Buxar Ka Yudh – बक्सर का युद्ध

Buxar-Ka-Yudh Buxar Ka Yudh

बक्सर का युद्ध बक्सर के आसपास ईस्ट इंडिया कंपनी के हैक्टर मुनरो और मुगल तथा नवाबों की सेनाओं के बीच लड़ा गया था। बंगाल के नबाब मीर कासिम, अवध के नबाब शुजाउद्दोला तथा मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना अंग्रेज कम्पनी से लडी I लड़ाई में अंग्रेजों की जीत हुई I

Buxar Ka Yudh – बक्सर का युद्ध

मीर कासिम के प्रारम्भिक जीवन के बारे में कोई विशेष जानकारी प्राप्त नहीं होती। वह समृद्ध परिवार से रहा होगा, तभी मीर जाफर ने उसे अपना दामाद बनाया होगा। जब मीर जाफर नवाब बना, तो मीर कासिम ने रंगपुर के फौजदार के रूप में अपनी प्रशासनिक योग्यता का परिचय दिया। वह एक योग्य सेनानायक था।

जब मीर जाफर के पुत्र मीरन की मृत्यु हो गई, तो उसमें बंगाल का नवाब बनने की आकांक्षा जाग उठी। अन्त में वेन्सीटार्ट के साथ साँठ-गाँठ करके वह बंगाल का नवाब बनने में सफल रहा। वह 1756 ई. के और उसके बाद के समय में हुए बंगाल के नवाबों के सबसे अधिक योग्य था। नवाब बनने के बाद मीर कासिम ने सन्धि के समय अंग्रेजों से किये गये अपने वायदे को निभाया।

उसने बर्दवान, मिदनापुर तथा चिटगांव के जिले अंग्रेजों को दे दिये और वेन्सीटार्ट और उसके साथियों को भेंट और उपहार स्वरूप आदि के रूप में काफी धन दिया। दक्षिण के युद्धों में सहायता के लिए अंग्रेजों को पांच लाख रुपया दिया। पूर्व नवाब को 15,000 रुपया मासिक पेन्शन देना आरम्भ किया। उसने उस धन देने का वायदा भी किया, जो सन्धि की शर्तों के अनुसार मीर जाफर अंग्रेजों को न दे सका।

Buxar Ka Yudh – बक्सर का युद्ध

मीर कासिम ने सैनिकों का बकाया वेतन चुका कर उन्हें सन्तुष्ट कर दिया। मीर कासिम ने नवाब बनते ही अपनी योग्यता का परिचय दिया। वह जानता था. कि शासन में सुधार किये बिना और अंग्रेजों से छुटकारा पाये बिना, उसकी भी वही दुर्दशा होगी, जो मीर जाफर की हुई थी। अतः उसने शासनकाल में इन बातों की ओर विशेष ध्यान दिया। उसने शासन को व्यवस्थित करने तथा अपनी स्थिति को दृढ़ करणे के लिए निम्नलिखित कार्य किये :

अर्थ व्यवस्था का पुनर्गठन – मीर कासिम जानता था कि बंगाल में अपनी शक्ति को स्थापित करने के लिए अच्छा शासन और भरा हुआ खजाना आवश्यक है। अतः उसने बंगाल की अर्थ व्यवस्था का पुनर्गठन करने के प्रयत्न आरम्भ कर दिये। जिस व्यक्ति के पास अधिक धन की जानकारी मिली, उसका धन जब्त कर लिया गया। शासन अधिकारियों को बाध्य किया गया कि वे बेईमानी से बचाया हुआ धन उसे दें।

