Giani zail Singh – ज्ञानी ज़ैल सिंह

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ज्ञानी जैलसिंह भारत राष्ट्र के सातवें तथा प्रथम पंजाबी राष्ट्रपति हैं। इन्होंने अपने जीवन मे देश के लिए अनेकानेक कुर्बानियां दी हैं। बचपन से ही आप मे देशभक्ति की भावना प्रबल थी। भगतसिंह आदि अन्य देश-प्रेमियों के संपर्क में आकर तथा उनके आदर्शों को देखकर उनकी देशभक्ति ने विद्रोह और क्रांति का रूप भी धारण कर लिया था।

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जन्म – आपका जन्म 5 मई सन् 1916 को पंजाब के फरीदकोट जिले के संधवान गांव में एक किसान परिवार में हुआ। गांव के अन्य मकानों की भांति उनका मकान भी कच्चा था। ज्ञानी जी के पूर्वज खेती करते थे। उनके पिता सरदार किशनसिंह के पास लगभग 66 एकड भूमि थी। इस छोटे से गांव में रहते हुए किसान-पुत्र ज्ञानी जी बचपन में ही गांव के जन-जीवन से भली-भाति अवगत हो गए थे। किसानो की तरह इनको भी कठोर श्रम करने की आदत पड़ गयी। अतः इन्हे सामान्य जन की समस्याओं को समझने में कभी कठिनाई नहीं हुई।

बचपन – जैलसिंह अभी छः वर्ष के ही थे कि इनके पिता की मृत्यु हो गई। कितु जैलसिंह ने अपनी माता जी से पूर्ण शिक्षा प्राप्त की। धार्मिक विचार, नैतिक बल, सामाजिक रहन-सहन, सभ्यता एव सेवा के व्रत इनको माता जी से ही प्राप्त हुए। इस संबंध में ज्ञानी जी ने एक बार स्वयं कहा था – “आज मैं जो कुछ हूं उसका श्रेय मेरी माता जी को है। उसने मुझे जन्म ही नही दिया, अपितु वह मेरे राजनैतिक और सार्वजनिक जोवन की भी निर्माती हैं।” माता जी के उपकारों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हुए इन्होंने कहा है-“मेरे चरित्र, मेरे भविष्य को बनाने के लिए उन्होंने जो बलिदान किए हैं, मैं आयु-पर्यन्त उनकी सेवा करके उस ऋण से मुक्त नही हो सकता।”

भारत माता की स्वतंत्रता के लिए योगदान – दुर्भाग्य से जब इनकी माता का देहांत हुआ, उस समय ये कारावास मे थे। ये उस समय पाच वर्ष की जेल काट रहे थे। इनकी जेल-अवधि पूरी होने मे अभी तीन महीने शेष थे। इनकी मां भयंकर रोगग्रस्त थी। इन्होंने अपनी मां के दर्शन के लिए, उनकी आखिरी सेवा के लिए पैरोल पर छूटने के लिए प्रार्थना की। किंतु अधिकारियों ने इसकी आशा नहीं दी।

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वास्तव में उन्होंने जैलसिंह से क्षमायाचना की शर्त रखी थी जिसे इन्होंने मानने से मना कर दिया था। निःसंदेह अपनी मां को ज्ञानी जी सर्वाधिक प्यार करते थे, किंतु भारत माता की सेवा के आगे इन्हें यह कुर्बानी करनी पड़ी। ये ऐसा कोई कार्य नही करना चाहते थे जिससे भारत माता की अवमानना हो। फलतः इनके जेल में रहते ही इनकी मा परलोक सिधार गयी।

ज्ञानी जी को अपनी माता जी के अंतिम दर्शन न हो सकने का बड़ा अफसोस हुआ। किंतु इन्होंने लाखों-करोड़ों की मां ‘भारत माँ के उद्धार की खातिर इस सदमे को सहन कर लिया। इस घटना से ज्ञानी जी को देशभक्ति और भी तीव्रतर हो गयी। इसने इन्हें और अधिक विद्रोही बना दिया। ये पहले से भी अधिक देश सेवा में संलग्न हो गए।

