल दूरदर्शी, अपितु कूटनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने मेवाड़ को अकेला रखने की अकबर की नीति को सफल नहीं होने दिया। इसलिए उन्होंने जालौर के ताज खां, जोधपुर के राव चन्द्रसेन, बूंदी, सिरोही, ईडर, डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा राज्यों का मुगल विरोधी गुट बनाया।

Haldi Ghati Ka Yudh – हल्दी घाटी का युद्ध

इसका परिणाम यह हुआ कि मुगल सेना मेवाड़ पर आक्रमण करने में कभी भी इन राज्यों के शासकों का सहयोग प्राप्त नहीं कर सकी। महाराणा प्रताप नारियों का बहुत सम्मान करते थे। उनकी महानता का एक उदाहरण यह है कि जब 1680 ई. में अब्दुर्रहीम खान को प्रताप के विरुद्ध भेजा गया, तब वह अपनी स्त्रियों सहित आखेट के लिए सिरोही आया, जहां उसे राजपूतों के हाथों परास्त होना पड़ा।

राणा प्रताप के ज्येष्ठ पुत्र अमरसिंह ने उसकी स्त्रियों को बन्दी बना लिया। जब राणा को इसका पता चला तो उन्होंने इन बंदी बेगमों को खान के पास शाही सम्मान के साथ भिजवा दिया। यह कार्य राणा की शत्रु के प्रति उदारता, सहिष्णुता और नारीत्व के प्रति सम्मान और पवित्रता का द्योतक है।

जब हमारे देश में अंग्रेजों का शासन था। उस समय भी प्रताप का त्याग एवं बलिदान जनता में जबरदस्त राष्ट्रीय चेतना जाग्रत करता रहा। फ्रांस की राज्य क्रान्ति 1789 ई. से यूरोप में राष्ट्रीयता का विकास हुआ था, जबकि भारत में 1572 ई. से ही प्रताप ने इस भावना के विकास को प्रोत्साहन देना प्रारम्भ कर दिया था। प्रताप की धैर्य, वीरता, स्वाभिमान एवं बलिदान के कारण ही विश्व में राजस्थान को जाना जाता है।

Haldi Ghati Ka Yudh – हल्दी घाटी का युद्ध

प्रताप न केवल हिन्दुओं के, अपितु, मुसलमानों के भी नेता थे। जालौर के मुस्लिम शासक ताज खां का उनको समर्थन प्राप्त था एवं हकीम खां सूर ने हल्दी घाटी के युद्ध में भाग लिया था। कर्नल टॉड ने हल्दी घाटी को थर्मोपोली के युद्ध की संज्ञा दे दी। आज के युवकों तथा किशोरों को प्रताप के त्यागमय एवं संघर्षमय जीवन से परिचित करवाया जाना चाहिए, ताकि उनमें देशप्रेम एवं देश भक्ति की भावना जाग्रत हो सके एवं उन्हें राष्ट्रीय आदशों के लिए मर मिटने की प्रेरणा मिल सके। संक्षेप में –

‘माई एहड़ा पूतजण, जेड़ा राण प्रताप,

अकबर सूतो ओझके, जाण सिराणे सांप |’ 

Chhatrapati Shivaji Maharaj : छत्रपती शिवाजी महाराज चरित्र

Leave a Comment