Dr Ram Manohar Lohia – डॉ. राममनोहर लोहिया

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पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सोवियत संघ का भ्रमण किया और ‘सोवियत रसिया’ (Soviet Rusia) नाम से एक पुस्तक भी लिखी। इनके अलावा एम. एन. राय भी सोवियत व्यवस्था से काफी प्रभावित हो चुके थे। सोवियत साम्यवादी व्यवस्था के अलावा इंगलैण्ड के उदार समाजवादी आन्दोलन ने भी भारतीयों पर अमिट छाप छोड़ी थी। बाबू जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, डॉ. राममनोहर लोहिया भारतीय समाज विचारधारा के स्तम्भ माने जाते थे और मार्क्सवादी विचारों से भी काफी प्रभावित थे।

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लोहिया की गिनती बड़े ही सिद्धान्तवादी समाजवादियों में की जाती थी। ये बहुत ही लक्षण बुद्धि और प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति थे। डॉ. साहब ने जब होश संभाला तब से वे समाजवादी आन्दोलन से ही जुड़े रहे। आज समाजवाद और लोहिया एक दूसरे के पर्यायवाची बन गये हैं। हमारी समझ में डॉ. राममनोहर लोहिया भारतीय राजनीतिक क्षितिज पर एक देदीप्यमान नक्षत्र थे जिनके अस्त होते ही समाजवाद रूपी पुष्प मुरझाकर धरती पर धाराशायी हो गया।

डॉ. लोहिया के समान समर्पित समाजवादी बहुत कम हुए हैं। यह बात दूसरी है कि उनका समाजवाद बहुत व्यापक नहीं था। महान नेता होते हुए भी वे अपने जाति और वर्ग के बंधन से ऊपर न उठा पाए। वे ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के सिद्धान्त के विपरीत ‘बहुजन हिताय’ में अपनी आस्था रखते थे।

वे तथाकथित पिछड़ों के लिए 60 प्रतिशत आरक्षण की मांग करते थे। मेरे विचार में सर्वश्रेष्ठ नेता वही है जो समभाव से सबके लिए गंगा के पवित्र जल के समान लाभप्रद हो। राम, कृष्ण, महात्मा गाँधी, महात्मा बुद्ध, महत्मा ईसा, पंडित जवाहरलाल नेहरू, खान अब्दुल गफ्फार खाँ कुछ ऐसी विभूतियाँ हैं जिन पर सारा संसार आज भी गर्व करता है और वर्षों तक करता रहेगा।

Dr Ram Manohar Lohia – डॉ. राममनोहर लोहिया

डॉ. राममनोहर लोहिया अत्यधिक निर्भय और स्वतंत्र विचारक थे। मार्क्सवाद का ज्ञान रखते हुए भी वे पूर्णत मार्क्सवादी नहीं कहे जा सकते। वे महात्मा गाँधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों से भी अपनी असहमति रखते थे। इनके अलावा उनके विचार जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, नरेन्द्रदेव और आचार्य जे. बी. कृपलानी जैसे लोगों से भी समय-समय पर टकराते रहे। लोहिया जी एक बार निश्चित कर लेते उस पर चट्टान के समान अड़े रहते। उनके आर्थिक और सामाजिक विचार बहुतों से भिन्न थे।

पंडित जवाहरलाल नेहरू के जीवनकाल में ही उन्होंने ‘कांग्रेस भगाओ और देश बचाओ’ का नारा देना शुरू किया था। पंडित जी के देहावसान के बाद 1967 में उनके विचारों का जनमानस पर काफी प्रभाव पड़ा। नेहरू के बाद कांग्रेस का नेतृत्व संयुक्त हाथों में आ पहुँचा जो लोहिया के समक्ष टिक नहीं सके। 1967 में पहले-पहल गैर कांग्रेसवादी सरकारें देश के कई राज्यों में बनी लेकिन उनका सफाया भी आपसी बिखराव के चलते तुरन्त हो गया। फिर भी डॉ. राममनोहर लोहिया की भूमिका इससे कम नहीं होती है।

कहना न होगा कि 1967 में उनके और कांग्रेस विरोधी आन्दोलन में बाबू जयप्रकाश नारायण और आचार्य जे.बी. कृपालानी ने भी दिल खोलकर साथ नहीं दिया। डॉ. साहब एक महान राजनीतिक योद्धा, स्वतंत्र चिन्तक, स्पष्ट वक्ता, दृढनिश्चयी और त्यागी पुरुष थे। डॉ. राममनोहर लोहिया समाजवादी विचारधारा के एक बहुत ही सशक्त प्रचारक थे। वे तीक्ष्ण भाषण देते थे पर वे जो भी कहते उनका समर्थन आंकड़ों से करते।

