Bhagwan Mahaveer – भगवान महावीर

Bhagwan-MahaveerBhagwan Mahaveer

भारत के बिहार प्रदेश की पुण्यभूमि वैशाली में एक दिव्य पुरुष का आविर्भाव हुआ था जिन्हें संसार भगवान महावीर के नाम से जानता है। उनका जन्म सन् 539 ई.पू. हुआ था। उन्हें जैन धर्म का अन्तिम 24वां तीर्थंकर कहा जाता है। सामान्यतः ‘जिन’ शब्द का अर्थ विजेता है। ‘जिन’ शब्द से ही जैन शब्द बना है। जैन उसे कहते हैं जो मन के राग और द्वेषात्मक प्रवृत्तियों पर विजयी हो चुका हो।

Bhagwan Mahaveer – भगवान महावीर

जैन धर्म को एक शाश्वत धर्म भी कहा जाता है। कभी-कभी इस धर्म में व्यवधान आने पर उसे पुनः परिमार्जित करने के लिए कुछ महान विभूतियों का अवतार होता है। भगवान महावीर के पहले इसमें 23 तीर्थंकर हो चुके हैं। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ या ऋषभदेव माने जाते हैं जिन्हें आदिनाथ भी कहा जाता है। उन्हें ही नीति-नियमों का प्रथम संस्थापक माना जाता है।

लोगों की मान्यता है कि इनका जन्म इक्वाकु वंश में अयोध्या में हुआ था। इनकी प्रथम रानी से भरत और ब्राह्मी तथा दूसरी पत्नी से बाहुबलि और सुन्दरी का जन्म हुआ था। उन्होंने गणों की स्थापना की। आग जलाकर भोजन पकाना, बर्तन बनाना, कपड़े बुनना आदि कार्यों की शिक्षा उन्होंने ही दी। ब्राह्मी को अक्षर ज्ञान, सुन्दरी को गणित, भरत को स्थापत्य कला और बाहुबलि को चित्रकला सिखाई।

ऋषभदेव ने भरत को राज्य दे कठोर तपस्या की तथा अन्त में कैलाश पर्वत पर निर्वाण प्राप्त किया। सभी तीर्थकरों का जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ। जैन धर्म ग्रन्थों में इन तीर्थकरों के गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष सब एक समान मिलता है। नेमि अथवा अरिष्टनेमि जैन धर्म के 22वें तीर्थकर मागे गये हैं। कुछ लोगों का कहना है कि परम्परागत वे भगवान कृष्ण के चचेरे भाई थे।

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अरिष्टनेमि का जन्म सूरजपुर, जिला आगरा के महाराजा समुद्रविजय की महारानी शिवा के गर्भ से हुआ था। जब वे राजमती से विवाह करने जा रहे थे तब नगर के पास वाड़े में बंधे हुए पशुओं का चीत्कार सुनाई पड़ा। वे तुरन्त समझ गए कि यह वारातियों के लिए भोजन की तैयारी है। इससे उनके मन में वैराग्य की भावना उत्पन्न हुई तथा श्रमण दीक्षा ग्रहण कर ली। गिरनार पर्वत पर ही उन्हें निर्वाण को प्राप्ति हुई।

जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर का नाम पार्श्वनाथ था। इनका जन्म ई. सन् 800 वर्ष पूर्व तथा भगवान महावीर से 250 वर्ष पहले वाराणसी के इक्ष्वाकु वंशीय राजा अश्वसेन के घर हुआ था। उनकी माता का नाम बामादेवी था। सुनते हैं कि उन्होंने भी 30 वर्ष की अवस्था प्राप्त करने पर वैराग्य ग्रहण किया। अनेक वर्षों तक तपस्या की। घूम-घूमकर लोगो को अमर सन्देश सुनाते रहे।

अन्त में उन्हें सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। प्राचीन जैन ग्रन्थों में भगवान पार्श्वनाथ को पुरुषश्रेष्ठ, लोकपूजित, सर्वज्ञ, धर्म तीर्थकर कहा है। उन्होंने धर्म को सुचारू रूप से चलाने के लिए चार भागों में बांटा था जिसे श्रमण, श्रमणी, श्रावक, श्राविका कहा जाता है। पार्श्वनाथ के बहुत से शिष्य भगवान महावीर के समय में भी मौजूद थे। बिहार के नालन्दा के निकट तुंगी ग्राम में उनके शिष्यों का केन्द्र था।

