Bhagwan Das – डॉ भगवान दास

Bhagwan-Das
                                                               Bhagwan Das

 

जन्म एवं प्रारंभिक जीवन – डॉ. भगवानदास ने एक ऐसे कुल में जन्म लिया जो अंग्रेज़ी राज और उसके विरोध के बीच की कड़ी था। यह ठीक है कि उस समय उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी का साथ व्यापार के रूप में दिया था, परन्तु भारतीयता को कभी भी न छोड़ा था। वस्तुतः यह परिवार अंग्रेज़ों के सम्पर्क में अपनी सत्यनिष्ठा, व्यापारकुशलता और चातुर्य के कारण आया था।

Bhagwan Das – डॉ भगवान दास

डॉ. भगवान दास का जन्म 12 जनवरी, 1869 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम साह माधव दास था। वे वाराणसी के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और धनी व्यक्तियों में गिने जाते थे। धन और प्रतिष्ठा से डॉ. भगवान दास का संबंध उनके पूर्वजों के समय से ही था। कहा जाता है कि डॉ. भगवान दास के पूर्वज बड़े ही दानी और देशभक्त थे। इन सभी गुणों के साथ साथ वह कुशल व्यापारी भी थे।

व्यापारी परंपरा – कहते हैं किसी समय, जब भारत में यातायात के पूर्ण साधन भी नहीं थे, भारत भर में इनके व्यापार की पचास के लगभग शाखाएं थीं। यह अध्यवसाय और सूझ-बूझ का ही काम था। इनकी व्यापारिक संस्था की साख इतनी थी कि इनके पर्चे को देखकर ही भुगतान कर दिया जाता था। इनकी हुण्डियां सारे भारत में चलती थीं। डॉ. भगवानदास के पूर्वजों में साह मनोहर दास थे।

उन्होंने बहुत नाम और रूपया-पैसा कमाया, पर दान में तथा पुण्य कार्यों में खर्च भी दिल खोल कर किया। कहते हैं अंग्रेज़ों ने टीपू सुलतान को दवाने के लिए जो फौज भेजी थी, उसकी पूरी रसद का ठेका इन्हीं के पास था। इससे जो रुपया मिला उन्होंने कलकत्ता में सैकड़ों बीघा जमीन खरीदी और उसे गौओं की चरागाह के लिए दान दे दिया। उसमें उनके लिए पानी पीने का तालाब भी बनवाया।

Bhagwan Das – डॉ भगवान दास

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वह बहुत दूर की सोचते थे और यह भी जानते थे कि लक्ष्मी का स्वभाव चंचल है, इसलिए उन्होंने सोचा कि धन का उपयोग इस रूप में किया जाये कि आने वाली पीढ़ी को भी धनाभाव का कभी कष्ट न हो। यह सोच कर उन्होंने कलकत्ता में और जगह खरीदी और वहां एक विशाल कटरा बनवाया। यह स्थान बड़ा बाज़ार में है। उनके परिवार की मुख्य आय का साधन आज भी यह कटरा ही है।

वहीं से ढाई-तीन सौ वर्ष पहले यह परिवार वाराणसी आया। तभी यह परिवार वाराणसी का सभ्य सुसंस्कृत और घनी-मानी परिवार माना जाने लगा। वैसे हमारे देश भारत में यह कहा जाता है कि लक्ष्मी और सरस्वती का वास अलग-अलग होता है, परन्तु यह परिवार तो सदा से ही इस बात का अपवाद रहा। इसके साथ ही एक आम धारणा यह है कि दार्शनिक लोग बड़े लापरवाह होते हैं और घर तथा औरतों से कैसे व्यवहार किया जाता है, यह जानते ही नहीं।

परन्तु डॉ. भगवानदास ने दोनों धारणाओं को गलत सिद्ध किया । वह अपने पर, परिवार तथा अन्य आत्मीय जनों के साथ समाज के प्रति सदैव सजग रहे और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरी तरह निभाया। वह पर का पूरा ध्यान रखते अपनी वेशभूषा और नियमों के प्रति अन्त तक सजग रहे और राष्ट्रहित के सामने अपने हित को त्याग दिया। वह श्री सरस्वती और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य पालन के लिए सदैव जागरूक रहते थे।