 

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उन्होंने एक बार कहा था कि भारत गरीब नहीं है, भारत के लोग गरीब हैं। यह दुर्भाग्य की बात है कि भारत के गरीब एक नहीं, बल्कि जरूरत से ज्यादा आपस में विभक्त है। आज भी डॉ. लोहिया के इस कथन में सत्यता का अंश मौजूद है। हमारे नेता अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए जाति, धर्म, सम्प्रदाय, वर्ग भाषा के आधार पर जनता को बाँटकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। हमारा दृढ़ विश्वास है कि जिस दिन भारत की सुषुप्त जनता जाग जाएगी उस दिन चालबाज राजनीतिक सदा के लिए धाराशायी हो जायेंगे।

जन्म – इस युगद्रष्टा पुरुष का जन्म 23 मार्च, 1910 ई. को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिलान्तर्गत अकबरपुर नामक ग्राम में एका वणिक परिवार में हुआ था। इनके पूर्वज लालमन सुखराम मिर्जापुर में निवास करते थे और वहीं एक कपड़े और लोहे की छोटी सी दुकान पर आजीविका चलाते। डॉ. राममनोहर लोहिया के पिता हीरालाल लोहिया स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े हुए थे तथा उनकी माता चन्दरी या चन्दादेवी एक धर्मनिष्ठ पतिव्रता थीं।

शिक्षा – उन्होंने अपने पैतृक स्थान अकबरपुर में स्थापित टंडन पाठशाला और विश्वेश्वरनाथ हाई स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। अपने पिताश्री के साथ बम्बई चले गए और वहीं से उन्होंने बम्बई विश्वविद्यालय से सन् 1925 ई. में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक की परीक्षा पास की। सन् 1927 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से इन्होंने आई.ए. किया और सन् 1929 ई. में कलकत्ता के विद्यासागर महाविद्यालय से अंग्रेजी विषय में ऑनर्स के साथ बी.ए. किया।

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स्नातक होते ही एक सुप्रतिष्ठित न्यास से छात्रवृत्ति प्राप्त कर उच्च अध्ययन के लिए पहले लंदन और उसके बाद बर्लिन चले गये। बर्लिन विश्वविद्यालय से सन् 1932 ई. में पी-एच. डी. की डिग्री प्राप्त की। उनके शोध का विषय था–“भारत का नमक और व्यक्तिगत सत्याग्रह ” भारतीय राजनीति का परिदृश्य 1932 में काफी बदल चुका था।

1927 ई. में ब्रिटिश सरकार ने जान साइमन की अध्यक्षता में भारत की राजनीतिक परिस्थितियों का अध्ययन कर उसके समाधान के लिए एक प्रतिवेदन प्रस्तुत करने को भेजा था, पर साइमन को यहाँ बहुत कठिनाइयों को झेलना पड़ा। भारत के हर भाग में ‘साइमन वापस जाओ’ के नारों से उसका बहिष्कार किया गया। काला झण्डा दिखाकर उसका अपमान किया गया।

पंजाब में लाला लाजपत राय ने, संयुक्त प्रान्त में पंडित जवाहरलाल नेहरू और गोविन्दबल्लभ पंत ने आयोग के बहिष्कार का नेतृत्व किया फिर भी साइमन ने 1930 में सरकार को अपना प्रतिवेदन समर्पित किया। गाँधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ हुआ। हजारों लोग गोलियो के शिकार हुए और जेल गये।

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इंगलैण्ड में भारतीय राजनीतिक समस्या के निराकरण के लिए गोलमेज परिषदे हुई। संसद की संयुक्त प्रवर समिति को भारत के लिए नया संविधान बनाने का कार्यभार सौंपा गया। तात्पर्य यह है कि राजनीतिक स्थिति बहुत चिंताजनक थी। गाँधी-इरविन समझौते से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। भारतीय नवयुवक जवाहरलाल और सुभाष के नेतृत्व में पूर्ण स्वराज्य की माँग पर जोर दे रहे थे।

