Firozshah Mehta – फिरोजशाह मेहता

Firozshah-MehtaFirozshah Mehta

सर फिरोजशाह मेहता भारत की अनुपम विभूतियों में से एक थे। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अपने समय में दादाभाई नौरोजी के बाद सबसे बड़े लोकप्रिय नेता थे। उन्होंने दादा भाई नौरोजी से ही राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में प्रवेश करने की प्रेरणा प्राप्त की थी। 1945 ई. में सर फिरोजशाह की जन्म शताब्दी केवल भारत में ही नहीं, लंदन में भी बहुत उत्साह के साथ मनायी गयी थी।

Firozshah Mehta – फिरोजशाह मेहता

सर फिरोजशाह ने दादा भाई नौरोजी के अनेक सिद्धान्तों को व्यावहारिक रूप में अपनाया। उन दिनों भारत में एक से एक नेता जन्मे थे, जो देश सेवा को ही अपना लक्ष्य मानते। बदरुद्दीन तैयब, महादेव गोविन्द रानडे, गोखले, तिलक, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, उमेशचन्द्र बनर्जी आदि योग्य नेताओं के साथ फिरोजशाह ने कार्य किया था।

फिरोजशाह मेहता दादाभाई नौरोजी की तरह पारसी थे, पर वे अपने को पहले भारतीय समझते थे। उन्होंने इस संबंध में एक बार कहा था “पारसी अपने को अलग रखें, ऐसी भावना पैदा होने से वे खुदगर्ज ही नहीं बल्कि छोटे और नासमझ हो जायेंगे।” आज भारत में जातिवाद, सम्प्रदायवाद का बोलबाला है। कुछ लोग देश में धर्म के नाम पर आतंक फैला रहे हैं। फिरोजशाह मेहता के जीवन से हम अपने अन्दर राष्ट्रीयता का भाव भर सकते हैं।

हम सभी पहले भारतीय हैं बाद में हिन्दू या मुसलमान, जैन या पारसी, बौद्ध या सिख इसी भावना से हम अपने देश को अखण्ड रख सकते हैं। सर फिरोजशाह मेहता की प्रतिभा बहुमुखी थी। वे जहाँ भी जाते अपनी धाक जमायें बिना नहीं रहते। वे उच्च कोटि के वक्ता, उद्भट विद्वान् तथा कुशल नेता थे जिन्हें जनता और सरकार दोनों मानती।

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जन्म – सर फिरोजशाह मेहता का जन्म 4 अगस्त, 1845 को धनी पारसी के घर में हुआ था। इनके पिता बड़े नामी व्यापारी थे, लेकिन वाणिज्य के साथ-साथ ये शिक्षा के प्रचार और समाज सेवा में भी काफी भाग लेते। यही कारण है कि उन्होंने अपने पुत्र फिरोजशाह मेहता के अध्ययन के लिए अच्छी व्यवस्था की थी। बाम्बे के एलिफिस्टन कॉलेज से उन्होंने 1864 ई. में बी.ए. की परीक्षा पास की।

कुछ महीने बाद ही उन्होंने एम.ए. की डिग्री भी प्राप्त कर ली। वे शायद पहले पारसी थे जिन्होंने एम.ए. की शिक्षा प्राप्त की। फिरोजशाह की इच्छा इंगलैण्ड में जाकर बैरिस्ट्री पढ़ने की थी। अतः वे 1865 ई. में विलायत गये। वहाँ वे बहुत तन्मयता के साथ कानून का अध्ययन करने लगे। वहाँ वे हुए समय का वे सदुपयोग करते पाश्चात्य दार्शनिकों के विचारों से वे अवगत हुए। इंगलैण्ड में उनकी प्रतिभा और अधिक विकसित हुई।

