First Anglo Mysore War – प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध

First-Anglo-Mysore-WarFirst Anglo Mysore War

अंग्रेज दक्षिण की तीन शक्तियों निजाम, मराठा व मैसूर को अलग-अलग रखना चाहते थे, क्योंकि वे इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि यदि ये तीनों शक्तियों एक हो गई हो, तो दक्षिण में अंग्रेजों का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। अंग्रेजों के सौभाग्य से उस समय निजाम, मैसूर और मराठे अपने स्वार्थों की सिद्धि हेतु परस्पर संघर्ष में व्यस्त थे।

First Anglo Mysore War – प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध

अतः दक्षिण में अंग्रेजों की कूटनीति सफल सिद्ध हुई, किन्तु अंग्रेज, मराठे एवं निजाम मैसूर के अस्तित्व को बनाये रखना चाहते थे, क्योंकि मराठों को खिराज प्राप्त होता था। निजाम को मराठों के विरुद्ध एक मित्र मिल जाता था तथा अंग्रेज दक्षिण भारत में शक्ति सन्तुलन को बनाये रखने के लिए मैसूर का अस्तित्व बनाये रखना चाहते थे। साथ ही ये शक्तियां मैसूर को इतना शक्तिशाली भी नहीं देखना चाहती थी कि वह उनके लिए खतरा बन जाय।

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1766-69ई.) – हैदरअली के बढ़ते हुए प्रभाव से अंग्रेज संशकित थे। वे इस बात को अच्छी तरह समझ गये थे कि दक्षिण में अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए मैसूर की शक्ति को नष्ट करना होगा। उन्होंने मराठों एवं हैदराबाद के निजाम से मिलकर हैदर के विरुद्ध एक शक्तिशाली गुट का निर्माण भी किया था, परन्तु हैदर अली ने अपनी कूटनीति से इस त्रिगुट को भंगकर दिया। मैसूर के शासक ने ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं कि अंग्रेजों को अकेले ही उससे लड़ना पड़ा।

प्रथम मैसूर युद्ध के कारण – हैदरअली व फ्रान्सीसियों के बीच घनिष्ठ मैत्री थी। – उसके दरबार में फ्रान्सीसी प्रभाव बढ़ता जा रहा था। ‘हैदर अली फ्रान्सीसीयों के निकट संगठित रहने के लिए प्रसिद्ध था और कहा जाता है कि उसने उन्हें सुरक्षित ही नहीं किया, बल्कि बिखरे फ्रान्सीसी लोगों को भारत में एकत्रित भी किया।’

First Anglo Mysore War – प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध

हैदरअली की फ़्रान्सीसियों से मैत्री अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं थी। अंग्रेजों ने इस मैत्री को कर्नाटक के लिए खतरा बताया था, लेकिन हैदरअली की योग्यता, कूटनीतिज्ञता, सैनिक कुशलता एवं उसका बढ़ता हुआ प्रभाव अंग्रेजों की दृष्टि में उसका सबसे बड़ा दोष था अंग्रेज भारत के शासक बनना चाहते थे, अतः उनका हैदर से संघर्ष अनिवार्य हो गया था। अंग्रेजों और हैदर के बीच युद्ध होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

(1) यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध आरम्भ होने पर भारत में भी अंग्रेजों और फ्रान्सीसियाँ के बीच संघर्ष आरम्भ हो गया। फ्रान्सीसियों ने हैदर अली से सहायता की प्रार्थना की। इस पर हैदर अली ने उन्हें 4,000 घोड़े दिये, किन्तु इसी समय हैदर के शत्रुओं ने मराठों की सहायता की और इसके बाद अचानक उस पर आक्रमण कर दिया। इसलिए 12 अगस्त, 1760 ई. को हैदर अली को विवश होकर बंगलौर की ओर भागना पड़ा। हैदर अली ने अंग्रेजों के विरुद्ध फ्रान्सीसियों को सहायता दी थी। इसलिए अंग्रेज हैदर अली से कुद्ध हो गये।

