Chittaranjan Das – चित्तरंजन दास

Chittaranjan-DasChittaranjan Das

भारत की आजादी की लड़ाई में अनेक सपूतों ने भाग लिया। विनय, बादल, दिनेश, सरदार भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, चन्द्रशेखर आजाद और खुदीराम बोस आदि ने भारत माँ को बेड़ियों से मुक्त करने के लिए हँसते-हँसते प्राणों की बाजी लगा दी। उनके त्याग को याद कर हम आज भी रोमांचित हो जाते हैं।

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इनके अलावा अनेक महापुरुषों ने ऐश्वर्य और सुख का लोभ छोड़ स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए कष्टमय जीवन चुना। इस श्रेणी में हम त्यागमूर्ति पंडित मोतीलाल नेहरू और देशबन्धु चितरंजन दास को रख सकते हैं। मोती के बेटे जवाहर ने भी ऐशाआराम की जिन्दगी को त्यागकर जेल में ही अपना अधिकांश समय भारत माँ को बेड़ियों से मुक्त करने के लिए बिताना पसन्द किया।

चमकती हुई वकालत को गाँधीजी के इशारे पर छोड़कर देशबन्धु चितरंजन दास ने अनुपम त्याग का परिचय दिया। सुनते हैं उस समय उनकी वकालत चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी। उनकी वार्षिक आय छह-सात लाख तक पहुँच चुकी थी। वे मोतीलाल के समान ही उच्चतम श्रेणी के वकील थे। उनका जीवन बड़ा ही सुखमय और ऐश्वर्य सम्पन्न था। असहयोग आन्दोलन के बाद सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने भौतिक जीवन से संन्यास ले साधु जीवन बिताना शुरू कर दिया।

जन्म – चितरंजन का जन्म बंगाल के प्रतिष्ठित ब्रह्मसमाजी परिवार में 5 नवम्बर, 1870 में कलकत्ता में हुआ था। उनके पिता भुवन मोहन दास सॉलिसिटर (कानूनी सलाहकार) एवं पत्रकार थे। वे ‘ब्रह्म पब्लिक ओपिनियन’ का संपादन करते थे। चितरंजन की माता निष्तारिणी देवी एक उदार और साधारण पढ़ी-लिखी महिला थीं। उन्होंने अपने माता-पिता के सद्गुणों से काफी प्रेरणा प्राप्त की।

Chittaranjan Das – चित्तरंजन दास

शिक्षा – चितरंजन दास ने अपनी शिक्षा कलकत्ता में पूरी की। छात्र जीवन से ही वे राजनीति में भाग लिया करते। वे विद्यार्थी संघ के सचिव भी थे। 1890 ई. में प्रेसीडेसी कॉलेज कलकत्ता से बी.ए. की परीक्षा पास कर वे पढ़ने के लिए विलायत चले गये। आई.सी.एस. की परीक्षा में वे शामिल हुए पर असफल रहे। अतएव उन्होंने कानून का अध्ययन करना प्रारम्भ किया। इसमें उन्हें काफी अभिरुचि थी।

चितरंजन दास कि वकालत – 1892 में स्वदेश लौटे और कलकत्ता हाइकोर्ट में अपनी वकालत प्रारम्भ कर दी। कई वर्षों तक उन्हें इस पेशे में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त नहीं हुई, पर वे निराश न हुए। शीघ्र ही वे भारत के विख्यात वकील बन गए। पहले इनके पास केवल फौजदारी मुकदमे ही आते पर डुमरॉव राज्य के मुकदमे में पैरवी करने के बाद इनकी ख्याति दीवानी वकील के रूप में भी फैल गयी। देश के राजे-महाराजे इन्हें ही अपना वकील चुनते।

चितरंजन दास का नाम मानिकतला मुकदमा के बाद और भी चमक उठा। 1908 में “वन्दे मातरम्” पर मुकदमा चला। इसी वर्ष पुलिस ने कलकत्ता के उपनगर मानिकतला में बम बनाने के कारखाने का पता लगाया। इसमें कुछ बंगाली युवकों को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर सम्राट् के विरुद्ध विद्रोह करने का मुकदमा चलाया गया। इन्हीं बन्दियों में श्री अरविन्द घोष भी थे। इस मामले की पैरवी करने के लिए कोई वकील तैयार नहीं हो रहा था।