डॉ. राममनोहर लोहिया और भारतीय स्वतंत्र संग्राम – डॉ. राममनोहर लोहिया के दिल में किशोरावस्था से ही स्वतंत्रता के लिए तड़प उत्पन्न हो चुकी थी। उन्होंने भारत माँ को बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए कसमें खायी। बचपन से ही मातृ सुख से वंचित रहने के कारण लोहिया भावुक कम, तार्किक अधिक थे। अपनी चाची और दादी की गोद में पले और अपने पिता के अनुपम दुलार के फलस्वरूप सौभाग्यवश उनमें हीन भावनायें नहीं पनप पायीं। लोहिया के पिता हीरालाल जी उन दिनों की राजनीति में अपना स्थान बना चुके थे।

8 वर्ष की अवस्था में अपने पुत्र राममनोहर को लोहिया जी अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में लेते गये थे। बालक लोहिया के मन में चमकते हुए पंडाल और नेताओं को देखकर मन में अद्भुत भावनायें उठ रही होगी। उसे क्या पता था कि यही बालक एक दिन भारत के राजनीतिक मंच पर प्रचण्ड प्रभाकर के समान चमकेगा।

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उन्होंने 16 वर्ष की अवस्था में 1926 के गुवाहाटी के कांग्रेस अधिवेशन में पिता के साथ भाग लिया। के बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में उनकी इच्छा व्याख्याता बनने की थी पर उन्हें इस प्रयत्न में असफलता मिली। तदुपरान्त उन्होंने रामेश्वरदास बिड़ला के यहाँ आप्त सचिव का पद ग्रहण किया। बड़ी खूबी से उन्होंने इसका निर्वाह किया।

होता वही है जो ईश्वर चाहता है। एक स्वतंत्र शेर को कोई कब तक पिज़रे में चंद रख सकता है। आजाद पुरुष केवल रोटी से संतुष्ट नहीं होता। धीरे-धीरे तत्कालीन राजनीति में उनकी अभिरुचि बढ़ती गई। पिता के समान पुत्र भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। डॉ. राममनोहर लोहिया ने भारत को विदेशी सत्ता से मुक्त करने का दृढ़ संकल्प लिया और उससे वे कभी टस से मस नहीं हुये।

1933 ई. तक उनका सम्पर्क कांग्रेस में समाजवादी नेताओं से काफी हो चुका था। कांग्रेस के अन्दर कुछ लोग समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे। उन सबने यह तय किया कि 1934 ई. में कांग्रेस सोशलिस्ट संगठन पटना में किया जाये। बाबू जयप्रकाश नारायण इसका भार अपने ऊपर लिया। अच्युत पटवर्धन की अध्यक्षता में यह सम्मेलन सम्पन्न हुआ जिसमें डॉ. राममनोहर लोहिया ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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सर्वसम्मति से लोहिया जी को कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की कार्यसमिति के सदस्य के साथ-साथ पार्टी के प्रमुख साप्ताहिक पत्र ‘कांग्रेस सोशलिस्ट’ का प्रथम सम्पादक नियुक्त किया गया। बाद में कांग्रेस के विदेश विभाग के सचिव पद पर भी नियुक्त हुए। कुछ दिनों तक उन्होंने नेहरूजी के सचिव के रूप में भी काम किया था। जब नेहरूजी कांग्रेस के विदेश विभाग के प्रमुख थे। सन् 1938 ई. में लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में उन्हें कांग्रेस की समाजवादी शाखा की केन्द्रीय समिति का सदस्य चुना गया।

सन् 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ हुआ। बिहार सहित अन्य प्रांतों में बनी लोक सरकारों ने पद-त्याग कर दिया। गाँधीजी से मतभेद होने के कारण सुभाषचन्द्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से पद-त्याग कर दिया था। पहले कुछ कांग्रेस नेता जर्मनी के खिलाफ ब्रिटिश सरकार की सहायता करने के पक्ष में थे क्योंकि उन्हें यह समझाया गया कि संघर्ष, तानाशाही व्यवस्था और जनतंत्र के बीच है।

डॉ. राममनोहर लोहिया इस विचार से सहमत नहीं थे। उन्होंने कलकत्ता में भाषण दिया कि हमें इस युद्ध में अंग्रेजों की सहायता नहीं करनी चाहिए। “न एक भाई न एक पाई” का पुनः नारा देकर भारतीयों को युद्ध से मुख मोड़ने का प्रयास किया। सरकार ने उन्हें इस अपराध में गिरफ्तार कर लिया। पुनः उन्हें छूटने पर इलाहाबाद के कांग्रेस दफ्तर से जेल में बन्द कर दिया गया।