(2) कर्नाटक के नवाब मोहम्मद अली अंग्रेजों का मित्र उथा, जब कि उसका बड़ा भाई महफूज खां मोहम्मद अली का कट्टर शत्रु था। इस समय मैसूर व कर्नाटक के बीच सीमावर्ती प्रदेशों को लेकर तनाव बना हुआ था। इसलिए हैदर ने महफूज खां का पक्ष लिया और उसे अपने यहां आश्रय भी दे दिया।

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इतना ही नहीं, हैदर ने चांदा साहब के पुत्र राजा साहब की भी सहायता की, जो कि अंग्रेजों का शत्रु था, हैदर अली के इन कार्यों से अंग्रेज कुद्ध हो उठे और उन्होंने बेलौर में हैदर के विरुद्ध अपनी सेना तैनात कर दी। अंग्रेजों की इस कार्यवाही ने हैदर को उत्तेजित कर दिया।

(3) मालाबार का शासक अंग्रेजों का मित्र था। हैदर ने अंग्रेजों के कार्यों से चिढ़कर 1766 ई. में मालाबार प्रदेश पर आक्रमण कर दिया। इसलिए मालाबार के शासक ने हैदर के विरुद्ध अंग्रेजों से सहायता मांगी । यद्यपि उस समय अंग्रेजों ने मालाबार के शासक को किसी भी प्रकार की सहायता नहीं दी, किन्तु अंग्रेज हैदर के प्रति सशंकित अवश्य हो गये। इससे दोनों के मध्य तनाव बढ़ा।

(4) हैदर अली को अंग्रेजों की शक्ति पर बेहद भरोसा था अतः उसने परस्पर क्षेत्रीय महत्वकांक्षा के लिए अंग्रेजों से मैत्री करने की व्यक्त की। 1766 में उसने अपने प्रतिनिधि को लिखा कि, ‘मेरे पास एक बड़ी सेना है। अंग्रेजों के पास भी वैसा ही है। यदि दोनों एक हो जाएं तो, मुगल और मराठे कुछ नहीं कर सकते। यदि उनकी समस्या हो, तो मेरी सेनायें सहायतार्थ पहुंच जाएगी और यदि मेरी समस्या हो तो, उनकी पहुंच जाएगी।

First Anglo Mysore War – प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध

इसकी सूचना गर्वनर को दो और यदि उसका भी वैसा ही मत हो और कौंसिल के सदस्य भी चाहते हों तो, मसला तय हो जाये। यह बात पत्र-व्यवहार से नहीं हो सकती इसलिए तुम एक अंग्रेज और सात कौंसिलों के सील सहित एक पत्र लेकर आओ ।’ परन्तु अंग्रेजों को हैदर के प्रति विश्वास नहीं था। अतः उन्होंने हैदर के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इससे हैदर अली अंग्रेजों से असन्तुष्ट हो गया।

(5) इसी समय यह अफवाह फैल गई कि हैदर अली निजाम से सांठ-गांठ कर कर्नाटक पर आक्रमण करने की योजना बना रहा है, परन्तु अंग्रेजों ने निजाम को अपनी ओर मिला लिया और 12 नवम्बर, 1766 को उससे एक सन्धि कर ली। पेशवा माधवराव हैदर के विरुद्ध पहले ही निजाम से सन्धि कर चुका था। इसके बाद मराठों ने मैसूर में लूटमार भी आरम्भ कर दी।

इन बिकट परिस्थितियों में भी हैदर हिम्मत हारने वाला नहीं था । वह जानता था कि त्रिगुट के सदस्यों में पारस्परिक विश्वास नहीं है और उनकी मित्रता स्वार्थो पर आधारित है। अतः इसे आसानी से भंग किया जा सकता है। हैदर ने अपनी कूटनीति से इस त्रिगुट को भंग कर दिया। उसने मराठों को 35 लाख रुपये देकर लौटा दिया तथा निजाम को उत्तरी सरकार दिलाने में सहायता का वचन देकर अपनी ओर मिला लिया। इस प्रकार हैदर की कूटनीति से अंग्रेज अकेले पड़ गये।

