Batukeshwar Dutt – बटुकेश्वर दत्त

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देश की स्वतंत्रता के लिए अनेक वीर देशभक्तों ने निस्स्वार्थ भाव से संघर्ष किया। उनमें से कई के बारे में तो हम अच्छी तरह से जानते हैं, लेकिन कई स्वतंत्रता सेनानी अनजाने ही रह गए। कई ऐसे भी हैं, जिनके नाम अपने साथियों की शोहरत के पीछे छिप गए। ऐसे ही एक स्वतंत्रता सेनानी थे बटुकेश्वर दत्त, जो एसेंबली बम कांड में भगत सिंह के साथी थे।

Batukeshwar Dutt – बटुकेश्वर दत्त

जन्म और प्रारंभिक जीवन – बटुकेश्वर दत्त गोष्ठबिहारी दत्त के बेटे थे। बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवंबर, 1910 को बर्दवान जिले के छोटे से गाँव ‘ ओएरी’ में हुआ था। उन्हें बी.के. दत्त, बट्टू और मोहन नाम से भी जाना जाता था। वे बर्दवान जिले के खांडा और मौस में भी रहे। उन्होंने कानपुर हासिल की। के पी.पी.एन. सिंह हाई स्कूल से पढ़ाई की और स्नातक की उपाधि हासिल की I

क्रांति के पथ पर अग्रेसर – बटुकेश्वर चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के निकट सहयोगी थे। वे भारत के क्रांतिकारियों के सशक्त संगठन ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी’ के सदस्य थे। बटुकेश्वर सन् 1924 में कानपुर में भगत सिंह के संपर्क में आए थे। कानपुर में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन के सदस्य रहते हुए उन्होंने बम बनाना सीखा। आगे चलकर जब अंग्रेज सरकार के ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ का विरोध करने के लिए सेंट्रल एसेंबली में बम फेंकने की योजना बनी तो उनकी बम बनाने की यह कला काम आई।

साइमन कमीशन के विरोध में हुए प्रदर्शन को कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा कराए गए लाठीचार्ज में 30 अक्तूबर, 1928 को लाला लाजपतराय गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें छाती में गंभीर चोटें आई और 17 नवंबर, 1928 को उनकी मौत हो गई। इससे पूरे देश में उपद्रव फैल गया और राजनीतिक स्थिति विकट हो गई क्योंकि क्रांतिकारियों ने ‘खून का बदला खून’ का नारा दे दिया था।

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Bhagat Singh – भगत सिंह

युवाओं में जोश और देशभक्ति की भावना पैदा हो गई। लाला लाजपतराय की मौत का बदला क्रांतिकारियों ने अपनी पहली प्राथमिकता बना लिया था। उन लोगों ने स्कॉट की हत्या की योजना बनाई लाला लाजपतराय की मौत के ठीक एक माह बाद जयगोपाल, राजगुरु, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुखदेव ने लाहौर में जे.आर. सांडर्स की हत्या कर दी। सांडर्स ने ही लाला लाजपतराय और अन्य प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज का आदेश दिया था।

असेम्बली में बेम फेंके – पुलिस के हाथों में और अधिक शक्ति देने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारत सुरक्षा अधिनियम’ पारित किया। इस अधिनियम को पारित कराने का मुख्य उद्देशा क्रांतिकारियों का दमन करना था, जो दिनोदिन उग्र होते जा रहे थे। इसके जरिए क्रांतिकारी गतिविधियों से किसी भी तरह का संबंध रखनेवाले को गिरफ्तार करने का अधिकार पुलिस को मिल गया था। हालांकि, यह अधिनियम पारित नहीं हो सका इसलिए इसे अध्यादेश के जरिए लागू करवाया गया और दावा किया गया कि जनहित में है।

क्रांतिकारियों की गतिविधियाँ शांत नहीं हुई। उन्होंने अब सेंट्रल एसेंबली में बम फेंकने की योजना बनाई, जहाँ इस अध्यादेश को पारित कराया जा रहा था। भगत सिंह ने इस काम को पूरा करने का बीड़ा उठाया। यह बहुत जोखिम भरा कार्य था, क्योंकि इसमें गिरफ्तारी हो सकती थी और उसके गंभीर परिणाम हो सकते थे। ब्रिटिश सरकार भारत की सत्ता को अपने हाथ से फिसलते देख बहुत गुस्से में थी।

