Dr Annie Besant – डॉ एनी बेसेन्ट

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जन्म – एनी बेसेंट अदम्य साहस से भरपूर महिला थीं, जिन्होंने इंग्लैंड ही नहीं, भारत में भी अपनी छाप छोड़ी। उनका जीवन सदैव स्वतंत्र विचारधारा से प्रेरित रहा। 1 अक्तूबर, 1847 को क्लैफम, लंदन में जन्मी एनी बेसेंट का असली नाम ऐनी वुड था। वे लंदन में बस गए आयरिश मूल के मध्यमवर्गीय परिवार से थीं। उनके पिता विलियम वुड डॉक्टर थे। उनकी माँ का नाम ऐमिली मॉरिस था। बेसेंट जब पाँच साल की थीं, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। उनके परिवार की आमदनी का कोई स्रोत नहीं बचा।

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उनकी माँ ने स्थिति सँभाली और हैरो स्कूल में बोर्डिंग हाउस में काम करना शुरू कर दिया। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर ही बन रही तो ऐमिली ने ऐनी के पालन-पोषण की जिम्मेदारी अपनी सहेली ऐलन मैरियट को सौंप दी। ऐलन ने ऐनी को अच्छी शिक्षा और अच्छे संस्कार दिए। ऐमिली ने ही उनके अंदर स्वतंत्र चेतना और सामाजिक दायित्व की भावना पैदा की। इन्हीं दोनों भावनाओं पर एनी बेसेंट के जीवन की नींव पड़ी। उन्होंने यूरोप का दौरा भी किया और रोमन कैथोलिक धर्म के प्रति झुकाव महसूस किया।

प्रारंभिक जीवन – 19 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने से सात वर्ष बड़े एक पादरी फ्रैंक बेसेंट से विवाह किया। वे भी उनके विचारों से सहमत थे। हालाँकि उनका वैवाहिक जीवन लंबा नहीं चला। चार साल के वैवाहिक जीवन में उन्हें एक बेटा और एक बेटी, कुल दो संतानें हुईं। ऐनी का स्वतंत्र स्वभाव और कृषि मजदूरों के समर्थन के कारण उनका वैवाहिक जीवन सफल नहीं हो सका।

उनके लेख, कहानियाँ और बच्चों की किताबें लिखने से होनेवाली सारी आय उनके पति ने ले ली। ऐनी का अपने पति से कानूनी अलगाव हो गया। उनकी बेटी ऐनी के साथ रही। उन्होंने वैवाहिक जीवन सुधारने का एक और असफल प्रयास किया, जिसके बाद उनका विवाह पूरी तरह से टूट गया। हालाँकि तलाक के बाद भी उन्होंने बेसेंट सरनेम लगाए रखा, क्योंकि पादरी फ्रैंक के लिए तलाक प्रतिष्ठा के प्रतिकूल होता।

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उस समय तक ऐनी धर्म से संबंधित कई अनुत्तरित प्रश्नों से जूझ रही थीं। उन्होंने कई पुस्तकों की सहायता ली, लेकिन जब उन्हें पुस्तकों से भी अपने उत्तर नहीं मिले तो अन्य उपाय तलाशने शुरू किए। प्रश्नों से घिरे उनके मन ने ईसाई परंपराओं पर अंधविश्वास नहीं किया। उन्होंने चर्च की आलोचना शुरू कर दी, विशेषकर इंग्लैंड का सरकारी चर्च उनके निशाने पर रहा। आखिरकार उन्होंने ईसाई धर्म को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

उन्होंने चार्ल्स ब्रेडलाफ के साथ स्वतंत्र रूप से प्रवचन करने शुरू कर दिए और नेशनल सेकुलर सोसायटी में शामिल हो गईं। वे ब्रैडलाफ के साप्ताहिक ‘नेशनल रिफॉर्मर’ की सह-संपादक भी बनीं और साथ में महिला मताधिकार, मजदूर संघ, राष्ट्रीय शिक्षा और परिवार नियोजन जैसे सामाजिक मुद्दों पर लेख भी लिखती रहीं। ऐनी विलक्षण वक्ता भी थीं। वे बच्चों और वंचितों की शिक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बोलती थीं।