First Anglo Mysore War – प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध

युद्ध की घटनायें – मई, 1767 ई. में हैदर व निजाम की संयुक्त सेना ने कनार्टक पर आक्रमण किया तथा कर्नाटक के क्षेत्र को रौंद डाला । जब निजाम और हैदर ने कावेरीपट्टम का घेरा डाला, तब अंग्रेजों को शत्रु की गतिविधियों की जानकारी मिली। इसका प्रमुख कारण यह था कि उस समय अंग्रेजों की संचार सेवा अत्यन्त ही अकुशल थी।

इस समय मद्रास के सर्वोच्च सैनिक अधिकारी कर्नल स्मिथ के पास बहुत ही कम सेना थी, इसलिए कर्नल वुड की सहायता प्राप्त करने के लिए वह त्रिनोपाली की ओर बढ़ा। त्रिनोपाली में कर्नल वुड की सेनाओं तथा हैदर व निजाम की संयुक्त सेना के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में निजाम और हैदर अली की सेनायें पराजित हुईं। दिसम्बर, 1767 ई. में हैदर अली की एक अन्य स्थान पर भी पराजय हुई।

First Anglo Mysore War – प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध

निजाम द्वारा अंग्रेजों से सन्धि (22 मार्च, 1768 ई.)

अंग्रेजों की इन सफलताओं को देखकर एंव जानकर, कि अंग्रेज हैदराबाद पर आक्रमण करने के लिए सेना भेज रहे हैं, निजाम का साहस टूट गया। अत: उसने हैदर अली का साथ छोड़ दिया और 22 मार्च, 1768 ई. को अंग्रेजों से सन्धि कर ली। इस सन्धि की प्रमुख शर्ते निम्नलिखित थीं

(1) निजाम और अंग्रेजों ने पिछली सन्धि की शर्तों को फिर स्वीकार कर लिया।

(2) निजाम ने हैदर अली को विद्रोही माना और मैसूर राज्य पर उसके अधिकार को स्वीकार नहीं किया।

(3) यह निश्चय हुआ कि जब मैसूर राज्य पर अधिकार हो जायेगा, तो उसकी दीवानी अंग्रेज कम्पनी को दे दी जायेगी।

(4) निजाम ने वायदा किया कि वह अंग्रेजों और कनार्टक के नवाब को हैदर अली को दण्ड देने में सहायता देगा।

यह सन्धि निजाम और मद्रास सरकार के बीच हुई थी। आगे चलकर यह सन्धि अंग्रेजों और मैसूर राज्य के बीच स्थायी झगड़े का कारण बनी।

हैदर अली की विजय – जब निजाम ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली, तब हैदर अली 1768 ई. में पुन: अकेला पड़ गया, परन्तु उसने साहस नहीं छोड़ा और बहादुरी से अंग्रेजों का मुकाबला करता रहा। इस समय अंग्रेजों ने मालाबार तट पर हैदर के प्रदेशों पर अधिकार करना आरम्भ कर दिया, किन्तु हैदर के पुत्र टीपू ने बम्बई सरकार की एक अंग्रेज सेना को 11 मई, 1768 को परास्त करके मंगलौर से खदेड़ दिया।

कर्नल स्मिथ व कर्नल वुड हैदर के अनेक प्रदेशों पर अधिकार कर चुके थे। चूंकि इस समय हैदर अली अकेला रह गया था और उसे मराठों के आक्रमण का भी डर था, अतः उसने विवश होकर सितम्बर, 1768 ई. में अंग्रेजों से सन्धि वार्ता प्रारम्भ की, किन्तु स्मिथ ने सन्धि की ऐसी कठोर शर्तें लिखकर भेजीं कि उन्हें हैदर स्वीकार न कर सका।