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मोतीलाल नेहरू – Motilal Nehru

चितरंजन ने इस मुकदमे की पैरवी का भार सहर्ष लिया। जो दूसरे की भलाई के लिए अपने को संकट में डालता है वह व्यक्ति वंदनीय है। यह मामला जोखिम से भरा था। इसमें लगभग 500 चीजें जो बम से संबंधित थी, अदालत में लायी गयीं 4000 दस्तावेज तथा 200 गवाह उपस्थित किये गये। “वन्दे मातरम्” तथा इस मुकदमे में दास की प्रतिभा का आश्चर्यजनक ढंग से विकास हुआ।

लोग इस युवक वकील की बहस करने के ढंग से काफी प्रसन्न हुए। अरविन्द को उन्होंने निरपराध प्रमाणित कर दिया। मेरी समझ में दास की इस सफलता से उन्हें धन की अपेक्षा यश की प्राप्ति अधिक हुई। इस संबंध में कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जैनकिन्स ने लिखा है: “में खास तौर से यह लिखना चाहता हूँ कि जिस योग्यता से अभियुक्तों के प्रमुख वकील सी. आर. दास ने मुकदमे की पैरवी की है, वह अत्यन्त सराहनीय है। “

चितरंजन दास के दिन भी एक समान नहीं थे। उन्हें दिवालिया घोषित किया गया था। कारण, इनके पिता श्री भुवनमोहन दास ने काफी ऋण लिया था। इसके अलावा चितरंजन के साथ संयुक्त रूप से वे अपने एक मित्र के कर्जों की जमानत दे चुके थे। दुर्भाग्यवश वह मित्र कर्जा न चुका सका। 1906 ई. में बाप-बेटे दोनों को दिवालिया घोषित कर दिया गया, पर समय ने तुरंत पलटा खाया।

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इन्होंने स्वयं अदालत में आवेदन-पत्र देकर दिवालियापन अपना लिया और अपने पिता का समस्त ऋण भी चुका दिया। वे अपने घर पर बुलाकर लोगों को मुँहमाँगा धन देकर ऋण चुकाते। यह एक अनोखी पद्धति थी। इस कार्य से उनकी ईमानदारी देशभर में फैल गयी। बंगाल की भूमि साहित्य, कला और संस्कृति के लिए भी भारत में विख्यात रही है। यहाँ के राजनीतिक नेता भी साहित्यिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक मनोवृत्ति से भरे पड़े थे।

देशबन्धु चितरंजन दास केवल सुविख्यात वकील और राजनेता ही नहीं थे, बल्कि वे सफल पत्रकार और कुशल साहित्यकार भी थे। ये बड़े धार्मिक व्यक्ति थे। ब्रह्म समाज में जन्म के बावजूद वे वैष्णव विचारधारा से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। उनका कोमल हृदय बंगाल के वैष्णव धर्म में अपने को समाहित किये बिना न रह सका।

काव्य में योगदान – उन्होंने कविता के क्षेत्र में भी अक्षय कीर्ति प्राप्त की। अपने समय के वे एक महान कवि भी माने जाते थे। 1897 ई. में उन्होंने दो काव्य प्रकाशित किये। इनमें ‘माला’ ने विशेष ख्याति अर्जित की। इसके अलावा इनके द्वारा विरचित ‘किशोर-किशोरी’, ‘अन्तर्यामी’, ‘सागर-संगीत’ आदि बंगला साहित्य की अमूल्य निधि मानी जाती है।

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अन्तर्यामी’ में भगवान विष्णु की उपासना में विभोर कवि आन्तरिक निर्वाण प्राप्त कर लेता है। ‘सागर-संगीत’ उनकी स्फूट कविताओं का संकलन है। कुछ लोगों के मतानुसार यह उनकी सुन्दरतम कृति है। इसका अनुवाद इन्होंने स्वयं अरविन्द घोष के साथ मिलकर किया है।

पत्रकारिता में योगदान – चितरंजन दास को पत्रकारिता से भी बड़ा प्रेम था। यह गुण शायद उन्होंने अपने पूज्य पिता भुवनमोहन दास से प्राप्त किया था। सन् 1906 ई. में प्रसिद्ध राष्ट्रीय पत्र ‘वन्दे मातरम्’ के सम्पादकों में से ये भी एक थे। तदुपरान्त उन्होंने दो पत्रों का संपादन प्रारम्भ किया। पहला ‘नारायण’ नामक मासिक बंगला पत्रिका और दूसरा अंग्रेजी में ‘फारवर्ड’ था। इन दोनों पत्रों ने जनसाधारण में राजनीतिक और आध्यात्मिक चेतना भर दी।

