Battle of Karnal – करनाल का युद्ध

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करनाल का युद्ध 24 फ़रवरी, 1739 ई. को नादिरशाह और मुहम्मदशाह के मध्य लड़ा गया। औरंगजेब के उत्तराधिकारी अयोग्य तथा दुर्बल सिद्ध हुए, जिसके कारण उत्तरी-पश्चिमी सीमा असुरक्षित हो गई। अतः विदेशी आक्रमणकारियों ने उचित अवसर पाकर मुगल साम्राज्य पर आक्रमण किया और उसे भारी हानि पहुंचाई।

Battle of Karnal – करनाल का युद्ध

करनाल का युद्ध 24 फ़रवरी, 1739 ई. को नादिरशाह और मुहम्मदशाह के मध्य लड़ा गया। नादिरशाह के आक्रमण से भयभीत होकर मुहम्मदशाह 80 हज़ार सेना लेकर ‘निज़ामुलमुल्क’, ‘कमरुद्दीन’ तथा ‘ख़ान-ए-दौराँ’ के साथ आक्रमणकारी का मुकाबला करने के लिए चल पड़ा था।

नादिरशाह एवं उसका आक्रमण – नादिरशाह का वास्तविक नाम नादिरकुली था। उसका जन्म 1688 ई. में खुरासान में एक साधारण परिवार में हुआ था। 1727 ई. में उसने अफगान लूटेरों को ईरान से मार भगाया, जिसके कारण उसे बहुत ख्याति प्राप्त हुई। तत्पश्चात् उसने ईरानी शासक शाहन्हमासक का भागीदार बनकर देश के एक भाग पर शासन करना प्रारम्भ कर दिया। 1736 ई. में शाहन्हमासक की मृत्यु हो गई। उसका कोई वंशज न होने के कारण नादिरकुली ईरान का शासक बन गया और उसने नादिरशाह की उपाधि धारण की। इसके बाद नादिरशाह ने राज्य विस्तार की नीति पर चलते हुए भारत-विजय की योजना बनाई।

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भारत पर आक्रमण के कारण – नादिरशाह के भारत पर आक्रमण करने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे I

(1) नादिरशाह अफगानिस्तान के अफगानों की शक्ति को नष्ट करना चाहता था। मुगल सम्राट मुहम्मदशाह ने दो बार उसे सहायता का आश्वासन दिया, परन्तु कोई सहायता नहीं दी। अतः नादिरशाह मुगल साम्राज्य का शत्रु बन गया।

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(2) मुगल सरकार के बहुत से अमीरों तथा दरबारियों ने नादिरशाह को पत्र लिखे और उसे भारत पर आक्रमण करने की प्रेरणा दी।

(3) नादिरशाह भारत की असीम धन-दौलत प्राप्त करना चाहता था।

(4) वह अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था।

भारत पर आक्रमण – मई, 1738 ई. में नादिरशाह एक विशाल सेना के साथ भारत पर आक्रमण करने के लिए रवाना हुआ। उसने लाहौर के सूबेदार जकरियां खां को पराजित कर पंजाब तक के प्रदेश पर अधिकार कर लिया। इसके बाद नादिरशाह ने दिल्ली की और कुंच किया। मुगल सम्राट ने राजपूतों, मराठों तथा सिक्खों से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया, परन्तु उसे कहीं से सहायता प्राप्त नहीं हुई। अन्त में यह खान दौरां, सआदत खातं एवं निजाम-उल-मुल्क जैसे सेनापतियों के साथ 80 हजार योद्धाओं को लेकर पंजाब की ओर बढ़ा।

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करनाल का युद्ध (13 फरवरी, 1739 ई.) – 13 फरवरी, 1739 ई. के दिन मुगल सम्राट मुहम्मदशाह और नादिरशाह की सेना के बीच करनाल नामक स्थान पर घमासान युद्ध हुआ। यद्यपि खाने दौरों और उसके सैनिकों ने युद्ध में वीरता का प्रदर्शन किया, परन्तु मुगल सेना पराजित हुई और नादिरशाह को युद्ध में निर्णायक विजय प्राप्त हुई।