Batukeshwar Dutt – बटुकेश्वर दत्त

चंद्रशेखर आजाद पहले नहीं चाहते थे कि भगत सिंह एसेंबली बमकांड को अंजाम दें। भगत सिंह युवा और निडर थे तथा चंद्रशेखर आजाद को उनकी तरह के दिग्गजों की अन्य कार्यों में आवश्यकता थी। हालांकि भगत सिंह ने किसी की नहीं सुनी। वे प्रण कर चुके थे। अन्य क्रांतिकारियों ने भी आजाद को सहमत होने पर मजबूर किया।

आखिरकार, तय हुआ कि भगत सिंह किसी एक साथी के साथ जाएँगे और एसेंबली में बम फेंकेंगे। चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह के साथ के लिए बटुकेश्वर दत्त को चुना। दोनों को असेम्बली में बम फेंककर वहाँ मौजूद लोगों का ध्यान खींचने और फिर परचे फेंकने का निर्देश दिया गया।

8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल एसेंबली के गलियारे में दो बम और परचे फेंकते ‘इनकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाए। बमो से किसी को नुकसान नहीं हुआ और न ही उनका कोई ऐसा इरादा ही था। वे तो सिर्फ सरकार का ध्यान इस ओर खींचना चाहते थे कि जनता उस अध्यादेश के खिलाफ है। बम फेंकने के बाद दोनों ने स्वयं ही समर्पण कर दिया और गिरफ्तार हो गए।

Batukeshwar Dutt – बटुकेश्वर दत्त

बम फेंकने के बाद पैदा हुई अफरा-तफरी में वे चाहते तो आसानी से भाग सकते थे, लेकिन वे ऐसा चाहते ही नहीं थे। बम से कोई हताहत नहीं हुआ। गिरफ्तारी के समय भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त, दोनों ने माना कि यह काम उन्होंने ही किया था। 6 जून, 1929 को सेशन कोर्ट में दोनों ने बयान दिया कि बम फेंकने का उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था, बल्कि बहरी ब्रिटिश सरकार तक अपनी आवाज पहुँचाना था, जो जनता की अनसुनी करने पर तुली हुई थी।

बम फेंकने का उद्देश्य सिर्फ धमाके करना था। इतना ही नहीं, बम फेंके भी उस जगह गए थे, जहाँ कोई व्यक्ति मौजूद ही नहीं था। ऐसे में किसी के घायल होने की आशंका तक नहीं थी। बम बटुकेश्वर दत्त ने ही बनाए थे, जिन्होंने कानपुर में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के सदस्य के रूप में बम बनाना सीखा था। ब्रिटिश फोरेंसिक अधिकारियों की जाँच में भी इसकी पुष्टि हुई।

बमो की तीव्रता भी इतनी नहीं थी कि उनसे कोई घायल हो पाता। इतने स्पष्ट सबूत के बावजूद दोनों पर हत्या के प्रयास का आरोप लगाया गया और 7 मई, 1929 को मुकदमा शुरू हो गया। गिरफ्तारी के बाद दोनों को जज लियोनार्ड मिडल्टन के सेशन कोर्ट में पेश किया गया, जिसने घोषणा की कि दोनों ने बम फेंकने की हरकत सुनियोजित रूप से की, क्योंकि बम से एसेंबली हॉल का डेढ़ इंच का लकड़ी का फर्श टूट गया था।

Batukeshwar Dutt – बटुकेश्वर दत्त

बटुकेश्वर दत्त का मुकदमा आसफ अली ने लड़ा, जबकि भगत सिंह ने अपना मुकदमा स्वयं लड़ने का फैसला किया था। ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ ने तय किया था कि दोनों अपने को गिरफ्तार कराएँगे और बम फेंकने के बाद भागेंगे नहीं। वे अदालती काररवाई का उपयोग क्रांतिकारी विचारधारा के प्रसार के लिए करना चाहते थे, क्योंकि उस समय अखबारों पर सेंसरशिप लगी थी और क्रांतिकारियों को अपने विचार जनता तक पहुँचाने के लिए माध्यम की आवश्यकता थी।

अखबारों को अदालती काररवाई विस्तार से छापने की छूट थी। हालांकि बाद में सरकार को यह समझ में आ गया और उसने यह संभावना भी खत्म कर दी। दोनों पर मुकदमा चला और दोनों को दोषी ठहराते हुए दंड संहिता की धारा 307 एवं विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के अनुच्छेद 4 के तहत उन्हें काले पानी की सजा सुनाई गई। बटुकेश्वर दत्त पर सिर्फ एसेंबली बमकांड का ही मुकदमा चला और सन् 1929 में दिल्ली के सेशन कोर्ट ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी।