First Anglo Mysore War – प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध

अब हैदर अंग्रेजों पर टूट पड़ा और मुल्बागल पर अधिकार कर लिया। मैलीसन ने लिखा है कि- ‘कम ही लोभ और शोषण को इतना अनुबोधक दंड मिला होगा। कठिनाईयों में पागल और अप्रशिक्षित बुद्धि हावी हो गई। मुल्बागल के वापसी के साथ सफलता का ऐसा तांता लगा कि हैदर अली विजयी हो गया। इसके बाद उसने अपने अन्य प्रदेशों को पुनः प्राप्त करना आरम्भ कर दिया।

अंग्रेजों की निरन्तर पराजय के कारण मद्रास सरकार ने कर्नल स्मिथ को वापस बुला लिया तथा सेना का नेतृत्व कर्नल वुड के हाथों सौंप दिया। कर्नल वुड भी हैदर के हाथों परास्त हुआ। अतः मद्रास सरकार ने कर्नल वुड को वापस बुला लिया और सेना की कमान पुनः स्मिथ को सौंप दी। स्मिथ ने 1769 में अपना कार्य भार ग्रहण किया, किन्तु स्मिथ के आने से पूर्व हैदर अली उन सभी स्थानों को विजय कर चुका था, जिन पर पहले अंग्रेजी सेना ने कब्जा कर लिया था।

हैदर ने स्मिथ को अनेक स्थानों पर पराजित किया। मार्च, 1769 में हैदर ने मद्रास पर आक्रमण किया और मद्रास की सरकार को एक सन्धि करने के लिए बाध्य किया। अत: हैदर की एक के बाद एक शर्ते स्वीकार कर ली गई।

First Anglo Mysore War – प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध

मद्रास की सन्धि एवं प्रथम मैसूर युद्ध का अन्त – हैदर और मद्रास सरकार के बीच 4 अप्रैल, 1769 ई. को एक सन्धि हो गई, जिसकी शर्तों को हैदर अली ने निश्चित किया था। इस सन्धि की प्रमुख शर्ते निम्नलिखित थीं।

(1) दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए प्रदेश लौटा दिये।

(2) हैदर अली ने कारुर का जिला कर्नाटक के नवाब को दे दिया, जिस पर मैसूर राज्य ने बहुत पहले अधिकार किया था।

(3) हैदर के जहाजों को, जिन्हें बम्बई की सरकार ने पकड़ लिया था, उसके बदले में कोलार का भण्डार हैदर को दे दिया गया।

(4) युद्ध के खर्च और जुर्माने के रूप में अंग्रेजों ने हैदर अली को एक बड़ी रकम भेंट की।

(5) अंग्रेज तथा हैदर अली ने एक दूसरे को किसी भी बाहय आक्रमण के अवसर पर सहायता देने का वचन दिया।

चूंकि मद्रास सरकार युद्ध जारी रखने की स्थिति में नहीं थी। अतः उसने विवश होकर इस सन्धि को स्वीकार किया था। सन्धि की शर्तों से ही स्पष्ट होता है कि मानों अंग्रेजों ने हैदर से शान्ति स्थापित करने के लिए याचना की हो।

‘हैदर ने इस अवसर के लिए एक चित्र बनाने का आदेश दिया, जिसमें गर्वनर और उसकी कौंसिल के सदस्य झुके हुए उसके समक्ष बैठे हैं। हैदर को डूप्ले की नाक पकड़े हुए दिखाया गया था, जो हाथी की सूंड की तरह दिख रहा था, जिससे गिनी और पगोडा निकल रहा था। स्मिथ को संधि-पत्र हाथ में लिए और तलवार को दो टुकड़ों में तोड़ता हुआ दिखाया गया था।’

First Anglo Mysore War – प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध

इस प्रकार प्रथम मैसूर युद्ध समाप्त हुआ। इस युद्ध से सिद्ध हो गया कि वीरता, युद्ध कौशल और कुटनीति में हैदर अंग्रेजों से बहुत ऊंचा था और अंग्रेज़ किसी भी क्षेत्र में उसका मुकाबला नहीं कर सकते थे।

Chhava

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