Bhagat Singh – भगत सिंह

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“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही आखिर निशां होगा।”

अमर शहीद सरदार भगतसिंह पंजाब के उन शूरवीरो में से एक हैं, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता- वेदी पर प्राणों की आहुति दी। उन्होंने अपनी भारतमाता को स्वतंत्र करवाने के लिए जो निर्भयतापूर्वक बलिदान दिया, उसका परिणाम यह हुआ कि तत्कालीन नवयुवकों में एक नवीन चेतना, स्फूर्ति एवं उत्साह भर गया। अपने असीम देश-प्रेम एवं बलिदान से उन्होंने अपने समकालीन भारतीय नव युवकों के समक्ष अतीव निराशा को तिलांजलि देकर राष्ट्र-सम्मान का मार्ग प्रशस्त किया।

Bhagat Singh – भगत सिंह

जन्म – राष्ट्रवीर सरदार भगत सिंह का जन्म जिला लायलपुर के बंगा गांव में 27 सितंबर सन् 1907 ई. को हुआ। उन्होंने जिस परिवार में जन्म लिया उनके लिए देशभक्ति या देश के लिए बलिदान करना कोई नई बात नहीं थी। एक ऐसे स्वतंत्रता संग्रामी परिवार में उनका जन्म हुआ था जिसने योद्धाओ का एक नक्षत्र मंडल ही उत्पन्न किया था। उनके दादा सरदार अर्जुनसिंह प्रथम स्वतंत्रता युद्ध के प्रेरक स्वामी दयानंद जी से दीक्षित होकर भारतमाता की स्वतंत्रता हेतु स्वतंत्र विचारों से पोषित होने लगे।

उनके पिता सरदार किशन सिंह एक क्रांतिकारी, ‘भारतमाता सोसाइटी’ के कार्यकर्ता थे और कई बार जेल गए थे। भगतसिंह के जन्म के समय वे भूमि सुधार आंदोलन के संबंध मे सेंट्रल जेल से छूटकर वापिस आए उनके चाचा सरदार अजीतसिंह अपने समय के एक बहुत बड़े क्रांतिकारी स्वतंत्रता संग्रामी थे। उनके भी जेल से छूटने का तभी समाचार आया था। इन्हीं कारणो से भगतसिंह की दादी ने उनको भागो वाला कहा, जिससे उनका नाम भगतसिंह पड़ा।

ऐसे क्रांतिकारी पारिवारिक वातावरण में स्वाभाविक ही था कि भगतसिंह बचपन से ही देश प्रेम की भावनाओं से ओतप्रोत हो जाते। बाल्यावस्था से ही उनका पूरा वातावरण उस महान बलिदान के लिए तैयार कर रहा था जिसका उदाहरण इतिहास में कम ही उपलब्ध होता है। सरदार भगतसिंह का झुकाव लडकपन से ही उछल-कूद तथा सामरिक क्रीड़ाओ की ओर था। उन्हें तलवार बंदूक से बड़ा प्रेम था।

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प्रारंभिक शिक्षा – भगतसिंह की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही एक स्थानीय स्कूल में हुई। गांव के स्कूल की पाचवी कक्षा उत्तीर्ण करके भगतसिंह ने 1916-17 ई. मे डी. ए. वी स्कूल लाहौर में प्रवेश लिया। इसी समय उनका संपर्क भारत के बहुचर्चित राजनैतिक नेता श्री नंदकिशोर मेहता, लाला पिंडीदास, सूफी अंबाप्रसाद तथा लाला लाजपतराय से हो गया।

सरदार भगतसिंह जिस युग में विद्यार्थी जीवन व्यतीत कर रहे थे, उस समय पंजाब गदर पार्टी के वीरों एवं शहीदों की गाथाओं से गूज रहा था। गदर पार्टी के वीरो मे शहीद करतारसिंह सराभा ने भगतसिंह को सर्वाधिक प्रभावित किया। लाहौर षड्यंत्र केस की खोज के लिए उनका हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लेना देशस्वातंत्र्य के लिए एक अनुपम बलिदान था। नौ वर्षीय भगतसिंह के मन पर इस घटना का अत्यंत गहन प्रभाव पड़ा।