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महात्मा गाँधी ने 1942 ई. में ‘करो या मरो’ का नारा दिया 8 अगस्त, 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन का डॉ. लोहिया ने हृदय से समर्थन किया 20 मई, 1944 को पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और लाहौर जेल में बंद कर दिया जहाँ उन्हें अनेक तरह के कष्ट उठाने पड़े। भूमिगत होकर कलकत्ता और बम्बई से गुप्त कांग्रेसी कार्यक्रमों के प्रसारण का संचालन करने लगे और उन्हीं दिनों जयप्रकाश नारायण के साथ मिलकर नेपाल में जाकर आजाद दस्ता के लिए कार्य किया।

11 अप्रैल, 1946 को जेल से छूटने के बाद उन्हें कांग्रेस का प्रधानमंत्री बनाये जाने का प्रस्ताव आया पर उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। लोहिया का मतभेद कांग्रेस के साथ बढ़ता गया। उनका विचार था कि कांग्रेस का अध्यक्ष न तो सत्ता में आने पर प्रधानमंत्री का पद संभाले और न कार्यसमिति का कोई सदस्य केन्द्र या राज्य में मंत्री बने। इस मुद्दे पर डटे रहने के कारण उन्हें अपने कई समाजवादी साथियों के साथ 1948 में कांग्रेस से अलग होना पड़ा।

1952 ई. में आचार्य कृपलानी के साथ मिलकर उन्होंने कृषक मजदूर प्रजा पार्टी को मिलाकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का निर्माण किया। इस पार्टी में वे केवल दो वर्षों तक बने रहे। भाषा विवाद को लेकर त्रावनकोर-कोचीन के मुख्यमंत्री पत्तमयानु पिल्लई की भूमिका के विरोध में डॉ. लोहिया द्वारा वक्तव्य जारी किये जाने के कारण उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

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इसके बाद लोहिया हतोत्साहित नहीं हुए और 1955 में हैदराबाद में सोशलिस्टों का संगठन कर अलग पार्टी बनायी जिसके वे अध्यक्ष बने। मैनकाइन्ड नामक पत्रिका भी निकाली एवं रवय इसके ये सम्पादक बने। 7 जून, 1964 को पार्टी का विलय कर सोशलिस्ट पार्टी के साथ कर दिया जिसका नाम संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी रखा गया।

डॉ. लोहिया का विचार था कि हिन्दी का ही प्रयोग सब जगह किया जाये। पिछड़ों और अछूतों को और अधिकार दिये जायें जिसे उनके बहुत से मित्रों ने पसन्द नहीं किया। दक्षिण भारत के लोगों ने उनके इस विचार को पसन्द नहीं किया। उनके दल को दक्षिण में कोई मान्यता नहीं मिली।

डॉ. राममनोहर लोहिया पंडित नेहरू और अन्य नेताओं के बड़े समालोचक थे। नेहरूजी को कभी-कभी वे चकलेटी कालर की संज्ञा देते। बहुत बार उन्होंने संसद में जाने का प्रयत्न किया। अंत में 1963 में फर्रुखाबाद क्षेत्र से लोकसभा के लिए पहली बार एवं अंतिम बार निर्वाचित हुए। वे बड़े ही ओजस्वी वक्ता, प्रबुद्ध सांसद थे। लोकसभा में लोहिया दहाड़ते तो सभी सांसद शान्त हो जाते। उनके बोलते समय लोकसभा में ठहाका लगाना और तालियों की गड़गड़ाहट स्वाभाविक बात थी।

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कभी-कभी पंडित नेहरू को भी उनके समक्ष निरुत्तर होना पड़ता था। उनके मंत्रिमण्डल के लोग तो मानो हतप्रभ हो जाते। लोहिया ने नेहरूजी द्वारा, गठित योजना आयोग को ब्राह्मण आयोग की संज्ञा दी थी। कभी-कभी सस्ती लोकप्रियता के लिए वे वैसे वाक्यों का प्रयोग कर दिया करते थे।