लॉर्ड कर्जन ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में उनके सहपाठी थे। मुंबई नगर निगम के अध्यक्ष, मुंबई विधान परिषद के सदस्य। मुंबई क्षेत्र के जाने-माने मावलवी नेता फिरोज शाह मेहता का व्यक्तित्व बहुत तेजतर्रार था। उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय के मामलों की देखभाल की थी। वह मुंबई के ठोस वर्गों से निकटता से जुड़े थे।

Firozshah Mehta – फिरोजशाह मेहता

उनका नेतृत्व बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन के माध्यम से उभरा। सरकारी अधिकारियों से उनके अच्छे संबंध थे। यद्यपि वे अंग्रेजों की बुद्धिमता में विश्वास करते थे, उन्होंने अन्यायपूर्ण, सरकारी निर्णय की भी आलोचना की। मुंबई क्षेत्र के सियासी इलाकों में उनका एक अजीबोगरीब आभामंडल था I उनपर ब्रिटिश उदारवादी दार्शनिकों और नेताओं के विचारो का काफी प्रभाव था I

फिरोज शाह का एकतरफा नेतृत्व मुंबई में स्थापित हुआ। हालाँकि उनकी राय अक्सर सहमत नहीं होती थी, फिर भी किसी ने उनके खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं की। वे कांग्रेस के अधिवेशनों में नियमित रूप से उपस्थित नहीं होते थे। लेकिन केवल तिलक ने ही उनका खुलकर विरोध करने की ताकत दिखाई। हालांकि, नवंबर 1915 में मेहता की मृत्यु तक, तिलक को मुंबई में ज्यादा समर्थन नहीं मिला।

मेहता और गोखले दोनों की मृत्यु ने न केवल तिलक बल्कि जहाल नेताओं के नेतृत्व का भी मार्ग प्रशस्त किया। मेहता और गोखले की मृत्यु ने कांग्रेस में मवलों का अंत कर दिया। सूरत अधिवेशन में मेहता का दबदबा था। क्योंकि सूरत उनका गढ़ था। उन्होंने सूरत को अधिवेशन के स्थल के रूप में और रासबिहारी घोष को इसके अध्यक्ष के रूप में चुना था।

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तिलक गुट लाला लाजपत राय को अगला अध्यक्ष बनाना चाहता था, लेकिन वे सफल नहीं हुए। सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने सूरत सम्मेलन में फिरोज शाह मेहता की भूमिका की आलोचना की उनके अनुसार उनकी भूमिका लोकतंत्र के तत्वों को हानि पहुंचाने वाली थी I मुंबई नगर पालिका और मुंबई विश्वविद्यालय इन दोनों संस्थानों में उनका काफी वजन था। उन्होंने मुंबई में कई सुधार किए I

उन्होंने मुख्य रूप से स्थानीय स्वशासन के विचार और पद्धति को प्रतिष्ठा दी। मेहता ने ब्रिटिश राजतंत्र के दोषों की ओर इशारा किया। ब्रिटिश नौकरशाही की आलोचना की। हालाँकि लॉर्ड कर्जन और मेहता दोनों ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सहपाठी थे, फिर भी उन्होंने कर्जन के दो फैसलों, बंगाल के विभाजन और विश्वविद्यालय अधिनियम की कड़ी आलोचना की।

मुंबई सम्मेलन – वे मुंबई में 1904 के कांग्रेस अधिवेशन के स्वागतध्यक्ष थे। 1915 में मुंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। 1904 से ग्यारह साल बाद यह अधिवेशन मुम्बई में हो रहा था। सम्मेलन में 2269 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उनकी जिद थी कि मुंबई में एक अधिवेशन आयोजित किया जाए। अधिवेशन के अध्यक्ष सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा चुने गए।