जैलसिंह अभी 16 वर्ष के ही थे कि तभी शहीद भगतसिंह को 23 मार्च 1931 को फांसी दी गयी। इस घटना से ये अत्यधिक प्रभावित हुए। इनकी आंखों में आंसू आते रहे। अन्य क्रांतिकारियों के संपर्क से इनमें क्रांति की अग्नि और भी प्रज्वलित होने लगी। इन्होंने देश के लिए प्राण न्यौछावर करने तक का प्रण लिया और यह प्रण उन दिनों लिया जबकि राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने का कोई स्वप्न तक नहीं लेता था।

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शहीदों की जीवनियों एवं कारनामों ने इनके चरित्र पर ऐसा प्रभाव डाला कि ये देश को स्वतंत्र कराने के अनेकानेक साधन अपनाने लगे। लाला लाजपतराय, बाबा आत्मासिंह और बाबा ईश्वरसिंह से मिलकर इन्होंने सारे पंजाब में स्वतंत्रता की भावना का प्रचार-प्रसार किया। ये देश की आजादी के लिए एक प्रकार से दीवाने हो गए थे। इनके प्रयासों से सारे पंजाब मे ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ के नारे गूंजने लगे।

वस्तुतः ज्ञानी जी का अपना एक पृथक, विलक्षण एवं अछूता व्यक्तित्व है। भरा-पूरा चेहरा, ऊंचा कद उभरा हुआ शरीर मिलनसार स्वभाव, हंसमुख, हाजिर जवाब, अचकन-पायजामा घारी-पगड़ी बांधे हुए ज्ञानी जी अपने में एक अलग पहचान है। शेरो-शायरी का इतना शौक है कि किसी भी अवसर को आप खाली नहीं छोड़ते। हर मौके के लिए अनुकूल शेरो का आपके पास खजाना भरा रहता है। ये इस कला के बल पर गंभीर से गंभीर वातावरण को भी सजीव बना लेते हैं। इससे आपकी जिंदादिली तथा तीव्र स्मरण शक्ति का पता चलता है।

स्वतंत्रता सेनानी जीवन का आरंभ – वस्तुत: ज्ञानी जैलसिंह के स्वतंत्रता सेनानी जीवन का आरंभ 1938 से तब होता है जब इन्होंने फरीदकोट में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की। उन दिनों में इस राज्य में राजनीतिक जागृति का नामो निशान तक नहीं था। ऐसे वातावरण में किसी राजनीतिक पार्टी का गठन अथवा सभाएं करना बड़ा दुष्कर कार्य था।

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महाराजा फरीदकोट ने अपने राज्य में कांग्रेस की स्थापना पर पाबंदी लगा दो। ज्ञानी जी ने अपनी हठधमों और हिम्मत से वहां कांग्रेस की स्थापना कर दी। इनकी सभाओं में गड़बड़ी मचायी जाती थी किंतु ज्ञानी जी निराश नहीं होते थे । अततः इन्हें अपराधी घोषित कर दिया गया। बाद में इन्हें पकड़कर पाच वर्ष के लिए जेल में डाल दिया गया।

महाराजा सरकार के विरुद्ध समानांतर सरकार की स्थापना करना ज्ञानी जी के जीवन की सर्वाधिक साहसी घटना है। ज्ञांनी जी को विद्रोही घोषित करके पकड लिया गया। वहां तरह-तरह की यातनाएं देकर इन्हें यह धमकी दी गयी कि इनको जीप से बाधकर सड़कों पर घसीटा जाएगा। किंतु दृढ़-संकल्पी ज्ञानी जी कब झुकने वाले थे। ये अपने संकल्प पर डटे रहे। इन्होंने अलवत्ता अपना आंदोलन और सक्रिय कर दिया।

ज्ञानी जी के इस कठोर संकल्प के आगे महाराजा को ही अंततः झुकना पड़ा। महाराजा को सुबुद्धि प्राप्त हुई। उसने इस विचार को त्याग दिया। ज्ञानी जी की यह बहुत बड़ी विजय थी। 1942 सत्याग्रह का युग था। गांव हो अथवा नगर गांधी जी का आंदोलन बड़े वेग से चल रहा था। “अंग्रेजो ! भारत छोड़ो” का नारा कोने-कोने में फैल चुका था। ज्ञानी जी उन दिनों जेल में पड़े हुए थे। जब इनको ऐसी सूचनाएं मिलती तो इनका मन भी कुछ कर गुजरने को होता।