राजस्व विभाग का पुनर्गठन किया गया तथा विश्वस्त व्यक्तियों को नियुक्त किया गया। सरकारी व्यय में कमी करने के लिए बहुत से कर्मचारियों को नौकरी से हटा दिया गया। राज्य की आय में वृद्धि करने के लिए जनता पर कुछ नये कर लगाये गये अनेक जमींदारों से पिछला बकाया धन वसूल किया गया एवं विद्रोही जमींदारों का कठोरता से दमन किया गया। परिणामस्वरूप राज्य की आय में काफी वृद्धि हुई। वास्तव में मीर कासिम ने अपने कार्यों से सिद्ध कर दिया कि वह एक योग्य शासक था।

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सैन्य व्यवस्था का पुनर्गठन – मीर कासिम ने अंग्रेजों के चंगुल से मुक होने तथा शान्ति और व्यवस्था कायम करने के लिए अपनी सैन्य व्यवस्था का पुनर्गठन करने का निश्चय किया। तदनुसार उसने अपने सैनिकों की संख्या में वृद्धि की और उन्हें यूरोपियन तरीके से सैन्य प्रशिक्षण दिलवाया। सेना का संगठन भी यूरोपिय ढंग से किया गया। सैनिकों में अनुशासन की भावना जागृत की और उन्हें आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों से लैस किया। अपनी नई राजधानी मुंगेर में उसने बारूद बनाने तथा अच्छी तोपें बनाने का एक कारखाना भी स्थापित किया।

राजधानी का परिवर्तन – मीर कासिम ने अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त होने के लिए अपनी राजधानी का परिवर्तन करना आवश्यक समझा। इस समय राजधानी मुर्शिदाबाद थी। यहां अंग्रेजों की स्थिति दृढ़ होने के कारण वे उसके विरूद्ध सफलतापूर्वक षड्यन्त्र कर सकते थे। अतः नवाब ने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानान्तरित कर दी। मुंगेर कलकत्ता से काफी दूर था।

यहाँ अंग्रेजों का प्रभाव नहीं होने के कारण वह कम्पनी के अधिकारियों के नियन्त्रण से मुक्त होकर अधिक स्वतंत्रता से कार्य कर सकता था। नवाब ने मुंगेर की सुदृढ़ किले बन्दी की और वहां लगभग 40,000 सैनिकों की एक प्रशिक्षित सेना तैनात की गई। इतना ही नहीं, युद्ध सामग्री का निर्माण करने के लिए यहाँ एक कारखाना भी स्थापित किया गया।

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अंग्रेजों से संघर्ष – मीर कासिम के अंग्रेजों से संघर्ष होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

(1) मीर कासिम और अंग्रेजों के बीच संघर्ष का मुख्य कारण सत्ता का प्रश्न था मीर कासिम बंगाल का वास्तविक शासक बनना चाहता था। इसलिए उसने अंग्रेजों के हाथों की कठपुतली बनने से इन्कार कर दिया, जबकि अंग्रेज यह चाहते थे कि नवाब उनके इशारों पर कार्य करे।

(2) 1761 ई. में शाह आलम द्वितीय ने स्वयं को मुगल बादशाह घोषित कर दिया और अंग्रेजों से मांग की कि वे उसे दिल्ली सिंहासन पर बिठाने में सहायता करें। अंग्रेजों ने उसे पटना में आमन्त्रित किया और उसका वहाँ बहुत अच्छा स्वागत किया। उन्होंने मीर कासिम से कहा कि वह एक घोषणा करके शाह आलम को मुगल बादशाह स्वीकार कर ले।

अंग्रेजों की धमकीके कारण मीर कासिम को मजबूर होकर शाह आलम को मुगल सम्राट् स्वीकार करना पड़ा। इतना ही नहीं, उसे 12 लाख रुपये नजराने के रूप में शाह आलम को देने पड़े। अंग्रेजों ने शाह आलम के नाम के सिक्के भी ढलवाये। अंग्रेजों की इसी नीति के कारण मीर कासिम को यह भय हुआ कि कहीं वे शाह आलम की सहायता से बंगाल, बिहार और उड़ीसा की सूबेदारी ने ले लें। इस घटना से मीर कासिम और अंग्रेजों के आपसी सम्बनधों में तनाव आ गया।