जेल में भूख हड़ताल – भगत सिंह को मियाँवाली जेल में रखा गया तो दत्त को लाहौर जेल भेज दिया गया। भगत सिंह ने जेल में देखा कि यूरोपीय कैदियों और भारतीय कैदियों के साथ बहुत भेदभाव होता है। उन्होंने इस भेदभाव के विरोध में भूख हड़ताल शुरू कर दी। कुछ दिनों बाद भगत सिंह को लाहौर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। वहाँ भगत सिंह और दत्त, दोनों ने मिलकर भारतीय राजनीतिक कैदियों के अधिकारों और उनके लिए बेहतर सुविधाओं की मांग करते हुए भूख हड़ताल शुरू करवा दी।

Batukeshwar Dutt – बटुकेश्वर दत्त

जेल में बंद राजनीतिक कैदियों के साथ भी ब्रिटिश अधिकारी आम कैदियों की तरह बुरा व्यवहार करते थे। यूरोपीय कैदियों को बेहतर सुविधाएँ मिलती थी और उनका भोजन भी अन्य कैदियों से बेहतर होता था। भगत सिंह और बी. के. दत्त ने जेल में ही इसका विरोध किया और भूख हड़ताल शुरू कर दी। उन्होंने माँग की कि भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ यूरोपीय कैदियों की तरह बेहतर व्यवहार किया जाए और उन्हें अन्य कैदियों के साथ कोठरियों में न रखा जाए।

सरकार ने भूख हड़ताल खत्म कराने का भरसक प्रयास किया और कैदियों को तरह-तरह के पकवान देने का लालच दिया। पानी के लिए रखे गए घड़ों में दूध तक भर दिया गया। हालांकि भूख हड़ताल जारी रही। जब सरकार के सारे प्रयास असफल हो गए तो उसने अन्य तरीके अपनाए। भूख हड़ताल पर बैठे कैदियों को नली के जरिए जबरदस्ती खाना खिलाने की कोशिश की गई। यह प्रयास भी असफल रहा; क्योंकि कैदी किसी भी तरह से मानने को तैयार नहीं हुए।

भूख हड़ताल की काररवाई बहुत लोकप्रिय हो गई और देश भर में चर्चा का विषय बन गई। सरकार ने तभी सांडर्स हत्याकांड का मुकदमा शुरू कर दिया, जिसमें भगत सिंह शामिल थे। उनका स्वास्थ्य इतना कमजोर हो चुका था कि उन्हें सुनवाई के लिए स्ट्रैचर पर लिटाकर ले जाया जाता था। इसी बीच 63 दिनों की भूख हड़ताल के बाद एक कैदी जतिंद्रनाथ दास की मौत हो गई। इस घटना के बाद कई कैदियों ने भूख हड़ताल खत्म कर दी।

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बस, भगत सिंह और बी. के. दत्त डटे रहे। उन्होंने 24 जून, 1929 को लाहौर जेल से ही भारत सरकार के गृह सचिव को पत्र लिखा। उन्होंने माँग की कि राजनीतिक कैदियों को बेहतर भोजन दिया जाए, जो कम-से-कम यूरोपीय कैदियों को मिलनेवाले भोजन की तरह तो हो। उन्हें कठोर श्रम और घटिया काम करने पर बाध्य न किया जाए। किताबें और लेखन सामग्री उपलब्ध कराई जाए। कम-से-कम एक दैनिक अखबार दिया जाए।

उन्हें विशेष वार्ड में रखा जाए। इसके अलावा, उन्होंने बेहतर कपड़े और प्रसाधन सामग्री की भी माँग की। उनके साथ ‘बेहतर श्रेणी’ के कैदी का व्यवहार किया जाए। पत्र में उन्होंने आगे लिखा था कि जेल अधिकारियों ने उनसे कहा है कि उच्च अधिकारियों ने ये माँगें मानने से इनकार कर दिया है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी मांग की कि उन्हें जबरदस्ती भोजन न कराया जाए।

बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ सांडर्स हत्याकांड का मुकदमा हटा लिया गया, पर उन्हें एसेंबली बम कांड में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। भगत सिंह को सांडर्स हत्याकांड में दोषी ठहराया गया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। सुखदेव और राजगुरु के साथ भगत सिंह को 23 मार्च, 1931 को फांसी पर लटका दिया गया। उनका अंतिम संस्कार पंजाब में फिरोजपुर के पास किया गया।