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गौतम बुद्ध – Gautama Buddha

भगवान महावीर और पार्श्वनाथ के शिष्य श्रमण गांगेय के बीच तर्क का उल्लेख भगवती सूत्र में मिलता है। गांगेय ने भगवान महावीर के साथ शास्त्रार्थ में अपनी पराजय स्वीकार कर उनके द्वारा प्रतिपादित पाच व्रतों-अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को स्वीकारा। भगवान महावीर के आविर्भाव के समय केवल भारत में ही नहीं, दुनिया के अधिकांश भागों में हिंसा, स्वार्थपरता, युद्ध, भाई भतीजावाद का ताण्डव नृत्य हो रहा था।

यूनान के राजा अदूरदर्शी एवं प्रजा को कष्ट देने वाले थे। स्त्रियों का जीवन दुःखमय था, दास प्रथा प्रचलित थी। महात्मा सुकरात ने आविर्भूत होकर आदर्श राज्य निर्माण करने और युवकों को सत्य पथ पर लाने का प्रयास किया था। उन्हें विष का प्याला दे सदा के लिए इस धराधाम से स्वार्थी शासकों ने विदाई दे दी पर उनके अमर सन्देशों का प्रचार उनके विद्वान् शिष्य अफलातून (प्लेटो) ने किया।

चीन में कन्फ्यूशियस, फारस में जरथुस्त्र ने तत्कालीन व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई और सनीति प्रचार करना शुरू किया। लगभग उसी समय हमारे देश में भगवान बुद्ध और महावीर ने जन्म ले धर्म में फैले आडम्बरों का विरोध किया। बलि प्रथा को बन्द करने का प्रयास किया। दोनों ने यह बतलाया कि जाति-पांति, वर्ग का भेद कृत्रिम है। मनुष्य अपने कर्म से ही महान बन सकता है।

Bhagwan Mahaveer – भगवान महावीर

भगवान महावीर ने यह अनुभव किया कि दृढ़ इच्छा शक्ति द्वारा ही हम उच्चतम उपलब्धियां प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने बतलाया कि हर आदमी को स्वावलम्बी होना चाहिए। मनुष्य स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माता है। यह जो चाहे बन सकता है। उन्होंने बतलाया कि किसी भी हालत में दूसरे की धन-सम्पत्ति का अपहरण करना अनुचित है। अतः हर आदमी को चाहिए कि अपनी इन्द्रियों और इच्छाओं पर विजय प्राप्त करे।

प्राकृतिक छटा से भरपूर गंडक तट पर स्थित पुण्य भूमि वैशाली को महावीर के जन्म स्थान होने का गौरव प्राप्त हुआ। राजा विशाल द्वारा बसाने के कारण इसका नाम वैशाली पड़ा। जब अधिकांश देशों में राजतंत्र सरकारें कायम थीं, तब भी इस पुण्य भूमि में जनतंत्र के अवशेष मौजूद थे। इस दृश्य का वर्णन करते हुए कविवर मनोरंजन प्रसाद सिंह ने लिखा है :

“जब जग में थी राजतंत्र की घटा घिरी काली काली,

तब भी इस प्राचीन भूमि में प्रजातंत्र की थी लाली।

सुना कमी उत्पन्न हुआ था किसी समय वह राजकुमार,

त्याग दिया था जिसने जग का भोग विलास साज शृंगार I

लिच्छवा लोग नागरिकों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को सहायता से गणतंत्र प्रणाली द्वारा शासन करते थे। नदी के तट पर कुंडग्राम अथवा कुंडपुर नाम का उपनगर था। वह कुंडग्राम क्षेत्रिय कुंडग्राम और ब्राह्मण कुंडग्राम नामक दो टीलों में बढ़ा हुआ था। क्षेत्रिय कुंडग्राम में ही महावीर का जन्म हुआ था। महावीर झातुकुल में ही जन्मे ।

Bhagwan Mahaveer – भगवान महावीर

भगवान महावीर को वैशाली में पैदा होने के कारण वैशलीय और झातुकुल में पैदा होने के कारण झातृपुत्र कहा जाता है। उनके पिता सिद्धार्थ झातृकुल के क्षत्रियों के मुखिया थे। उनकी माता का नाम त्रिशला था जो सुप्रसिद्ध शासक गणराज्यों के मुखिया चेटक की बहन थी। उनके माता-पिता श्रमणोपासक थे और पार्श्वनाथ के अनुयायी थे।