ब्रेडलाफ और ऐनी ने परिवार नियोजन के बारे में चार्ल्स नोल्टन की एक किताब भी प्रकाशित की, जिसकी आलोचना भी हुई और उन्हें प्रताड़ना भी सहनी पड़ी। पुस्तक को अश्लील माना गया और उन्हें छह माह की जेल की सजा भी सुनाई गई, हालाँकि बाद में सजा माफ कर दी गई। ऐनी ने तभी जन्म-नियंत्रण पर ‘द लॉज ऑफ पॉपुलेशन’ नाम की किताब लिखी। अपने सामाजिक कार्य उन्होंने जारी रखे। उन्हीं दिनों उन्होंने लंदन यूनिवर्सिटी से विज्ञान में डिग्री हासिल कर ली।

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चार्ल्स को नॉर्थहैंप्टन से सांसद चुन लिया गया। चार्ल्स ईसाई नहीं थे, इसलिए उन्होंने बाइबिल की शपथ लेने से इनकार कर दिया और उनकी संसद् सदस्यता समाप्त कर दी गई। महिलाओं की संसदीय कार्यों में कोई भूमिका नहीं होती थी, इसलिए ऐनी और ब्रेडलाफ की दोस्ती आगे नहीं चल पाई। ऐनी की मित्रता अब युवा आयरिश लेखक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ से हो गई और वे फैबियन सोसायटी में शामिल हो गईं।

राजनीती और ऐनी – ऐनी राजनीति में सक्रिय हो गई और लंदन में माचिस की फैक्ट्रियों में काम करनेवाली लड़कियों के आंदोलन में हिस्सा लिया। कुछ समय बाद वे मार्क्सवाद से बेहद प्रभावित हो गई और सोशलिस्ट लीग में शामिल हो गईं। वे चुनाव में भी खड़ी हुई और अपने प्रभावशाली भाषणों के बल पर जीत भी गईं। एनी बेसेंट का झुकाव सम्मोहन, अध्यात्म और तंत्र-मंत्र की ओर भी था। जब

उन्होंने मैडम हेलेना ब्लावत्स्की की किताब ‘द सीक्रेट डॉक्ट्रिन’ पढ़ी, तो उन्हें लगा कि उनकी सत्य की खोज को अर्थ मिल गया। उन्हें इस किताब की समीक्षा करनी थी, इसलिए उन्होंने लेखिका का साक्षात्कार लिया। थियोसॉफिकल सोसायटी की संस्थापक मैडम हेलेना से हुई मुलाकात ने उन्हें उनकी राह दिखा दी और उन्होंने धर्मनिरपेक्ष विचार त्याग दिए तथा थियोसॉफिकल सोसायटी में शामिल हो गईं।

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हेलेना ने नया धार्मिक आंदोलन ‘ थियोसॉफी’ शुरू किया था और अपनी किताब में इसके बारे में लिखा ऐनी इससे बहुत प्रभावित हुई और अपने लेखों-भाषणों के जरिए उन्होंने थियोसॉफी के विचार प्रचारित-प्रसारित करने शुरू कर दिए। उन्होंने विश्व में व्याप्त बुराइयों को थियोसॉफी की मदद से जड़ से समाप्त करने के नए तरीके खोजे। हेलेना ब्लावत्स्की के निधन के बाद मूल सोसायटी में विभाजन हो गया।

उसकी अमेरिकी शाखा ने अलग सोसायटी बना ली। मूल सोसायटी के प्रमुख एच.एस. ऑलकॉट बने। एनी बेसेंट इसी के साथ जुड़ी रहीं। इस समय इसका मुख्यालय चेन्नई में है। सन् 1893 में उन्होंने शिकागो में विश्व धर्म संसद् में थियोसॉफिकल सोसायटी का प्रतिनिधित्व किया। वहीं पर उन्होंने स्वामी विवेकानंद का भाषण सुना। वे इंटरनेशनल ऑर्डर ऑफ फ्रीमेसॉनरी, ली ड्रॉइटह्यूमन की सदस्य बन गईं।

उन्होंने पहली डिग्री हासिल की और इंग्लैंड लौटकर लॉज ऑफ इंटरनेशनल मिक्स्ड मेसॉनरी, ली ड्रॉइटह्यूमन की स्थापना की। एच.एस. ऑल्कॉट के साथ वे सोसायटी की सदस्य के रूप में भारत आईं। यहाँ उन्हें एक नया जगत् देखने को मिला। यहाँ उन्हें घर जैसा ही महसूस हुआ। भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक विरासत से वे बहुत प्रभावित हुईं। कई कट्टर हिंदू ब्राह्मण भी उनसे प्रभावित होकर थियोसॉफिकल सोसायटी में शामिल हो गए।

