Chandra Shekhar Azad – चंद्रशेखर आजाद

Chandra-Shekhar-AzadChandra Shekhar Azad

जन्म – भारत के महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर रियासत के भावरा नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री सीताराम तिवारी और माता का नाम श्रीमती जगरानी देवी था। आजाद से पूर्व उनके तीन और भाई हुए थे, परंतु उनमें से एक भाई सुखदेव को छोड़कर शेष दोनों अकाल मृत्यु के ग्रास बन गए थे। आजाद के जन्म के समय उनके माता-पिता अत्यंत प्रसन्न हुए, परंतु साथ ही उन्हें काफी चिंता भी हो रही थी, क्योंकि जन्म के समय आजाद का वजन बहुत कम था।

Chandra Shekhar Azad – चंद्रशेखर आजाद

माता-पिता अपनी संतान को अधिक-से-अधिक आराम और सुविधा के साथ पालना चाहते थे, परंतु उनकी आर्थिक स्थिति उनकी इस इच्छा के आड़े आती थी। वे अत्यंत स्वाभिमानी व्यक्ति थे। भूखे रहने की स्थिति में भी उन्होंने कभी किसी से कुछ माँगने की चेष्टा नहीं की। कभी-कभी तो बालक चंद्रशेखर के लिए दूध का प्रबंध कर पाना भी कठिन हो जाता था, लेकिन ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने अपना आत्मसम्मान तो बनाए ही रखा, साथ ही बच्चे को भी भरपूर स्नेह से पाला।

शिक्षा – चंद्रशेखर का विद्यार्थी जीवन 5-6 वर्ष की अवस्था से आरंभ हुआ। वे अपने बड़े भाई सुखदेव के साथ विद्यालय जाने लगे। पं. सीतारामजी ने पुत्रों की पढ़ाई पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन खर्च किया। उन्हें कभी किसी प्रकार की कमी नहीं होने दी। चौदह वर्ष की अवस्था में एक दिन चंद्रशेखर ने अपने माता-पिता से काशी जाकर संस्कृत पढ़ने की अनुमति माँगी।

लाड़ली संतान होने के कारण माता-पिता उन्हें स्वयं से दूर नहीं रखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने काशी जाने की अनुमति नहीं दि। चंद्रशेखर भी अपनी धुन के पक्के थे। जो बात उन्होंने अपने मन में एक बार ठान ली, सो ठान ली। माता-पिता से अनुमति न मिलने पर भी उनके निश्चय में कोई बदलाव नहीं आया। अंततः एक दिन के घर से भाग निकले और लौटकर फिर वापस नहीं आए। स्वजनों का प्रेम भी उनके पाँव की बेड़ी नहीं बन पाया।

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चंद्रशेखर का इस तरह घर से भागना उनके क्रांतिकारी जीवन का बीज रूप था। काशी पहुँचकर उन्होंने अपने माता-पिता को अपनी कुशलता का पत्र लिखा। उन्होंने लिखा था-“आप लोग मेरी किसी भी प्रकार की चिंता न करें। मैं यहाँ पढ़ने के लिए आया हूँ। आपके आशीर्वाद से यहाँ ठीक-ठाक हूँ।”

क्रांतिकारी जीवन की शुरुवात – उस समय पूरा देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। देश अपना था, परंतु शासन विदेशियों का था। उनके अत्याचार दिन-ब-दिन बढ़ते ही जा रहे थे। भारतीय जनता का वजूद उनकी नजर में कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं था, जिसे कुचलने का वे कोई-न-कोई अवसर तलाशते ही रहते थे। सन् 1919 में पास हुआ रॉलेट ऐक्ट भी इसी बर्बरता की एक कड़ी था. जिसके द्वारा भारतीयों के मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा था।

पूरे भारत में इसपर तीव्र प्रतिक्रिया हुई। पंजाब भी इससे अछूता नहीं रह पाया। इसी रॉलेट ऐक्ट के विरोध में जलियाँवाला बाग में एक सभा हो रही थी, जिसमें लगभग 20,000 भारतीय उपस्थित थे, जिनमें बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सभी थे। सभा शांतिपूर्वक चल रही थी। अचानक जनरल डायर ने आकर अपने सैनिकों को निर्दोष जनता पर गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया। अचानक हुए इस हमले के कारण लोगों को सँभलने तक का अवसर नहीं मिला।

