Dadabhai Naoroji- दादा भाई नौरोजी

Dadabhai-NaorojiDadabhai Naoroji

जन्म – दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर, 1825 को बॉम्बे में एक पारसी परिवार में हुआ था। भारतीय राजनीतिक इतिहास में निःसन्देह दादा भाई नौरोजी का स्थान बड़ा ही सम्मानपूर्ण एवं प्रतिष्ठाजनक है। उन्हें लोग ‘भारत का वृद्ध पितामह’ (The Grand Old Man of India) कहते हैं। गरीबी में पैदा होकर दादा भाई नौरोजी ने जो पद और गौरव प्राप्त कया वह निश्चय ही उनके कठोर परिश्रम, सतत प्रयत्न और दृढ़ इच्छा का परिचायक है।

Dadabhai Naoroji- दादा भाई नौरोजी

उनकी गणना एक राजनीतिक विचारक, शिक्षक, दूरदर्शी एवं उच्च कोटि के देशभक्त के रूप में की जाती है। वे उदारवादी कांग्रेस के महान नेता थे जैसे परिवार का वृद्ध पुरुष अपनी चिन्ता किये बिना परिवार के सभी सदस्यों के कल्याण का ध्यान रखता है वैसे ही दादा भाई सम्पूर्ण देश के हित में चिन्ता करते थे। वे क्षेत्रीयता, साम्प्रदायिकता एवं सभी तरह के संकुचित विचारों से परे थे। उनकी दृष्टि में राष्ट्रहित सर्वोपरि था।

प्रारंभिक जीवन – बारहवीं शताब्दी में अरब ने ईरान पर चढ़ाई कर दी। बहुत से अग्निपूजक पारसी उनके अत्याचार से घबराकर भारत में आ बसे। दादा भाई नौरोजी के पूर्वज उनमें से एक थे। उनके पूर्वज बड़ौदा के पास नवसारी के रहने वाले थे। मुगल काल में नवसारी सुगंधित फूलों और इत्र के लिए प्रसिद्ध था। उनके पूर्वज चाँद जी कामदिन लाजवाब इत्र तैयार करते थे। दादा भाई नौरोजी का वंश दोरड़ी कहलाता था।

नवसारी के निकट धर्मपुर में उनके पिता और पितामह कृषि का कार्य करते। दादा भाई के पिता का नाम नौरोजी पालन जी दौरड़ी और माता का नाम मानक बाई था। उनके पिता का देहावसान 1829 में ही हो गया जब दादा भाई केवल चार साल के थे। उनकी माता मानक बाई पढ़ी-लिखी महिला नही थीं लेकिन उनमें अटूट धैर्य और साहस था।

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भरी जवानी में ही वे विधवा हुई। चाहती तो दूसरी शादी रचाकर भोग-विलास का जीवन बिता सकती थी। महान लोग अपने सुख तिलांजलि दे अपने दायित्व का निर्वाह करना अधिक पसन्द करते हैं। बालक दादा भाई का पालन-पोषण एवं शिक्षा-दीक्षा का भार माँ के कंधों पर पड़ा। गरीबी के बावजूद मानक बाई ने अपने पुत्र दादा भाई की शिक्षा की समुचित व्यवस्था कराई।

जैसे शिवाजी महाराज की माँ जीजाबाई ने अपने पुत्र के चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई वैसे ही दादा भाई की माँ ने उनके चरित्र-निर्माण में अहम् भूमिका अदा की। दादा भाई सामान्यतः कहा करते–“जीवन में जो कुछ बन सका है, माँ के कारण ही।” उनका विवाह 11 वर्ष की अवस्था में ही सोराबजी शराफ की कन्या गुलबाई से हो गया।

शिक्षा – उन दिनों बम्बई में शिक्षा निःशुल्क थी। इसलिए दादा भाई को पढ़ाई-लिखाई में कोई कठिनाई नहीं हुई। इसका उनके जीवन पर काफी प्रभाव पड़ा। वे जीवनभर मुफ्त शिक्षा के लिए वकालत करते रहे। उनका विचार था कि बच्चा गरीब हो या अमीर, सबके लिए समुचित शिक्षा का प्रबंध होना ही चाहिए। लगभग ढाई हजार वर्ष पहले यूनान के दार्शनिक प्लेटो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिपब्लिक’ में निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था पर जोर दिया था।