डॉ. लोहिया द्वारा सदन और सदन के बाहर दिये गये वक्तव्यों को भारत स्थित दूतावासों द्वारा बड़ा ही महत्त्व दिया जाता था और उनके द्वारा अपनी-अपनी भाषाओं में अनुवाद करवाकर अपने देशों में प्रेषित किया जाता थाI एक संविधानविद् और सुयोग्य जागरूक सांसद के रूप में लोकसभा की सदस्यता की संक्षिप्त अवधि में डॉ. लोहिया ने जो परिचय दिया है, उससे उनके व्यक्तित्व की निराली विशेषता उजागर होती है।

डॉ. राममनोहर लोहिया का बाड़ा व्यक्तित्व उतना आकर्षक और मोहक नहीं था। वे सामान्य कद के व्यक्ति थे ये डॉ. राजेन्द्रप्रसाद के सवेरे जगो और सवेरे सोओ’ के सिद्धान्त में नहीं बल्कि देर से सोने और देर से जगने के आदी थे। गांधीजी के साथ रहने पर भी वे धूम्रपान का परित्याग नहीं कर सके। जमकर सिगरेट और चाय पीते, डॉ. लोहिया में कई विशिष्ट गुण मौजूद थे। वे खूब हँसते और दूसरों को भी हँसाते। उनके भाषण, व्यंग्यों और आँकड़ों से भरे होते।

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हिन्दी के कट्टर समर्थक थे, पर हिन्दू धर्म में फैले पाखण्ड के वे विरोधी थे। चाहे राजा हो या रक वे सबको उचित जवाब देते। वे महिलाओं और समाज के पिछड़े परित्यक्त वर्गों के हिमायती थे। वे वर्ग और वर्ग-भेद के ऊपर से कट्टर विरोधी होते हुए भी जाति और वर्ग के आधार पर आरक्षण का समर्थन करते। वे जनसंख्या वृद्धि के विरोधी थे। उनकी मान्यता थी कि अन्तर्जातीय विवाह से जातिवाद का प्रभाव कुछ हद तक कम हो सकता है।

डॉ. लोहिया का विचार था कि देश में विदेशी पूंजी से चलाये जा रहे कल-कारखानों का राष्ट्रीयकरण किया जाये और साढ़े छह हजार एकड़ तक जमीन रखने वाले हर वर्ग के किसानों को राजस्व की छूट मिलनी चाहिए। उनका आर्थिक विचार लोकहितेषी था। वे पूंजी को कुछ लोगों तक सीमित रखने के विरोधी थे। उसका समाजीकरण चाहते थे। पूंजी का वितरण उस तरह से हो जिससे अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो सके। वे सत्ता के विकेन्द्रीकरण में अपनी आस्था रखते थे।

उनका कहना था कि सत्ता का केन्द्रीयकरण भ्रष्टाचार को जन्म देता है। हर हालत में समाज के हित में उसका विकेन्द्रीकरण आवश्यक है। वे शासन में सबकी सहभागिता के समर्थक थे। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुदृढीकरण के पक्षधर थे। वे देश के उत्थान के लिए कृषि की उन्नति को आवश्यक शर्त मानते थे। कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था ग्राम्य जीवन के लिए जरूरी है। भारत गाँवों का देश है जहाँ 80 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर है। अतः हर हालत में कृषि का विकास होना ही चाहिए।

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डॉ. राममनोहर लोहिया पर कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एन्जिल के साम्यवादी विचारों, मार्क्स के कम्युनिस्ट मैनीफेस्टो और कैपिटल का प्रभाव स्पष्टतः परिलक्षित होता है। किन्तु मार्क्स के धर्म और राजनीति संबंधी विचारों को उतना महत्व नहीं देते जितना उनके आर्थिक विचारों को महत्त्व देते। मार्क्स की तरह वे नहीं मानते कि समय आने पर राज स्वतः समाप्त हो जाएगा।

महात्मा गांधीजी के विचारों को उन्होंने पूर्णतः नहीं अपनाया। लोहिया भारत की वैदेशिक नीति के आलोचक थे। हिन्दी के हिमायती होने के कारण वे सभी कार्यक्रमों को हिन्दी के माध्यम से ही करने के पक्षधर थे। डॉ. लोहिया ने द्वन्द्व भौतिकवाद का तो समर्थन किया था पर रूढ़िवादी मार्क्सवाद की अपेक्षा स्वतंत्र विचार को अधिक महत्त्व दिया है।