Chandra Shekhar Azad – चंद्रशेखर आजाद

बाग से निकलने का केवल एक ही रास्ता था और उसपर जनरल डायर साक्षात् नरपिशाच बना खड़ा था। इस दुर्घटना में लगभग एक हजार निर्दोष भारतीयों की निर्मम हत्या कर दी गई। इस घटना से पूरे देश में क्षोभ का वातावरण उत्पन्न हो गया। काशी में पढ रहे चंद्रशेखर को इस घटना का समाचार मिला। इस बर्बरतापूर्ण कृत्य से किशोर चंद्रशेखर का खून खौल उठा। उस समय उनकी आयु मात्र 13 वर्ष थी।

अनुभव की परिपक्वता आयु का बंधन स्वीकार नहीं करती। 13 वर्ष की अवस्था सामान्यता बचपन ही होती है, परंतु विदेशी बंधन और आए दिन की बर्बरतापूर्ण घटनाओं ने उस समय बच्चों से उनका बचपन भी छीन लिया था। किशोर चंद्रशेखर यह सब देखकर छटपटाहट उठे। स्वयं को अधिक समय तक देशसेवा से दूर रख पाना अब उनके लिए असंभव था।

शीघ्र ही उन्हें उचित अवसर भी प्राप्त हो गया। एक बार एक प्रदर्शन में अंग्रेज सैनिक प्रदर्शनकारी सत्याग्रहियों को इंडों से पीट रहे थे। चंद्रशेखर यह सब देख रहे थे। जब उनसे यह अत्याचार नहीं देखा गया तो उन्होंने एक बड़ा सा पत्थर उठाकर एक सिपाही के माथे पर दे मारा। वह सिपाही लहूलुहान हो गया। बाकी सभी सिपाही चंद्रशेखर को ढूँढ़ने लगे।

Chandra Shekhar Azad – चंद्रशेखर आजाद

इधर चंद्रशेखर उनकी आँखों में धूल झोंककर वहाँ से निकल चुके थे। उन्हें भागते हुए एक सिपाही ने देख लिया था। चंद्रशेखर माथे पर चंदन का टीका लगाया करते थे। उस सिपाही को चंद्रशेखर के माथे पर लगा चंदन का टीका याद था। चंद्रशेखर को ढूँढ़ते हुए अंग्रेज सिपाही उनके घर तक पहुँच गए। सिपाहियों ने देखा कि एक कमरे की दीवारों पर महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, पं. मोतीलाल नेहरू आदि कई देशभक्तों और क्रांतिकारियों के चित्र टंगे हुए थे।

सिपाही कमरे को ध्यान से देख रहे थे। अचानक एक सिपाही की नजर चंद्रशेखर पर पड़ गई। उसने टीका देखकर उन्हें तुरंत पहचान लिया। उनके हाथों में हथकड़ियाँ डाल दी गई। चंद्रशेखर को हवालात में बंद कर दिया गया। अगले दिन उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया तो मजिस्ट्रेट ने चंद्रशेखर से पूछा,

“लड़के, तुम्हारा नाम क्या है ?”

“आजाद।” चंद्रशेखर ने जवाब दिया।

“पिता का नाम ?”

“स्वतंत्र”

मजिस्ट्रेट अपने प्रश्नों का उत्तर इतनी ललकारती आवाज में सुनकर दंग रह गया। मजिस्ट्रेट ने तीसरा प्रश्न किया,

“तुम्हारा घर कहाँ है ?”

“जेलखाना।” चंद्रशेखर ने जवाब दिया।

उत्तर सुनकर मजिस्ट्रेट गुस्से के मारे उबलने लगा। उसने किशोर चंद्रशेखर को पंद्रह बेंतों का कठोर दंड सुना दिया। जल्लाद को बुलाकर उसे आज्ञा दी गई कि चंद्रशेखर के नंगे बदन पर बैत लगाना आरंभ करे। आदेश का पालन आरंभ हुआ।

जेलर ने जैसे ही बोला, “एक।” जल्लाद ने तेल से भीगा बेंत चंद्रशेखर की पीठ पर सटाक से दे मारा। बेंत की आवाज के साथ ही चंद्रशेखर के मुँह से जयघोष हुआ—“भारत माता की जय।”

पहले बेंत ने ही चंद्रशेखर की पीठ से चमड़ी को बुरी तरह खींच डाला, लेकिन उनके मुँह से एक आह भी न निकली। एक बार फिर जेलर कड़कती आवाज में गरजा, “दो”। जल्लाद ने फिर पूरी शक्ति से बेंत लगाया। बेंत की आवाज के साथ एक आवाज और गूँजी – “भारत माता की जय!”