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तत्कालीन लेखक आनंदराम का कहना है कि यदि इस युद्ध में मुगल सम्राट अपनी सैनिक टुकड़ी को सहायता के लिए समय पर सादत खां को भिजवा देता, तो उसे पराजय का मुंह न देखना पड़ता। एक और तत्कालीन लेखक की यह राय है कि यदि भारतीय सैनिकों के पास अच्छा तोपखाना होता, तो ईरानी कभी भी उनका सामना न कर सकते।

भारतीय सेना के पास रसद सामग्री का भी अभाव था। अतः मुगल सम्राट मुहम्मदशाह की पराजय हुई। कहा जाता है कि उस समय अनाज 6-7 रुपये सेर भी नहीं मिलता था। इन सबके बावजूद भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि नादिरशाह एक कुशल सेनानायक था, जिसे पराजित करना कोई आसान कार्य नहीं था, विशेषतः जबकि मुगल सम्राट स्वयं दुर्बल एवं अयोग्य था।

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दिल्ली में लूट-मार – नादिरशाह से पराजित होने के बाद दिल्ली सरकार की अवस्था बहुत शोचनीय हो गयी थी। इसे ध्यान में रखते हुए घायल खान दौरां ने वजीर तथा मीर बख्शी निजाम-उल-मुल्क से यह प्रार्थना की कि, ‘मुगल बादशाह को नादिरशाह के सामने न लाया जाए और न ही नादिरशाह को दिल्ली में प्रवेश करने का अवसर दिया जाए।

जिस प्रकार भी हो इस विपत्ति को रोकने का प्रयत्न किया जाए।’ खान दौरां के परामर्शानुसार निजाम-उल-मुल्क ने नादिरशाह से भेंट की और ईरानी विजेता ने 50 लाख रुपये युद्ध क्षति पूर्ति के रूप में लेकर ईरान वापस जाना स्वीकार कर लिया। उस समय सादत खां, जो निजाम-उल-मुल्क के बढ़ते हुए प्रभाव से ईर्ष्या करता था, ने देशद्रोह किया। उसने नादिरशाह को दिल्ली पर आक्रमण करने हेतु प्रोत्साहित किया।

इस पर नादिरशाह ने निजाम-उल-मुल्क को अपने पास रोक लिया और युद्ध क्षति पूर्ति के रूप में 10 करोड़ रुपये की रकम मांगी। ऐसी स्थिति में मुगल सम्राट को विवश होकर नादिरशाह के खेमे में आना पड़ा और उसे भी बन्दी बना लिया गया। इरविन के शब्दों में, ‘मुहम्मदशाह के बन्दी बन जाने से हिन्दुस्तान का द्वार खोलने की कुंजी नादिरशाह के हाथ में आ गई।

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मार्च, 1739 ई. में नादिरशाह ने बिना किसी प्रकार के विरोध के दिल्ली में प्रवेश किया। दुर्भाग्यवश उस समय कुछ शरारती लोगों ने नादिरशाही की मृत्यु की अफवाह फैला दी। इस पर भारतीयों ने कुछ ईरानी सैनिकों को मार डाला। एक तत्कालीन लेखक ने यह कहा है कि कुछ ईरानी सैनिकों को अनाज बेचने वालों से झगड़ा हो गया था I जिसमें उनकी मृत्यु हो गई।

ईरानी सैनिकों की मृत्यु का समाचार सुनकर नादिरशाह क्रोध से पागल हो गया और उसने 11 मार्च (रविवार) 1739 के दिन अपने सैनिकों को कत्ले आम करने का आदेश दे दिया। फलतः राजधानी में एक प्रलय सा आ गया। ईरानी सैनिकों ने बदले की भावना से प्रेरित होकर निर्दोष एवं निहत्थे लोगों को निर्दयतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया। कुछ ही घण्टों में नगर की गलियों तथा बाजारों में शवों का ढेर दिखाई देने लगे।

चांदनी चौक, सब्जी मण्डी, दरीबा बाजार एवं जामा मस्जिद के आसपास के भवन जलाकर राख कर दिये गये आनंदराम ने लिखा है कि ‘348 वर्ष पूर्व दिल्ली के नगरवासियों को तैमूर के आक्रमण के समय जिस विनाश का अनुभव हुआ था, उसी प्रकार का विनाश नादिरशाह और उसके सैनिकों ने किया। अन्त में मुगल सम्राट के क्षमा मांगने पर दोपहर के दो बजे रक्तपात बन्द कर दिया गया। कहा जाता है कि इन पांच घण्टों में 20,000 भारतीय मृत्यु का ग्रास हुए।’