डॉ. लोहिया का विचार है कि प्रारम्भ काल से अब तक इतिहास जातियों एवं वर्गों के बीच आन्तरिक संघर्ष की उपज है। उनका यह विचार आंशिक रूप से ही सही कहा जा सकता है। इतिहास विभिन्न जातियों और वर्गों के बीच केवल संघर्ष का फल ही नहीं बल्कि प्रेम एवं सहयोग का परिणाम भी है।

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यह बात दूसरी है कि समय-समय पर अपना वर्चस्व कायम करने के लिए विभिन्न दलों के बीच युद्ध हुआ है जिसका मूल कारण जातीय द्वेष नहीं बल्कि सत्ता प्राप्त करना था। लोहिया मौलिक चिन्तन पर विशेष ध्यान देते थे। डॉ. लोहिया चतुर्थ स्तम्भीय जनतंत्र में विश्वास करते थे। इस चतुर्थ स्तम्भीय जनतंत्र में केन्द्रीयकरण और विकेन्द्रीकरण के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न होता है। इस पद्धति में ग्राम, महल, राज्य और केन्द्र सबका महत्त्व कायम रहता है।

वे आपस में व्यावसायिक संपवाद की व्यवस्था के तहत समन्वित है। इस पद्धति में जिला प्रशासन को समाप्त कर दिया जाता है जो समस्त अधिकारों को गलत तरीके से अपने में रखता है। हम कह सकते हैं कि वे एक स्वतंत्र समीक्षक थे और यह मानते थे कि स्वतंत्र चिन्तन ही व्यक्ति का सर्वांगीण विकस कर सकता है।

डॉ. राममनोहर लोहिया ने साम्यवादियों की तरह द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत का विरोध नहीं किया था। साम्यवादियों का झुकाव सोवियत संघ की ओर रहता था। यही कारण है कि लोहिया ने एम. एन. राय के विचारों को कभी प्रमुखता नहीं दी। उनमें राष्ट्रवाद कूट-कूट कर भरा था। भारत पाकिस्तान विभाजन का उन्होंने खान अब्दुल गफ्फार खाँ के समान विरोध किया था। 1962 ई. में चीन ने जब भारत पर आक्रमण किया तब उन्होंने उसका डटकर विरोध किया। 

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वे चीनियों को अपनी सीमा से शीघ्र भगाने के पक्ष में थे। स्वतंत्रता के बा+-द यदि डॉ. लोहिया चाहते तो कोई सरकारी पद प्राप्त कर या मंत्री बनकर ऐशाआराम की जिन्दगी बसर कर सकते थे पर सिद्धांतों के धनी डॉ. साहब ने अपने विचारों के साथ कभी समझौता नहीं किया। आजादी के बाद उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक आन्दोलन में डटकर भाग लिया। वे बहुत कम नेताओं में से थे जिन्होंने आजादी के पहले और बाद में भी जेल की यात्रा की।

वे केवल सफल राजनेता और प्रथम कोटि के स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे बल्कि गाँधी, नेहरू, सुभाष, डॉ. राजेन्द्रप्रसाद आदि की तरह एक प्रख्यात और यशस्वी लेखक भी थे। यह बात दूसरी है कि गाँधी और नेहरू की तरह उनके ग्रन्थ लोकप्रिय नहीं हो पाये हैं फिर भी उनके द्वारा लिखित पुस्तकें भारत की समसामयिक आर्थिक परिस्थितियों का दिग्दर्शन कराने वाली हैं। डॉ. राममनोहर लोहिया ने पुराकालीन ब्राह्मण व्यवस्था पर भी कुठाराघात किया है। भाषा उनकी बहुत ही सरल एवं प्रांजल है।

उनकी पुस्तक पढ़ने से मन नहीं ऊबता। वैसे तो छोटी-मोटी उन्होंने चालीस पुस्तकों की रचना की है। कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों में मिनिस्ट्री ऑफ स्टाफर्ड क्रिप्स, रेस्पेक्ट्स ऑफ सोशलिस्ट पॉलिसी, व्हिल ऑफ हिस्ट्री, बिल पावर एण्ड अदर राइटिंग्स, गिल्टीमेन ऑफ इण्डियन पार्टीशन, मार्क्स, गाँधी एण्ड सोशलिज्म, इण्डिया चाइना एण्ड नर्दन फ्रंटियर्स, दि कास्ट सिस्टम, फ्रेगमेन्ट्स ऑफ वर्ल्ड माइण्ड, लैंग्वेज आदि प्रमुख हैं।