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थियोसॉफिकल सोसायटी के लिए काम करते हुए उन्होंने विश्व भर के दौरे किए। वे कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, न्यूजीलैंड और यूरोप के करीब हर देश गईं। सन् 1907 में एच.एस. ऑल्कॉट की मृत्यु के पश्चात् वे थियोसॉफिकल सोसायटी की दूसरी अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं। इस पद पर वे आजीवन बनी रहीं। सोसायटी की अध्यक्ष के रूप में उन्होंने इसका विस्तार विश्व भर में किया। सोसायटी के कार्यालयों की संख्या 11 से बढ़कर 47 हो गई। थियोसॉफिकल सोसायटी ने कई स्कूल खोले, जिनमें बच्चों को थियोसॉफी के मूल सिद्धांत पढ़ाए जाते थे।

सोसायटी के काम से जब वे एक बार इंग्लैंड में थीं, तो उनकी मुलाकात एक अन्य थियोसॉफिस्ट चार्ल्स वेबस्टर लीडबीटर से हुई। चार्ल्स ने बताया कि वह अतींद्रियदर्शी है। एनी बेसेंट को यह विषय दिलचस्प लगा। उन्होंने भी इसमें ज्ञान बढ़ाया। लीडवीटर के अनुसार तो एनी बेसेंट भी अतींद्रियदर्शी हो गई थीं। उनके अनुसार, उन लोगों ने अपनी इस क्षमता के बल पर दुनिया के कई स्थानों का भ्रमण

किया थियोसॉफिकल सोसायटी के लिए काम करने के दौरान ही उन्होंने इस विषय पर कई किताबें भी लिखीं। उनकी लिखी सबसे अहम किताब ‘ऑकल्ट केमिस्ट्री’ है। इस किताब में उन्होंने अपने जाँचे रासायनिक तत्त्वों का जिक्र किया। पुस्तक क्रांतिकारी थी, लेकिन हाल की घटनाओं से पुस्तक में बताई बातों की पुष्टि हुई है। पुस्तक को सन् 1951 में सोसायटी के एक पूर्व अध्यक्ष ने बड़े स्तर पर प्रकाशित करवाया।

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भारत में भी वे महिलाओं के उत्थान और शिक्षा के लिए सक्रिय रूप से कार्य करती रहीं। उन्होंने ही बनारस में सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना की थी। थियोसॉफी के सिद्धांतों पर आधारित यह लड़कों का स्कूल था। इसमें कई शिक्षक भी जाने-माने थियोसॉफिस्ट थे। पंडित मदन मोहन मालवीय के साथ मिलकर उन्होंने वाराणसी में विश्वविद्यालय की स्थापना का निश्चय किया।

भारत सरकार का नियम था कि कॉलेज इस विश्वविद्यालय का अंग बने। एनी बेसेंट और कॉलेज के ट्रस्टी इसके लिए सहर्ष तैयार हो गए। इस प्रकार, 1 अक्तूबर, 1917 को विश्वविद्यालय आरंभ हो गया और कॉलेज इसका केंद्र रहा। कुछ सालों बाद उन्होंने लड़कियों के लिए सेंट्रल हिंदू स्कूल शुरू किया। एनी बेसेंट को भारत में शिक्षा के क्षेत्र में अद्भुत योगदान के लिए ‘डॉक्टर ऑफ लेटर्स’ की डिग्री प्रदान की गई।

उन्होंने कई किताबें लिखीं, जिनमें ‘ए स्टडी इन कॉन्शसनेस और ‘एसोटेरिक क्रिश्चियनिटी’ प्रमुख हैं। विश्व के धर्मों पर उनके थियोसॉफिकल भाषण ‘सेवन ग्रेट रिलीजंस’ में संकलित किए गए हैं, जिनमें हर धर्म का बुनियादी अर्थ बताया गया है। सन् 1905 में उन्होंने ‘भगवद्गीता’ का अंग्रेजी में अनुवाद किया। थियोसॉफिकल सोसायटी के अडयार स्थित मुख्यालय का उन्होंने विस्तार किया और थियोसॉफिकल जगत् से जुड़े लोगों को एक सूत्र में बाँधने के लिए ‘अडयार बुलेटिन’ शुरू किया।

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इसी समय उनको एक दक्षिण भारतीय बालक जिद्दू कृष्णमूर्ति मिला, जिसे उन्होंने विश्व गुरु के रूप में तैयार किया, क्योंकि ब्लावत्स्की की तरह उनकी भी सोच यही थी कि थियोसॉफिकल सोसायटी का मुख्य उद्देश्य मानव जाति को विकास की राह दिखाना है। कृष्णमूर्ति और उनके छोटे भाई को उनके पिता की सम्मति से एनी बेसेंट ने थियोसॉफिकल सिद्धांतों के अनुसार पाला-पोसा।