1919 ई. मे अमृतसर में प्रसिद्ध जालियांवाला हत्याकांड हुआ। इस कांड मे भारतीय चेतना जाग पड़ी और राष्ट्र जाग उठा। भगतसिंह की आयु उस समय केवल 12 वर्ष की थी। वह लाहौर में पढ़ रहे थे। परंतु जिसकी शिराओं मे अपनी तीन पीढ़ियों के देशभक्तों का रक्त प्रवाहित हो रहा था वह इस बात से प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकता था ? इम समाचार को सुनकर वे स्कूल न जाकर, अमृतसर जालियांवाला बाग पहुंचे।

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वहां उन्होंने देश के लिए प्राणो की आहुति देने वाले वीरों के प्रति सत्कार भावना प्रकट की। वह श्रद्धा से नत मस्तक हो गए। उनकी आंखें आसुओं से भर गई। किंतु वे आंसू बह न सके। रक्तरंजित धरती गूंजी और बार-बार गूंज उठी। संभवतः उसका अभिप्राय था कि भगतसिंह अपने प्राणों की बलि दे। बालक भगतसिंह ने खून से रंगी धरती से धूलि उठाई और माथे पर टिका किया। उन्होंने देश के लिए बलिदान की शपथ ली।

वह एक शीशी में शहीदों की मुट्ठी भर पवित्र राख लेकर घर लौटे। तब तक बालक भगतसिंह में पर्याप्त परिवर्तन हो चुका था। घर आए तो उनकी बड़ी बहन ने उनको उनके हिस्से का फल खाने को कहा। किंतु उन्होंने इस बात पर ध्यान तक नहीं दिया और खिन्न, उदास मन से राख भरी हुई शीशी अपनी बहन को दिखायी तथा कहा -“देखो अंग्रेजों ने हमारे सैंकड़ों आदमी मार डाले हैं।” यह रक्तरंजित धूलि सदैव उन्हें प्रेरणा देती रहती और स्मरण दिलाती रहती थी कि उन्होंने अंग्रेजों द्वारा किए गए भारतीयों के प्रति अपमान का प्रतिकार लेना है।

आंदोलनों में हिस्सा – 1920 ई. में गांधी जी ने जब असहयोग आंदोलन चलाया तो भगतसिंह नवी कक्षा के छात्र थे । वे स्कूल छोड़ आंदोलन में कूद पड़े। परंतु 1922 ई. में गांधी जी ने सत्याग्रह स्थगित कर दिया। अचानक आंदोलन के स्थगित होने से वे बड़े बेचैन हुए। उनका मानना था की केवल एक हिंसा की घटना से पुरे देश का जोश दबा देना उचित नहीं था I

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इसी समय पंजाब में गुरुद्वारा आंदोलन चल रहा था। भगत सिंह भी इस आंदोलन में कूद पड़े। उनके पूर्वज सिख होते हुए भी आर्यसमाजी विचारों से प्रभावित थे | गुरुद्वारा आंदोलन में भाग लेने के लिए उन्होंने केश रख लिए, पगड़ी और कृपाण भी बाधने लगे।

शीघ्र ही वे लाला लाजपतराय द्वारा स्थापित और काशी विद्यापीठ से संबद्ध नेशनल कॉलेज में भर्ती हो गए। उनके हृदय में क्रांति की ज्वाला धधक रही थी। इस कॉलेज में सामान्य विषयों के अतिरिक्त देशभक्ति, राष्ट्रवाद तथा ऐसे कई अन्य विषयों पर भाई परमानंद, लाला लाजपतराय आदि राष्ट्रीय नेताओं के भाषण होते थे। इससे नवयुवकों को देश स्वतंत्र कराने के लिए प्रेरणा मिलती थी।

यही पर भगतसिंह, भगवतीचरण, सुखदेव, यशपाल आदि क्रांति कारियों के संपर्क में आए। इतिहास के प्रोफेसर जयचंद्र विद्यालंकार से भगतसिंह विशेष प्रभावित हुए थे। एक प्रकार से वे उनके राजनीतिक गुरु बन गए थे। विद्यालंकार जी का उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों से प्रत्यक्ष संपर्क था। वे उनके संबंध में इन्हें जानकारी देते रहते थे। कॉलेज-जीवन के समय भगतसिंह को राजनीति और पढ़ाई में रुचि होने के साथ-साथ देशभक्ति के गीत गाने, जोशीले नाटक रचने मे अत्यधिक रुचि थी।

वे नेशनल नाटक क्लब के क्रियाशील सदस्य थे और अभिनय किया करते थे। इन नाटकों को खेलने का उद्देश्य लोगों में राष्ट्रीय भावनाये उद्दीप्त करना तथा उन्हें विदेशी शासकों के विरुद्ध आवाज बुलंद करने के लिए प्रेरित करना था। इसलिए सरकार ने इस क्लब पर प्रतिबंध लगा दिया।