कभी कभी स्वप्न भावी घटनाओं का सूचक होता है। स्वप्न की चर्चा प्राच्य और पाश्चात्य दोनों साहित्यों में वर्णित है। वर्धमान के गर्भ में आते ही त्रिशाला ने सुन्दर स्वप्न देखा। सिद्धार्थ यह स्वप्न सुनकर प्रफुल्लित हुए। भविष्यवक्ताओं ने बतलाया कि उनके घर में एक प्रतापी / पुरुष जन्म लेगा जिससे सारा जगत प्रकाशित होगा। ठीक नौ महीने साढ़े सात दिन के बाद त्रिशला ने एक अद्भुत एवं प्रियदर्शन शिशु को जन्म दिया।

शिशु के जन्म लेते ही कुंडग्राम में आनन्द की लहर दौड़ पड़ी। दासियों को इनाम दिये गये। घर-घर तोरण पताका फहराये जाने लगे। नगर को भलीभांति सजाया गया। इष्ट मित्रों को आमंत्रित कर सुरवाद भोजन कराया गया। राजा ने घोषणा की कि बालक के जन्म के बाद उनके घर में धन-सम्पत्ति में वृद्धि होती जा रही है। इसलिए शिशु का नाम वर्धमान रखा गया।

धीरे-धीरे वर्धमान बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रविष्ट हुए। राज-वैभव में पले वर्धमान अपने जीवन से संतुष्ट नहीं थे। वे इसे सोचकर बहुत दुःखी होते कि किसी के पास अपार सम्पत्ति है और किसी के यहां खाने के लिए दाने भी नहीं है। आखिर इस विषमता का क्या कारण है? वर्धमान कभी-कभी रो पड़ते। जब वर्धमान ने युवावस्था प्राप्त की तो उनके माता-पिता उन्हें विवाह के बंधन में जकड़ना चाहते थे।

Bhagwan Mahaveer – भगवान महावीर

राजकुमार अत्यंत ही सुन्दर नवयुवक थे जिन्हें एक बार देखने पर कोई मोहित हुए बिना नहीं रहता था। उन्होंने मन में तय कर लिया था कि वे आजीवन विवाह नहीं करेंगे, किन्तु माता त्रिशला की इच्छा के समन उन्हें झुकना पड़ा। परम सुन्दरी राजकुमारी यशोदा के साथ परिणय सूत्र में वर्धमान बंध गये।

न चाहते कुछ वर्षों तक गृहस्थाश्रम का सुख भोग किया लेकिन जिसका मन अमरत्व की खोज में हो हुए भी उसे सांसारिक बंधन कब तक रोक रखेंगे! उन्हें यशोदा से प्रियदर्शना नाम की सुपुत्री हुई जिसका विवाह उसी नगर के क्षत्रिय कुमार जामालि के साथ हो गया। वे सदा सोचते कि क्या संसार को आवागमन से छुटकारा पाने के लिए प्रवल पुरुषार्थ की जरूरत नहीं है।

वे विचार करते कि मनुष्य जन्म बड़ा दुर्लभ है, उसे पाकर यों ही बिता देना मूर्खता है। जीवन क्षणिक है। यह तो पानी के बुलबुलें और ओस कणों के सुदश है। संसार में अनेक प्राणी है जिन्हें अपने कर्तव्य का ज्ञान नहीं है। ये दूसरों की हिंसा और निन्दा करने में अपना बहुमूल्य समय बिता देते हैं। अपनी मुक्ति की चिंता नहीं करते। प्राणी की सेवा के संबंध में नहीं सोचते।

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इनका हित करने और इनको सन्मार्ग दिखाने के लिए अनवरत पुरुषार्थ की, अटूट धैर्य की और अपने को अधिक से अधिक योग्य बनाने को आवश्यकता है। वर्धमान समुचित दीक्षा प्राप्त कर तपश्चर्या के लिए प्रयास करना चाहते थे। माता-पिता के जीवनकाल में गृह न त्यागने की प्रतिज्ञा को निभाया। 28 वर्ष की अवस्था में उनके माता-पिता का निधन हो गया।

उन्होंने बड़े भाई नदिवर्धन से दीक्षा प्राप्त करने की आज्ञा मांगी पर उन्होंने उन्हें समझाया कि यह बहुत कठिन कार्य है। सभी इस कठोर पथ का अनुसरण नहीं कर सकते। किसी तरह वर्धमान एक वर्ष तक घर में रहे। जब 29 वर्ष के हुए तो उन्होंने दृढ़ संकल्प किया कि वे अब एक क्षण भी गृहस्थाश्रम में नहीं रहेंगे।