Bhagwan Das – डॉ भगवान दास

बनारस (पुराना नाम वाराणसी) जो हिन्दू धर्म का पवित्र तीर्थ माने जाने के कारण प्रसिद्ध है, वहां डॉ. भगवानदास के परिवार ने अपने नाम को और भी रौशन किया किसी समय तो यह परिवार और बनारस एक दूसरे के पूरक प्रतीक बन गये थे। इनके पिता साह माधवदास बनारस के बड़े प्रभावशाली व्यक्ति थे। उस समय धीरे-धीरे अंग्रेजियत और अंग्रेजी पढ़ाई, शिक्षा-दीक्षा यहां पांव जमाने लगी थी।

शिक्षा – माधवदास के चार बेटे थे-गोविन्द दास, भगवानदास, रामाचरण और सीताराम इनमें भगवानदास ही अधिक मेघावी और प्रतिभाशाली थे। इनका जन्म 12 फरवरी, 1869 में हुआ। माधवदास जी ने अपने चारों पुत्रों को उच्च शिक्षा दिलवाई। डॉ. भगवानदास की आरम्भिक तथा बी. ए. तक की शिक्षा वाराणसी में हुई। एण्ट्रेन्स परीक्षा 12 वर्ष की आयु में पास की और उसके बाद वहीं के क्वीन्स कॉलिज से बी. ए. अंग्रेज़ी, मनोविज्ञान, दर्शन और संस्कृत लेकर पास की।

एम. ए. के लिए कलकत्ता जाना पड़ा क्योंकि इलाहाबाद में तब विश्वविद्यालय नहीं था एम. ए. दर्शन में किया। इसके अतिरिक्त उनमें अन्य भाषाएं तथा अन्य नवीन विषय पढ़ने की रुचि थी। संस्कृत, उर्दू और फारसी के ग्रन्थ भी पढ़ते थे। उनमें आरम्भ से ही चिन्तन और अध्ययन के प्रति अथाह रुचि थी, इसीलिए 23 वर्ष की आयु में ही ‘साइंस ऑफ पीस’ तथा ‘साइंस ऑफ इमोशन्स’ नामक ग्रन्थों की रचना की।

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उस संयम उच्च शिक्षा प्राप्त युवकों के लिए अच्छी नौकरी पाना कुछ भी कठिन न था और भगवानदास जी के लिए तो और भी सरल था, क्योंकि एक तो उच्च शिक्षा, दूसरे प्रभावशाली परिवार। परन्तु उन्हें सरकारी नौकरी रुचिकर प्रतीत नहीं होती थी, जबकि पिता चाहते थे कि बेटा किसी उच्च सरकारी पद को संभाले। इसीलिए उन्होंने डिप्टी कलक्टरी की नौकरी की और लगभग आठ साल इस पद पर रहे। परन्तु पिताजी के देहावसान के बाद नौकरी छोड़ दी।

हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना – इस समय देश एक नई जागृति की करवट ले रहा था और श्रीमती ऐनी बेसेन्ट ने एक नई चेतना का संचार किया था देश उनसे प्रभावित था देश के अन्य व्यक्ति भी यह अनुभव करने लगे थे कि देश की संस्कृति, भाषा, इतिहास के साथ देश की आम जनता में स्वाभिमान की भावना भरना ज़रूरी है। वह इसके लिए सरकार के प्रभाव से मुक्त शिक्षण संस्थाएं खोलना चाहते थे।

डॉ. एनी बेसेन्ट वाराणसी में हिन्दू कॉलिज स्थापित करना चाहती थीं, इस काम में उनका साथ दिया डॉ. भगवानदास ने इस काम के लिए वे सरकार से एक पैसा भी सहायता न लेना चाहते थे, इसालेए संस्था के सेक्रेटरी के रूप में धन संग्रह के लिए उन्होंने सारे भारत का दौरा किया। सैण्ट्रल हिन्दू कॉलिज की स्थापना हो गई।