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लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

दादा भाई को एक ग्रामीण पाठशला में भेजा गया जहाँ उन्होंने अपनी स्मरण शक्ति से सबको मुग्ध कर दिया। एक बार जो पढ़ते उसे समझ लेते। उनके शिक्षक उनकी बुद्धिमत्ता और सुन्दर व्यवहार के कारण बड़ा पसन्द करते। किसी भी स्थिति में वे गालियाँ नहीं देते। दादा भाई के एक शिक्षक के कहने पर उनकी माँ ने उन्हें नेटिव एडुकेशन सोसायटी द्वारा संचालित विद्यालय में नामांकन करा दिया।

दादा भाई नौरोजी खूब पुस्तकें पढ़ते और उन्हें अपने दोस्तों के बीच सुनाया करते सभी सहपाठी उन्हें अपना नेता मानने लगे थे। दादा भाई नौरोजी का एक सहपाठी किताबी कीड़ा था। पुस्तकों से संबंधित सभी प्रश्नों का वह उचित जवाब देता, अतः वह सभी पुरस्कार प्राप्त करता। उस विद्यालय में सामान्य ज्ञान की भी परीक्षा होती। दादा भाई नौरोजी इस परीक्षा में सबसे आगे रहते और उन्हें प्रत्येक साल विशेष पुरस्कार मिलता।

उच्चशिक्षण – प्रवेशिका परीक्षा में उत्तीर्णता प्राप्त कर उन्होंने एलीफिस्टन कॉलेज में नामांकन करा लिया। उन दिनों इसकी गिनती अच्छे कॉलेजों में हुआ करती थी। कॉलेज में उन्हें बहुत से पुरस्कार प्राप्त हुए। उन्हें कई छात्रवृत्तियाँ भी मिली। वे अंग्रेजी, परसियन और गणित में विशेष अभिरुचि लेते। वे फिरदौसी द्वारा रचित ‘शाहनामा’ काव्य तथा वाट द्वारा लिखित पुस्तक ‘इम्प्रूवमेंट ऑफ दी माइन्ड’ से काफी प्रभावित हुए थे।

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उन्होंने विद्याध्ययन करते समय अपने जीवन में कई सिद्धान्तों को अपनाया जिन पर वे जीवनपर्यन्त कायम रहे। ‘दी ड्यूटीज ऑफ जोरेस्ट्रीयन्स’ (The Duties of Zoroastrians) नामक पुस्तक से सीखा कि हर व्यक्ति को अपने विचार और कर्म में स्वच्छ होना चाहिए। इस पुस्तक से उन्हें यह भी सीख मिली कि जहाँ एक ही शब्द से काम चले वहाँ दो शब्दों का व्यवहार नहीं करना चाहिए।

जहाँ तक संभव हो व्यक्ति को स्पष्ट विचार रखना चाहिए। कॉलेज जीवन में दादा भाई ने विश्व के महान व्यक्तियों की जीवनी पढ़ी थी। उनसे वे काफी प्रभावित । हुए थे। समाज और देश की सेवा करने की प्रेरणा उन्हें महान विभूतियों के जीवन से ही प्राप्त हुई थी। उनके प्रधानाध्यापक उन्हें भारत की आशा कहते।

एलीफिस्टन कॉलेज के सचिव उस समय हाईकोट के न्यायाधीश अमरीकन पेरी थे। वे उनकी योग्यता और व्यवहार से काफी प्रभावित थे। उन्होंने उन्हें इंगलण्ड में जाकर कानून पढ़ने की राय दी पर धनाभाव इसमें सबसे बड़ा बाधक सिद्ध रहा था। न्यायाधीश महोदय ने उनके इंगलैण्ड में अध्ययन का आधा व्यय स्वयं वहन करने का वादा किया और कहा कि अमीर पारसियों को चाहिए कि बाकी खर्च की वे व्यवस्था करें।