Buxar Ka Yudh – बक्सर का युद्ध

(3) अंग्रेजों और मीर कासिम के बीच संघर्ष का मुख्य कारण व्यापार था। अंग्रेजों को मुगल सम्राट् फर्रुखसियर के समय से ही बिना कर चुकाये व्यापार करने का अधिकार प्राप्त था, लेकिन कम्पनी के कर्मचारियों ने इस अधिकार का दुरूपयोग करना आरम्भ कर दिया। कम्पनी के कर्मचारियों ने निजी व्यापार भी निःशुल्क करना आरम्भ कर दिया।

यही नहीं, उन्होंने एक विशेष कमीशन लेकर अपने दस्तकों (Free Pass) को भारतीय व्यापारियों के बेच दिये। इससे भारतीय व्यापारी भी बिना कर चुकाये व्यापार करने लगे। इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। इससे एक ओर तो नवाब की आय घट गई और दूसरी तरफ भारतीय व्यापारियों के लिए अपना व्यापार चलाना कठिन हो गया।

इस कारण मीर कासिम ने इस असुविधा के सम्बन्ध में कम्पनी से एक निश्चित समझौता करने का प्रयास किया। फोर्ट विलियम के गर्वनर वेन्सीटार्ट ने मुंगेर में नवाब से भेंट की और यह निर्णय लिया कि कम्पनी अपने सामान पर 9 प्रतिशत शुल्क अदा करें और भारतीय व्यापारी 25 से 30 प्रतिशत शुल्क दें, परन्तु कलकत्ता कौंसिल ने इस समझौते को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि अंग्रेज अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं। थे।

Buxar Ka Yudh – बक्सर का युद्ध

कोई समझौता ने होने पर मीर कासिम ने 1762 ई. में भारतीय व्यापारियों को मी अंग्रेजों के समान निःशुल्क व्यापार करने की अनुमति दे दी। मीर कासिम के इस कदम से अंग्रेज अधिकारी क्रुद्ध हो गये, क्योंकि इससे उनका विशेषाधिकार समाप्त हो गया। अंग्रेजों को लाभ उसी समय था, जबकि वे बिना कर दिये हुए व्यापार करें और भारतीयों को कर देना पड़े। इसकारण कलकत्ता कौंसिल ने उनकी बात को ठुकरा दिया। इस प्रकार नवाब की व्यापारिक नीति अंग्रेजों और नवाब के बीच संघर्ष मुख्य कारण बनी।

(4) मीर कासिम ने आरोप लगाया कि उसने अंग्रेजों को बर्दवान, मिदनापुर एवं चिटगांव के जिले इस शर्त पर दिये थे कि अंग्रेजी सेना नवाब की सहायता के लिए कार्य करेगी। चूंकि वह सेना उसी के विरुद्ध काम में लाई जा रही है। अत: अंग्रेज उन जिलों की और उनसे वसूल किया गया राजस्व भी लौटा दें। इससे दोनों पक्षों में और अधिक तनाव उत्पन्न हो गया।

ऐसी स्थिति में कलकत्ता कौंसिल ने अपनी सदस्यों हे और और अमायत को नवाब से बात चीत करने हेतु भेजा नवाब ने अंग्रेजों की बात मानने से इन्कार कर दिया और हे को बन्दी बना लिया गया। इस पर उद्दण्ड सेनापति एलिस ने पटना पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया तथा बहुत से व्यक्तियों को मार दिया। नवाब के साथ हुई हाथा पाई में अमायत मारा गया। मीर कासिम ने सेना भेज पटना को पुनः अपने अधिकार में ले लिया। एलिस और उसके साथी अंग्रेजों को बन्दी बना लिया गया।