घर-द्वार, सुख-सम्पत्ति, परिवार सब कुछ छोड़कर वर्धमान पालकी पर सवार हो क्षत्रिय कुंडग्राम के बाहर झातृखंड उद्यान की ओर चल पड़े। अगहन वदी 10 का शुभ दिन था। उद्यान में पहुंच वर्धमान जयविजय की घोषणा के बीच पालकी से उतरे शरीर के सारे बहुमूल्य वस्त्र आभूषण उतार डाले। पंच मुष्टि से अपने केशों का लोंच किया। कुल वृद्धा एवं अन्य स्त्रियों ने जाते समय कहा :

“बेटा! प्रयत्नपूर्वक संयम को पालना, अपने व्रत और नियमों में अडिग रहना, क्षणभर के लिए भी प्रमाद नहीं करना।”

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महावीर ने कठोर तपस्या की। पहले वे कुम्भार ग्राम में गये जहां ध्यानस्थ हो गये। एक ग्वाला अपने बैलों को उन्हीं की देख-रेख में छोड़कर चला गया। आने पर वहां बैल न देखा। उसे बड़ा कोथ हुआ। आस-पास में बैल चर रहे थे, वह उन्हें मारने के लिए दौड़ा, सोचा कि वह उन्हीं का काम है। वहां से वे मोराग सन्निवेश गये जहां तापसकुलपति का आश्रम था। वे वहां रहने लगे।

उनकी झोपड़ी सूखी घास की बनी थी घास के अभाव में गाय उनके झोपड़ी की घास खाने लगी। महावीर के इस आचरण पर तापस कुलपति को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने उन्हें फटकारा कि वे अपने घर की रक्षा भी नहीं कर सकते। घूमते-घूगते महावीर अट्ठियाग्राम पहुंचे। यहां महावीर को अनेक कष्ट उठाने पड़े।

अन्त में 12 वर्षों की कठिन तपश्चर्या के उपरांत ऋतुकला नदी के तटवती जम्मक गांव में महावीर को ज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान प्राप्त कर महावीर चुपचाप बैठे नहीं। उन्होंने चारों तरफ अपनी शिक्षा का प्रचार किया। अहिंसा, सत्य, शान्ति, अपरिग्रह आदि का संदेश देते। उन्होंने बिहार के अलावा दूसरे क्षेत्रों का भी भ्रमण किया।

अनेक लोगों ने उनसे दीक्षा ग्रहण की। हजारों ने अपना जीवन सुधारा 72 वर्ष की अवस्था, कार्तिक मास की अमावस्या, दीपावली के दिन उन्हें पावापुरी में निर्वाण प्राप्त हुआ। राजगीर और पावापुरी में बहुत से सुन्दर आश्रम बने हुए हैं। राजगीर का विश्वस्तूप बहुत ही आकर्षक बनाया गया है।

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उपदेश : भगवान महावीर का कठोर तपस्या का लक्ष्य केवल अपनी मुक्ति नहीं बल्कि सारे जगत का कल्याण करना था। रामकृष्ण परमहंस देव कहा करते थे कि सच्चे तपस्वी इंजन के समान होते हैं जो अपने सहित डिब्बों और उसमें बैठे लोगों को ढोते हैं। संत भी अपनी मुक्ति का लक्ष्य जनसेवा ही मानते हैं। महात्मा महावीर सभी जीवों की निष्काम भाव से सेवा करने का उपदेश देते। आज का जगत सेवा में नहीं, बल्कि उत्पीड़न में अधिक विश्वास रखता है।

येन केन प्रकारेण, दूसरों की सम्पत्ति और दूसरों की स्त्री के अपहरण में अधिक अभिरुचि लेता है। प्राचीन ऋषियों की तरह महावीर भी दूसरे की सम्पत्ति से विमुख रहने और परस्त्री को माता समझने की शिक्षा देते हैं। वही व्यक्ति ज्ञानी है जो आत्मतत्व का सब जीवों में दर्शन करता  है I भगवान महावीर जाति वर्ग में विश्वास नहीं करते थे। सबका समभाव से कल्याण हो यही उनकी साधना का लक्ष्य था। महर्षि वेदव्यास की तरह परोपकार को ही पुण्य एवं परपीड़न को पाप समझते थे।