Batukeshwar Dutt – बटुकेश्वर दत्त

” बटुकेश्वर दत्त भगत सिंह से बिछुड़ गए और उन्हें सेल्युलर जेल भेज दिया गया। जहाँ भी उन्होंने दो बार भूख हड़ताल की पहली मई 1933 में, और दूसरी जुलाई 1937 में। 1938 में बाँकीपुर जेल से रिहा कर दिया गया। रिहाई के बाद बटुकेश्वर दत्त को क्षयरोग हो गया। अपनी खराब सेहत के बावजूद उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा छेड़े गए ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में हिस्सा लिया। उन्हें फिर से चार साल की सजा हुई।

स्वतंत्रता के बाद का जीवन – नवंबर 1947 में उन्होंने अंजलि से विवाह किया स्वतंत्रता के बाद उन्हें कोई मान-सम्मान या पहचान नहीं मिली। उनके बुरे दिन बने रहे और एक सिगरेट कंपनी के एजेंट तथा एक टूरिस्ट एजेंट का काम करके वे अपना जीवन यापन करते रहे। उनकी पत्नी एक निजी स्कूल में काम करती थीं। इतनी कठिनाइयों और गुमनामी के जीवन के बावजूद उन्होंने अपना आत्म-गौरव कभी नहीं खोया।

भारत माँ की गोदी में आखरी सांस ली – अपने आखिरी दिन उन्होंने राजनीतिक चकाचौंध से दूर गरीबी में गुजारे और 20 जुलाई, 1965 को लंबी बीमारी के बाद दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में उनका निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार पंजाब में फिरोजपुर के पास हुसैनीवाला में उसी जगह किया गया, जहाँ उनके साथी भगत सिंह, राजगुरु सुखदेव का अंतिम संस्कार कई सालों पहले किया गया था।

Batukeshwar Dutt – बटुकेश्वर दत्त

उनके परिवार में सिर्फ एक बेटी श्रीमती भारती बागची हैं, जो पटना में जक्कनपुर इलाके में रहती हैं। उनकी मौत के बाद दिल्ली में एक निजी आवासीय कॉलोनी का नाम बी. के. कॉलोनी रखा गया। यह कॉलोनी सफदरजंग हवाई अड्डे के सामने, जोरबाग के पास स्थित है।

प्रसिद्ध लेखक न्यायमूर्ति अनिल वर्मा ने उनके बारे में शोध किया और लखनऊ पोस्टिंग के दौरान हिंदी में एक किताब लिखी- ‘बटुकेश्वर दत्त भगत सिंह के सहयोगी’। पुस्तक का लोकार्पण 18 नवंबर, 2010 को दत्त के जन्म शताब्दी वर्ष में उनकी बेटी ने किया था। इस पुस्तक का प्रकाशन भारत सरकार के उपक्रम नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया है। बटुकेश्वर दत्त पर किसी भी भाषा में लिखी गई यह पहली पुस्तक है।

पुस्तक में खुलासा किया गया है कि दत्त ने जेल में लंबा समय बिताया और उस दौरान उन पर अमानवीय अत्याचार हुए थे। न्यायमूर्ति वर्मा ने लिखा है कि स्वतंत्रता के बाद दत्त के साथ जो व्यवहार हुआ, उससे उनकी बेटी बहुत आहत हैं। अन्य क्रांतिकारियों के ठीक विपरीत उनकी मौत गुमनामी में हुई। उनके बलिदान के सम्मान में न कोई डाक टिकट जारी हुआ और न ही कोई स्मारक बनाया गया। न्यायमूर्ति वर्मा ने इस महान् स्वतंत्रता सेनानी की याद में डाक टिकट जारी करने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय को लिखा, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।

Batukeshwar Dutt – बटुकेश्वर दत्त

हम सब भारतीयों की जिम्मेदारी हैं की बटुकेश्वर दत्त और इन जैसे कई अन्य स्वतंत्र सेनानी जिन्होंने अपनी जान की बाज़ी लगाकर हमे स्वतंत्रता दिलाई उनको उचित सम्मान दे और उनका गौरयान्वित इतिहास दुनिया के सामने लाये I उनके बारे में पढ़े हमारी अगली पीढ़ी को उनकी गौरव गाथा सुनाये I उनके बारे में व्याख्यान आयोजित करे I बच्चे उनका विषय वक्तृत्व स्पर्धा के लिए चुने और उनका सम्मान करे I

Chhava

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