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इसी समय उनके पिता के मित्र श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल ने उन्हें प्रभावित किया। उन्होंने भगतसिंह को क्रांतिकारी बनने को प्रेरित किया। सान्याल का तर्क था – “अहिंसा अंग्रेजों को खदेड़कर भगा नही सकती। तुम्हें गुप्तदल मे शामिल होना चाहिए, हथियार इकट्ठे करने चाहिए और आतंक उत्पन्न करने वाले अंग्रेजों को मौत के घाट उतारना चाहिए। भारतीय सेना को अपनी ओर करना चाहिए और देश में क्रांति उत्पन्न करनी चाहिए।”

विवाह से इन्कार – यद्यपि भगतसिंह के पिता स्वयं एक क्रांतिकारी थे तथापि वे अपने पुत्र को क्रांतिकारी बनाकर उन सभी यंत्रणाओं को भोगने से बचाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने भगतसिंह को विवाह करके गृहस्थ जीवन बिताने की सलाह दी। किंतु भगतसिंह ने इसे स्पष्टतः अस्वीकार कर दिया। उसने कहा कि वह अपना सारा जीवन मातृभूमि की सेवा में लगाना चाहता है। पिता ने सभी प्रकार से भगत सिंह को इतना विवश किया कि वे पढ़ाई छोड़कर कानपुर जा पहुंचे।

उन्होंने पिता को लिखा “मैं आपके पत्र के विषय को पढ़कर आश्चर्यचकित रह गया। जब आप सरीखे देशभक्त एवं साहसी व्यक्ति ऐसी साधारण समस्याओ से हताश हो जायें तो एक साधारण व्यक्ति का क्या होगा। आप केवल दादी की चिंता कर रहे है। पर 33 करोड़ व्यक्तियो की भारतमाता कितने और कैसे दुःखो मे है। हमे उसके दुःख दूर करने के लिए सभी कुछ स्वीकार करना पडेगा। मैं जानता हूं कि यदि मैं यही रहा तो मुझे विवाह करने पर विवश किया जायेगा। इसलिए मैं किसी अन्य स्थान पर जा रहा हूं।” “विवाह का समय नही, देश मुझे बुला रहा है। मैने राष्ट्र की तन-मन से सेवा करने की सौगन्ध ली है। कृपा करके मुझे बन्धन मे मत जकड़ें बल्कि मुझे आशीर्वाद दें कि मैं अपने उद्देश्य मे सफल होऊ।”

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वह अपने मित्रों से यह कहकर जुदा हुए कि “दोस्तो, यदि मेरा विवाह गुलाम भारत में होना है तो मेरी वधू केवल मौत होगी- बारात जुलूस के रूप में होगी और बाराती देश के लिए मर मिटने वाले परवाने होंगे।”

कानपुर में भगतसिंह हिंदी ‘प्रताप’ के संपादक श्री गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। उनसे उन्होंने पत्रकारिता का प्रशिक्षण भी लिया बहुत भागदौड़ के बाद सरदार किशनसिंह अपने पुत्र भगतसिंह का पता लगाने में सफल हुए। उन दोनों के बीच मौन समझौता हुआ कि बाप बेटे को विवाह के लिए विवश नहीं करेगा और अपनी सशस्त्र कार्रवाई उसे करने देगा। इस प्रकार भगतसिंह पूर्णकालिक क्रांतिकारी बन गए।

चंद्रशेखर आजाद से भेट तथा सशस्त्र कार्यवाही कि और – दिसंबर, सन् 1927 में चार क्रांतिकारियों – रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लहरी, रोशन सिंह तथा अशफाक उल्ला खाँ को प्रसिद्ध काकोरी कांड के संबंध में फासी की सजा दे दी गयी। इस मामले में एक अन्य फरार चंद्रशेखर आजाद अपने एक दूसरे फरार सहयोगी कुंदनलाल को मार्फत भगतसिंह से मिले। तीनों ने मिलकर दल को पुनसँगठित किया। हथियार तथा रुपए-पैसे फिर से एकत्र किए जाने लगे। क्रांतिकारी तथा सशस्त्र कार्यवाही पर विचार-विमर्श गर्मजोशी के साथ होने लगा। उन्होंने बम बनाना भी सीख लिया।