Chandra Shekhar Azad – चंद्रशेखर आजाद

चंद्रशेखर के बदन से बुरी तरह से खून टपकने लगा, लेकिन उनके चेहरे पर पीड़ा के कोई भाव न थे। यह देखकर जेलर और जल्लाद, सभी दाँतों तले उँगली दबा रहे थे। जेलर तीसरी बार चिल्लाया-“तीन।” जल्लाद ने अधिक-से-अधिक शक्ति लगाकर तीसरा बेंत मारा। फिर भी चंद्रशेखर आजाद के मुँह से एक ही सिंहनाद निकला- “भारत माता की जय !”

चंद्रशेखर आजाद के बदन पर बेंत लगते जा रहे थे और उनसे हुए जख्मों से रक्त बह रहा था। चौदह वर्ष का वह किशोर और बेतों की मार, जिसके आगे अच्छे-अच्छों का साहस छूट जाता है, लेकिन आजादी का दीवाना वह ‘आजाद’ पूरी तरह शांत और निर्भीक दिखाई दे रहा था। दंड पूरा होने के बाद चंद्रशेखर जैसे ही बाहर आए, अदालत के बाहर खड़ी हजारों की भीड़ ने उनका स्वागत गर्मजोशी से किया। बेंतों की मार खाकर चंद्रशेखर के हृदय में मातृभूमि के प्रति प्रेम और भी दृढ़ हो गया।

क्रांति के पथ पर अग्रसर – चंद्रशेखर आजाद अब क्रांति के पथ पर अग्रसर हो चले थे। फरवरी 1922 का समय था। पूरे देश में असहयोग आंदोलन’ जोरों पर था, जो कि गांधीजी ने आरम्भ किया था। पूरा आंदोलन पूर्णतः अहिंसात्मक ढंग से चल रहा था।’ इस आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस तो पूरी तरह कमर कसे बैठी थी। गोरखपुर के चौरीचौरा नामक स्थान पर कुछ आंदोलनकारियों ने हिंसा का जवाब हिंसा से देकर अपना धैर्य खो दिया।

Chandra Shekhar Azad – चंद्रशेखर आजाद

12 फरवरी, 1922 को कुछ आंदोलनकारियों ने बर्बर पुलिसकर्मियों को पुलिस स्टेशन के अंदर ही बंद करके बाहर से आग लगा दी, जिसमें उस थाने का दरोगा और 21 सिपाही जल मरे। इस हिंसा के कारण गांधीजी ने ‘असहयोग आंदोलन’ बीच में ही वापस ले लिया, जिसके ठीक अगले दिन ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

इस प्रकार बीच में ही आंदोलन वापस ले लेने पर युवावर्ग में रोष फैल गया और अंग्रेजों के समक्ष इसे नैतिक पराजय के रूप में देखा गया। इसी रोष ने जन्म दिया ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ को। संगठित क्रांति प्राप्त करना, नागरिकों को मताधिकार प्राप्त कराना और समाज के शोषित वर्ग का उत्थान करना आदि इस संगठन के मुख्य उद्देश्य थे।

आजाद इस संगठन के एक सक्रिय कार्यकर्ता बने। आगे चलकर इसी संगठन में आजाद ने रामप्रसाद बिस्मिल, सुखदेव, राजगुरु और भगत सिंह जैसे सूरमाओं को अपना नेतृत्व प्रदान किया। यह उनके जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय था। देशभक्ति के रंग में वे कुछ इस तरह रँग गए थे कि देश की आजादी का ही सपना हर समय देखा करते थे। इसी बीच चंद्रशेखर के पिता का देहांत हो चुका था।

Chandra Shekhar Azad – चंद्रशेखर आजाद

इधर आजाद अपना अधिकांश समय घर से बाहर रहकर देश की सेवा में व्यतीत किया करते थे। घर में माँ जगरानी देवी बिल्कुल अकेली पड़ गई थीं। चंद्रशेखर कभी चार तो कभी आठ-आठ दिन के बाद माँ से मिलने के लिए घर जाते थे। एक बार चंद्रशेखर दस-बारह दिनों के बाद अपनी माँ से मिलने घर पहुंचे। उन्हें देखकर माँ बहुत प्रसन्न हुई।