चितरंजन दास और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस – देशबन्धु चितरंजन दास पहले राजनीति में कम अभिरुचि लेते थे। उन्होंने 1906 ई. में पहले पहल कांग्रेस अधिवेशन में एक प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। वर्षों तक उन्होंने उसमें कोई विशेष अभिरुचि न दिखलाई। प्रथम विश्वयुद्ध के समय से वे कुछ राजनीति की ओर प्रेरित हुए। 1913 ई. में बंग साहित्य सम्मेलन के सभापति चुने गये।

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1917 ई. में ये बंगाल प्रान्तीय राजनीतिक सम्मेलन के सभापति चुन लिये गये। यहीं से कांग्रेस के साथ इनकी घनिष्ठता बढ़ती गई। 1918 ई. में कांग्रेस के दिल्ली अधिवेशन में इन्हीं की चेष्टा के फलस्वरूप प्रान्तीय स्वशासन की मांग का प्रस्ताव पारित हुआ। श्री दास ने भारत सरकार द्वारा पारित रोलेट एक्ट का विरोध किया जलियांवाला बाग में जो नरसंहार हुआ, उससे उनका हृदय द्रवित हो उठा।

अमृतसर काण्ड की जाँच समिति के थे सदस्य बनाये गये थे, गाँधीजी से उनका सम्पर्क उसी समय हुआ। 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में भी उन्होंने असहयोग आन्दोलन के प्रस्ताव का जोरदार समर्थन किया। बंगाल में अनेक स्वयंसेवकों ने भाग लिया। नवम्बर 1921 में ये असहयोग और खिलाफत आन्दोलन के बंगाल प्रदेश के संचालक बने और कुछ दिनों बाद गिरफ्तार हुए और उन्हें छह माह के लिए जेल की सज़ा मिली।

1922 ई. में चौरी-चौरा काण्ड के कारण गाँधीजी के निर्देशानुसार कांग्रेस अधिवेशन में असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया गया। गाँधीजी के इस कार्य से बहुत से कांग्रेसी दुःखी हुए। सुभाषचन्द्र बोस ने महात्मा गाँधी के इस कार्य की सार्वजनिक रूप से आलोचना की। 1923 ई. में गया में कांग्रेस अधिवेशन हुआ। इसकी अध्यक्षता चितरंजनदास ने की। उन्होंने प्रस्ताव किया कि कांग्रेसियों को कौंसिल में प्रवेश करना चाहिए और सरकार को हर तरह से परेशान करना आवश्यक है।

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उनके कोसिल प्रवेश का प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया। सी. राजगोपालाचारी और गाँधी के अन्य अनुयायियों ने दास के प्रस्ताव का घोर विरोध किया। फलस्वरूप सी. आर. दास और पं. मोतीलाल नेहरू ने मिलकर स्वराज पार्टी की स्थापना की। 1924 में कांग्रेस को बाध्य होकर उनका प्रस्ताव बेलगाँव कांग्रेस में स्वीकार करना पड़ा जिसकी अध्यक्षता स्वयं महात्मा गाँधी ने की थी।

दास द्वारा गठित स्वराज पार्टी शीघ्र ही लोकप्रिय बन गयी। मोतीलाल नेहरू के चलते संयुक्त प्रांत में और चितरंजन दास के चलते बंगाल में स्वराज पार्टी ने शानदार सफलता प्राप्त की। यहाँ तक कि बंगाल के गवर्नर जनरल लार्ड लिटन ने दास को ही मंत्रिमंडल बनाने का आमंत्रण दिया जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि वे और उनके दल द्वैत शासन प्रणाली को नष्ट करने के लिए भी कौंसिल में प्रवेश करना चाहते हैं। दास के प्रयत्न के फलस्वरूप सरकार को ‘द्वैत शासन प्रणाली’ की उपयोगिता की जांच के लिए एक समिति का गठन करना पड़ा।