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जब 1943 मे आप फरीदकोट जेल से मुफ्त हुए तो आप भी गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन में कूद पड़े। आपने अपने प्रदेश में इस आंदोलन का कार्य शुरू कर दिया। बडी सफलता से इन्होंने इस आंदोलन को चलाया। महाराजा इस आंदोलन से भयभीत हो गए। उन्होंने ज्ञानी जी पर अनेकानेक अत्याचार किए। ज्ञानी जी ने उनकी तनिक भी परवाह नहीं की। इन्होंने तिरंगे को घर-घर, दुकान-दुकान और सरकारी भवनो पर लगाने का निश्चय किया। इस योजना को सफल बनाने हेतु इन्होंने पं. जवाहर लाल नेहरू को रियासत में निमंत्रित कर इस रस्म को पूरा किया। इससे ज्ञानी जी नेहरू जी के अधिक निकट आ गए।

1956 में इन्हें राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित किया गया ये उस समय पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुख्य उपाध्यक्ष भी थे। 1962 के आम चुनावो मे उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं में अभूतपूर्व उत्साह जाग्रत किया जिससे उसे सर्वाधिक विजय मिल सकी। फलतः इन्हें पंजाब सरकार में सरदार प्रतापसिंह कैरो के मंत्रिमंडल में सम्मिलित कर लिया गया। उन दिनों चीन ने भारत पर धोखे से आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण के विरुद्ध अपनी शक्तियों को पूर्णतः केंद्रित करने हेतु वे पहले मंत्री थे, जिन्होंने त्यागपत्र दिया था।

1962 से 1972 तक ज्ञानी जैलसिंह ने पंजाब में सांप्रदायिक और प्रादेशिक ताकतों का डटकर मुकाबला किया। पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष होने के नाते आपने अपने कार्यकर्ताओं में ऐसी चेतना जगायी कि 1971 के लोक सभा चुनावों और 1972 के विधान सभा चुनावों में कांग्रेस को भारी बहुमत प्राप्त हुआ।

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इन परिणामों को देखते हुए कांग्रेस की कार्यकारिणी कमेटी ने ‘ज्ञानी जी को एक सुयोग्य और ईमानदार शासक समझकर 1972 में इन्हे पंजाब का मुख्यमंत्री बना दिया। 1972-75 के अपने कार्यकाल मे आपने पंजाब का एक स्थिर, शक्तिशाली और संपन्न प्रदेश बना दिया। इस समय सभी धर्म और विश्वास के लोगो मे सद्भावना बनी रही। हिंदू-सिख तथा अन्य जातियों के लोग परस्पर सद्भाव से रहे।

इन्होंने भी रामतीर्थं मिशन, आर्य समाज, मुस्लिम, हरिजन और सभी वर्गों के नेताओं को अपने धार्मिक कृत्यो के लिए बिना किसी भेदभाव के उदारतापूर्वक अनुदान दिया। यह काल पंजाब में हरित क्रांति और औद्योगिक विकास का काल माना जाता है। स्वतंत्रता सेनानी होने के कारण इन्हें शहीदों के प्रति हार्दिक सहानुभूति रहती है।

अतः इन्होंने पंजाब में हुए शहीदो और देशभक्तों के स्मृति चिह्न बनवाए तथा पुराने स्मारकों की मरम्मत करवाई और स्वतंत्रता सेनानी तथा शहीदों के उत्तराधिकारियो अथवा उनके सहायको की पेंशन का प्रबंध कराया। सभी स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान दिए जाने की परंपरा भी डाली। इसी के साथ आपके समय में बिना किसी रंग, जाति भेद के समाजसेवी, देशभक्त, कवि, लेखक, गायक, वैद्य, कलाकार आदि को सम्मान दिए गए।

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1980 के लोकसभा चुनाव में ज्ञानी जी विजयी हुए। यह चुनाव इन्होंने होशियारपुर से लड़ा था इनकी विजय का कारण अपने लोक कल्याणकारी कार्यों के कारण इनकी लोकप्रियता है। इनकी योग्यताओं को देखते हुए इन्हे केन्द्रीय सरकार मे गृहमंत्री बनाया गया। इन्होंने जनवरी 1980 से जुलाई 1982 तक बड़ी कुशलता से इस पद की गरिमा का निर्वाह किया। इस समय देश में कानून और अनुशासन की व्यवस्था अत्यंत बिगड़ी हुई थी।