थोड़ी ही देर में जब चंद्रशेखर खाना खाकर जाने को तैयार हुए तो माँ ने दुःखी होकर कहा, “चंद्रशेखर, क्या तू एक दिन भी अपनी माँ के पास नहीं रुक सकता? तुझे मेरी ममता की तनिक भी परवाह नहीं है ?” “माँ, तेरा बेटा यह बात समझता है। ममता के लिए ही तो मैं यह सब कर रहा हूँ। माँ दुःख उठाती रहे और बेटा देखता रहे, ऐसे बेटे को तो धिक्कार है।”

चंद्रशेखर का जवाब था। वे चंद्रशेखर की बात समझ नहीं पाईं सोचने लगीं, ‘यह मुझे कौन सी खुशी देने की बात कर रहा है?’ वे बोलीं, “मेरे लाल, तू नहीं समझता कि मेरा सुख तो तभी है, जब तू मेरी आँखों के सामने रहे।” “माँ, तुम्हारा यह सुख झूठा है। भारत माँ, जो तैंतीस करोड़ भारतीयों की माँ है, आज गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई है। मुझसे उसका दुःख देखा नहीं जाता। मैं उसे आजाद कराकर ही रहूँगा।” चंद्रशेखर की बातें सुनकर उनकी माँ का सिर गर्व से और ऊँचा हो गया।

Chandra Shekhar Azad – चंद्रशेखर आजाद

‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ में भले ही ऐसे कार्यकर्ताओं का कोई अभाव नहीं था, जो देश के लिए बड़े से बड़ा बलिदान देने में पीछे नहीं हटते थे; परंतु फिर भी कुछ आर्थिक कठिनाइयाँ थीं, जिनके कारण संगठन की गतिविधियाँ प्रभावित हो रही थीं। आजाद और अन्य कार्यकर्ता इस समस्या के कारण काफी परेशान थे। उन्हीं दिनों उन्हें पता चला कि फतेहपुर के पासवाले गाँव के सेठ ने लोगों का खून चूस चूसकर काफी धन जमा कर लिया है।

बस, फिर क्या था? इससे अच्छा अवसर और सेठ से बढ़कर उपयुक्त पात्र भला और क्या हो सकता था? तुरंत धावा बोल दिया गया। आजाद और उनके साथी धन बटोरने में लग गए, तभी आजाद की नजर अपने एक साथी पर पड़ी, जो उस घर की नवयुवती को छेड़ रहा था। युवती भय से काँप रही थी। यह देखकर आजाद का खून खौल उठा। उन्होंने दो गोलियाँ अपने उस साथी के सीने में दागकर उसे हमेशा के लिए शांत कर दिया ऐसा उज्ज्वल था उस अखंड ब्रह्मचारी का चरित्र !

चंद्रशेखर आजाद वेश बदलने में अत्यंत निपुण थे। रास्ते में चलते-चलते ही वे अपना वेश बदल लिया करते थे। पुलिस का मुखबिर उन्हें देखकर जितनी देर में पुलिस को सूचना देता, उतनी देर में चंद्रशेखर आजाद अपना वेश बदलकर भाग चुके होते थे। पुलिस हाथ मलती रह जाती थी।

Chandra Shekhar Azad – चंद्रशेखर आजाद

एक बार चंद्रशेखर आजाद कानपुर से दिल्ली जाने के लिए स्टेशन जा रहे थे। मुखबिर ने पुलिस को सूचना दी कि चंद्रशेखर माल रोड से होकर स्टेशन की ओर जा रहे हैं। सूचना मिलते ही पुलिस दल उनकी खोज में पहुँच गया। पुलिसवाले चंद्रशेखर के नजदीक से ही होकर गुजरे, लेकिन बदले हुए भेस के कारण कोई उन्हें पहचान नहीं सका। पुलिस को चकमा देकर वे बदले हुए भेस में स्टेशन पर पहुँचे थे। पुलिस निराश होकर लौट गई।