इन बच्चों की माता का देहांत उनकी बहुत कम उम्र में ही हो चुका था। जिट्टू ने ऐनी को ही अपनी धर्ममाता मान लिया था। जिट्टू को वे अमेरिका ले गईं और दावा किया कि वह बुद्ध का अवतार और नया मसीहा है। हालाँकि जिदू कृष्णमूर्ति ने बाद में इस दावे को असत्य करार दिया। एनी बेसेंट ब्रिटिश राज में भारतीयों की दुर्दशा से बहुत द्रवित हुईं।

उन्होंने लोगों के दिलों में राष्ट्रवाद की भावना जगाई और लोगों को विदेशी सत्ता से मुक्ति पाने के लिए लड़ाई के लिए तैयार किया। उनका मानना था कि भारत के युगों पुराने ज्ञान को दुनियाभर में फैलाने की जरूरत है, जिसके लिए भारत का स्वाधीन होना जरूरी है। सन् 1913 में एनी बेसेंट भारतीय राजनीति में सक्रिय भागीदारी शुरू करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गईं।

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एक साल बाद ही, भारत की ब्रिटिश सरकार से मतभेदों के चलते उन्होंने ‘यंग मैन्स इंडियन एसोसिएशन’ का गठन किया। इस संगठन में युवाओं को सार्वजनिक कार्यों के लिए प्रशिक्षण दिया जाता था। उन्होंने इस कार्य के लिए मद्रास में गोखले भवन को दान कर दिया, जहाँ लोग राष्ट्रीय मुद्दों पर खुलकर अपने विचार रख सकें और राष्ट्रवादी भावनाएँ व्यक्त कर सकें।

उन्होंने दो पत्रिकाएँ भी शुरू की ‘द कॉमनवेल्थ’ और ‘न्यू इंडिया’। 191फ में उन्होंने लॉर्ड बेडेन पॉवेल की इच्छा के खिलाफ भारतीय स्काउट आंदोलन की शुरुआत की। जब पॉवेल भारत आया तो इस आंदोलन की सफलता को देखकर उसने उन्हें स्काउटिंग का सर्वोच्च सम्मान ‘सिल्वर वॉल्फ मेडल’ प्रदान किया।

होमरूल लीग की स्थापना – लोकमान्य तिलक के साथ मिलकर उन्होंने होमरूल लीग की स्थापना की, जो कांग्रेस से भी अधिक सक्रिय थी। इसी काल में उन्हें गिरफ्तार करके एक हिल स्टेशन भेज दिया गया। जब कांग्रेस और मुसलिम लीग, दोनों ने उनकी गिरफ्तारी का विरोध किया तो उन्हें रिहा किया गया। अपनी रिहाई के बाद वे साल भर तक इंडियन नेशनल कांग्रेस की अध्यक्ष भी बनाई गईं।

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जब विश्व युद्ध शुरू हुआ तो भारत को भी इसमें भाग लेना पड़ा। हालांकि उनके बलिदान को कोई मान्यता नहीं दी गई। इससे भी ऐनी बहुत नाराज हुई और भारत की स्वतंत्रता का उनका इरादा और पक्का हो गया। उन्होंने पुणे में ‘ऑल इंडिया वीमेंस कॉन्फ्रेंस’ की भी स्थापना की। युद्ध के पश्चात् भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में बदलाव हुआ और महात्मा गांधी इसके नेता बने।

आजादी की लड़ाई का उनका तरीका एकदम अलग था। उनका तरीका अहिंसा पर आधारित था। एनी बेसेंट ने गांधीजी के ‘असहयोग आंदोलन’ और ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ का विरोध किया, जिसकी वजह से कांग्रेस में उनका समर्थन घट गया। एनी बेसेंट कांग्रेस के अहिंसक आंदोलन से सहमत नहीं थीं, लेकिन भारत की स्वतंत्रता के लिए वे आजीवन काम करती रहीं।

मृत्यु – एनी बेसेंट जीवनपर्यंत थियोसॉफिकल सोसायटी की अध्यक्ष रहीं। छियासी वर्ष की उम्र में 20 सितंबर 1933 को थियोसॉफिकल सोसायटी के अडयार मुख्यालय में उनका देहांत हो गया। उनकी इच्छा बनारस में गंगा तट पर अंतिम संस्कार की थी। उनकी इच्छा पूरी की गई। उनकी अस्थियाँ गंगा में विसर्जित की गई।

Chhava

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