असम में बाहर से आए लोगों को लेकर बड़ा संघर्ष चल रहा था। वे लोग नही चाहते थे कि बाह्य व्यक्ति उनकी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थितियों को निर्बल बना दें। इस संघर्ष को दूर करने के लिए असम सरकार ने स्वयं काफी प्रयत्नं किए किंतु सब व्यर्थ मई-जून 1980 में ज्ञानी जी को निष्पक्ष समझकर इस समस्या को सुलझाने का भार सौंपा गया।

राष्ट्रपति की तौर पर कार्य – राष्ट्रपति पद पर आसीन होकर आपने धर्म निरपेक्षता का पूरा ध्यान रखा। वो मंदिर, गुरुद्वारे, मस्जिद, गिरिजाघर आदि सब में श्रद्धापूर्वक जाते रहते थे। राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रभाषा हिंदी का कोई भी समाचार पत्र न देखकर आपको बड़ा आश्चर्य हुआ उन्होंने तत्काल हिंदी का समाचार पत्र मंगवाने का आदेश दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने भाषण भी हिंदी मे देने शुरू कर दिए।

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आपके राष्ट्रपति काल के अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों में इन दो कार्यों का भी विशेष उल्लेख होगा। राष्ट्रपति के रूप में ज्ञानी जैलसिंह के अनेक विशिष्ट कार्यों में से एक हैउग्रवादी आदोलन से निपटना। सिखों ने खालिस्तान की मांग जब शुरू में की तो उन्होंने  स्पष्टता से कहा था,

“मैं इस प्रकार के राजनैतिक पचड़े में पड़ने के लिए तैयार नहीं क्योंकि इस नारे में देशभक्ति नहीं है। यह केवल स्वार्थ से ओतप्रोत है। मैं इस एस. जी. पी. सी. को बड़ी इज्जत की दृष्टि से देखता हूं-मैं इस संस्था के साथ था। हमे अपने देश के पिछले इतिहास को देखकर सोचना चाहिए कि भारत मे अब विदेशी शासक नहीं। अपने भाई ही भारत की देखभाल करने वाले हैं।”

लेकिन कुछ उग्रवादियों ने खालिस्तान आंदोलन को गलत दिशा दी। परिणामतः सरकार को इसके विरुद्ध हस्तक्षेप करना पड़ा। इस नाजुक घड़ी मे ज्ञानी जैलसिंह ने बड़ी संयमित दृष्टि से राष्ट्र के नाम जो प्रसारण किया उसके कुछ अंश अवलोकनीय है “मै आज ऐसे दुखदायी वक्त पर बोल रहा हूं जबकि बीते हुए समय में घटी घटनाओं के गहरे जख्मो के दुख मेरे दिल में है और ठीक सोचने वाले सारे लोगों के दिलों में भी है।

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इन घटनाओं के घटने के बाद किसी भी विचारवान व्यक्ति का दिल न दुखे ऐसा हो नहीं सकता। पर हमारा एक फर्ज बनता है कि हम जज्बात को रो मे बहने से पहले इन वाकयात के पीछे की घटनाओं को देखे। वर्तमान को देखे और भविष्य के बारे में विचार करे ।

“जहा तक मेरा व्यक्तिगत सवाल है मैं अपने राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारियो को निभाते हुए इस बात को कोशिश करता रहा हूँ, कई बार ‘आउट आफ दी वे ‘ जाकर भी कोशिश की, कि इन चीजों को रोका जाय, पर वह नहीं रुक सकी। “दो धार्मिक तथा राजनैतिक नेताओं ने मजबूर होकर अपनी गिरफ्तारियां दे दी।

इस तरह अतिवादियों को भी, जब सेना पहुंच गई तो सेना की अपील पर “गुरुद्वारे की पवित्रता बनाने के लिए बाहर आ जाना चाहिए मैं समझता हूं कि बेहतर होता कि वह गिरफ्तारियां दे देते और कहते कि हमारे ऊपर मुकदमे चलाओ। पर गुरुद्वारे और पवित्र अकाल तख्त साहब की ओट लेकर लड़ाइयां करना, यह कोई अच्छी बात नहीं है। इसलिए हर गुणवान तथा खास तौर से वह जिनको गुरु महाराज पर भरोसा है और जो सिख मर्यादा को अच्छी तरह मानते हैं उनको भी दुख हुआ।