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यह सही ढंग से चलने लगा, परन्तु जब महामना पं. मदन मोहन मालवीय जी ने बनारस में हिन्दू विश्वविद्यालय स्थापित करने की सोची तो डॉ. भगवानदास ने उनका साथ दिया और बना बनाया कॉलिज उससे सम्बद्ध करने को तैयार हो गए।

यह ठीक है कि एक व्यक्ति जिस चीज का निर्माण करता है तो उससे उसे लगाव और प्रेम भी हो जाता है, परन्तु डॉ. भगवानदास ने देश के व्यापक हित को ध्यान में रख महामना का साथ देने का निश्चय कर लिया और अपने आपको गौण कर लिया। यह उनकी विशेषता और दूरदर्शिता थी। उसके बाद तो वह वर्षों उससे सम्बद्ध रहे। आगे चलकर काशी और इलाहाबाद के विश्वविद्यालयों ने उन्हें डॉक्टर की मानद उपाधियों से विभूषित किया।

क्रांति के पथ पर – डॉ. भगवानदास केवल शिक्षा शास्त्री ही नहीं थे, वह सच्चे देशभक्त भी थे। 1921 के तूफानी सविनय अवज्ञा आन्दोलन में वह भी जेल गये। थोड़े दिन बाद उन्हें उनके प्रभाव, सम्मान और पारिवारिक ख्याति के कारण जेल से मुक्त कर दिया गया, परन्तु वह इसे रियायत ही समझते थे। इसलिए उन्होंने शेष दिन घर में ही एकान्त में रहकर जेल की तरह ही बिताए।

1921 में गांधी जी ने सरकार से पूर्ण असहयोग का नारा दिया था। उस समय छात्रों ने स्कूल-कॉलिज छोड़ दिये थे, परन्तु गांधी जी चाहते थे कि जिन छात्रों ने सरकारी शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार किया है उनके लिए राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की जाये। उस समय वाराणसी में ही काशी विद्यापीठ की स्थापना हुई और डॉ. भगवानदास इसके मुख्य संस्थापकों में से ही नहीं, इसके प्रथम कुलपति भी बने।

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भगवानदास जी ने ही लाल बहादुर जी तथा उनके अन्य साथियों को प्रेरणा दी थी कि पहले इस संस्था में शिक्षा समाप्त कर लें फिर राजनीति के व्यापक क्षेत्र में कूदें। शास्त्री जी ने ऐसा ही किया उस समय इन उत्साही युवकों का मार्गदर्शन करना बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य था। अन्यथा अनेक युवक भटक जाते और आगे चलकर देश के लिए इतने उपयोगी सिद्ध न होते जैसे वे वस्तुतः सिद्ध हुए।

इससे प्रकट होता है कि वह कांग्रेसी दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत ही नहीं, उसे क्रियात्मक रूप से अमल में भी लाने के लिए प्रयत्नशीत भी थे। वह समय-समय पर कांग्रेस के आन्दोलनों में भाग लेते रहे। 1922 में जब कांग्रेस ने म्युनिसिपल कमेटियों के चुनाव लड़ने का निश्चय किया तो वाराणसी में कांग्रेस को भारी बहुमत मिला। डॉ. भगवानदास म्युनिसिपैलिटी के अध्यक्ष चुने गये।

कांग्रेस द्वारा किसी भी प्रकार के प्रशासन का यह प्रथम प्रयोग था वह अन्य अनेक सभा-सोसाइटियों से सदा ही सम्बद्ध रहे। वाराणसी में शहर की सफाई तथा अन्य सुधार कार्यों के लिए उन्होंने अनेक यत्न किये। हिन्दी साहित्य सम्मेलन की तो वह आरम्भ से ही सहायता करते रहते थे और उसके अध्यक्ष भी रहे। 1935 में वह केन्द्रीय विधानसभा के लिए भी चुन लिये गये थे। इन बातों से स्पष्ट है कि वह अपनी ही दुनिया में खोये रहने वाले दार्शनिक न थे।