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रूढ़िवादी पारसियों ने मदद नहीं की। उन्हें यह भ्रम था कि दादा भाई इंगलैण्ड जाकर कहीं ईसाई न बन जाये। अतः इंगलेण्ड जाने की उनकी इच्छा उस समय पूरी नहीं हुई। दादा भाई नौरोजी अपना सार्वजनिक जीवन शिक्षा-समाप्ति के बाद प्रारम्भ किया।

विविध जगहों पर नौकरी – शायद वे भारत के प्रथम व्यक्ति थे जिन्हें प्राध्यापक के पद पर नियुक्त किया गया। वे एलिफिस्टन कॉलेज में ही गणित और प्राकृतिक विज्ञान पढ़ाने लगे। छह वर्षों तक उस कॉलेज में कार्य करने के बाद उन्होंने पदत्याग कर दिया। 1853 ई. में उन्होंने बम्बई एसोसिएशन की स्थापना की इस एसोसिएशन में कम्पनी से अनुरोध किया कि भारत के हित में कम्पनी को अधिक-से-अधिक कार्य करने की योजना बनानी चाहिए।

इस संघ का कुछ प्रभाव 1853 के चार्टर एफ्ट पर दृष्टिगोचर होता है। 1856 ई. में नौरोजी एक पारसी कम्पनी ‘केया एण्ड सन्स’ में कार्य करने लगे। कम्पनी के प्रतिनिधि के रूप में ये इंगलैण्ड में कार्य निरीक्षण के लिए भेजे गए। 1866 ई. में उन्होंने ईस्ट इण्डिया एसोसिएशन की स्थापना लंदन में की।

Dadabhai Naoroji- दादा भाई नौरोजी

इसमें इंगलेण्ड और भारत के प्रतिष्ठित व्यक्ति सदस्य होते। कम्पनी की नौकरी छोड़कर उन्होंने 1876 में बढ़ोदा राज्य में दीवान के पद पर काम करना शुरू किया। यहाँ वे केवल तीन वर्षों तक ही कार्य कर सके। बड़ोदा राज्य के रेजीडेण्ट कर्नल पेरी से विरोध होने के कारण उन्हें यह पद छोड़ना पड़ा।

राजनैतिक कार्य की शुरुवात – दादा भाई नौरोजी ने अनेक संस्थाओं की स्थापना की। वे तत्कालीन भारतीय राजनीति में काफी अभिरुचि लेते। 1885 ई. में उन्होंने डब्ल्यू. सी. बनर्जी, सर फिरोजशाह मेहता और एस. एन. बनर्जी के साथ मिलकर इण्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना बम्बई में की। वे नरम दल के नेता थे।

उन्होंने अनुभव किया कि भारत तभी प्रगति कर सकता है जब उसे स्वशासन प्राप्त हो। वे अनुभव करने लगे कि भारतीयों का आर्थिक शोषण प्रारम्भ हो चुका है। भारत को इसमें मुक्ति दिलाने का हर संभव प्रयास होना चाहिए। कुछ दिनों बाद ये इंगलेण्ड में ही रहने लगे। उनकी प्रतिभा से अंग्रेज काफी प्रभावित हुए। भारत के पक्ष में उन्होंने जनमत तैयार किया।

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1886 के कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वे अध्यक्ष चुने गये। उस समय भारतीयों के लिए यह सर्वोच्च पद था। वे उसी वर्ष पुनः इंगलैण्ड बले गये। दादा भाई नौरोजी की तीव्र इच्छा थी कि वे इंगलैण्ड के हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य बने। उनका ख्याल था कि इंग्लैण्ड की संसद का सदस्य होने पर वे भारतीयों की आवश्यकताओं कठिनाइयों और समस्याओं से लोगों को अधिक सक्षमता के साथ बतलाने में समर्थ होंगे।

ये प्रथम प्रयास में सांसद नहीं बन सके I पर हिम्मत नहीं हारे 1892 ई. में सेन्ट्रल फिन्सबरी से वे निर्वाचित हुए और 1895 तक सांसद बने रहे। उनके भाषण आकर्षक और आँकड़ों से भरे पड़े होते पुनः 1893 ई. में उन्हें लाहौर काँग्रेस अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया और तीसरी बार 1906 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष बने। इसी अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा था “ब्रिटिश सरकार को चाहिए कि वह भारत को स्वराज्य दे दे।”