Buxar Ka Yudh – बक्सर का युद्ध

बक्सर का युद्ध (23 अक्टूबर, 1764 ई.) – अब बंगाल में नवाब तथा अंग्रेजों में संघर्ष अनिवार्य हो गया। कलकत्ता कौंसिल ने मीर कासिम को नवाब पद से हटाने का फैसला कर लिया कम्पनी ने जून, 1763 में एडम्स के नेतृत्व में एक सेना मुर्शिदाबाद की ओर रवाना की 19 जुलाई, 1763 ई. को कटवा के निकट मीर कासिम और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ, जिसमें नवाब पराजित हुआ।

इसके बाद तीन और युद्ध लड़े गये। उन सभी में नवाब को बुरी तरह से परास्त होना पड़ा, लेकिन इन पराजयों से नवाब हताश नहीं हुआ, वरन उसने मुंगेर की सुरक्षा का पूर्ण प्रबन्ध कर पटना की ओर प्रस्थान किया। नवाब अंग्रेजों से बहुत क्रुद्ध हो गया था। अतः उसने पटना में कुछ भारतीय और अंग्रेज कैदियों को, जिनमें स्त्रियां और बच्चे भी थे, मौत के घाट उतार दिया।

इस घटना को ‘पटना हत्याकाण्ड’ कहा जाता है। इस पर एडम्स ने मीर कासिम को पराजित किया और पटना पर अधिकार कर लिया। अत: नवाब ने पटना से भागकर अवध के नवाब शुजाउद्दौला यहां शरण ली। इस प्रकार जुलाई, 1763 ई. में बंगाल के नवाब का पद रिक्त हो गया था। कलकत्ता कौंसिल ने मीर जाफर का पुनः बंगाल का नवाब बना दिया। मीर जाफर ने अंग्रेजों की समस्त मांगे स्वीकार कर लीं।

Buxar Ka Yudh – बक्सर का युद्ध

उसने मीर कासिम के साथ हुए युद्धों की क्षतिपूर्ति करने का भी आश्वासन दिया। परास्त मीर कासिम ने मुगल सम्राट के वजीर व अवध के नवाब शुजाउद्दौला से सहायता लेने का निश्चय किया। शुजाउद्दौला उन दिनों मुगल सम्राट शाह आलम के साथ इलाहाबाद में ठहरा हुआ था। मीर कासिम ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला से सहायता मांगी और उसकी सेना के व्यय के लिए 11 लाख रुपया प्रतिदिन देना स्वीकार कियाI

शुजाउद्दौला ने बंगाल में अपना प्रभाव बढ़ाने का यह उपयुक्त अवसर समझा। अतः वह मीर कासिम को गद्दी दिलाने में सहायता देने के लिए तैयार हो गया। मुगल बादशाह आलम भी उसके साथ हो गया। शाह आलम दुरंगी चाल चल रहा था। वह गुप्त रूप से अंग्रेजों से मिला हुआ था।

1764 ई. में अवध के नवाब एवं मुगल सम्राट के वजीर शुजाउद्दौला, स्वयं मुगल सम्राट् शाह आलम और मीर कासिम तीनों की सम्मिलित सेनाओं ने पटना को घेर लिया और वर्षा ऋतु आरम्भ हो जाने पर यह संयुक्त सेना बक्सर की ओर बढ़ी। इसी समय अंग्रेज सेनानायक मुनरो लगभग 8,000 सैनिकों के साथ बनारस के पूर्व में स्थित बक्सर नामक स्थान पर पहुंच गया युद्ध के पूर्व अंग्रेजों ने कूटनीति और घूंस देकर शुजाउद्दौला के आसद खां, जैनउल आबीदिन, इतिहासकार गुलाम हुसैन खां एवं रोहतास के गर्वनर साहूमल आदि अधिकारियों को अपनी ओर मिला लिया।

