Chandrasekhara Venkata Raman – डॉ. सी. वी. रमन

Chandrasekhara-Venkata-RamanChandrasekhara Venkata Raman

जन्म – नोबेल पुरस्कार विजेता सर सी.वी. रमन का जन्म नवम्बर 1888 में तमिलनाडु के त्रिचनापल्ली नगर में एक चन्द्रशेखर नामक ब्राह्मण परिवार में हुआ था दक्षिण भारत में पिता के नाम के साथ बेटा का नाम भी जोड़ दिया जाता है। इसलिए पूरा नाम चन्द्रशेखर वेंकट रमन पड़ा। उनके पूर्वज तंजीर जिले के एक गांव में छोटे से जमींदार थे। यहीं ये खेती-बारी करते थे।

Chandrasekhara Venkata Raman – डॉ. सी. वी. रमन

प्रारंभिक शिक्षा – वेंकट रमन के पिता गांव छोड़कर त्रिचनापल्ली में आए और वहीं एक विद्यालय में शिक्षक के पद पर कार्य करने लगे। उनके पिता को भौतिक विज्ञान में काफी अभिरुचि थी। इसका प्रभाव सी. वी. रमन पर पड़ा जिन्होंने आगे चलकर भौतिक विज्ञान में ही नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। माता पार्वती अम्मल संस्कृत भाषा में पारंगत थी। विदुषी होने के साथ-साथ वे सेवा-कार्य में भी काफी अभिरुचि लेती थी।

पति को प्रसन्न रखना और पुत्र की इच्छाओं को पूरी करना अपना धर्म मानती वेंकट रमन के अनुसंधान के मुख्य विषय भौतिक विज्ञान तथा प्रकाश थे शिक्षा के प्रति अनुराग उन्हें विरासत के रूप में प्राप्त हुआ था। वेंकट रमन के नाना को न्यायदर्शन पढ़ने की इच्छा हुई। उन दिनों बंगाल में गुरुकुल पद्धति द्वारा छात्रों को शिक्षित किया जाता था। गुरु पत्नियाँ ही छात्रों को खिलाती।

 

सी. वी. रमन के नाना ने अपने ज्ञान की तृप्ति के लिए मद्रास से बंगाल तक पैदल यात्रा की और वहाँ न्यायदर्शन का अध्ययन करने लगे। रमन का स्वास्थ्य बचपन में ठीक नहीं रहता था, फिर भी किसी से कम काम नहीं करते। इस संसार में कुछ लोग अच्छे वातावरण से लाभ उठाते हैं जबकि कुछ अन्य उसका दुरुपयोग करते हैं।

Chandrasekhara Venkata Raman – डॉ. सी. वी. रमन

यह बात नहीं कि हर शिक्षित व्यक्ति प्रतिभासम्पन्न होता है या हर प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति शिक्षित होता है I ऐसे व्यक्ति विरले ही होते हैं जिनमें शिक्षा के प्रति झुकाव के साथ प्रतिभा एवं अनुकूल परिस्थिति भी रहे। सौभाग्यवश वेंकट रमन का परिवार शिक्षित था, सुविधायें थीं एवं सबसे बढ़कर उनको जीवन में कुछ करने की तमन्ना थी।

फिर क्या था, किशोर रमन ने बारह वर्ष की अवस्था में बीमार रहने के बावजूद मैट्रिक की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर एक कीर्तिमान स्थापित किया। रमन केवल अपने वर्ग की निर्धारित पुस्तको से संतुष्ट नहीं होते थे, अन्य पुस्तके भी खूब पढ़ते माता उन्हें रामायण, महाभारत और पुराण की कहानियाँ सुनाती। इससे भी उनका ज्ञानवर्द्धन होता। मैट्रिक पास करने के बाद रमन ने वाल्टेयर कॉलेज में नामांकन कराया।