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“हमारे सामने है जब हिंदुस्तान गुलाम था उस वक्त गुरुद्वारों पर कब्जा करने वाले महंतों ने वो ज्यादतियां की जिनके बदले कइयो को अपनी जान को बलि देनी पड़ी। उस वक्त की सरकार उनकी हिमायत मे थी। इसलिए सिखो को बहुत कुर्बानिया देनी पड़ी। शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी बनी, इसलिए कि गुरुद्वारों के अंदर उनकी पवित्रता कायम रहे। गुरुवाणी का प्रचार हो I गुरु महाराज की पवित्र वाणी मे लिखा है कि –

“गुरुद्वारे हरि कीर्तन सुनिए,

सदगुरु भेंट हरि जसमुख भणिए,

दूजी अवर न जापस काई

सगल तुआरी धारणा।”

“मैं इसका अर्थ करने की जरूरत नहीं समझता। सभी समझते हैं। सतगुरु जी ने यह भी फरमाया है :- “गुरुद्वार होई के साहब संभालिहू, साहब नू याद करो, गुरु दे द्वारे पहुंचो ।” और गुरुद्वारा वह स्थान है :

“जेहि दर आवत जातियहु हटके नाही कोय,

सो दर कैसे छोड़िये, जो दर ऐसा होय।”

“हरमंदिर साहब गुरु पंचम पातशाह महाराज की मंशा के मुताबिक रचा गया। उसके बाद उसकी इमारत शानदार बनती गई। स्वर्ण मंदिर भी हो गया और श्री अकाल तख्त साहब की उच्च मर्यादा को बनाए रखने के लिए अपना निवास स्थान 6-7 मील की दूरी पर छेरहटा साहब में रखा। मगर वे मर्यादाएं सब तोड़ दी गईं और ये हालात हो गए कि:

“ऐती मार पई कुरलाणे, तँकी दर्द न आइया

जे सकता सकते को मारे, ता मन रोस न होई ।”

Giani zail Singh – ज्ञानी ज़ैल सिंह

“अब सवाल यह है कि हम आज इन जख्मों को किस तरह भरें और किस तरह हम इन सारे वाकेआत से गुजरें यह सरकार का, समाज का सबका फर्ज बनता है। हमें याद करना चाहिए श्री गुरु तेगबहादुर की शहादत को, जिन्होंने प्रण किया था कि मैंने बाजू पकड़ लिए, और मेरे पास जो आए है, धर्म की रक्षा करने के लिए –

“तिलक जंजू राखा प्रभ ताका। कीनो बढ़ो कलू महि साका।”

“जिस समय वह चले तो उनके सब श्रद्धालुओं ने यहा तक कि सफुद्दीन जो गुरु साहब के श्रद्धालु थे, ने एक महीने से ज्यादा गुरु जी को रोके रखा। उन्होंने कहा आप दिल्ली जा रहे हैं, दिल्ली जाओगे तो कत्ल हो जाओगे। गुरु तेग बहादुर ने कहा, नहीं मैं कत्ल होना पसंद करूंगा, मैं कातिलों के पास जाऊंगा, लेकिन मैं शरण लेकर पवित्र गुरु स्थान में छिपूगा नहीं। मैं किसी दोस्त के घर भी नही छिपूगा मैं किसी के साथ दगा नहीं करूंगा। मैं फरेब नहीं करूंगा, क्योकि

बांहि जिनां दी पकड़िए,

सिर दइये बाह न छोड़िए”

“आज मैंने बहुत अफसोस के साथ ये देखा कि कुछ लोगों ने अपील की है कि जितने भी सिख हैं जिन-जिन ओहदों हर है, खास तौर पर फौजियों को भी कह दिया गया है कि आप वहा से छोड़कर वापस आ जाओ। क्या ये किसी का धर्म है ? धर्म का अर्थ कर्तव्य भी है और जो सौगंध वाहेगुरु का नाम लेकर खाई हुई है उनका पालन न करना कायरों, बुजदिलों और भटके हुए, श्रम मे फंसे हुए लोगों का कार्य हो सकता है।

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इसीलिए मैं उनका मशकूर हु जिन लोगो ने अपनी सेवाओं को निभाया और सेवाओ को निभाने में कोई बेईमानी और दुश्मनी नहीं की। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मेरी सरकार ने किसी को शिकस्त देने की किसी की जीत कराने की आशा को लेकर कोई उपाय नही किया। आज भी सरकार के मन में जीत-हार का सवाल नही I सवाल है कि हम जख्मों को कैसे भरें।