साइमन कमीशन का विरोध लाला लाजपतराम के नेतृत्व में हो रहा था। 30 अक्तूबर, 1928 को यह कमीशन लाहौर पहुंचा। दो अंग्रेज पुलिस अधिकारियों, स्काट तथा सांडर्स की कमान मे पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर हमला किया। इस आक्रमण में लाला लाजपत राय पर लाठियों से प्रहार किया गया, जिसके फलस्वरूप वे घायल होकर बीमार पड़ गए और अंततः 17 नवम्बर, 1928 को उनकी मृत्यु हो गयी।

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क्रांतिकारियों ने इसका बदला लेने का निर्णय लिया। कुछ ही समय पश्चात् भगतसिंह ने अपनी पिस्तौल से सांडर्स को छलनी कर दिया। यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद को एक चुनौती थी। लाहौर का वातावरण एकाएक गरम हो गया। किंतु सरदार भगतसिंग भेस बदलकर कलकत्ता पहुंच गए। लाला लाजपतराय की हत्या का बदला लेने और तत्कालीन नौकरशाही पुलिस की आंख में धूल झोंककर बच निकलने पर वह युवकों के प्रिय नेता बन गए ।

असेम्बली मे बम फेंके – भगतसिंह दल को संगठित करने में पुनः लग गए। वे राजनीतिक गति विधियों पर भी दृष्टि रखे हुए थे। ब्रिटिश सरकार स्वतंत्रता सेनानियों और मजदूर नेताओं के विरुद्ध नए कानून बनाने की तैयारियां कर रही थी। देश में इस बिल के विरुद्ध पर्याप्त विचार प्रकट हो चुके थे। केन्द्रीय विधान सभा ने इन कानूनों को ‘काला कानून’ कहकर अस्वीकृत कर दिया था किंतु वायसराय को अपने निरंकुश विशेषाधिकारों के अंतर्गत जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा अस्वीकृत कानून को भी विधि संहिता में सम्मिलित कराने का अधिकार प्राप्त था।

8 अप्रेल, सन् 1929 को इस बिल के विषय में केन्द्रीय असेम्बली में बहस हो रही थी। ज्योंही वायसराय ने इन कानूनों को प्रमाणित किया तत्काल ही भगतसिंह और बटुकेश्वरदत्त ने केन्द्रीय हॉल में दो बम फेंके सदस्यों को लगा जैसे भूचाल आ गया हो। परंतु वे दोनों तरुण शांत चित्त से खड़े रहे। वे भाग सकते थे। बाहर एक गाड़ी उनको ले जाने के लिए खड़ी थी। परंतु वे ‘इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे।

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उन्होंने लाल पर्चे भी फेंके, जिसमे क्रांतिकारी दल के उद्देश्य छपे हुए थे- समाजवाद यानी एक वर्गहीन समाज की रचना जिसमें मनुष्य, मनुष्य का शोषण न करे। उन पर्चों पर लिखा था – “हम मानव जीवन को पवित्र समझते है, हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य मे विश्वास रखते है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शांति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके। हम इंसान का खून बहाने की अपनी विवशता पर दुःखी हैं। परंतु क्रांति द्वारा सबको समान स्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण समाप्त कर देने के लिए क्रांती में कुछ न कुछ रक्त अनिवार्य है। लेकिन मानवता को प्यार करने में हम किसी से पीछे नहीं है।”

दिल्ली के असेम्बली भवन में बम फेकने के पश्चात् सरदार भगतसिंह का नाम न केवल देश के कोने-कोने में चर्चा का विषय बन गया अपितु विदेशों में भी उनके साहस का उल्लेख हुआ और भारत के स्वाधीनता संग्राम में रुचि रखने वाले तत्त्वों ने उनके कार्य की सराहना की। अपने विरुद्ध चल रहे मुकदमे में उन्होंने कहा था कि मेरा बम फेंकने का अभिप्राय किसी व्यक्ति विशेष की हत्या करना नही था बल्कि में बहरे कानो को यह सुनाना चाहता था कि भारत की जनता क्या चाहती है ?