1924 का वर्ष देशबन्धु के जीवन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साल कहा जा सकता है। इसी वर्ष कलकत्ता के कॉरपोरेशन का चुनाव हुआ जिसमें स्वराज पार्टी ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। देशबंधु ही फलकत्ता कॉरपोरेशन के मेयर चुने गये। उन्होंने युवक सुभाष को कार्यकारिणी पदाधिकारी नियुक्त किया।

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गुरु और शिष्य दोनों ने मिलकर कलकत्ता कारपोरेशन की कार्य प्रणाली में महत्त्वपूर्ण सुधार किया। 1924 ई. में वे कलकत्ता में होने वाले भारतीय ट्रेड यूनियन के अध्यक्ष भी चुने गये। सी. आर. दास ने कभी भी किसी क्रान्तिकारी को निन्दा नहीं की। उनका कहना था हरेक क्रान्तिकारी किसी-न-किसी रूप में भारत की सेवा करता है।

इस संबंध में उन्होंने तत्कालीन भारत मंत्री लार्ड वर्कन हेड से कहा: “राजनीतिक हत्याओं या अन्य किसी भी प्रकार की हिंसा का में सिद्धान्ततः विरोधी हूँ पर साथ ही सरकार को भी यह मानना चाहिए कि क्रान्तिकारी चाहे कितनी ही गलती पर हो, उनके तरीके चाहे कितने ही व्यर्थ हों और काम चाहे कितने ही अपराधपूर्ण और निन्दनीय हो, उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य देश की आर्थिक स्वतंत्रता के लिए ‘बलिदान’ करना है। “

देशबन्धु चितरंजन दास की सेवाओं से प्रसन्न होकर जनता ने उन्हें स्वयं देशबन्धु की उपाधि से विभूषित किया था। वही उपाधि सही है जिसे स्वयं जनता जनार्दन दे। दास ने मरने के पूर्व ही अपनी सारी सम्पत्ति दान कर दी जिसके द्वारा एक ट्रस्ट का निर्माण किया गया। उनके द्वारा स्थापित चितरंजन सेवा सदन’ आज भी हजारों भारतीयों की सेवा कर रहा है।

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सामाजिक सुधारना में योगदान – चित्तरंजन शुरू में ब्रह्मो समुदाय के विचारों से प्रभावित थे लेकिन बाद में शाक्त और वैष्णववाद के प्रति आकर्षित हो गए। जातीयता और अस्पृश्यता उन्हें स्वीकार्य नहीं थी। उन्होंने महिलाओं की पूर्ण स्वतंत्रता और महिलाओं की शिक्षा के प्रसार के लिए प्रयास किया।

उन्होंने विधवा पुनर्विवाह और अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा दिया और अपनी दो बेटियों के अंतरजातीय विवाह के लिए सहमति दी। एक और वकील के रूप में उनका जीवन विलासिता और पाश्चात्यवाद का जीवन था, लेकिन असहयोग आंदोलन में पड़ने के बाद उन्होंने एक साधारण जीवन शैली को अपनाया। सूत कताई का प्रचार किया और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया।

मृत्यु – देशबन्धु ने 55 वर्षों तक भारत माँ की सेवा की। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती वासंती देवी ने भी अपने पतिदेव के सदकार्यों में यथासंभव सहायता प्रदान की। चितरंजन दास का स्वर्गवास 16 जून, 1925 ई. को हो गया। स्वयं गाँधीजी ने उनके शव को कंधा लगाया था। उनके अन्तिम संस्कार में तीन लाख से भी अधिक लोगों ने भाग लिया था।

Chittaranjan Das – चित्तरंजन दास

चितरंजन दास का पार्थिव शरीर भले ही हमारे बीच न हो, पर ये अपने त्याग और अनुपम सेवाओं के चलते अमर है और अमर रहेंगे। गाँधीजी ने उनके मरने पर कहा था “मनुष्यों में से एक देवता जाता रहा और आज बंगाल विधवा के समान हो गया है। “मातृभूमि के प्रति देशबंधु चितरंजन दास ने स्वयं कहा था “अपने देश के लिए कार्य करना मेरे लिए धर्म का ही अंग है। यह मेरे जीवन के आदर्शवाद का कम न होने वाला एक हिस्सा है। अपने देश की भावना में ही में ईश्वर का साक्षात्कार करता हूँ।”

Chhava

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