अब तक देश के अधिकतर क्रांतिकारी चुन-चुनकर पकड़े जा चुके थे। चंद्रशेखर आजाद’ आजाद’ ही थे। पूरे उत्तरी भारत में इस अकेले व्यक्ति के लिए सी.आई.डी. का जाल बिछा हुआ था। लाख प्रयासों के बावजूद पुलिस आजाद को पकड़ पाने में असमर्थ थी। अंग्रेज सरकार के बड़े-बड़े अफसरों पर आजाद का आतंक छाया हुआ था। उन्हें सपने में भी आजाद ही दिखाई देते थे।

अंग्रेज अफसरों को डर था कि न जाने कब और कौन सा अंग्रेज आजाद की गोली का शिकार हो जाए, इसलिए ब्रिटिश सरकार हर हाल में आजाद को पकड़ना चाहती थी; लेकिन आजाद तो बस आजाद ही थे। उन्हें भला कौन पकड़ सकता था ?

Chandra Shekhar Azad – चंद्रशेखर आजाद

सन् 1928 में जब ‘साइमन कमीशन’ भारत आया तो उसके विरोध में चारों ओर प्रदर्शन होने लगे। लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध करने पर लाला लाजपतराय को अंग्रेज अफसर सांडर्स ने इतना पीटा कि बाद में उनकी मृत्यु हो गई। तब आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने उनकी मृत्यु का बदला लेने की सौगंध खाई। सभी क्रांतिकारियों ने इस हत्या का बदला लेने के लिए एक योजना बनाई।

आजाद, भगत सिंह, सुखदेव आदि क्रांतिकारियों ने बड़ी चतुराई से इस काम को अंजाम दिया। सांडर्स को गोलियों से उड़ाकर सभी क्रांतिकारी फरार हो गए। चंद्रशेखर आजाद कुशल संगठनकर्ता और क्रांतिकारियों के श्रेष्ठ नायक थे। अपने संगठन पर उनकी पूरी धाक थी। उनकी शक्ति और अचूक निशाने से ब्रिटिश सरकार भी काँपती थी।

शहादत – 27 जनवरी, 1931 को सुबह के समय आजाद और उनका एक विश्वासघाती साथी वीरभद्र तिवारी इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में घुसे। उस दिन आजाद रेलगाड़ी से बंबई जानेवाले थे। दोनों वहीं पार्क में थोड़ी देर तक बातें करते रहे। अचानक चंद्रशेखर आजाद ने देखा कि सामने कुछ दूरी पर अनगिनत पुलिसकर्मियों ने घेरा डाल दिया था। दरअसल, विश्वासघाती वीरभद्र तिवारी ने ही लालच आकर आजाद को पकड़वाने की योजना बनाई थी।

Chandra Shekhar Azad – चंद्रशेखर आजाद

आजाद ने जैसे-तैसे अपने साथी को तो निकाल दिया, परंतु अब उनके भागने का कोई रास्ता नहीं था। आजाद ने जिधर देखा, उधर पुलिस ही-पुलिस थी। पुलिस ने सीधे ही गोलियों की बौछार शुरू कर दी। पुलिस सुपरिटेंडेंट नाटबाथर ने आगे बढ़ते हुए कहा, “हेड्स अप।” जवाब में आजाद की गोली उसके हाथ में लगी और वह बुरी तरह घायल हो गया। अपने अफसर को घायल होता देख पुलिस अंधाधुंध गोलियाँ बरसाने लगी।

आजाद एक पेड़ की आड़ में आ गए और गोलियों का जवाब गोलियों से देने लगे। आजाद की गोलियों से पुलिस के कई अफसर और सिपाही घायल हो गए। लगभग बीस मिनट तक दोनों ओर से गोलियाँ चलती रहीं। आखिर आजाद अकेले इतने सारे सिपाहियों का मुकाबला कब तक करते ? लड़ते-लड़ते आजाद की गोलियाँ समाप्त होने को आ गई।

वे समझ गए कि बच निकलना मुश्किल है, लेकिन वे किसी दुश्मन के हाथों मरना नहीं चाहते थे। जब उनकी पिस्तौल में अंतिम गोली बची, तो उन्होंने अंतिम बार मातृभूमि को चूमकर उसे प्रणाम किया और पिस्तौल अपनी कनपटी से लगाकर गोली चला दी। इस प्रकार आजाद ‘आजाद’ ही रहे। वे जिए भी ‘आजाद’ और मरे भी ‘आजाद’ ।

Chhava

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