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वह बाह्य जगत् के प्रति भी जागरूक थे और उसके प्रति अपने कर्तव्यों की पूर्ति भी करते थे। यह बात सच है कि महानता चमत्कार नहीं, चमत्कार तो यह है कि महान् होते हुए भी मनुष्य अपने कर्तव्य कैसे निभाता है। डॉ. राधाकृष्णन ने ठीक ही कहा है कि मुक्त आकाश में ऊंधी उड़ान भरो, पर अपने पांव बड़ी मज़बूती से पृथ्वी पर टिकाये रखो।

रहनसहन – डॉ. भगवानदास दार्शनिक, विद्वान्, समाजसेवी और चिन्तक रहे, परन्तु जीवन की छोटी-छोटी बातों के प्रति भी सदा सजग रहे। वह बहुत ही सादे और मितव्ययी व्यक्ति थे। उनके पास पैसे की कमी न थी, परन्तु उनका विचार था कि व्यक्ति को उतनी ही चीजें बटोरनी चाहिएं, जितनी उसके लिए नितान्त आवश्यक हो। यह एक-एक पाई का हिसाब रखते और परिवार के किसी सदस्य को अपव्यय न करने देते।

पर इसका भाव यह नहीं कि वह खर्च करते ही नहीं थे। सही ढंग से रहने, अच्छे भोजन और नये ढंग के कपड़ों का उन्हें बेहद शौक था परन्तु अंकुश उस पर भी था। बुढ़ापे में भी उनके कपड़ों में शिकन नहीं आई पर यह परिधान विशुद्ध भारतीय ढंग के होते थे। अपनी लम्बी दादी और विशुद्ध भारतीय वैशभूषा में वह एक महर्षि से प्रतीत होते थे।

Bhagwan Das – डॉ भगवान दास

भव्यता और शालीनता उन्हें घेरे रहती थी। यह कभी भी सामाजिक, नैतिक और बौद्धिक स्तर से नहीं गिरे। यह अन्तिम क्षणों तक नित्य नियमों का पालन करते रहे। सदा व्यायाम करते और नियमित जीवन के कारण कभी भी बूढे प्रतीत नहीं हुए। यह नध्ये वर्ष तक जीये पर सदा युवकों के समान सीधी कमर और उन्नत मस्तक करके चलते थे। सुव्यवस्था और नियमितता उनके जीवन का मानदण्ड ही बन गये थे।

अपने पुत्र श्री श्रीप्रकाश जी पर उनकी पूरी छाप थी। इसी कारण वह भारतीय राजनीति में अपना एक महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट स्यान बना पाये। डॉ. भगवानदास के जीवन में कोई असंतोष और अभिलाषा न थी जिससे वह चिन्तित रहते। इसीलिए वह अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में व्यस्त सार्वजनिक जीवन से अलग हो गये थे उनका यह जीवन वानप्रस्थी के समान बीता और सारा समय चिन्तन, मनन और अध्ययन में ही विताया।

वह भारतीय दर्शन के प्रकाण्ड पण्डित माने जाते थे। मनुस्मृति के तो वह आचार्य ही थे। डॉ. राधाकृष्णन और गांधी जी की तरह वह सभी धर्मों की बुनियादी एकता में विश्वास रखते थे। विश्व शान्ति के लिए वह यह आवश्यक समझते थे कि विश्व व्यवस्था का आधार सभी धर्मों के मूल तत्व ही हो सकते हैं। अन्य शब्दों में वह एक विश्व और एक विश्व सरकार के हामी थे।

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मृत्यु – उनके विश्वास बड़े पुष्ट और दृढ़ थे, परन्तु उन्हें फटूट्टरपंथी नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह तो प्राचीन और अवांचीन का समन्वय चाहते थे। 1955 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने, जब वह राष्ट्रपति थे, डॉ. भगवानदास को उनकी महिमा और गरिमा के अनुरूप ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया। लगभग 90 वर्ष की आयु में 18 सितम्बर, 1958 में उनका देहावसान हो गया।

जो महानता उन्हें विरासत में मिली थी, उसे उन्होंने बरकरार ही नहीं रखा, उसे और भी गरिमा प्रदान की और अनन्त महत् में विलीन हो गये।

Chhava

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