दादा भाई नौरोजी बहुआयामी प्रतिभासम्पन्न पुरुष थे। प्रख्यात शिक्षक और सांसद के अलावा वे उच्च कोटि के निःस्वार्थ समाजसेवी भी थे। उन्होंने हर तरह से समाज-सेवा करने का निर्णय लिया। गरीब महिलाओं के लिए उन्होंने विद्यालयों की स्थापना की जहाँ वे शिक्षा प्राप्त करती।

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उन्होंने ऐसे संगठन भी बनाये जहाँ आकर लोग सामाजिक, साहित्यिक एवं राष्ट्रीय विषयों पर विचार विमर्श करते दादाभाई नौरोजी ने ‘रास्त गुप्तार’ नाम का एक पाक्षिक पत्र भी निकाला जिसका अर्थ है सत्य कहने वाला उनका लक्ष्य जन-जीवन को सुन्दरतम बनाना था। इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने जनचेतना का निर्माण किया। यही कारण है कि उन्हें लोग बम्बई नगर का प्रथम समाज सुधारक मानते हैं।

दादा भाई नौरोजी ने इंगलैण्ड में रहते समय वहाँ के कई प्रमुख समाजवादियों से सम्पर्क किया था। उनकी सहानुभूति श्रमिक वर्ग के साथ थी। दादा भाई नौरोजी समाज को विकास का आधार मानते। कहा कि हर वृद्ध व्यक्ति के लिए सरकार की ओर से पेंशन की व्यवस्था होनी चाहिए। आज हम देख रहे हैं कि सामाजिक सुरक्षा के अन्तर्गत कई राज्य सरकारों ने वृद्ध लोगों के लिए पेंशन की व्यवस्था की है। केन्द्रीय सरकार ने भी इस दिशा में कदम उठाया है।

दादा भाई नौरोजी एक सुलझे हुए अर्थशास्त्री थे। उनका कहना था कि अंग्रेजों के शोषण के कारण ही भारतीयों की आर्थिक स्थिति अत्यधिक चिन्तनीय है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘पोबर्टी एण्ड अनब्रिटिश रूल इन इण्डिया” (Poverty and Unbritish Rule in India) में लिखा था कि किस तरह अंग्रेजों की गलत आर्थिक नीतियों के कारण भारत के आर्थिक ढाँचे को जड़े खोखली हो रही थी। उनकी मान्यता थी कि अंग्रेजी शासन ने भारत में आर्थिक विषमता का वातावरण उत्पन्न कर दिया है। निर्धनता के चलते भारत अधःपतन की ओर दिनानुदिन बढ़ता जा रहा है। ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था में भारतीयों की आर्थिक अवस्था अत्यंत दयनीय है।

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उन्होंने ब्रिटिश जनता से अपील करते हुए कहा कि “भारत में ब्रिटिश सेना के रखने के लिए युद्ध मन्त्रालय को दिये जाने वाले दान, इगलेण्ड में प्रशासन पर होने वाला व्यय तथा अँग्रेज व्यापारियों द्वारा भारत से इंगलेण्ड को भेजी जाने वाली अर्जित आय के रूप में भारत की अपार सम्पत्ति देश से बाहर खींची जा रही है।” उन्होंने भारतीयों को उनकी आर्थिक निर्बलता का ज्ञान कराकर उन्हें गरीबी, भुखमरी, शोषण, अकाल तथा महामारी के विरुद्ध युद्ध करने के लिए प्रेरित किया।

दादा भाई नौरोजी मानते थे कि देश का उत्थान तब तक नहीं होगा जब तक कि भारत से धन का बाहर जाना न रुकेगा। वे यथार्थ अर्थशास्त्री थे। उनका अध्ययन आँकड़ों और तथ्यों पर आधारित था। उन्होंने बतलाया कि उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में तीस लाख पौण्ड की राशि का शोषण होता था और बाद में यह शोषण बढ़ते बढ़ते तीन करोड़ पौण्ड तक हो गया।

