Battle of Khanwa – खानवा का युद्ध

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खानवा का युद्ध बाबर और राणा सांगा के बिच हुआ था जिसमे बाबर ने राणा सांगा को हरा दिया था I जब मध्य एशिया में बाबर अपना राज्य स्थापित करने में असफल रहा तो लोदी सरदारों के आमंत्रण पर वह भारत आया और उसने यहाँ अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहाI उसने दिल्ली को जीत लिया. बाबर के लिए दिल्ली पर अधिकार करना सरल था. किन्तु अपनी शक्ति को दृढ़ बनाये रखना कठिन था I

Battle of Khanwa – खानवा का युद्ध

उत्तर पश्चिम भारत की विजय और पानीपत में इब्राहिम लोदी की हार ने बाबर को केन्द्रीय हिंदुस्तान का स्वामी बना दिया था. लेकिन अब भी उसके समक्ष दो प्रतिद्वंदी थे राजपूत और अफगान. बाबर ने पानीपत के युद्ध के बाद अफगानों की शक्ति को कुचल दिया था। अब उसने मेवाड़ के राणा सांगा अथवा संग्रामसिंह से निपटने का निश्चय किया।

युद्ध के कारण –

(1) राणा सांगा राजस्थान के सबसे शक्तिशाली सरदार थे । वह असाधारण युद्ध सामग्री और साधनों के स्वामी थे। कर्नल टॉड के अनुसार, ‘अस्सी हज़ार घुडसवार, बड़े-बड़े नरेश ७ राव और 104 रावल तथा रावत हर समय उनके इशारे पर रणक्षेत्र में कूदने के लिए तैयार रहते थे।राणा सांगा की शक्ति को कुचले बिना बाबर सम्पूर्ण उत्तरी भारत का शासक नहीं बन सकता था। इसके अतिरिक्त राणा सांगा भारत में हिन्दू साम्राज्य अथवा ‘हिन्दु-पद-पादशाही’ स्थापित करना चाहता थे।

(2) सांगा का यह विचार था कि बाबर भी अन्य मुस्लिम आक्रमणकारियों की भांति धन-दौलत लूटकर भारत से चला जाएगा। इस प्रकार उन्हें भारत में हिन्दू पद- पादशाही स्थापित करने का अवसर मिल जायेगा, लेकिन जब उन्हें बाबर के इस निश्चय का पता चला कि वह भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना करेगा, तो उनके सम्मुख केवल एक ही मार्ग था बाबर से युद्ध। संक्षेप में, सांगा और बाबर की परस्पर विरोधी महत्त्वकांक्षाओं के कारण दोनों के बीच युद्ध अनिवार्य हो गया था।

Battle of Khanwa – खानवा का युद्ध

(3) कहा जाता है कि जब बाबर काबुल में था, तब सांगा और उसके बीच एक सन्धि हुई थी। बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ‘जब में काबुल में था और हिन्दुस्तान नहीं आया था, उन दिनों राणा सांगा ने अपना राजदूत मेरे पास भेजा था और उसके द्वारा मेरे प्रति सम्मान प्रकट किया गया था।

उस राजदूत के द्वारा यह निश्चय हो गया कि बादशाह काबुल से चलकर दिल्ली पर आक्रमण करे और उसी समय में आहारा पर करूंगा। इस प्रकार निश्चय हो जाने के बाद राणा सांगा का राजदूत काबुल से लौटकर चला गया था। पूर्व में की गई सन्धि के अनुसार सांगा ने पानीपत युद्ध के समय इब्राहीम लोदी पर आक्रमण नहीं किया। अत: बाबर ने सांगा पर वचन मंग करने का दोष लगाया यह युद्ध का एक कारण बना।

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(4) राणा सांगा ने बाबर को उखाड़ फेंकने के लिए इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी और हसन खां मेवाती से गठजोड़ कर लिया था। बाबर इस राजपूत अफगान गठबन्धन को अपने लिए खतरनाक मानता था। इसी कारण एस. आर. शर्मा ने लिखा है कि, ‘यह युद्ध मुसलमानों के विरूद्ध हिन्दुओं का युद्ध न था, बल्कि एक विदेशी शत्रुओं के विरूद्ध संयुक्त राष्ट्रीय प्रयत्न था।’