उच्च शिक्षा – अस्वस्थता के कारण पढ़ाई में कुछ व्यवधान भी आया पर अत्यधिक लगन के कारण वह टिक नहीं सका। स्कूल से ही रामन प्रयोग करते। डाक्टर उन्हें आराम करने की सलाह देते। आदमी में कभी-कभी परिवर्तन का आना स्वाभाविक है। रमन की रुचि कुछ दिनों के लिए विज्ञान से हटकर कला की ओर हुई। उन दिनों रामकृष्ण परमहंस देव के सिद्धान्ती का प्रचार प्रसार हो रहा था।

Click on below links to read more | अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

More Hindi Blogs

History in Hindi Articles

Chittaranjan Das – चित्तरंजन दास

Raja Ram Mohan Roy History – राजा राममोहन राय का इतिहास

एनी बेसेण्ट थियोसोफिकल सोसाईटी के सिद्धान्तों का प्रचार भारत में कर रही थी। भारतीय संस्कृति और अध्यात्म से वे प्रभावित थीं। रमन इस धारा में वह पड़े। यह उनकी विशिष्ट प्रतिभा का ही सूचक है कि विषय बदलकर एफ.ए. में अस्वस्थता के बावजूद प्रथम श्रेणी में उत्तीर्णता प्राप्त की। फिर ये विज्ञान की ओर मुड़े। बी.ए. में उनका नामांकन प्रेसीडेन्सी कॉलेज मद्रास में कराया गया।

उन्होंने अपने माता-पिता से कह दिया कि वे विज्ञान का ही अध्ययन करेंगे विज्ञान विषयों के साथ वे प्रेसीडेन्सी कॉलेज में पढ़ने लगे। उनकी तन्मयता, योग्यता तथा व्यवहार कुशलता के चलते कॉलेज के अध्यापक और प्राचार्य बड़ा मानते। उन्होंने बी.ए. की पढ़ाई करते समय बहुत से प्रयोग किये। कॉलेज की प्रयोगशाला छोटी लगने लगी। कॉलेज के प्राचार्य नाना साहब को यह पता चला कि अद्भुत प्रतिभासम्पन्न एक बालक पढ़ रहा है, तब उन्होंने उससे भेंट की।

उन्होंने रमन पर से सब प्रकार के प्रतिबन्ध हटा लिए। फलस्वरूप रामन विश्वविद्यालय में प्रथम हुए। उन्हें भौतिक विज्ञान में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए ‘अर्णी स्वर्ण पदक’ दिया गया। इसके अलावा उन्हें और पुरस्कार दिये गये। रामन एम.ए. में पढ़ने लगे। दिन-प्रतिदिन प्रयोग में उनकी अभिरुचि बढ़ती गई। एम. ए. पढ़ते समय उन्होंने भौतिक शास्त्र की अनेक पुस्तकों का अध्ययन किया जिन्हें बहुत से प्राध्यापकों ने भी नहीं पढ़ा था।

Chandrasekhara Venkata Raman – डॉ. सी. वी. रमन

रामन की यह एक अच्छी आदत थी कि जो प्रयोग करते या पढ़ते, उसे लिपिबद्ध कर लेते। एक लेख उन्होंने अपने कॉलेज के प्रो. जोन्स को दिया। उसे प्रो. जोन्स साहब न तो देखे न कुछ सुझाव दे पाये तीन-चार माह तक अपने पास रखे रहे। अन्त में लाचार होकर रमन ने यह कहकर लेख मांग लिया कि इसमें सुधार की जरूरत है। उन्होंने इस लेख को लंदन से प्रकाशित फिलासाफिकल मैगजीन में भेज दिया और वहाँ से लेख भी प्रकाशित हो गया।

प्रो. जोन्स को जब यह पता चला कि रमन का लेख प्रकाशित हो चुका है तब वे बहुत बिगड़े। पुनः उनका एक अन्य लेख इसी मैगजीन में प्रकाशित हुआ। इस तरह छात्र जीवन में ही वे अपने लेखन के चलते विश्व के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के सम्पर्क में आये। शब्द विज्ञान पर उन दिनों लार्ड रेले काम कर रहे थे। रमन ने उस पर काम करना शुरू किया और उसका समाधान एक भिन्न तरीके से निकाला जिसे उनकी सहमति लेने के लिए रमन ने उनके पास भेजा।