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बेशक ये चुनाव भी मेहता के पुढाकार से ही हुआ हालांकि, नवंबर में उनकी और गोखले की मृत्यु से इस अधिवेशन का पूरा उत्साह चला गया I हालांकि लॉर्ड कर्जन और मेहता ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सहपाठी थे, कर्जन का बंगाल विभाजन और 1904 के विश्वविद्यालय अधिनियम की आलोचना की थी, लेकिन फिर भी उनका विचार था कि अंग्रेजों के साथ संबंध भारत के हित में हैं।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मेहता – इंगलैण्ड में ही फिरोजशाह मेहता की मुलाकात दादा भाई नौरोजी से हुई। ये उन दिनों इंगलैण्ड में ही रहकर भारतीयों के लिए कल्याण की योजना बनाते। इसके अलावा उनकी उमेशचन्द्र बनर्जी से भी वहीं भेंट हुई। ये तीनो उमेशचन्द्र बनर्जी, दादा भाई नौरोजी और फिरोजशाह मेहता बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्तम्भ बने और नरम दल के जीवनभर नेता बने रहे।

1868 ई. में वे लंदन से बैरिस्ट्री पास कर बम्बई पहुँचे। अपनी वकालत बम्बई में ही शुरू कर दी। पहले तो असफलता ही हाथ लगी पर कुछ दिनों के अन्दर ही वे बम्बई के प्रसिद्ध वकीलों में गिने जाने लगे। फिरोजशाह मेहता सामाजिक कार्यों में भी हाथ बटाते। धीरे-धीरे उनका प्रभाव नागरिक जीवन पर भी पड़ने लगा। 1872 ई. में बम्बई में म्युनिसीपैलिटी एक्ट बनने के बाद वे ही नागरिक प्रशासन के प्रधान हो गये।

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पुनः 1884 और 1885 तथा 1905 और 1911 उन्हें कॉरपोरेशन का अध्यक्ष चुना गया। 1886 ई. में बम्बई के गवर्नर ने इन्हें अपनी व्यवस्थापिका सभा का सदस्य नामजद किया। फिरोजशाह मेहता बड़े ओजस्वी वक्ता थे। तुरन्त ही इन्होंने अनेक सदस्यों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया। 1888 ई. में बाम्बे कारपोरेशन एक्ट को पारित करने में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। इनके प्रयत्न से बाम्बे नगर निगम को कुछ नागरिक अधिकार प्राप्त हो गये।

कॉंग्रेस की ओर से गवर्नर की प्रान्तीय व्यवस्थापिका सभाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग की जा रही थी। फलस्वरूप 1892 ई. में ‘भारतीय परिषद् कानून’ पारित किया गया। इसके अनुसार, प्रांतीय व्यवस्थापिक सभाओं में विश्वविद्यालयों और निगम को भी अपना सदस्य चुनकर भेजने का अधिकार दिया गया। फिरोजशाह मेहता बाम्बे कॉरपोरेशन द्वारा निर्विरोध सदस्य चुने गये।

वे भारत में सर्वप्रथम गैरसरकारी निर्वाचित सदस्य थे। 1893 ई. में ही बम्बई की व्यवस्थापिका सभा ने फिरोजशाह को ही केन्द्रीय कौंसिल में सदस्य चुनकर भेजा। 1905 ई. में सर फिरोजशाह मेहता को सरकार की ओर से ‘सर’ की उपाधि प्रदान की गई। 1905 ई. में जब प्रिंस ऑफ वेल्स भारत आये तो उनके स्वागत का भार भी इन्हीं के कंधों पर पड़ा। बाद में वे बम्बई विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी नियुक्त हुए।

Firozshah Mehta – फिरोजशाह मेहता

इन्हें विश्वविद्यालय की ओर से डाक्टर ऑफ लॉ की उपाधि प्रदान की गई। इसके अलावा सर फिरोजशाह मेहता सम्पादन कला में बड़ी अभिरुचि रखते थे। सन 1912 ई. में ‘बाम्बे क्रॉनिकल’ नामक एक राष्ट्रीय दैनिक समाचारपत्र की स्थापना की। यही नहीं उन्होंने सेन्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया की स्थापना में भी सोराबजी पोथकानवाला की भी बड़ी मदद की थी।