(5) पानीपत के युद्ध के बाद बाबर ने बयाना पर अधिकार कर लिया था। सांगा बयाना को अपने अधीन समझता था। अतः सांगा ने बयाना पर पुनः अधिकार कर लिया। अतः दोनों पक्षों के बीच युद्ध अनिवार्य हो गया था।

Battle of Khanwa – खानवा का युद्ध

युद्ध की घटनाएं

फरवरी, 1527 ई. में दोनों पक्षों की सेनाएं आगरा के पास कनवाहा के रणक्षेत्र में एकत्र हो गई। युद्ध आरम्भ होने से पूर्व बाबर को एक विचित्र कठिनाई का सामना करना पड़ा। जब राजपूतों ने मुगलों के अग्रिम पहरियों को हरा दिया, तो इससे मुगल सैनिकों में बड़ी निराशा फैल गई। इसी समय रणक्षेत्र में उपस्थित ज्योतिषी मुहम्मद शरीफ ने यह भविष्यवाणी की कि इस युद्ध में विजय राजपूतों की होगी।

इसने मुगल सैनिकों को अधिक निरुत्साहित कर दिया। ऐसे संकट के समय में भी बाबर ने असाधारण योग्यता तथा धैर्य का परिचय दिया। बाबर ने अपने सैनिकों में आत्मविश्वास और उत्साह का संचार करने के लिए शराब के भण्डार को पृथ्वी पर बहा दिया, शराब के पात्रों को तोड़ डाला और आजीवन शराब न पीने की शपथ ली। उसने ज्योतिषी को भला-बुरा कहकर बन्दीगृह में डाल दिया।

Battle of Khanwa – खानवा का युद्ध

इस नाटकीय कार्य के बाद बाबर ने मुगल सैनिकों को सम्बोधित करते हुए । कि-‘सरदारों और सिपाहियों, प्रत्येक व्यक्ति जो इस संसार में आता है, नाशवान है। जब हम लोग मर जाते हैं और इस संसार से चल बसते हैं, तो केवल ईश्वर ही अपरिवर्तनीय होकर अमर रहता है। जो कोई भी जीवन मौज में बिताता है, उसे समाप्त होने से पहले ही उसको मृत्यु का प्याला पीना पड़ता है I

जो मृत्यु की सराय में पहुंचता है, उसका दुनिया से, जो दुःखों का घर है, लौट जाना निश्चित है बदनामी के साथ जीने की अपेक्षा सम्मान के साथ मरना कितना अच्छा है। यश के साथ मरूं भी, तो में सन्तुष्ट हूं। इसकारण कि यह यश हमारा हो, क्योंकि शरीर तो मौत का अधिकार है।

सबसे सच्चे ईशवर ने हम लोगों के प्रति दया दिखाई है और हमें ऐसे संकट में दिया है कि यदि हम लड़ाई के मैदान में खेलते रहते हैं, तो शहीद की मौत मरते है। यदि जीवित रहते हैं, तो ईश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करते हुए विजयी निकलते है।

Battle of Khanwa – खानवा का युद्ध

इसलिए आओ हम लोग एक स्वर से अल्लाह के पवित्र नाम की शपथ ग्रहण कर कि जब तक आत्मा हमारे शरीर को छोड़ नहीं जाती, तब तक हम में से कोई भी इस युद्ध भूमि से मुंह मोड़ने की बात नहीं सोचेगा और न ही इस युद्ध और रक्तपात से, जो आगे होने जा रहा है, भागेगा। बाबर के इस भाषण ने मुगल सैनिकों में प्राण फूंक दिये और प्रत्येक सैनिक ने पवित्र “कुरान को उठाकर बाबर का साथ देने की सौगन्ध खाई।

17 मार्च, 1527 ई. को राजपूतों और मुगलों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में राजपूतों की बुरी तरह पराजय हुई। ऐसा कोई भी राजपूत दल नहीं रहा, जिसके श्रेष्ठ नायक का रक्त न बहा हो।’ राणा सांगा बुरी तरह घायल हुए। उसे मूर्छित अवस्था में उस भूमि से ले जाया गया। इस आकस्मिक घटना से राजपूतों में भगदड़ मच गई। विजय बाबर की हुई। बाबर ने इस समय ‘गाजी’ की उपाधि धारण की।