जगदीशचन्द्र जैन ने लिखा है भगवान महावीर ने अपने जीवन द्वारा सिद्ध करके बताया कि दूसरों का शोषण कर दूसरों की धन-सम्पत्ति पर नजर रख और दूसरों को हीन समझकर यशस्वी बनने की अभिलाषाएं कभी तृप्त नहीं होतीं। इसके लिए तो न्याय और नीति का अवलम्बन लेते हुए कठोर अनुशासन की आवश्यकता है।”

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अहिंसा : हर धर्म का सार अहिंसा बतलाया गया है। महाराज मनु ने लिखा है कि धर्म के दस लक्षणों में अहिंसा ही सबसे प्रमुख है। यह चिरंतन सत्य है कि अहिंसा समाज के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। भगवान महावीर ने इसी अहिंसा को व्यापक स्वरूप प्रदान किया है अपने जीवन में उतारा है और लोगों को भी उतारने की शिक्षा दी है। महात्मा गांधी ने राजनीति में अहिंसा का प्रयोग कर अंग्रेजों के विशाल साम्राज्य को भारत से उखाड़ फेंका।

अहिंसा के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए आचरण सूत्र में कहा है: “सबको अपना-अपना जीवन प्रिय है। सब सुख चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता, वय कोई नहीं चाहता, सबको जीवन प्यारा है और सब कोई जीने की इच्छा रखते हैं। ” दूसरे के दुख-सुख को अपना समझना, दूसरे के हानि-लाभ को अपनी क्षति या लाभ समझना ही संक्षेप में अहिंसा की आधारशिला है।

हमें अगर गाली पसंद नहीं है तो दूसरे भी इसे नापसंद ही करेंगे। इस भावना को आत्मसात करने वाला पुरुष ही अहिंसक हो सकता है। जैन धर्म ग्रन्थ मानते हैं कि अहिंसा के साथ-साथ तप और संयम भी जरूरी है। संक्षेप में संयम का अर्थ अपनी इन्द्रियों को वश में करना है। संयम के बिना अहिंसा का पालन नहीं हो सकता। हमें अपनी वाणी पर संयम रखना होगा।

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सामान्य जीवन में भी संयम की आवश्यकता सभी मानते हैं। तप का अर्थ समस्त सुख-सुविधाओं का त्याग करना एवं ऐशो-आराम की जिन्दगी को छोड़ना है। तप का अर्थ लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कठिन व्रतों को करना है लेकिन इसका अर्थ कभी भी हठधर्मिता को अपनाकर शरीर को नष्ट करना नहीं है।

भगवान महावीर के तप का लक्ष्य शुष्क देह-दमन नहीं था, लौकिक यश अथवा कीर्ति लाभ के लिए भी उन्होंने तप का मार्ग नहीं अपनाया। उनकी शारीरिक कठोर साधना का एकमात्र उद्देश्य था अपनी काया को आरामतलब नहीं बनाना। संक्षेप में महावीर का अहिंसा का उपदेश मनसा-वाचा- कर्मणा किसी को कष्ट नहीं पहुंचाना है। अहिंसा का अर्थ है अनन्त प्रेम और उसका भावार्थ कष्ट सहने की अनन्त शक्ति अहिंसा परमोत्कृष्ट धर्म है।

जैसे नदियां समुद्र में मिलकर विलीन हो जाती है उसी प्रकार सारे धर्म अहिंसा में समाहित हो जाते हैं। एक स्थल पर महावीर ने कहा है “किसी को मत मारो मत सताओ, पीड़ा मत दो, हुकूमत मत करो, बलात् किसी को अपने अधीन मत करो। जिसे तू मारना चाहता है वह तू स्वयं ही है, अर्थात् उसकी और तेरी आत्मा एक-सी है। “

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अपरिग्रह : भगवान महावीर अपरिग्रह को धर्म का प्रधान लक्षण मानते थे। महाराज मनु ने अपरिग्रह को अपनाने की शिक्षा दी है। अपरिग्रह का अर्थ संचय करने की प्रवृत्ति है जो सभी दुःखों का कारण है। जो सुख-दुःख से मुक्त होना चाहता है उसके लिए अपरिग्रह आवश्यक है। संग्रह की भावना व्यक्ति को अधःपतन की ओर ले जाती है। वह सम्पत्ति के संग्रह के लिए तरह-तरह का कुकर्म करता है।