सर फिरोजशाह मेहता शिक्षा के प्रचार पर बहुत ध्यान देते थे। उनका विचार था कि शिक्षण संस्थाओं के व्यय का पूरा भार सरकार को वहन करना चाहिए। उस समय उनका यह विचार अवश्य ही क्रान्तिकारी था क्योंकि सरकार भारतीयों की शिक्षा पर बहुत कम खर्च करती थी। आज भले ही शिक्षा को सरकार ने माध्यमिक स्तर तक निःशुल्क कर दिया है, पर उस समय ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता था।

फिरोजशाह मेहता चाहते थे कि भारत के लोग बहादुर बनें। दुर्बलता को वे सबसे बड़ा पाप मानते थे। सर फिरोजशाह मेहता राष्ट्रीय गतिविधियों में भी भाग लेने लगे। इनके प्रयत्न से बम्बई प्रेसिडेन्सी नामक संस्था बनी ये ही इसके जीवनपर्यन्त प्रधान रहे। जब 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बनी तब से ही उसमें सक्रिय हो उठे। अल्प समय में ही इतने लोकप्रिय हो। गये कि 1890 के कलकत्ता अधिवेशन में उन्हें अध्यक्ष चुना गया।

Firozshah Mehta – फिरोजशाह मेहता

फिरोजशाह मेहता उदारवादी विचारक थे। उनकी मान्यता थी कि भारतीयों का हित अँग्रेज़ी शासन में है। उन्होंने अध्यक्ष पद से बोलते हुए कहा था “भारत अंग्रेजी राज्य में है। अगर आप चाहें तो इसे अपने लिए अच्छा बना सकते हैं और चाहें तो बुरा। अगर आप अंग्रेजों के सामाजिक, नैतिक, मानसिक और राजनैतिक गुणों को अपनायेंगे तो भारत और ब्रिटेन के बीच संबंध अच्छा रहेगा।”

यद्यपि फिरोजशाह मेहता अंग्रेजी हुकूमत के समर्थक थे, पर उनके अन्याय को उन्होंने डटकर विरोध किया। उन्होंने सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई और सरकार के मनमाने कानून का भी विरोध किया। उन्होंने अपने लेखों और भाषणों से सरकार की त्रुटियों से जनता को अवगत कराया। फिरोजशाह सदा किसानों के भलाई के लिए कौंसिल में लड़ते रहे।

सरकार द्वारा पारित पुलिस कानून का अधिकांश सदस्यों ने समर्थन किया लेकिन फिरोज ने इसका विरोध किया। इस कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाये ही सज़ा देने की व्यवस्था थी। सर फिरोजशाह मेहता जीवनपर्यन्त देश की सेवा करते रहे। यह सही है कि वे तिलक की तरह लोकप्रिय नेता नहीं हो सके, कारण वे आरामपसन्द व्यक्ति थे और अधिक यात्रा से कतराते थे।

Firozshah Mehta – फिरोजशाह मेहता

मृत्यु – फिरोजशाह मेहता को  ‘मुंबई का शेर’ और ‘मुंबई के बेताज बादशाह’ के नाम से जाना जाता था। 1915 में उनके सुझाव पर भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का अधिवेशन बम्बई में होना निश्चित हुआ था। सत्येन्द्र प्रसन्न सिन्हा, अध्यक्षता करने वाले थे। स्वागत समिति का अध्यक्ष वृद्ध फिरोजशाह को ही बनाया गया था। लेकिन यह अधिवेशन फिरोज देख न सके। 5 नवम्बर, 1915 ई. में इस महान देशभक्त का स्वर्गवास हो गया। सर फिरोजशाह मेहता सच्चे देशभक्त और जनता के सेवक थे। उनका व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण आज भी अनुकरणीय है। 

Shetkaryancha Asud

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