जब से ये जख्म शुरू हुए है, तब से काफी समय बीत चुका है। उस बीते हुए समय में कौन जिम्मेदार था, यह इतिहास बताएगा, जानकारियां बताएंगी। मैं इनका जिक्र नही करता। पर मैं बहुत दुख के साथ कहता हूं कि में उस पंजाब में गया जो पंजाब हसता था, खेलता था, दौड़ता था, भागता था, गाता था, बजाता था और अपनी कमाई से खुशहाल हो रहा था। वह पंजाब घरों में डरा हुआ था। ऐसा क्यों हुआ ! इसकी तह में जाना बहुत जरूरी है।

“हम अपनी मातृभूमि की सेवा कर सकें, हम इस देश के वासी- मातृभूमि के बेटे-बेटिया है। हमारा फर्ज बनता है कि हमारी माता को कष्ट न हो। इस भारत माता की गोद मे हमारे सारे मजहब पले है, पवित्र स्थान हैं, हमारे देश के ऋषि और मुनि है, हमारे शूरमा बहादुर है, सारे वैज्ञानिक और डाक्टर हैं, सारे बहुत बडे-बडे प्रबंधक है और सेवक है, मजदूर है, किसान है।

Giani zail Singh – ज्ञानी ज़ैल सिंह

इन सब तबको का दुख अपने दिल मे लेना हमारा सबका फर्ज बनता है। मैं महसूस करता हूं और सबकी सेवा में विनती करना चाहता हू कि आज हम एकता की तरफ चलें। सुलह की बातें करें, सुलह की बातें ही नही बल्कि सद्भावना समितियां बना बना कर हम वातावरण को ठीक करें और हमारे में फिर से एकता आए और जो भी किसी से गलतियां हुई है उन गलतियों की माफी मागना कोई पाप नही है।

“मैं उम्मीद रखता हू खासतौर से सिखो के धार्मिक अगुआओं से कि वे गुरु जी की वाणी से प्रेरणा ले क्योंकि हमारे दशम गुरु जी ने कहा कि मेरे बाद सिखो का गुरु ‘गुरुग्रंथ साहब’ है। गुरुग्रंथ जी मे सभी भक्तो की वाणिया है, शेख फरीद भी है, कबीर भी है, रविदास भी है, रामानंद भी है, मैं सबके नाम नही गिन सकता, जो उनके उपदेशों के मुताबिक चलेगा वही गुरु का सिख होगा। दूसरा मनमतिया होगा।

‘मन दियां मतां खिड्डिया’ ( विचार भिन्न-भिन्न होते हैं), उनके साथ हम गलत रास्ते पर पड़ सकते है। हमें उन रास्तों पर पड़ने से बचने की जरूरत है और श्री गुरु गोविंदसिंह जी महाराज के उस पवित्र वाक्य को याद करें जो उन्होंने हमे कहे थे, मेरी देशवासियों से अपील है I

“साथ कहीं सुन लेहू सभै

जिन प्रेम कियो तिनहि प्रभ पायो।”

राष्ट्र के नाम इनके इस संदेश का बड़ा अनुकूल प्रभाव पड़ा। शीघ्र ही पंजाब मे स्थिति सामान्य हो गयी।

निःसंदेह राष्ट्रपति जैलसिंह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के धर्मनिरपेक्षवादी राष्ट्रपति है। उन्होंने इस पद की परंपरागत मान्यताओं को कायम रखते हुए अनेक नई मान्यताएं भी स्थापित की। उन्होंने सामान्य परिवार में जन्म लेकर अपने देश के सर्वोच्च पद को प्राप्त किया।

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मृत्यु – 1994 में तख्त श्री केशगड़ साहिब जाते समय उनके गाड़ी की दुर्घटना की वजह से उनकी मृत्यु हो गयी. दिल्ली में जहां ज्ञानी जैल सिंह का दाह-संस्कार हुआ था, उसे एकता स्थल के नाम से जाना जाता है. आज भी लोग वहां जा कर उन्हें श्रद्धांजली देते है. वे एक समर्पित भारतीय राजनेता थे I इनके कार्यों को आज भी याद किया जाता है I

Shetkaryancha Asud

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