इस घटना के बाद पुलिस एवं गुप्तचर विभाग ने क्रांतिकारियों एवं उनके समर्थको को तेजी से धर-पकड प्रारंभ कर दी, अनेक प्रमुख क्रांतिकारी पुलिस के शिकजे में फस गए। भगतसिंह एवं उनके साथी क्रातिकारियों पर लगाए गए आरोपों की सुनवाई एवं निर्णय के लिए न्यायाधीश जी. सी. हिल्टन की अध्यक्षता में एक विशेष न्यायालय का गठन किया गया जिसने 7 अक्टूबर, सन् 1930 को भगतसिंह, राजगुरु तथा सुखदेव को फासी की सजा सुना दी। अन्य लोगों को लंबी सजाएं दी गयी। इससे सारे देश में उथल-पुथल मची।

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शहादत – जब सरदार भगतसिंह को फांसी का हुक्म हो गया और उनके सभी साथी शोकमग्न अवस्था में हो गए, उस समय एक साथी ने उनसे पूछा- “सरदार ! तुम सदा के लिए भारतमाता की कोख सूनी करके जा रहे हो, मैं जानना चाहता हू कि तुम्हे कोई अफसोस तो नही हो रहा, तुम्हारी कोई हार्दिक इच्छा तो शेष नही रह गयी ?”

भगतसिंह पहले तो खूब हसे फिर गभीर स्वर में बोले -“क्रांति के मार्ग पर कदम रखते समय मैंने सोचा था कि यदि में अपना जीवन देकर देश के कोने-कोने तक इकलाब जिंदाबाद का नारा पहुंचा सका तो मैं समझूगा कि मुझे अपने जीवन का मूल्य मिल गया; आज फासी की इस कोठरी में लोहे के सलाखों के पीछे बैठ कर भी में करोड़ों देशवासियों के कंठो से उठती हुई उस नारे की हुंकार तो सुन सकता हूं। मुझे विश्वास है कि मेरा यह नारा स्वाधीनता संग्राम के चालक शक्ति के रूप में साम्राज्यवादियों पर अंत तक प्रहार करता रहेगा।” फिर कुछ रुककर अपनी स्वाभाविक मुस्कराहट के बीच धीरे से कहा–“और इतनी छोटी जिंदगी का इससे अधिक मूल्य हो भी क्या सकता है ?” भगतसिंह ने अपने साथियों से विदा होने से पहले सदेश दिया

“मित्रो, मिलना और बिछड़ना स्थायी (अंतिम) है। हो सकता है हम फिर न मिल सकें। जब आपकी सजा पूरी हो जाये तो घर पहुंचकर सांसारिक कामो में मत उलझ जायें । जब तक आप भारत में से अंग्रेजों को निकालकर समाजवादी जनतंत्र स्थापित न कर लें, आराम से न बैठें। यह मेरा आपके लिए अंतिम संदेश है।”

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कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि अभियुक्तों की ओर से यदि वायसराय को (क्षमा याचना-पत्र) दिया जाये, तो संभव है मृत्युदंड मे परिवर्तन हो जाए। एडवोकेट प्राणनाथ मेहता को इस विषय पर भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव से वार्ता करने के लिए जेल भेजे जाने का निर्णय लिया गया। उन्होंने उनसे जेल में भेंट की और उन्हें समझाया कि उनका जीवन राष्ट्र की धरोहर है। जिस आजादी के लिए वे लड रहे हैं वह अब दूर नही, वह मिलकर रहेगी और आजादी के बाद देश का पुननिर्माण आवश्यक होगा, जो उनके बिना कठिन हो जाएगा। इस मसविदे मे तुम्हारे स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने की बात नहीं होगी।

अगले दिन एडवोकेट प्राणनाथ उक्त मसविदे की प्रति, जिसे रात्रि जागरण के पश्चात् कठोर परिश्रम से पांच व्यक्तियों ने तैयार किया था लेकर भगतसिंह से पुनः जेल मे भेंट करने गए। भगतसिंह ने मसविदा पढकर जोर से हसे। फिर उन्होंने श्री मेहता को सूचना दी कि वे अपना क्षमा याचना पत्र स्वयं लिख कर वायसराय को भिजवा चुके है। अपने पत्र की प्रतिलिपि भी उन्होंने श्री मेहता को दे दी।

भगतसिंह के इस विस्तृत एवं अद्भुत दया याचना पत्र के महत्वपूर्ण अंश इस प्रकार थे -” हमने सम्राट् जार्ज पंचम के विरुद्ध संघर्ष किया है, यह हम पर सबसे बड़ा आरोप लगाया है। जिससे स्पष्ट हो जाता है कि ब्रिटिश शासन और भारतीय जनता के बीच संघर्ष जारी है और हमने उस संघर्ष में भाग लिया है। अतः हम युद्ध-बंदी हैं…।’