महान लोग दूसरे की सुन्दर रचना से अधिक प्रसन्न होते हैं जबकि दुर्जन द्वेष करते हैं। लाई रेले ने लिखा कि रमन का समाधान उनके समाधान से भी बेहतर है। रमन ने 1907 ई. में एम.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की और विश्वविद्यालय में भौतिक शास्त्र में सबसे अधिक अंक प्राप्त किये।

Chandrasekhara Venkata Raman – डॉ. सी. वी. रमन

परीक्षा के चलते प्रकाश पर शोधपूर्ण लेख इंगलैण्ड द्वारा प्रकाशित ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ एम.ए. पास करने के बाद उनकी इच्छा इंगलैण्ड जाने की थी पर डाक्टर ने उनका स्वास्थ्य परीक्षण करने के बाद कहा कि वे इंगलैण्ड जाने के लिए अयोग्य है। ज्ञातव्य है कि इंगलैण्ड जाने के पहले लोगों की स्वास्थ्य परीक्षा होती थी।

विविध जगहो पर कार्य – एम.ए. परीक्षा के बाद वे आजीविका प्राप्त करना चाहते थे। बड़ी-बड़ी नौकरियों की परीक्षा इंगलैण्ड में हुआ करती और रमन इंगलैण्ड जाने के लिए अयोग्य घोषित कर दिये गये थे। भारत सरकार के द्वारा एक प्रतियोगिता का आयोजन वित्त विभाग द्वारा किया जाता था। रमन ने बड़ी लगन और आत्मविश्वास के साथ वित्त विभाग द्वारा आयोजित परीक्षा में भाग लिया और उसमें भी सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया।

वे डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद पर कलकत्ता में नियुक्त हुए और यहाँ भी अपना सम्पर्क भारतीय विज्ञान परिषद से कायम रखा। रमन के माता-पिता चाहते थे कि उनका विवाह कर दिया जाये। चुंगी विभाग में कार्यरत सुपरिटेण्डेण्ट कृष्णास्वामी अय्यर की पुत्री से उनकी शादी करायी गयी।

Chandrasekhara Venkata Raman – डॉ. सी. वी. रमन

कलकत्ता कार्य करते समय रमन का सम्पर्क भारतीय विज्ञान परिषद से हुआ जिसकी स्थापना सर आशुतोष मुखर्जी और सर गुरुदास बनर्जी ने की थी। रमन अपने कार्यालय से छुट्टी पाकर इस विज्ञान परिषद में विविध प्रकार के प्रयोग करते। सर आशुतोष मुखर्जी और गुरुदास बनर्जी इस युवकरत्न को प्राप्त कर बहुत प्रसन्न हुए। यहाँ रहते हुए उन्होंने कई आविष्कार किए जिनकी प्रशंसा विश्व के कई वैज्ञानिकों ने की।

कलकत्ता की भारतीय विज्ञान परिषद से उनका लगाव बहुत बढ़ गया था पर सरकार ने उनका तबादला रंगून कर दिया। वहाँ प्रयोग करने के लिए कोई केन्द्र नहीं था। फिर भी उन्होंने पुस्तको एवं पत्रिकाओं को पढ़ा। विज्ञान का अध्ययन उनके जीवन का एक अनिवार्य अंग बन चुका था। उनके पिता जी मृत्यु जब रंगून में कार्यरत थे तभी हो गई।

छह माह की छुट्टी लेकर वे मद्रास लौट आए। जब मद्रास में छुट्टी बिता रहे थे तभी उनका तबादला नागपुर में कर दिया गया। नागपुर में उन्होंने अपना कार्यभार ग्रहण किया। सरकारी कार्यों के उत्तरदायित्व को तो वे निभाते ही साथ-ही-साथ अपने घर पर छोटी सी प्रयोगशाला उन्होंने बनाई। उनकी योग्यता और कार्यकुशलता से कुछ लोग प्रसन्न नहीं हुए और उन्होंने पदाधिकारियों के पास शिकायत की।