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नादिरशाह को दिल्ली की लूट में अपार धन की प्राप्ति हुई। तत्कालीन ऐतिहासिक साधनों से पता चलता है कि हजारों अशरफियां तथा 60 लाख रुपये प्राप्त हुए। यही नहीं, उसे बहुत सा सोना भी प्राप्त हुआ, जिसका मूल्य लगभग एक करोड़ था। इसके अतिरिक्त उसे करोड़ों रुपयों के बहुमूल्य हीरे-जवाहरात भी हाथ लगे। संक्षेप में, नादिरशाह भारत से 15 करोड़ रुपये का माल लूट कर अपने साथ ले गया, जिसमें तख्ते ताऊस भी था और इसका मूल्य एक करोड़ रुपये था।

नादिरशाह का वापस ईरान लौटना – दिल्ली में लूटमार करने के बाद नादिरशाह ने शाहनशाह की उपाधि धारण की। उसने न केवल फरमान जारी किए, अपितु अपने नाम के सिक्के भी प्रचलित किए। इसके अतिरिक्त नादिरशाह ने यह आदेश दिया कि खुतबा उसके नाम का पढ़ा जाए। मुगल सम्राट् ने नादिरशाह को प्रसन्न करने के लिए उसे सिन्ध का पश्चिम प्रदेश दे दिया। इस पर नादिरशाह ने उसे फिर से दिल्ली का सम्राट बना दिया। उसने तथा पंजाब के सूबेदार ने वार्षिक कर देना स्वीकार कर लिया

आक्रमण के परिणाम – नादिरशाह का आक्रमण मुगल साम्राज्य के लिए भयंकर विनाशकारी सिद्ध हुआ। तैमूर के आक्रमण के बाद से लेकर नादिरशाह के आक्रमण करने तक अर्थात् 348 वर्षों से राजकोष तथा जनता के पास जो धन जमा हुआ था. नादिरशाह लूटकर ले गया। इसके अतिरिक्त सिन्ध पार के प्रदेश पर नादिरशाह का सीधा अधिकार हो गया। पंजाब का मुगल सूबेदार मुगल सम्राट के स्थान पर नादिरशाह का सूबेदार बन गया।

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उसने 20 लाख रुपये प्रतिवर्ष नादिरशाह को कर के रूप में देना स्वीकार किया। इस आक्रमण से भारतीय की आर्थिक स्थिति को एक गहरा आघात पहुंचा। नादिरशाह ने न केवल मुगल सम्राट मुहम्मदशाह को पराजित किया था, अपितु उसे बन्दी भी बना लिया था। इस प्रकार अपनी ही राजधानी में उसे एक विदेशी आक्रमणकारी के हाथों बन्दी बन कर रहने से उसकी प्रतिष्ठा को जबरदस्त आघात पहुंचा।

वह भारतीय जनता को ईरानी सैनिकों के अत्याचारों से बचाने में असफल रहा। उसका नाम सिक्के तथा खुतबे से हटा दिया गया। इसके अतिरिक्त जब नादिरशाह ने मुगल सम्राट के सिर पर भरी सभा में ताज रखा, तो उसने यह शब्द कहे, ‘मैं शाहिनशाह की कृपा से दिल्ली के राज्य सिंहासन पर पुनः आसीन हुआ हूं।’

इससे भी अधिक निराशाजनक बात यह थी कि नादिरशाह ने दिल्ली पर अधिकार करने के बाद दो महीने तक रंगरेलियां मनाई, परन्तु किसी भी प्रान्तीय सूबेदार ने मुगल सम्राट की सहायता के लिए नादिरशाह के विरूद्ध कोई भी कदम उठाने का साहस नहीं किया। इसके विपरीत मुगल दरबारी तथा सरदारों ने जी भरकर नादिरशाह की चापलूसी की, जिससे उनके नैतिक पतन का प्रदर्शन हुआ।

Chhava

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