Dr Ram Manohar Lohia – डॉ. राममनोहर लोहिया

ये सभी पुस्तकें काफी प्रसिद्धि पा चुकी हैं जिनका अनुवाद देशी-विदेशी कई भाषाओं में हो चुका है। संक्षेप में उनकी लेखन-शैली की कला अनुपम और अद्वितीय थी। डॉ. राममनोहर लोहिया बहुभाषाविद् विचारक थे। हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला के साथ-साथ जर्मन, फ्रेंच, लैटिन आदि भाषाओं के भी ज्ञाता थे। डॉ. राममनोहर लोहिया ने अपना थेसिस तैयार करते समय जर्मन भाषा का अध्ययन किया था।

उन्होंने कई देशों का भ्रमण भी किया था। जर्मनी में 1951 में प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कान्फ्रेन्स में उन्होंने योगदान दिया था। 1953 ई. में उन्हीं के प्रयास पर रंगून में सर्वप्रथम एशियन सोशलिस्ट कान्फ्रेन्स आयोजित हुई थी। हालांकि उन्होंने अपरिहार्य कारणवश उसमें भाग नहीं लिया था। सन् 1946 ई. में उन्होंने गोआ की मुक्ति और नेपाल में जनतंत्र की बहाली के लिए अभियान छेड़ा था।

कोई भी व्यक्ति सर्वगुणसम्पन्न नहीं होता। डॉ. लोहिया भी इसके अपवाद नहीं थे। सद्गुणों के साथ उनमें निम्नांकित दुर्गुण मौजूद थे, यथा- अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं करना, विरोधियों के पीछे हाथ धोकर पड़ जाना, छोटी-छोटी बातों के लिए अकारण क्रोधित हो जाना, कठोर शब्दों का प्रयोग करना, भारत के एक वर्ग की आलोचना करना आदि।

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डॉ. राममनोहर लोहिया का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे योग्य पिता के योग्य पुत्र, सफल आन्दोलनकर्ता, एक स्वतंत्रता सेनानी, कुशल पत्रकार, सुविज्ञ लेखक, उच्च कोटि के संविधान वेत्ता, सफल सांसद और योग्य नेता थे डॉ. साहब भारतीय दीन-हीन, उपेक्षित, शोषित लोगों की दरिद्रता दुरवस्था से बेहद दुःखी और मर्माहत थे एवं जल्दी ही उनकी दयनीय दशा को सुधारने की तरकीब ढूँढा करते थे।

उनकी दृष्टि में भारत सुधारने और उसे प्रगति की राह पर ले जाने का रास्ता एकमात्र समाजवाद था। अतः भारतीय परिवेश में उन्होंने उपयुक्त प्रमाणित होने वाली नयी समाजवादी विचारधारा पर जोर दिया था। डॉ. राममनोहर लोहिया बड़े ही अध्यवसायी और परिश्रमी थे। अस्वस्थ रहते हुए भी उन्हें देश की चिन्ता सताती।

निधन – बुढ़ापा और बीमारी से कोई मुक्त नहीं हो सकता। डॉ. राममनोहर लोहिया प्रोस्टेटग्लैण्ड के ऑपरेशन के लिए दिल्ली स्थित विलिंगटन नर्सिंग होम में भर्ती किये गये। डाक्टरों ने उन्हें बचाने का भरसक प्रयत्न किया पर सफल नहीं हुए। 12 अक्टूबर, 1967 को यह दिव्य पुरुष सदा के लिए चिरनिद्रा में सो गया। उनके निधन पर देश-विदेश के राजनीतिज्ञों, विद्वानों और पत्रकारों ने अपनी संवेदना प्रकट की थी।

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उनके निधन से जो राजनीतिक क्षितिज पर शून्यता आयी उसे भरा नहीं जा सका। समाजवाद का सच्चा पुजारी आज हमारे बीच नहीं है लेकिन लोहियाजी के सारगर्भित विचार अवश्य ही विद्यमान हैं जिनके आधार पर आज के कुछ नेता सामाजिक न्याय की स्थापना करने का प्रयास कर रहे हैं। डॉ. लोहिया निःसन्देह एक युगपुरुष थे। अपनी वाणी, आचरण, चिन्तन, अनुशीलन एवं त्यागमूलक तपश्चर्या के द्वारा भारत के समुचित विकास के लिए उन्होंने जो रास्ते बतलाये थे, वे आज भी प्रासंगिक है।

Shetkaryancha Asud

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