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….हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध जारी है और यह लडाई तब तक जारी रहेगी जब तक शक्तिशाली लोग भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के स्रोतों पर अपना अधिकार बनाए रखेंगे। चाहे वे व्यक्ति अंग्रेज हो अथवा भारतीय।’

… बहुत संभव है कि यह संघर्ष एक भयंकर रूप ग्रहण कर ले, किंतु उस समय तक बंद नही होगा, जब तक कि समाज का वर्तमान ढांचा समाप्त नहीं हो जाता, प्रत्येक वस्तु मे क्रांति नही हो जाती, मानवी सृष्टि मे एक नवीन युग का सूत्रपात नही हो जाता।’ …..आप जिसकी लाठी उसकी भैंस का सिद्धात अपना रहे है और आप उसपर कटिवद्ध हैं। हमारे अभियोग की सुनवाई से साबित हो जाता है कि हमने अब तक कोई दया प्रार्थना नहीं की और अब भी हम आपसे कोई दया प्रार्थना नही कर रहे हैं। हम केवल यह प्रार्थना करना चाहते है कि आपके ही एक न्यायालय ने हम पर युद्ध जारी रखने का अभियोग लगाया है। अत इस स्थिति मे हमें युद्धबंदी समझा जाये और हमारे साथ युद्धबंदियो जैसा व्यवहार करते हुए हमे फांसी न देकर गोली से उड़ा दिया जाए ।’

” शीघ्र ही अंतिम संघर्ष आरंभ होने की दुदुभी बजेगी, उसका परिणाम निश्चयात्मक होगा I साम्राज्यवाद और पूंजीवाद अपनी अतिम घडियां गिन रहा है। हमने उनके विरुद्ध भाग लिया था और उसके लिए गर्व है।” राष्ट्रवीर सरदार भगतसिंह के ये शब्द दृढ संकल्प, साहस, शौर्य एवं निष्ठा के प्रतीक हैं। उनका यह अद्भुत क्षमा याचना-पत्र एक सपूर्ण जीवन दर्शन है I

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अमर भगतसिंह को जन्म देने वाली वीर माता श्रीमती विद्यावती जब अपने वीर पुत्र से फांसी दिये जाने के पूर्व अंतिम भेट करने गयी, तो हंसी के ठहाकों के साथ भगतसिंह ने कहा – बेबेजी, लाश लेने आप मत आना, कुशबीर को भेज देना, कही आप रो पडी, तो लोग कहेंगे कि भगतसिंह की मां रो रही है। इतना कहकर वे पुन इतनी जोर से हसे कि जेल के अधिकारी चकित रह गये।

फांसी के पूर्व भगतसिंह ने डिप्टी कमिश्नर से कहा, “मजिस्ट्रेट महोदय आप भाग्यशाली है कि आप अपनी आंखों से यह देखने का अवसर पा रहे है कि भारत के क्रांतिकारी किस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक अपने सर्वोच्च आदर्श के लिए मृत्यु का आलिंगन कर सकते है ।”

सर्वत्र विरोध एवं प्रदर्शन को देखते हुए भगतसिंह को अपने दोनों साथियो सहित तय किए गए दिन से एक दिन पहले ही यानी 23 मार्च सन् 1931 को फासी दे दी गयी। उस दिन एक ओर लाहौर जेल का फांसीघर बेडियों की झंकार से झकृत था, दूसरी ओर वे वीर अलमस्त स्वर में बाहों मे बाहँ डाले गाते जा रहे थे

‘दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत,

मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी ।’

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वस्तुत. भगतसिंह की मृत्यु कोई साधारण मृत्यु न थी, वह भावी पीढ़ियो के लिए जीवन-द्वार खोल गई। भगतसिंह के क्रांतिकारी कार्यों तथा उसके बलिदान ने अंग्रेज शासन की जड़ों को गहरा धक्का दिया था और जनता के हृदय में उसके उखाड़ फेंकने की तीव्र भावना भर दी थी। उनका नाम समस्त भारत में सशस्त्र क्रांति का प्रतीक बन गया। उन्होंने अपनी सर्वोच्च राष्ट्रीय भावना एवं आत्माहुति से जो लोकप्रियता प्राप्त की, वह अविश्वसनीय थी।

हम नौजवानो का यह फर्ज बनता हैं की उनकी शहादत को मरते दम तक याद रखे और इस महान राष्ट्रपुत्र के सपनो का भारत निर्माण करने में अपने आप को झोंक दे I

Chhava

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