युद्ध का महत्व एवं परिणाम

कनवाहा का युद्ध भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। इस युद्ध के परिणामस्वरूप बाबर के लिए मुगल साम्राज्य स्थापित करना का कार्य सुगम हो गया। बाबर निश्चयपूर्वक इब्राहीम लोदी के सिंहासन पर बैठ गया। भाग्य की खोज में घूमने के उसके दिन समाप्त हो गये। इस युद्ध से बाबर के जीवन में एक महत्त्वपूर्ण अध्याय आरम्भ हुआ रशबुक विलियम्स के अनुसार, अब उसके भाग्य की खोज में भटकने के दिन समाप्त हो गये थे।

Battle of Khanwa – खानवा का युद्ध

उसका भाग्य जाग उठा था और अब उसे अपने आपको इस भाग्य के योग्य सिद्ध करना था। निः सन्देह उसे कई और युद्ध लड़ने थे, परन्तु ये युद्ध शक्ति के विस्तार, शत्रुओं के दमन तथा राज्य में व्यवस्था लाने के लिए थे, सिंहासन प्राप्ति के लिए नहीं।” इस युद्ध के परिणामस्वरूप राजपूत शक्ति को गहरा आघात पहुंचा। सैनिक संगठन छिन्न-भिन्न होने से उनकी शक्ति क्षीण हो गई और राजपूतों का वैभव नष्ट हो गया I

लेनपूल के अनुसार, ‘कनवाहा का युद्ध राजपूतों के लिए इतना विनाशकारी सिद्ध हुआ कि कोई विरली ही ऐसी राजपूत जाति होगी, जिसके श्रेष्ठ योद्धा इस युद्ध में काम न आये हो एस. आर. शर्मा के शब्दों में, ‘राजपूतों की सर्वोचता का भय, जो गत दस वर्षों से मंडरा रहा था, वह सदैव के लिए समाप्त हो गया।

‘डॉ. आर. पी. त्रिपाठी के अनुसार, ‘इस युद्ध का प्रभाव बहुत दूर तक पहुंचा राजपूत संगठन का अस्तित्व जाति, बन्धुत्व, धर्म या संस्कृति के किसी बौद्धिक आधार पर न था, वह केवल उदयपुर राजघराने के ऐश्वर्य, उसके लड़ाकू नेताओं के सैनिक या कूटनीतिज्ञ विजयों पर आधारित था। इस घराने का नैतिक ऐश्वर्य अस्त हुआ, तो राजपूत संगठन मी विकृत हुआ।

Battle of Khanwa – खानवा का युद्ध

उत्तरी भारत के मुस्लिम राज्य अपने अस्तित्व के लिए चिन्तित थे। राजपूत संगठन के टूटने पर उनका दुःखद स्वप्न भंग हुआ। बहुत से सशक्त राजपूत सरदारों के विनाश और राणा की निर्बलता से राजपूत संगठन में टूट-फूट होने लगी तो पड़ोसी राज्यों के लिए राजपूताना पर आक्रमण का मार्ग खुल गया और वे शीघ्र ही इसके लिए तैयार भी हो गये।

कनवाहा की विजय ने मुगल साम्राज्य के बीच के मार्ग से बहुत बड़ी बाधा हटा दी। बाबर ने गाजी की उपाधि ग्रहण की और भारत में उसकी गद्दी पूर्णतया सुरक्षित हो गई। उसकी शक्ति का आकर्षण केन्द्र निश्चित रूप से काबुल से हटकर भारत में आ गया। राजपूतों की पराजय से अफगानों की शक्ति को भी धक्का लगा। राजपूताना के अथक और स्वतंत्र शासकों की सहायता से ये मुगलों के जीतने हेतु भीषण प्रतिद्वन्द्वी हो सकते थे, उतना अकेले होने पर उनके लिए असम्भव था।

राजपूतों की पराजय से हिन्दू पद-पादशाही की स्थापना का भय जाता रहा। डॉ. आर. सी. मजूमदार के अनुसार, ‘दिल्ली सल्तनत के ऱ्हास से उत्साहित होकर राजपूत अपने सैनिक-शक्ति के पुनरुत्थान की जो आशा लिए हुए थे, वह इस युद्ध के परिणामस्वरूप समाप्त हो गई, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि राजनीतिक क्षेत्र से राजपूतों का प्रभाव सदैव के लिए समाप्त हो गया।

Battle of Khanwa – खानवा का युद्ध

केवल तीस वर्ष के बाद उन्हें मुगल साम्राज्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो गया और उन्होंने मुगल साम्राज्य के इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला I इस विजय के बाद बाबर की गतिविधियों का केन्द्र काबुल के बजाय हिन्दुस्तान हो गया। 

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