इच्छायें अनन्त है, उसकी पूर्ति कोई नहीं कर सकता। इसलिए यदि हम सच्चा सुख चाहते हैं तो अपरिग्रह को अपनाना ही होगा। अपरिग्रह का वास्तविक अर्थ केवल वस्त्र आदि का त्याग कर देना ही नहीं, इसका अर्थ है ममत्व का त्याग। जिस वस्तु की कम से कम मात्रा में जितनी आवश्यकता है उतनी ही ग्रहण करना अपरिग्रह है। समस्त संघर्ष का कारण संचय की प्रवृत्ति है।

अनेकान्तवाद : अनेकान्तवाद का लगाव अहिंसा से है। यह उसका बौद्धिक रूप माना जाता है। यथा, अहिंसक वृत्ति- अप्रमाद भाव-पालने के लिए अपरिग्रह- ममत्व बुद्धि का त्याग की आवश्यकता है। उसी प्रकार अहिंसा को स्थायित्व प्रदान करने के लिए अनेकान्तवाद की जरूरत है। जामालि की शंका का समाधान करते हुए भगवती सूत्र में महावीर भगवान ने जीव और लोक को किसी अपेक्षा से शाश्वत और किसी अपेक्षा से अशाश्वत कहा है।

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अनेकान्तवाद का अर्थ है एकांत दृष्टि का त्याग-बौद्धिक सहिष्णुता मानसिक अहिंसा । मतलब यह है कि केवल अहिंसक भावना से अप्रमाद भावना से वर्णन करना ही काफी नहीं, इस भावना को बुद्धिसंगत बनाने की आवश्यकता है। इस भावना को समझने के लिए यह जरूरी है कि हम अपने पूर्वाग्रहों और हठधर्मिताओं का परित्याग करें। दूसरे के विचारों, सिद्धांतो एवं आदर्शों को भी समझने की चेष्टा करें। तात्पर्य यह है कि हम दूसरों के प्रति कठोर नहीं सहिष्णु बनें।

कर्म सिद्धांत : भगवद्गीता की तरह भगवान महावीर भी मानते हैं कि कर्म ही प्रधान होता है। अपने अच्छे कर्मों का फल अच्छा और बुरे कर्मों का फल बुरा सबको भोगना ही पड़ता है। सामान्यतः लोग कहते हैं कि जैसी करनी वैसी भरनी। “बोये पेड़ बबूल का, आम कहां से होय”। मतलब यह है कि बुरा कार्य करने से उसका फल कभी अच्छा नहीं होता।

भगवान महावीर का कहना है कि मनुष्य अपने ही कर्म से, अपने ही पुरुषार्थ से सब कुछ कर सकता है, उच्चतम पद पा सकता है। कर्म सिद्धांत परावलंबन की भावना का निराकरण कर हमें पुरुषार्थी बनने के लिए प्रेरित करता है। महावीर के धर्म में कर्म पर ही जोर दिया गया है, जाति पर नहीं चाण्डाल कुल में उत्पन्न व्यक्ति भी उच्चतम सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

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इस संबंध में विजय घोष ब्राह्मण और जयघोष मुनि का प्रसंग उल्लेखनीय है। जयघोष ने कहा–“जिसने राग, द्वेष और भय पर विजय पायी है, जो सदाचारी, तपस्वी और जितेन्द्रिय है, हिंसा नहीं करता, असत्य भाषण नहीं करता, बिना दी वस्तु को दूसरों की समझकर ग्रहण नहीं करता, काम-भोगों में लिप्त नहीं रहता, वही ब्राह्मण है।

सिर मुंडा लेने या यज्ञोपवीत धारण करने से ही कोई ब्राह्मण नहीं कहला सकता। वह मुनि नहीं है, जो वन वास करे और केवल कुश धारण करने से कोई तपस्वी भी नहीं हो सकता।” संक्षेप में मनुष्य अपने कर्म से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कहलाता है। भगवान महावीर का अमर संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक हैं जितना ढाई हजार साल पहले था।

आज समाज में जहां देखिये असत्यता, मिथ्याचारिता, लोलुपता, हठधर्मिता का साम्राज्य है। एक राष्ट्र दूसरे पर अपने वर्चस्व की स्थापना के लिए संघर्षरत है। एक जाति दूसरी जाति को समाप्त करने का प्रयास कर रही है, कोई किसी पर विश्वास नहीं कर रहा है। एक-दूसरे को लोग शंका की दृष्टि से देखते हैं। वहां केवल भगवान महावीर के उपदेश से ही समाज में मैत्री और विश्ववन्धुत्व की स्थापना की जा सकती है।

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