Buxar Ka Yudh – बक्सर का युद्ध

23 अक्टूबर, 1764 ई. को दोनों सेनाओं में बक्सर का प्रसिद्ध युद्ध हुआ। इस युद्ध में मुगल सम्राट् ने कोई रूचि नहीं ली, क्योंकि वह अंग्रेजों से मिल गया था। अंग्रेजों ने तीनों की संयुक्त सेना को बुरी तरह परास्त किया। इस युद्ध में अंग्रेजों के 825 सैनिक मारे गये, जबकि शुजाउद्दौला के लगभग दो हजार सैनिक मारे गये।

नवाब मीर कासिम रणक्षेत्र से भाग निकला। शुजाउद्दौला भी भाग पर रूहेलखण्ड चला गया। मुगल सम्राट अंग्रेजों से मिल गया। अंग्रेजों ने शुजाउद्दौला का पीछा किया और जनवरी, 1765 में उसे बनारस के निकट पुनः परास्त किया। अंग्रेजों ने चुनार तथा इलाहाबाद के दुर्गों पर अधिकार कर लिया ।

शुजाउद्दौला ने मराठा सेनानायक मल्हार राव होल्कर की सहायता से 1765 में अंग्रेजों के अवध से खदेड़ने की चेष्टा की, परन्तु 1765 में अंग्रेजों ने उन दोनों को कड़ा के युद्ध में बुरी तरह पराजित किया। अन्त में शुजाउद्दौला ने अपने आपको अंग्रेजों के हवाले कर दिया। मीर कासिम एक लम्बे समय तक इधर-उधर भटकता रहा और 1777 ई. में दिल्ली के निकट उसकी मृत्यु हो गई।

Buxar Ka Yudh – बक्सर का युद्ध

बक्सर के युद्ध का महत्त्व – आधुनिक भारत के इतिहास में बक्सर के युद्ध का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस युद्ध में अंग्रेजों की निर्णायक विजय हुई। एक दृष्टि से यह प्लासी के युद्ध से भी अधिक महत्त्वपूर्ण था। के. के. दत्त के अनुसार, ‘बक्सर का युद्ध प्लासी के युद्ध की अपेक्षा अधिक निर्णायक सिद्ध हुआ।

बक्सर के युद्ध में विजय के फलस्वरूप अंग्रेजों की प्रतिष्ठा और प्रभाव में आशातीत वृद्धि हुई। इस युद्ध ने अवध के नवाब व मुगल बादशाह के वजीर शुजाउद्दौला तथा स्वयं मुगल सम्राट् शाह आलम को अंग्रेजों की दया पर छोड़ दिया। प्लासी के युद्ध ने अंग्रेजों को केवल बंगाल, बिहार और उड़ीसा का स्वामित्व दिया था, परन्तु बक्सर के युद्ध में अंग्रेजों ने तीन प्रमुख शक्तियों-मुगल सम्राट् शाह आलम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मीर कासिम को पराजित किया था।

इस विजय के फलस्वरूप सम्पूर्ण अवध के सूबे पर अंग्रेजों का नियन्त्रण हो गया, जिसके कारण अंग्रेजों के लिए उत्तरी भारत में साम्राज्य स्थापित करना सरल हो गया। इस युद्ध का सम्पूर्ण भारत पर प्रभाव पड़ा। अब ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक अखिल भारतीय शक्ति बन गई। प्लासी में बंगाल की सेना परास्त हुई थी, जबकि बक्सर में अंग्रेजों ने भारत की श्रेष्ठ सेना को परास्त किया और बाद में अवध तथा मराठों की संयुक्तसेना को परास्त किया। बक्सर के युद्ध में विजय के फलस्वरूप अंग्रेजों का सम्मान सम्पूर्ण भारत में फैल गया।