दादा भाई नौरोजी ने आर्थिक विषमता को दूर करने का उपाय भी बतलाया है। उनका कहना था कि “जिस प्रकार इंगलैण्ड के प्रशासन में सेवायें, विभाग एवं पूरक बाते उन्ही के देशवासियों के हाथों में हैं, उसी प्रकार हम भारतवासियों के लिए भी चाहते हैं कि सेवायें, विभागादि सभी भारतीयों के हाथों में रहें।

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यह न केवल अधिकार की बात है और न ही शिक्षित व्यक्तियों की महत्वाकांक्षा है वरन् आर्थिक विषमताओं को दूर करने का यह केवल एक मार्ग है। “दादाभाई नौरोजी का कहना था कि यदि भारतीय स्वदेशी आन्दोलन में भाग ले तो बहुत हद तक आर्थिक समस्या का समाधान हो सकता है।

उनके अनुसार, “अंग्रेजी शासन शोषण पर आधारित है वे केवल फूट डालो और शासन करो’ के सिद्धान्त पर विश्वास करते थे। 1833 ई. के चार्टर एक्ट में कम्पनी सरकार ने घोषणा की थी कि भारतीयों को भी उच्च पद दिये जायेंगे भारत सरकार अधिनियम 1858 में महारानी विक्टोरिया ने घोषणा की थी कि सरकार उच्च पद प्रदान करने में जाति-धर्म का ख्याल नहीं करेगी। योग्य भारतीयों को भी प्रशासन में समुचित स्थान दिया जायेगा। लेकिन महारानी के ये सारे वादे हाथी के दाँत के समान सिद्ध हुए।

दादा भाई नौरोजी का कहना था कि अंग्रेज सरकार भारतीयों की ऐसी नौकरियों से वंचित रखती जिनके द्वारा उन्हें आय प्राप्त हो सके। अधिकांश पद सरकार अंग्रेजों को ही दिया करती। वे पदाधिकारी अवकाश प्राप्त कर इंगलेण्ड सीट जाते हैं। अंग्रेजों के पहले विदेशी लुटेरे कुछ लूटपाट करके वापस चले जाते थे, कुछ यही बस जाते थे, इससे भारत का लगातार शोषण नहीं होता था।

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लेकिन अंग्रेजी सरकार के शोषण का तरीका भिन्न था। पहले आक्रमणकारी तो कसाई के समान थे लेकिन अंग्रेजों ने तेज सर्जरी के चाकुओं के साथ काट-छाँट आरम्भ कर दी और मजाक तो यह था कि यह सब ये अंग्रेजी सभ्यता के विकास के नाम पर कर रहे थे। वे कहते कि भारत का हम शोषण नहीं करते बल्कि उसे सभ्य बना रहे है।

हर साल अंग्रेज सरकार तीन से चार करोड़ पौण्ड तक हड़पकर इंगलैण्ड ले जाती। यह विशाल पूंजी दूसरे रूप में भारत पुनः आती और उसका भी लक्ष्य भारत का शोषण ही था। यहाँ से कच्चा माल सस्ते दाम पर इंगलेण्ड की कम्पनिया खरीदती और उसे पुनः भारत में कई गुना अधिक मूल्य लेकर बेचतीं। इससे भी भारत की आर्थिक अवस्था जर्जर हो गयी। अतः यह ठीक ही कहा जाता है कि दादा भाई नीरोजी आर्थिक राष्ट्रवाद के जनक थे।

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मृत्यु – दादा भाई नौरोजी ने लगभग सत्तर वर्षों तक देश की सेवा की भारतीय राजनीति में उनका योगदान अभूतपूर्द है। तत्कालीन भारतीय आर्थिक और सामाजिक अवस्था को सुधारने के लिए भी उन्होंने कठोर परिश्रम किया दादा भाई नौरोजी का देहावसान 30 जून, 1917 ई. में बम्बई में हो गया। इस वृद्ध पितामह की मृत्यु से सारे देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी। उनके सम्मान में शोक सभायें आयोजित हुई। श्रद्धांजलियाँ अर्पित की गई।

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