Chandrasekhara Venkata Raman – डॉ. सी. वी. रमन

जाँच उपरान्त पाया गया कि रमन की कार्यप्रणाली बहुत ही उत्तम कोटि की थी। उनका कार्य बहुत ही संतोषजनक था, फलस्वरूप पदोन्नती देकर एकाउन्टेंट जनरल बना दिया गया। पुनः उनका तबादला 1911 ई. में कलकत्ता कर दिया गया। इस बार रमन लगभग आठ साल तक कलकत्ता रहे। इस प्रवास में उन्होंने अनेक लेख लिखे और कुछ ग्रन्थों की रचना की।

व्यक्ति अपनी तपश्चर्या और त्याग से महान बनता है। उपयुक्त अवसर मिले, वांछित प्रतिभा रहे, दृढ विश्वास और अध्यवसाय हो तो वह उत्कृष्टतम सफलता प्राप्त कर सकता है। एक बड़ी वस्तु की प्राप्ति के लिए महान से महान त्याग करना पड़ता है। कौन जानता था कि को एकाउन्टेन्ट जनरल का पद छोड़ना पड़ेगा।

सर आशुतोष मुखर्जी, सर तारकनाथ पालित, डॉ. रासबिहारी घोष आदि ने मिलकर कलकत्ता साइंस कॉलेज की स्थापना की थी। वे रमन जैसे योग्यतम व्यक्ति की तलाश में थे जिसे भौतिक विज्ञान का प्रधान बनाया जाये। इधर रमन भी चाहते थे कि कोई उपयुक्त संस्था मिले तो सरकारी पद छोड़कर वैज्ञानिक खोज में पूर्ण समय दिया जाये।

Chandrasekhara Venkata Raman – डॉ. सी. वी. रमन

सरकारी पद छोड़कर वैज्ञानिक खोज में जुटे –  यह तो हम सभी जानते हैं कि “जहाँ बाह, वहाँ राह” अथवा “जिन खोजा तिन पाइयां’ की कहावत सदियों से चरितार्थ होती आ रही है। रमन को 1917 ई. मेल साईन्स लिन के भौतिक विज्ञान का प्रधान बना दिया गया। उन्होंने सरकारी पद को तिलांजलि दे दी। जमकर प्रयोग चलने लगा। उनके पास कोई विदेशी उपाधि थी नहीं सामान्य नियम यही था कि विदेश से डिग्री प्राप्त करने वाले को ही विभाग का प्रधान बनाया जाएगा।

रमन की लगनशीलता, त्याग, समता, विद्वत्ता से संसार परिचित हो चुका था। उनके संबंध में कॉलेज के प्रिंसिपल आर्थीवाल्ड ने कहा था-“किसी विश्वविद्यालय की शोभा उसकी बड़ी और ऊँची आलीशान इमारतें नहीं बल्कि पढ़ाने वाले अध्यापक और उनसे पढ़ने वाले शिष्यगण होते हैं।”

1921 में ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल के विश्वविद्यालयों का सम्मेलन लंदन में होने वाला था। कलकत्ता विश्वविद्यालय ने सी.वी. रमन को ही प्रतिनिधि चुनकर भेजा। उनके विद्वत्तापूर्ण भाषण ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। उनकी खोजों के बारे में लोग जानकारी प्राप्त करने लगे। विद्यार्थी जीवन में जिस रमन को विदेश जाने के लिए अयोग्य घोषित ठहराया गया था आज उसी रमन ने इंगलेण्ड के अलावा अनेक देशों का भ्रमण किया जिनमें अमेरिका, पुराने सोवियत संघ के साथ-साथ यूरोप के अनेक देश सम्मिलित हैं।

Chandrasekhara Venkata Raman – डॉ. सी. वी. रमन

1924 में सी. वी. रमन को भारत सरकार ने सर की उपाधि प्रदान की। रमन के पहले भी प्रकाश पर अनेक वैज्ञानिकों ने काम किया था। उनकी विशेषता यह रही है कि उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि तरल और पारदर्शी पदार्थों में से छितराने पर प्रकाश का रंग बदल जाता है। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन करने के बाद उन्हें सिद्ध करने में तीन-चार वर्ष का समय लगा।

नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया – नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के कुछ वर्ष पहले उन्होंने विश्वास प्रकट किया था कि उन्हें एक-न-एक दिन नोबेल पुरस्कार मिलेगा ही। 1930 ई. में उन्हें यह महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्रदान किया गया। वे एशिया के प्रथम भौतिकी के वैज्ञानिक थे जिन्हें यह गौरव प्राप्त हुआ। रमन का वैज्ञानिक आविष्कार संसार की रचनात्मक भलाई करने के लिए ही था। उनका लक्ष्य ऐसा आविष्कार करने से था जो विश्व को विनाश से बचाये।

इनके इस आविष्कार से प्रसन्न होकर तत्कालीन सोवियत संघ की सरकार ने लेनिन एवार्ड से भी सम्मानित किया। सी. वी. रमन कॉलेज छोड़ने के बाद 1932 से 1937 तक इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइन्स के संचालक पद पर काम करते रहे। 1943 ई. में उन्होंने रमन इंस्टीट्यूट की स्थापना की। रमन इन्स्टीट्यूट को उन्होंने अपने परिश्रम से एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्थान के रूप में परिणत कर दिया था। डॉ. रमन बहुभाषाविद् व्यक्ति थे। 1959 ई. में वे नेशनल प्रोफेसर बने।

Chandrasekhara Venkata Raman – डॉ. सी. वी. रमन

मृत्यु – वैज्ञानिक होने के अलावा उनमें अनेक देवी गुण मौजूद थे। यथा, परोपकार, करुणा, सेवा और सहानुभूति। जब वे नागपुर में थे तो प्लेग की बीमारी फैली थी। अपना बहुमूल्य समय निकालकर वे रोगियों की सेवा करते। वे वैज्ञानिक तो थे ही, उनमें आध्यात्मिकता भी कूट-कूटकर भरी थी। रमन का देहावसान 20 नवम्बर, 1970 ई. में हो गया।

सर सी.वी. रमन भारत की एक अनुपम विभूति थे जिन्होंने भारत का नाम विश्व में रोशन किया। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने साहित्य में नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर जो यश अर्जित किया था, जो सम्मान भारत के लिए प्राप्त किया था, उसके लिए उनके प्रति समस्त भारतवासी नतमस्तक हैं। उनकी अमर कीर्ति गीतांजली से सारा संसार परिचित है। उसी तरह विज्ञान के क्षेत्र में सर सी.वी. रमन ने जो ख्याति अर्जित की है उसके लिए वे तो अमर हैं और रहेंगे।

बहुत कम वैज्ञानिक हैं जिन्हें जीवन में उतना सम्मान प्राप्त हुआ जितना रमन को हुआ था। उन्हें विश्व की कई महान वैज्ञानिक संस्थाओं ने सदस्य बनाया था जिनमें प्रमुख रॉयल फिलासाफिकल सोसायटी, ग्लासगो; रॉयल अमरीका एकेडेमी, ज्यूरिक फिजिकल सोसायटी, जर्मन ड्यूरश एकेडेमी ऑफ साइन्सेज, हंगरियन एकेडेमी ऑफ साइन्स, साइन्स एकेडेमी, पेरिस, रूसी एकेडेमी ऑफ साइन्सेज, फ्रेंच एकेडेमी, आप्टिकल सोसायटी ऑफ अमेरिका, चीनी फिजिकल सोसायटी है।

Chandrasekhara Venkata Raman – डॉ. सी. वी. रमन

विश्वविख्यात वैज्ञानिक रदरफोर्ड ने रमन के संबंध में कहा था “आचार्य रमन ने केवल महत्त्वपूर्ण अन्वेषण ही नहीं किए वरन् अपने प्रयत्न से कलकत्ता विश्वविद्यालय में विज्ञान की खोज के लिए एक प्रगतिशील और उपयोगी संस्था की स्थापना तथा उसका विकास भी किया।” 

Chhatrapati Shivaji Maharaj : छत्रपती शिवाजी महाराज चरित्र

 

Leave a Comment