Buxar Ka Yudh – बक्सर का युद्ध

अब उनके प्रभाव क्षेत्र का विस्तार बंगाल से दिल्ली तक हो गया। इतना ही नहीं, भारत में ब्रिटिश शासन की नींव पक्की हो गई। पी. ई. रॉबर्ट्स का मत है कि ‘प्लासी की अपेक्षा बक्सर को भारत में अंग्रेजी प्रभुता की जन्म भूमि मानना कहीं अधिक उपयुक्त है। बक्सर के युद्ध के बाद बंगाल का नवाब कम्पनी के हाथों की कठपुतली बन गया था।

अवध का नवाब उस पर निर्भर रहने वाला समर्थक मित्र एवं मुगल बादशाह उसका पेन्शनर था। सरकार एवं दत्त का मत है कि परिणाम की दृष्टि से बक्सर का युद्ध प्लासी के युद्ध की अपेक्षा अधिक निर्णायक था। प्लासी ने उन्हें बंगाल की गद्दी पर कठपुतली नवाब स्थापित करने के योग्य बनाया था और निस्सन्देह अंग्रेजों की प्रतिष्ठा में वृद्धि की, लेकिन बक्सर ने इससे कुछ अधिक किया।

उन्हें बंगाल में स्थिति को सुदृढ़ करने के अतिरिक्त इसने सूबे के उत्तर पश्चिमी सीमान्त की ओर अपना नियन्त्रण कायम करने के अवसर प्रदान किये। यदि प्लासी ने बंगाल के नवाब की पराजय को दिखाया, तो बक्सर ने अवध की महान् सता तथा मुगल सम्राट तक की पराजय को घोषित किया I

Buxar Ka Yudh – बक्सर का युद्ध

रेम्जेम्योर ने बक्सर के युद्ध के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि इसने (बक्सर के युद्ध ने) अन्ततोगत्वा बंगाल में कम्पनी के शासन की बेड़ियों को जकड़ दिया। इसने केवल बंगाल के नवाब को ही नहीं, वरन् सम्राट् तथा अवध के नवाब-वजीर को भी पराजित घोषित किया। सम्राट कम्पनी के हाथ में चला गया तथा I

अवध उसके चरणों मे गिरा पडा|राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सैनिक दृष्टि से भी बक्सर का युद्ध महत्त्वपूर्ण था। प्लासी के युद्ध में क्लाईव ने कूटनीति और षड्यंत्र से बिना लड़े ही विजय प्राप्त कर ली थी, परन्तु बक्सर का युद्ध एक पूर्ण सैनिक युद्ध था। इसमें वजीर और मुगल बादशाह की सम्मिलित सेना की संख्या 40,000 से 60,000 के बीच में थी, जबकि अंग्रेजों के पास केवल 8,000 सैनिक थे।

इस युद्ध में अंग्रेजों ने वास्तव में अपने सामरिक कौशल तथा प्रदर्शन किया और मीर कासिम शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट् की सम्मिलित सेनाओं को बुरी तरह पराजित किया था। इससे अंग्रेजों की सैनिक श्रेष्ठता प्रमाणित हो गई और भारतीय शासकों की सैनिक शक्ति की दुर्बलता स्पष्ट रूप से प्रकट हो गई।

Buxar Ka Yudh – बक्सर का युद्ध

वास्तव में बक्सर का युद्ध एक महान् निर्णायक युद्ध सिद्ध हुआ। इससे सम्पूर्ण भारत में अंग्रेज शक्ति की धाक जम गई। मुगल सम्राट् की पराजय से भारतीय जनता निराश हो गई थी। अब अंग्रेजों के लिए दिल्ली का मार्ग खुल गया और वे मराठों से संघर्ष के लिए तत्पर हुए, जिस पर भारत का भाग्य निर्भर था। अंग्रेजों ने जिस उद्देश्य से प्लासी का युद्ध लड़ा था, उसकी पूर्ति वासतव में बक्सर के युद्ध से ही हुई। इसीलिए यह कहा जाता है कि बक्सर के युद्ध ने पलासी के अधूरे कार्य को पूरा किया।

Chhava

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